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His Dark Obssession

राम की नजर अपने फोन पर गयी और उधर से विवान ने कुछ कहा तो राम कुछ पल उसकी बात सुनता रहा। फिर गंभीर आवाज़ में बोला, "तुम और अथर्व वापस आ जाओ। वहाँ से ये मामला सुलझने वाला नहीं है। हमें इसकी जड़ तक पहुँचना है और उसके लिए बनारस से जानकारी निकालनी पड़ेगी।"

वह कुछ पल रुका और फिर धीमे लेकिन सख्त लहजे में बोला, "अभी हमें बहुत संभलकर कदम उठाना होगा। बिना पूरी जानकारी के उठाया गया एक भी कदम मिस ठाकुर के परिवार के लिए परेशानी खड़ी कर सकता है। जब तक हमें उस शख्स के बारे में पूरी तरह पता नहीं चल जाता, तब तक जल्दबाजी में कुछ भी करना सही नहीं होगा।"

राम ने कुर्सी पर पीछे टिकते हुए कहा, "कुछ दिनों बाद मिस ठाकुर के दोनों भाइयों को भी यहाँ बुला लूँगा। पहले हमें पूरी तस्वीर समझनी होगी... उसके बाद ही आगे बढ़ेंगे।"

उधर से विवान ने बिना किसी सवाल के जवाब दिया, "ठीक है, भाई। हम वापस निकलते हैं।"

राम ने फोन काट दिया और कुछ पल स्क्रीन को देखते रहा। उसके चेहरे पर अब फिर वही गंभीरता लौट आई थी। उसके सामने अब सिर्फ अनुराधा का दर्द नहीं था... बल्कि उस दर्द के पीछे छिपा हुआ वह सच था, जिसे वह किसी भी कीमत पर सामने लाना चाहता था।

राम सुबह से लगातार काम में लगा हुआ था। देखते ही देखते शाम हो चुकी थी, लेकिन अनुराधा एक बार भी उसके केबिन में नहीं आई थी। सुबह से ही वह किसी न किसी बहाने खुद को उसके सामने आने से रोकती रही थी। कभी कोई फाइल किसी और के हाथ भेज देती, कभी किसी जरूरी काम का बहाना बना लेती। जैसे उसने तय कर लिया हो कि आज उसे राम का सामना ही नहीं करना है।

राम भी उसकी इस बेरुखी को अनदेखा करने की कोशिश कर रहा था, लेकिन हर गुजरते घंटे के साथ उसकी बेचैनी और चिढ़ दोनों बढ़ती जा रही थीं। काम के बीच में कई बार उसकी नजर अनायास केबिन के दरवाजे पर चली जाती, लेकिन अनुराधा वहाँ दिखाई नहीं देती।

शाम होते-होते ऑफिस लगभग खाली होने लगा। एक-एक करके कर्मचारी अपने घर के लिए निकलने लगे, लेकिन राम अब भी अपने केबिन में बैठा फाइलों और लैपटॉप के बीच उलझा हुआ था।

कुछ देर पहले अभिमन्यु भी उसके पास आया था। राम को काम में व्यस्त देखकर वह ज्यादा देर रुका नहीं और वापस लौट गया।वापस आते हुए अभिमन्यु अनुराधा के केबिन में चला आया।

अनुराधा ने उसे देखते ही मुस्कुराकर कहा, “आइए, सर... कोई काम था तो मुझे बुला लिया होता।“नहीं, ऐसा कुछ नहीं है, अनुराधा जी।”अपने लिए अभिमन्यु के मुँह से “अनुराधा जी” सुनते ही उसने तुरंत मुँह बना लिया।

“क्या मैं आपको इतनी बड़ी लगती हूँ, जो आप मुझे अनुराधा जी बोल रहे हैं?”उसने यह बात इतनी मासूमियत और प्यार से कही कि अभिमन्यु अपनी मुस्कान रोक ही नहीं पाया।

“अच्छा बाबा... ठीक है। तुम मुझसे बड़ी नहीं हो। लेकिन तुम भी तो मुझे सर बुलाती हो, उसका क्या?”

अनुराधा ने कुछ पल सोचने का नाटक किया।“हम्म्म... तो मैं आपको क्या बुलाऊँ?” फिर अचानक उसके चेहरे पर शरारती मुस्कान आई। “क्या मैं आपको मनु भाई बुलाऊँ?”

अभिमन्यु के चेहरे पर तुरंत बड़ी-सी मुस्कान आ गई।“बिल्कुल! मेरी छोटी राधा।”

फिर उसने प्यार से कहा, “और शुक्रिया... इतनी प्यारी बहन देने के लिए।”

अनुराधा ने तुरंत उसकी बात काट दी।“मनु भाई... बहन को शुक्रिया नहीं कहा जाता।”

“ठीक है, मेरी छोटी राधा।”अनुराधा के चेहरे पर भी मुस्कान आ गई।

कुछ पल दोनों यूँ ही भाई-बहन की तरह बातें करते रहे। फिर अभिमन्यु को अचानक कुछ याद आया।“अच्छा! बातों-बातों में तुम्हें ये बताना ही भूल गया कि मैं आया क्यों था।”

“क्यों?”आज हम सभी को रघुवंशी मेंशन डिनर के लिए जाना है।अनुराधा का चेहरा थोड़ा बदल गया।अभिमन्यु ने उसकी तरफ देखते हुए आगे कहा, “और राम अभी तक अपने काम में लगा हुआ है। मैं उसके पास गया था, लेकिन उसे काम में बहुत व्यस्त देखा तो वापस आ गया।”

फिर सहजता से बोला, “मैं मिस त्रिवेदी के साथ निकल रहा हूँ। तुम तैयार होकर आ जाना।”

अनुराधा ने हल्का-सा सिर हिला दिया, लेकिन उसके मन में सबसे पहले यही सवाल उठा। क्या उसे आज रात फिर राम का सामना करना पड़ेगा?

और दूसरी तरफ, अपने केबिन में बैठा राम शायद इसी बात से अनजान था कि जिस लड़की के आने का वह सुबह से इंतजार कर रहा था... अब वही लड़की शाम को भी उससे बचने की कोशिश कर रही थी।

अभिमन्यु दरवाजे की तरफ बढ़ते हुए अचानक रुक गया और पीछे मुड़कर बोला, "हाँ, और तुम राम को याद दिला देना कि आज डिनर पर जाना है। फिर उसी के साथ चली आना।"

अनुराधा ने मजबूरी में सिर हिलाया, लेकिन जैसे ही अभिमन्यु वहाँ से आगे बढ़ा, उसने मुँह बनाकर धीरे से खुद से कहा, "मुझे ही जाना होगा उस रावण रघुवंशी के पास... हुँह! पूरी दुनिया में एक यही इंसान बचा है क्या, जिसे डिनर याद दिलाने के लिए भी मुझे भेजना जरूरी है?"

उसके मुँह से "राम" की जगह "रावण" निकलते ही अभिमन्यु के कदम वहीं रुक गए।

उसने धीरे-धीरे गर्दन घुमाई और अनुराधा को ऐसी बड़ी-बड़ी आँखों से देखने लगा, जैसे अभी-अभी उसने ऑफिस में कोई बहुत बड़ा राज खोल दिया हो।

अनुराधा की नजर जैसे ही अभिमन्यु की नजरों से मिली, उसके चेहरे के भाव तुरंत बदल गए।

"वो... वो... मेरा मतलब... वो नहीं था!"अभिमन्यु के चेहरे पर कुछ पल तक गंभीरता बनी रही, फिर वह अपनी हँसी रोक नहीं पाया।

"अरे, इतना घबराने की जरूरत नहीं है। सच कहूँ तो... तुम्हारी बात गलत भी नहीं है।"

अनुराधा ने हैरानी से उसे देखा।अभिमन्यु ने हँसते हुए कहा, "मेरी तरफ से पूरी सहानुभूति है तुम्हारे साथ। मैं भी मानता हूँ... कभी-कभी राम सच में रावण ही लगता है।"

अनुराधा के चेहरे पर तुरंत राहत की मुस्कान आ गई,"सच में? "बिल्कुल।" अभिमन्यु ने पूरे विश्वास से कहा और फिर हाथ आगे बढ़ाते हुए बोला, "हाय-फाय?"

अनुराधा ने भी मुस्कुराकर उसके हाथ पर अपना हाथ मारा,"हाय-फाय!"अब चलो, ज्यादा देर मत करना। डिनर पर मिलता हूँ।"जी, मनु भाई।"अभिमन्यु मुस्कुराता हुआ वहाँ से निकल गया।

उसके जाने के बाद अनुराधा ने एक बार फिर अपनी फाइलों की तरफ देखा और काम में लग गई। मगर अब उसका ध्यान काम में कहाँ था? बार-बार उसकी नजर दीवार पर लगी घड़ी की तरफ जा रही थी।

धीरे-धीरे ऑफिस खाली हो गया। कर्मचारियों की आवाजें बंद हो चुकी थीं। गलियारों में भी अब पहले जैसी चहल-पहल नहीं थी। पूरा ऑफिस लगभग शांत हो चुका था।

अनुराधा ने आखिरकार अपनी फाइल बंद की और कुर्सी से उठते हुए राम के केबिन की दिशा में देखा।

"इतना भी क्या काम है कि इंसान को समय का ही होश नहीं रहता..." वह बड़बड़ाई। फिर अपने ही शब्दों पर मुँह बनाकर बोली, "नहीं... काम का नहीं, जनाब को बस काम में घुसे रहने का शौक है।"

कुछ पल वह वहीं खड़ी रही।फिर मन ही मन बोली, "चल अनु... जाना तो पड़ेगा। आखिर मनु भाई ने कहा है।"लेकिन अगले ही पल उसके चेहरे पर परेशानी लौट आई।

"हे भगवान... अब फिर सामने जाकर उस रावण का चेहरा देखना पड़ेगा। पता नहीं सुबह से मुझे ढूँढ़ रहे होंगे या फिर खुद ही नाराज़ बैठे होंगे कि उनकी सेक्रेट्री उनके केबिन में क्यों नहीं आई।"

उसने अपने माथे पर हाथ रखाऔर अगर पूछ लिया कि पूरे दिन मेरे केबिन में क्यों नहीं आई... तो क्या जवाब दूँगी?"वह कुछ पल सोचती रही, फिर खुद ही बुदबुदाई,

"कुछ भी हो, आज कोई बहाना नहीं चलेगा। बस डिनर की बात बतानी है और वापस आ जाना है। ना कोई बहस... ना कोई नोकझोंक... और बिल्कुल भी उनके करीब नहीं जाना है।"

अपनी ही बात पर उसने सिर हिलाया, जैसे खुद को आखिरी चेतावनी दे रही हो।फिर गहरी साँस लेकर राम के केबिन की तरफ चल पड़ी।हर कदम के साथ उसकी धड़कनें थोड़ी तेज होती जा रही थीं।

आखिरकार वह उसके केबिन के दरवाजे के सामने पहुँच गई।अंदर से हल्की रोशनी बाहर आ रही थी।अनुराधा ने दरवाजे की तरफ देखा और मन ही मन कहा,"चल अनु... शेर की मांद में कदम रख ही दिया है, अब डरना कैसा?"उसने हाथ उठाया और धीरे से दरवाजे पर दस्तक दी।

Continue......

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