शांति मेंशन के स्टडी रूम में इस वक्त माहौल कुछ अलग ही था। कमरे में विपुल जी, विशाल जी और अनील जी बैठे हुए विवेक का इंतजार कर रहे थे। तीनों के चेहरों पर गंभीरता थी और बीच-बीच में घड़ी की तरफ जाती नजरें साफ बता रही थीं कि उन्हें विवेक के आने का बेसब्री से इंतजार था।
कुछ देर बाद दरवाजा खुला और विवेक अंदर आया।उसे देखते ही विशाल जी की त्यौरियाँ चढ़ गईं।“इतनी देर कहाँ हो गई थी? कब से हम सब तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं।”
विवेक ने तुरंत सिर झुका दिया। “सॉरी, डैड... वो मैं...”विशाल, शांत हो जाओ,” विपुल जी ने बीच में ही रोकते हुए कहा। “कोई बात नहीं। शायद ट्रैफिक हो गया होगा... क्यों, बरखुरदार?”
“जी... जी, बड़े पापा,” विवेक ने जल्दी से जवाब दिया।
वह अभी ठीक से बैठ भी नहीं पाया था कि विपुल जी उसके पास आए और उसके कंधे पर हाथ रखकर धीमे से बोले, “हम्म... तो कब बता रहे हो सबको मंजरी के बारे में?”विवेक जैसे वहीं जम गया।उसकी आँखें फैल गईं। “वो... नहीं... ऐसा... कुछ...!”
विपुल जी के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आ गई। उन्होंने उसके कंधे पर प्यार से थपथपाया और उसके कान के पास झुककर बोले, “कोई बात नहीं। ऐसा होता है। लेकिन जल्द से जल्द सबको बता देना। अभी तो तुम्हारे बाप से तुम्हें बचा लिया है... देर हुई तो मैं भी कुछ नहीं कर पाऊँगा।”
विवेक कुछ पल उन्हें देखता रहा, फिर शर्मीली-सी मुस्कान उसके चेहरे पर आ गई।जी, बड़े पापा।”विपुल जी वापस अपनी जगह पर आकर बैठ गए। फिर अचानक उनके चेहरे की मुस्कान गायब हो गई और उसकी जगह गंभीरता ने ले ली।
उन्होंने धीमे स्वर में कहा, “चलिए... जिस बात के लिए हम सब यहाँ आए हैं, उस पर बात कर लेते हैं।”
कमरे में एकाएक खामोशी छा गई।विशाल जी और अनील जी ने एक-दूसरे की तरफ देखा। विवेक भी अब पूरी तरह गंभीर हो चुका था।विपुल जी ने कुछ क्षण सबको देखा, फिर बोले, “विवेक।”
“जी, बड़े पापा।”तुम युवराज सिंह चौहान के बारे में जितनी जल्दी हो सके, पूरी जानकारी पता लगाओ। विवेक की भौंहें सिकुड़ गईं। “युवराज सिंह चौहान?”
“हाँ,” विपुल जी ने गंभीर स्वर में कहा। “आज पार्टी में मैंने उस आदमी को देखा। पता नहीं क्यों, लेकिन उसे देखते ही मेरे मन में एक अजीब-सी बेचैनी हुई। कोई अच्छी फीलिंग नहीं आई।”
उन्होंने कुछ पल रुककर कहा, “कुछ तो है उस आदमी में... जो मुझे ठीक नहीं लगा।”
विशाल जी ने उनकी बात सुनकर कहा, “लेकिन भाईसाहब, ऐसा क्यों लग रहा है आपको? हो सकता है जैसे बाकी लोग उस टेंडर के सिलसिले में पार्टी में आए थे, वैसे ही वह भी आया हो।”
अनील जी ने भी सहमति में सिर हिलाया। “हाँ, जरूरी नहीं कि हर अजनबी के पीछे कोई वजह हो।”विवेक अब तक चुपचाप अपने बड़े पापा को देख रहा था। फिर उसने शांत लेकिन दृढ़ स्वर में कहा, “अगर बड़े पापा को ऐसा लग रहा है, तो जरूर कोई बात होगी।”
विशाल जी ने उसकी तरफ देखा।विवेक ने आगे कहा, “आज तक बड़े पापा ने किसी इंसान को पहचानने में धोखा नहीं खाया है। उनका अनुभव हम सबसे ज्यादा है। अगर उन्हें युवराज को लेकर कुछ गलत महसूस हुआ है, तो मैं उसकी तह तक जरूर जाऊँगा।”
विपुल जी ने उसकी तरफ देखा और धीमे से सिर हिला दिया।।मुझे भी यही चाहिए, विवेक। पता करो कि युवराज सिंह चौहान आखिर है कौन... उसका कारोबार क्या है, उसके रिश्ते कहाँ-कहाँ हैं और वह इस टेंडर के लिए यहाँ क्यों आया है।”
विवेक ने गंभीरता से कहा, “जी, बड़े पापा। कल नहीं... मैं आज से ही पता लगाना शुरू करता हूँ।”
कमरे में फिर खामोशी छा गई।किसी को नहीं मालूम था कि उसी वक्त, उसी शहर में एक दूसरा आदमी भी झा परिवार के बारे में जानकारी जुटाने का फैसला कर चुका था।और दोनों तरफ से शुरू हुई यह तलाश बहुत जल्द एक-दूसरे से टकराने वाली थी।
विपुल जी कुछ क्षणों तक चुप रहे। उनके चेहरे पर अब पहले जैसी सामान्य गंभीरता नहीं थी। बेटी की बात आते ही उनकी आँखों में एक पिता की चिंता साफ उतर आई थी। उन्होंने धीमे लेकिन बेहद दृढ़ स्वर में कहा, “राध्या का ध्यान रखना… खासकर तुम, विवेक। और इस टेंडर में उसे इन्वॉल्व मत करना। चाहे टेंडर मिले या न मिले, इस बार मैं नहीं चाहता कि राध्या इसमें शामिल हो।”
उनकी बात सुनते ही कमरे में मौजूद सभी लोग हैरानी से उनकी ओर देखने लगे। राध्या को किसी बिज़नेस डील से दूर रखने की बात विपुल जी ने पहले कभी नहीं कही थी। आखिर राध्या उनके लिए सिर्फ परिवार की एक सदस्य नहीं थी, बल्कि उनकी सबसे प्यारी बच्ची थी, जिस पर उन्हें जितना भरोसा था, उतनी ही उसकी सुरक्षा को लेकर चिंता भी रहती थी।
विशाल जी ने हैरानी से पूछा, “भैया, युवराज सिंह की बात तो समझ में आती है, लेकिन राध्या के लिए ऐसा क्यों? आप भी जानते हैं, वो इस टेंडर में हमारे ना चाहने के बावजूद शामिल होगी ही। और यकीनन टेंडर भी हमें मिल जाएगा। फिर आप उसे इससे दूर रखने की बात क्यों कर रहे हैं?”
विवेक ने भी बड़े पापा की ओर देखते हुए कहा, “हाँ, बड़े पापा… राध्या को इस तरह अलग करने की बात समझ नहीं आ रही। ऐसा क्या हुआ है, जो आप इस तरह की बातें कर रहे हैं? वैसे तो ‘जान’ को आप खुद हर बिज़नेस में शामिल करते हैं। फिर अचानक उसे इस टेंडर से दूर करने की बात क्यों?”
सबकी तरफ से बार-बार वही सवाल सुनकर विपुल जी का संयम टूट गया।तुम सबने नहीं देखा… मैंने देखा है।उनकी आवाज़ में इस बार गुस्से से ज्यादा अपनी बेटी को लेकर चिंता थी।
उन्होंने कुछ पल के लिए आँखें बंद कीं, जैसे पार्टी का वह दृश्य फिर से उनकी आँखों के सामने आ गया हो। फिर बोले, “युवराज सिंह को मैंने जिस तरह राध्या को देखते हुए देखा है, उसे मैं भूल नहीं पा रहा हूँ। तुम लोगों ने शायद उसकी नजरों पर ध्यान नहीं दिया, लेकिन एक पिता होने के नाते मेरी नजर अपनी बेटी पर थी… और उसके आसपास मौजूद हर उस इंसान पर भी, जिसकी नजर मेरी बच्ची पर थी।”
कमरे में बैठे सभी लोग शांत हो गए।उसकी आँखों में राध्या के लिए जो बेहिसाब सनक थी… जो बदनीयती थी, वो मुझे साफ दिखाई दे रही थी। पूरी पार्टी में उसकी नजर बार-बार सिर्फ राध्या पर जा रही थी। और फिर वो सीधे उसके पास गया और उसे डांस करने के लिए कहने लगा।”
विपुल जी की आवाज़ भारी हो गई।मैं ही नहीं, राध्या ने भी उसकी हरकत को समझ लिया था। उसने कितनी समझदारी से उसे इनकार किया और फिर तुम्हारे साथ डांस करने चली गई। उस वक्त उसने खुद को संभाल लिया, लेकिन एक पिता के तौर पर मैं उस आदमी की नजरों को कैसे नजरअंदाज कर दूँ?”
उन्होंने विवेक की ओर देखा।मैं पिता हूँ उसका, विवेक। भले ही उस पार्टी में मैं हर पल उसके पास नहीं था, लेकिन मेरी नजर हमेशा मेरी बच्ची पर रहती है। वो खुश है या परेशान… उसके आसपास कौन है… कौन उसे किस नजर से देख रहा है… शायद वो खुद न देख पाए, लेकिन एक पिता की नजर इन चीजों को महसूस कर लेती है।”
विपुल जी कुछ पल के लिए रुक गए। उनकी आँखों में अपनी बेटी को लेकर वही चिंता थी, जिसे वे शब्दों में पूरी तरह बयान नहीं कर पा रहे थे।
फिर उन्होंने दृढ़ स्वर में कहा, “मुझे नहीं पता युवराज सिंह के मन में क्या है, लेकिन उसकी नीयत मुझे ठीक नहीं लगी। और मैं अपनी बेटी की सुरक्षा के मामले में कोई लापरवाही नहीं कर सकता। इसलिए कह रहा हूँ।
राध्या को इस टेंडर से दूर रखना। चाहे टेंडर हमें मिले या नहीं… लेकिन अपनी बच्ची को किसी परेशानी में डालकर मुझे वो टेंडर नहीं चाहिए।”
“लेकिन बड़े पापा… जान ने ये बात मुझे क्यों नहीं बताई?”विवेक की आवाज में अब चिंता साफ झलक रही थी।
“तुम्हें मालूम है ना, वो सबकी परेशानियों का समाधान करती है, लेकिन अपनी परेशानी की भनक तक किसी को नहीं लगने देती। अब तक उसने जो भी किया है, अपनी सूझ-बूझ और समझदारी से किया है। और इस बार भी शायद उसके मन में यही चल रहा होगा कि ‘मैं सब संभाल लूँगी।’”
विवेक कुछ पल के लिए रुका, फिर विपुल जी की तरफ देखते हुए बोला,
“लेकिन बड़े पापा, आप उसके पिता हैं। आपको उसकी चिंता होना बिल्कुल स्वाभाविक है।”
विपुल जी ने उसकी बात ध्यान से सुनी। उनके चेहरे पर अब गुस्सा नहीं, बल्कि अपनी बेटी को लेकर एक गहरी चिंता थी।
उन्होंने धीमे स्वर में कहा,“बेटियाँ जब बड़ी हो जाती हैं, तो अक्सर अपनी माँ के ज्यादा करीब हो जाती हैं। जब छोटी होती हैं, तो अपने पिता से हर छोटी-बड़ी बात कह देती हैं। लेकिन बेटी के बड़ी हो जाने का ये मतलब बिल्कुल नहीं होता कि उसके पिता का ध्यान उस पर कम हो जाता है।”
उन्होंने एक पल रुककर सबकी ओर देखा।
“एक पिता अपनी जवान बेटी पर हर वक्त अपनी नजर नहीं रख सकता… और न ही उसे हर पल ये एहसास दिला सकता है कि वो उसकी निगरानी कर रहा है। लेकिन इसका मतलब ये भी नहीं कि उसे अपनी बेटी की चिंता नहीं होती।
फर्क सिर्फ इतना होता है कि बेटी पर किसकी नजर है… कौन उसे किस नजर से देख रहा है… इस पर एक पिता की नजर हमेशा रहती है।”
विपुल जी की आवाज में अब पिता होने का दर्द और चिंता दोनों साफ सुनाई दे रहे थे।मैं भी बेटियों का पिता हूँ। मुझे भी अपनी बच्चियों की बहुत फिक्र होती है। मैं उसे दिखाऊँ या न दिखाऊँ… मेरी नजर अपनी बेटियों पर हमेशा रहती है। और उन्हीं नजरों के बीच आज मुझे युवराज सिंह की नजर भी दिखाई दी।”
उन्होंने गंभीर होकर कहा,“उसकी नजर मुझे बिल्कुल पसंद नहीं आई। एक पिता होने के नाते मैं इतना तो समझ सकता हूँ कि कोई आदमी मेरी बेटी को किस नजर से देख रहा है।”
विपुल जी के आखिरी शब्दों के साथ कमरे का माहौल और भी गंभीर हो गया।सभी विपुल जी की बातें ध्यान से सुन भी रहे थे और समझ भी रहे थे। उनके चेहरे पर अब पहले वाली उलझन नहीं थी। हर किसी को एहसास हो चुका था कि विपुल जी की चिंता सिर्फ युवराज सिंह तक सीमित नहीं थी, बल्कि राध्या की सुरक्षा को लेकर थी।
कुछ देर बाद अनील जी और विशाल जी ने एक-दूसरे की ओर देखा। फिर अनील जी ने विपुल जी से पूछा, “फिर भाईसाहब, आगे क्या सोचा है?”
विपुल जी ने बिना देर किए कहा, “सबसे पहले राध्या और रिया को कुणाल के पास भेजने की तैयारी करो। उसके बाद सोचेंगे कि आगे क्या करना है।”
विशाल जी ने तुरंत उनकी ओर देखते हुए कहा, “लेकिन भैया, राध्या मानेगी?”
फिर थोड़ा सोचकर बोले, “रिया तो खुशी-खुशी मान जाएगी, लेकिन राध्या… वो हमारे अचानक लिए गए इस फैसले पर बहुत सारे सवाल करेगी। और उसे शक भी हो जाएगा कि हम उससे कुछ छिपा रहे हैं।”
विपुल जी ने कुछ क्षण सोचा, फिर उनकी नजर विवेक पर टिक गई।विवेक, तुम वंश से कॉन्टैक्ट करो। वो अगर राध्या से कहेगा, तो वो शायद इनकार नहीं करेगी।“जी, बड़े पापा।”
विवेक के जवाब के बाद विपुल जी कुछ पल शांत रहे। फिर उन्होंने गंभीर होकर ऊपर ठाकुर जी की ओर देखा। उनकी आवाज़ धीमी थी, लेकिन उसमें एक पिता की गहरी चिंता साफ सुनाई दे रही थी।
“ठाकुर जी… मेरी बच्ची पर कोई बड़ा संकट आने से पहले ही उसे खत्म कर देना।”
विपुल जी ने खुद को संभालते हुए कहा, “चलो, रात भी काफी हो गई है। कल सुबह एक बार फिर हम सब राध्या से बात करेंगे। अगर वो हमारी बात मान गई तो ठीक है… नहीं तो फिर वंश से बात करवानी पड़ेगी।”
वहाँ मौजूद सभी ने सहमति में सिर हिला दिया।एक-एक करके सभी कमरे से बाहर निकलने लगे। तभी पीछे से विपुल जी की आवाज़ आई,“विवेक!”
विवेक रुककर पीछे मुड़ा। “जी, बड़े पापा।”
विपुल जी ने उसकी ओर गंभीरता से देखते हुए कहा, “राध्या को अकेले कभी मत छोड़ना। और घर पर मंजरी के बारे में भी बात कर लो। अब जाओ… सो जाओ। रात काफी हो गई है।”
“जी, बड़े पापा।”विपुल जी वहाँ से चले गए।
विवेक कुछ देर वहीं खड़ा रहा। अभी-अभी हुई सारी बातें उसके मन में एक साथ घूम रही थीं..राध्या, युवराज सिंह, बड़े पापा की चिंता, उसे राध्या को अकेला न छोड़ने की हिदायत… और फिर मंजरी के बारे में घर पर बात करने की बात।
आखिरकार उसने एक लंबी साँस ली और अपने कमरे की ओर बढ़ गया। लेकिन उसके कदमों के साथ उसके मन में चल रहे सवाल भी उसके साथ ही चल रहे थे।
अगली सुबह शांति मेंशन में सभी लोग साथ बैठकर चाय पी रहे थे। सुबह का माहौल शांत था, लेकिन पिछली रात की बातचीत का असर अभी भी सबके मन में कहीं न कहीं था। विपुल जी के साथ विशाल जी और अनील जी भी बैठे हुए थे।
कुछ देर बाद विपुल जी ने चाय का कप नीचे रखते हुए विश्वनाथ जी की ओर देखा और कहा, “बाबूजी, मैं सोच रहा था कि कुछ दिनों के लिए राध्या और रिया को कुणाल के पास भेज दिया जाए।”
विशाल जी और अनील जी ने भी विपुल जी की बात का समर्थन करते हुए हामी में सिर हिला दिया।विश्वनाथ जी और शांतिजी ने एक-दूसरे की ओर देखा और फिर लगभग एक साथ बोले, “बच्चा, वो सब तो ठीक है… लेकिन एक बात हम तुमसे कहना चाहते हैं।”
दोनों की बात सुनकर विपुल जी ने ध्यान से उनकी ओर देखा।
विश्वनाथ जी ने कहना शुरू किया, “तुम्हें हमारे बहुत करीबी दोस्त महेंद्र ओझा और उनकी पत्नी उर्मिला ओझा तो याद ही होंगे। दोनों हमारे परम मित्र हैं। एक समय था, जब हम सब एक साथ ही रहा करते थे। वो हमारे पड़ोसी हुआ करते थे।”
उन्होंने विपुल जी की ओर देखते हुए पूछा, “तुम्हें याद है ना, विपु?”विपुल जी ने तुरंत हामी में सिर हिलाया। हाँ, बाबूजी… बिल्कुल याद है।
शांतिजी ने आगे कहा, “जब विशाल और वैदेही की शादी भी नहीं हुई थी, तब की बात है। महेंद्र जी और उर्मिला जी का एक बेटा था… मुकेश। लेकिन कुछ समय बाद वो सभी न्यूयॉर्क जाकर बस गए। वहीं उन्होंने अपना अच्छा-खासा बिज़नेस खड़ा कर लिया।”
विश्वनाथ जी ने बात आगे बढ़ाई, “अब उनका बिज़नेस वहीं है और उनका पोता ही उसे संभालता है। साहिल ओझा…! शांतिजी के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।साहिल की उम्र पच्चीस साल है। सांवला रंग, करीब पाँच फुट दस इंच लंबा और बहुत हैंडसम लड़का है।
कुछ क्षण रुककर विश्वनाथ जी बोले, “कुछ दिन पहले ही हमारी महेंद्र जी और उर्मिला जी से बात हुई थी। बातों-बातों में उन्होंने अपने पोते साहिल की शादी के लिए एक अच्छी लड़की की इच्छा जताई।”
शांतिजी ने मुस्कुराते हुए कहा, “हमने भी उनसे कह दिया कि हमें भी अपनी पोती राध्या के लिए एक अच्छा लड़का तलाश है।”विपुल जी, विशाल जी और अनील जी अब पूरी बात ध्यान से सुन रहे थे।
विश्वनाथ जी ने आगे कहा, “बस, फिर बातों-बातों में दोनों परिवारों ने एक-दूसरे को अपने पोती-पोते की तस्वीर भेज दी।”शांतिजी के चेहरे पर संतोष की झलक थी।हमें साहिल पसंद आ गया… और उन्हें हमारी राध्या।
कमरे में कुछ क्षणों के लिए खामोशी छा गई। सभी एक-दूसरे की ओर देखने लगे, जैसे अचानक सामने आई इस बात को समझने की कोशिश कर रहे हों।विश्वनाथ जी ने अपने मोबाइल में साहिल की तस्वीर खोली और सबकी ओर बढ़ाते हुए बोले, “लो, देखो… यही है साहिल।”
मोबाइल स्क्रीन पर साहिल की तस्वीर देखते ही सभी लड़कों के चेहरे पर खुशी आ गई। घर की महिलाओं ने तो तस्वीर देखते ही साहिल और राध्या की जोड़ी को मन ही मन पसंद कर लिया। उन्हें दोनों की जोड़ी एक नजर में ही अच्छी लग गई।
विपुल जी ने भी तस्वीर को गौर से देखा। उन्हें साहिल पसंद आ गया था और उनके चेहरे पर काफी समय बाद एक अलग ही खुशी दिखाई दे रही थी। ऐसा लग रहा था, जैसे अपनी बेटी को लेकर जिस पिता के मन में चिंता थी, उसे अचानक कोई सुकून मिल गया हो।
विश्वनाथ जी ने विपुल जी के चेहरे की खुशी देखी तो मुस्कुराते हुए बोले, “बाबूजी, फिर देर किस बात की है? उन्हें बुला लीजिए। दोनों बच्चे आपस में मिल लेंगे। अगर राध्या को साहिल अच्छा लग गया, तो हम सगाई और शादी साथ-साथ कर देंगे।”
उनकी बात सुनते ही वहाँ मौजूद सभी लोग खुशी से एक साथ बोले, “हाँ!”
घर का माहौल अचानक खुशियों से भर गया।विश्वनाथ जी भी बेहद खुश दिखाई दे रहे थे। उन्होंने गर्व से शांतिजी की ओर देखते हुए कहा, “देखा विपु की माँ! मैं ना कहता था कि हमारे बच्चे कभी मेरे फैसले पर नाखुश नहीं होंगे।”
शांतिजी ने तुरंत अपनी भौंहें चढ़ाईं और मुँह थोड़ा टेढ़ा करते हुए बोलीं, “ज्यादा होशियार मत बनिए… आपने नहीं, मैंने कहा था। मेरे बेटे और बहुएँ मेरा गुरुर हैं।”
यह कहते हुए उन्होंने अपने हाथ जोड़ दिए।विश्वनाथ जी तुरंत मुस्कुराए और बोले, “अरे हाँ! मेरी बच्चों की माँ… समझ गया। आप जीतीं और हम तो उसी दिन हार गए थे, जब पहली बार आपको देखा था।”
शांतिजी के चेहरे पर शर्मीली मुस्कान आ गई।“धत्… बूढ़े हो गए हैं, लेकिन आशिकी का भूत अभी तक नहीं उतरा आपका।”
उनकी बात सुनते ही वहाँ मौजूद सभी लोग जोरदार ठहाका लगाकर हँस पड़े। कुछ ही पलों में कमरे का गंभीर माहौल पूरी तरह हल्का और खुशगवार हो चुका था।
तभी विश्वनाथ जी ने हँसते हुए कहा, “और सुनो, वो सभी कल ही आ रहे हैं। मैंने उन्हें पहले ही बुला लिया था।”
अभी उनकी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि पीछे से राध्या की आवाज़ सुनाई दी। किसे बुला लिया है आप सबने? कौन आने वाला है?
Continue.........


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