अनुराधा ने उसकी आँखों में देखते हुए कुछ पल तक कुछ नहीं कहा। फिर धीरे-धीरे अपनी नजरें नीचे कर लीं और हल्के से सिर ना में हिला दिया। उसकी इस बचकानी-सी हरकत को देखकर राम के होंठों पर अनायास ही हल्की मुस्कान आ गई। जैसे इतने गुस्से और आँसुओं के बीच भी अनुराधा का यही मासूम अंदाज उसे अच्छी तरह पहचान में आता हो।
राम ने उसका हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा, “मेरी बातें ध्यान से सुनना... और सिर्फ सुनना नहीं, समझने की कोशिश भी करना।”अनुराधा ने चुपचाप उसकी तरफ देखा।
राम ने कुछ पल रुककर कहा, “जरूरी नहीं कि दुनिया का हर इंसान हमारे लिए अच्छा ही सोचे... और ये भी जरूरी नहीं कि हर कोई हमारे बारे में बुरा ही सोचे। लेकिन एक बात बहुत जरूरी है। हम खुद अपने बारे में क्या सोचते हैं... अपने लिए क्या चुनते हैं... अच्छा या बुरा।”
अनुराधा ने उसकी तरफ देखते हुए भौंहें सिकोड़ लीं। “मतलब क्या है आपका?”
राम के चेहरे की गंभीरता थोड़ी और गहरी हो गई। उसने शांत स्वर में कहा, “मेरा मतलब सिर्फ इतना है कि वहाँ जो कुछ भी कहा गया... वो तुम्हारी जिंदगी में तब तक कोई मायने नहीं रखता, जब तक तुम खुद उसे मायने नहीं देती।”
वह उसकी आँखों में देखते हुए आगे बोला, “उन्होंने तुम्हारे बारे में जो कहा, वो उनकी सोच थी। उनकी जुबान थी। उनका नजरिया था। लेकिन तुमने उनकी बातों को अपने ऊपर इतना हावी होने दिया कि तुम वहाँ बैठकर उन्हें जवाब देने के बजाय उठकर चली आई।”
अनुराधा कुछ कहने लगी, लेकिन राम ने हल्के से उसकी बात रोक दी।
“अगर तुम उनकी बातों को वहीं सुनकर नजरअंदाज कर देतीं, तो शायद अगली बार कुछ बोलने से पहले उन्हें खुद सोचना पड़ता। लेकिन तुमने उनकी कही बातों को इतना महत्व दे दिया कि वो शब्द तुम्हारे साथ यहाँ तक चले आए।”
अनुराधा कुछ पल चुप रही। फिर उसने अपना मासूम-सा चेहरा बनाकर धीमे स्वर में कहा, “तो क्या करती मैं? वहाँ खड़ी होकर उनकी बातें सुनती रहती?”राम ने उसकी तरफ देखा, लेकिन इस बार उसके चेहरे पर कोई मुस्कान नहीं थी।
अनुराधा ने होंठ भींचे और धीमे से कहा, “और सच तो यही है ना... मैं हूँ ही कौन आपकी?”
उस आखिरी सवाल पर राम कुछ पल बिल्कुल शांत रह गया।जैसे अनुराधा ने अनजाने में वही सवाल पूछ दिया हो, जिसका जवाब शायद राम खुद से भी अब तक नहीं पूछ पाया था।
“तुम राम रघुवंशी की पर्सनल सेक्रेटरी हो... और उसकी नई किरायेदार भी। ठीक है? अब चलो, या आज भी छुट्टी मारने का इरादा है?”
राम की बात सुनकर अनुराधा ने तुरंत अपना चेहरा कुछ इस तरह बनाया, जैसे दुनिया की सबसे मासूम लड़की वही हो। फिर धीमे से बोली, “क्या हो अगर मैं आपसे ये कहूँ कि... मुझे आज छुट्टी चाहिए? तो क्या आप मुझे छुट्टी दे देंगे?”
राम ने उसकी तरफ देखा। उसके अजीब से चेहरे को देखकर उसकी एक भौंह ऊपर उठ गई।
“क्या हो अगर,” उसने उसी गंभीर अंदाज में कहा, “मैं तुम्हारी आज की छुट्टी के बदले तुम्हारी पंद्रह दिन की सैलरी काट लूँ?”
अनुराधा के चेहरे की मासूमियत अगले ही पल गायब हो गई,“पंद्रह दिन की?”
वह उसे घूरती हुई पत्थर से नीचे उतरी और बड़बड़ाते हुए आगे बढ़ने लगी, “रावण रघुवंशी... एक दिन की छुट्टी माँगी थी और ये पंद्रह दिन की सैलरी काटने की धमकी दे रहे हैं। कंजूस कहीं के! इस मासूम गरीब की मेहनत की कमाई काटकर न जाने कौन-सा बुर्ज खलीफा खरीदेंगे... हुँह! मक्खीचूस!”
राम उसके पीछे कुछ कदम की दूरी पर खड़ा उसकी पूरी बड़बड़ाहट सुन रहा था।उसने शांत स्वर में कहा, “सुन रहा हूँ मैं।”
अनुराधा एक पल को रुक गई। फिर गर्दन थोड़ा टेढ़ी करके पीछे देखा और बिल्कुल बेझिझक बोली, “सुना रही हूँ मैं!”
राम के होंठों के कोने हल्के से उठे, मगर उसने तुरंत अपने चेहरे पर गंभीरता वापस ले आई। उसने चश्मा आँखों पर लगाया और आगे बढ़ते हुए कहा, “अब चलो।”
अनुराधा ने मुँह बनाकर उसकी पीठ को घूरा और उसी की नकल करते हुए बुदबुदाई, “हुँह... अब चलो।”
राम ने पीछे मुड़कर देखा।अनुराधा ने तुरंत अपना चेहरा सीधा कर लिया, जैसे उसने कुछ कहा ही न हो।राम ने सिर हिलाया और आगे बढ़ गया।अनुराधा भी उसके पीछे चल पड़ी।
दोनों ऑफिस के लिए निकल गए। राम हमेशा की तरह अपनी गंभीरता में, और अनुराधा हमेशा की तरह उसके पीछे-पीछे अपने ‘रावण रघुवंशी’ की बुराई करती हुई।
राम जब अनुराधा के साथ ऑफिस पहुँचा, तो लिफ्ट के दरवाजे खुलते ही अनुराधा अचानक तेजी से दूसरी लिफ्ट की तरफ भाग गई। राम कुछ पल उसे जाते हुए देखता रहा। मन ही मन उसने सोचा, “ये लड़की सच में कहीं पागल तो नहीं है? पैरों में चोट है... और असर दिमाग पर हो रहा है।”
फिर वह बिना कुछ कहे अपनी पर्सनल लिफ्ट से ऊपर चला आया। केबिन में पहुँचकर उसने अपना कोट उतारकर कुर्सी के पीछे रख दिया। इस वक्त उसने ब्लू शर्ट के ऊपर हाफ इनर कोट पहन रखा था, जिसमें उसका व्यक्तित्व हमेशा की तरह बेहद आकर्षक और प्रभावशाली लग रहा था।
कुछ देर बाद अनुराधा जल्दी-जल्दी कॉफी लेकर उसके केबिन के बाहर पहुँची और दरवाजे पर नॉक किया। अंदर से राम की आवाज आई, “कमिंग।”
अनुराधा अंदर आई और टेबल पर कॉफी रखते हुए बोली, “सर, कॉफी।”
राम की नजरें उसी पर टिक गईं। अनुराधा ने उसकी तरफ देखा तो उसे लगा कि राम कुछ ज्यादा ही गौर से उसे देख रहा है। वह मन ही मन बुदबुदाई, “इस रावण रघुवंशी को क्या हुआ? ऐसे क्यों घूर रहा है?”
राम ने तुरंत पूछा, “वो क्या था?”अनुराधा ने हैरानी से उसकी तरफ देखा। “क्या... क्या था?”
राम ने अपनी भौंहें सिकोड़ते हुए कहा, “मिस ठाकुर, जो आप नीचे कर रही थीं!”अनुराधा और ज्यादा कन्फ्यूज हो गई। “क्या... क्या कर रही थी मैं नीचे, सर?”
राम ने उसे कुछ पल तक देखा और मन ही मन सोचा, “कैसे कोई कहता है कि इसके पास दिमाग है?”अनुराधा अब भी उसकी तरफ उलझन में देख रही थी। “क्या था सर? आप किसकी बात कर रहे हैं?”
राम ने कुर्सी से उठते हुए कहा, “ऑफिस पहुँचते ही आप दूसरी लिफ्ट की तरफ ऐसे क्यों भागीं, जैसे मैं आपको पकड़ने वाला हूँ?”
अनुराधा ने तुरंत सफाई दी, “मैं भाग नहीं रही थी सर... मैं तो बस दूसरी लिफ्ट से जल्दी ऊपर आना चाहती थी।”
राम ने उसे सिर से पैर तक देखते हुए कहा, “पैर में चोट है और आप इतनी तेजी से दूसरी लिफ्ट तक पहुँच गईं कि मुझे लगा कहीं आज ऑफिस की बिल्डिंग का रिकॉर्ड ही न टूट जाए।”
अनुराधा ने मुँह बनाते हुए कहा, “तो इसमें मेरी क्या गलती है? आप अपनी पर्सनल लिफ्ट से आराम से आ गए और मुझे पब्लिक लिफ्ट में जाना पड़ा।”
राम ने धीमे से कहा, “बहाने बनाना बंद कीजिए, मिस ठाकुर।”अनुराधा ने होंठ सिकोड़ते हुए कहा, “हम्म... बहुत बड़े बॉस हैं ना आप, इसलिए हर बात में ऑर्डर देना जरूरी है।”
राम ने उसकी तरफ देखते हुए कहा, “और आपको हर बात का जवाब देना जरूरी है?”
अनुराधा ने तुरंत कहा, “जी।”राम कुछ पल उसे देखता रहा, फिर हल्की-सी मुस्कान उसके चेहरे पर आ गई। ये तो मुझे मालूम ही था।
राम ने अपनी नजरें अनुराधा पर टिकाए हुए पूछा, “मिस ठाकुर, मुझे लगा की आपको छत से कूदने की जल्दी थी। इसलिये आप भागी।अनुराधा ने उसकी तरफ ऐसे देखा, जैसे सामने कोई इंसान नहीं, बल्कि कोई अजीब-सा पागल खड़ा हो।
राम उसकी नजरों को समझ गया। उसने हल्की-सी भौंह उठाते हुए कहा, “मुझे पागल समझना बंद करो और अपने पागलपन पर फोकस करो।”
अनुराधा की आँखें थोड़ी और बड़ी हो गईं। “क्या कहा आपने? मैं... पागल हूँ?”
वह यह कहते हुए टेबल की तरफ थोड़ा झुक गई, जैसे अभी इसी वक्त उसे इस ‘इल्जाम’ का जवाब देना हो।
उसका मासूम-सा चेहरा और गुस्से में सिकुड़ी हुई नाक देखकर राम कुछ पल उसे देखता रह गया। वह इस वक्त उसे इतनी मासूम लग रही थी कि उसके होंठों पर अनायास ही हल्की मुस्कान आ गई।
वह अपनी कुर्सी से उठा और आराम से उसके पास चला आया। दोनों हाथों को अपनी पैंट की पॉकेट में डालते हुए उसने कहा, “इतना झुककर तकलीफ क्यों कर रही हैं, मिस ठाकुर?”
अनुराधा ने उसे देखा।राम उसके ठीक सामने आकर रुक गया और बेहद सहज अंदाज में बोला, “लीजिए... मैं आपके सामने आ गया। अब आराम से देख लीजिए।”
अनुराधा थोड़ी आवेश में उसकी तरफ मुड़ी ही थी कि तभी पीछे रखी कुर्सी की नोक उसके पैर से टकराने वाली थी।राम की नजर तुरंत उस तरफ गई। चोट लगने से पहले ही उसने हाथ बढ़ाकर कुर्सी की नोक रोक दी।
“आ... आ... आराम से, मिस ठाकुर!”अनुराधा ने एक पल के लिए उसकी तरफ देखा।
राम ने कुर्सी को एक तरफ करते हुए कहा, “सच सुनकर सबको मिर्ची लगती है... ये तो सुना था मैंने, लेकिन आपको देखकर यकीन हो गया कि सच वाकई करवा होता है।”इतना कहते हुए उसने अपनी एक भौंह ऊपर उठाई और अनुराधा को देखा।
अनुराधा गुस्से से बिल्कुल लाल हो चुकी थी।राम उसे उसी हालत में देखता रहा और मन ही मन मुस्कुरा उठा। उसके गुस्से से लाल हुए गाल और बड़ी-बड़ी आँखें उसे पहले से भी ज्यादा खूबसूरत लग रही थीं और शायद यही वजह थी कि उसे उसे चिढ़ाने में जरूरत से ज्यादा मजा आने लगा था।
अनुराधा ने अपनी कमर पर दोनों हाथ रखे और राम को सीधा घूरते हुए कहा, “मैं आपको पागल दिखती हूँ... क्यों?”
राम अभी कुछ कहने के लिए अपना मुँह खोलता, उससे पहले ही अनुराधा ने उसकी तरफ हाथ उठाकर उसे रोक दिया।
“नहीं... पहले मैं बताती हूँ,” उसने खुद ही फैसला सुनाते हुए कहा। फिर थोड़ी गर्दन टेढ़ी करके बोली, “क्योंकि मैं ऑफिस पहुँचने के बाद आपके साथ नहीं आई... है ना?”
राम ने बिना किसी झिझक के कहा, “हाँ! बिल्कुल।”
अनुराधा ने उसकी तरफ आँखें थोड़ी सिकोड़कर देखा और बोली, “आपने कभी सोचा कि मैंने ऐसा क्यों किया, सर?”
राम ने जैसे ही जवाब देने के लिए मुँह खोला, अनुराधा ने फिर हाथ दिखाकर उसे रोक दिया।
“रुकिए... आप मत बताइए। मैं खुद बताती हूँ।”
राम इस बार कुछ नहीं बोला। बस बाँहें सीने पर बाँधकर उसे देखने लगा। उसके चेहरे पर हल्की-सी दिलचस्पी थी, जैसे उसे पहले से अंदाजा हो कि अब अनुराधा किस दिशा में जाने वाली है।
अनुराधा ने अपनी बात जारी रखी, “आपको लगा होगा कि ये लड़की पता नहीं क्यों भाग गई। है ना? लेकिन असली बात ये है कि...”
वह एक पल के लिए रुकी और राम को ऊपर से नीचे तक देखकर बोली, “मैंने सोचा, अगर मैं आपके साथ आपकी पर्सनल लिफ्ट में चली गई और किसी ने देख लिया तो?”
राम की भौंह थोड़ी ऊपर उठ गई।अनुराधा ने तुरंत कहा, “और प्लीज! बीच में मत बोलिएगा। मेरी बात अभी खत्म नहीं हुई है।”राम ने होंठ भींचकर अपनी मुस्कान रोक ली।
अनुराधा फिर बोली, “कल रात से वैसे ही सबको लग रहा है कि मैं आपके घर में पता नहीं किस वजह से रह रही हूँ। सुबह आपके साथ ऑफिस आ गई... ऊपर से आपकी पर्सनल लिफ्ट में भी आपके साथ चली आती... तो लोग अपने दिमाग में दस कहानियाँ बना लेते।”
वह थोड़ी देर चुप रही, फिर धीमे से बोली, “और मुझे किसी की कहानी का हिस्सा नहीं बनना है, सर।”
इस बार उसकी आवाज में पहले वाली शरारत नहीं थी।राम चुपचाप उसे देखता रहा।अनुराधा ने फिर माहौल हल्का करने के लिए मुँह बनाया और बोली, “इसलिए मैं भागी थी। आपको देखकर नहीं... आपकी वजह से पैदा होने वाली अफवाहों से भागी थी।”
राम के चेहरे पर अब साफ मुस्कान आ चुकी थी।अनुराधा ने उसे मुस्कुराते देखा तो तुरंत आँखें तरेरते हुए बोली, “और अब ऐसे मुस्कुराइए मत... मैंने बहुत समझदारी वाला काम किया था।”
राम ने धीमे से कहा, “हाँ... बिल्कुल। बहुत समझदारी वाला।”
उसके स्वर में छिपी शरारत सुनकर अनुराधा समझ गई कि वह फिर उसे चिढ़ा रहा है।आप फिर शुरू हो गए! राम बस मुस्कुराता रहा।
अनुराधा ने राम की आँखों में देखते हुए धीमे स्वर में कहा, “मैंने ऐसा इसलिए किया, सर... क्योंकि मैं एक लड़की हूँ। और लोग मुझे आपके साथ देखेंगे तो बातें बनाएँगे। ये मैं अच्छी तरह जानती हूँ।”
राम चुपचाप उसे सुनता रहा।
“एक तो मैं आपकी एम्प्लॉयी हूँ,” अनुराधा ने आगे कहा, “और दूसरी बात... हमारे बीच कोई बराबरी भी नहीं है। आप कहाँ हैं और मैं कहाँ। आपका नाम, आपका परिवार, आपकी हैसियत... सब कुछ अलग है।”
वह कुछ पल रुकी।“आपको शायद फर्क न पड़े, सर। लोग आपके बारे में कुछ कहेंगे भी तो दो मिनट बाद भूल जाएँगे। लेकिन मेरे बारे में...” उसकी आवाज थोड़ी धीमी हो गई, “मेरे बारे में कही गई एक बात भी मेरे पीछे चलती रहेगी।”
राम के चेहरे की गंभीरता और बढ़ गई।अनुराधा ने कहा, “मैं मिडिल क्लास परिवार से हूँ। लोगों को मेरे बारे में सोचने में एक सेकंड नहीं लगेगा कि मैंने पैसों के लालच में आपको फँसाया है... या आपकी जिंदगी में आने की कोशिश कर रही हूँ।”
उसने हल्की कड़वाहट के साथ कहा, “फिर ऑफिस में हर किसी के पास मेरे बारे में कहने के लिए कुछ न कुछ होगा। कोई मेरी नौकरी को लेकर बात करेगा, कोई आपके साथ मेरे रिश्ते को लेकर... और कोई मेरे चरित्र पर सवाल उठाएगा।”राम की आँखें उसके चेहरे पर टिकी थीं।
“मैं नहीं चाहती, सर,” अनुराधा ने कहा, “कि मैं जहाँ भी जाऊँ, लोग मुझे देखकर पहले यही सोचें कि ‘ये वही लड़की है जो राम रघुवंशी के साथ रहती है।’ मैं अपनी पहचान किसी और के नाम से नहीं बनाना चाहती।”
वह कुछ क्षण चुप रही, फिर बोली, “वैसे ही मैं आपके घर में रह रही हूँ... वो भी आरोही की वजह से। अब अगर ऑफिस में भी मैं आपके साथ आती-जाती दिखूँगी, आपके साथ हर वक्त नजर आऊँगी... तो लोग अपनी कहानी खुद बना लेंगे।”
उसने सिर हिलाते हुए कहा, “नहीं सर... मैं ऐसा नहीं कर सकती।”राम अब भी खामोश था।
अनुराधा ने उसकी तरफ देखते हुए आखिर में कहा, “मैं जानती हूँ कि शायद आपको ये सब बहुत ज्यादा सोचना लगे... लेकिन मुझे हर कदम सोचकर रखना पड़ता है। क्योंकि आपकी एक छोटी-सी बात को लोग भूल जाएँगे... लेकिन मेरी एक छोटी-सी गलती को लोग जिंदगी भर याद रखेंगे।”
राम ने उसकी बात खत्म होने तक उसे टोका नहीं।उसके चेहरे पर अब वह पहले वाली शरारती मुस्कान बिल्कुल नहीं थी। वह सिर्फ अनुराधा को देख रहा था, जैसे पहली बार उसे समझने की कोशिश कर रहा हो।
राम उसकी पूरी बात बिना टोके सुनता रहा। उसके चेहरे पर कोई प्रतिक्रिया नहीं थी, लेकिन उसकी आँखों में अनुराधा की हर बात जैसे उतरती जा रही थी।
कुछ पल बाद उसने आगे बढ़कर अनुराधा की कलाई थाम ली। अनुराधा की नजरें उस पर गयी तब तक उसने झटके मे उसे अपनी तरफ खींचा। वह सीधे राम के सीने से आ लगी और राम के हाथ उसके कमर पर आ ठहरा।
अचानक इतनी नज़दीकी से अनुराधा की साँस जैसे वहीं अटक गई।
वह एक पल के लिए बिल्कुल स्थिर रह गई। राम की गहरी, ठहरी हुई और कशिश ली हुई नजरें सीधे उसकी आँखों में थीं। जिससे अनुराधा की पहले से बेचैन धड़कनें और तेज़ हो गईं।
उसने खुद को सहज रखने की कोशिश की, लेकिन उसकी साँसों की बढ़ती रफ्तार उसकी बेचैनी का राज़ खोल रही थी।
“ये... आप... क्या... कर... रहे... हैं...?”
यह छह शब्द थे....लेकिन उन्हें बोलने में ही जैसे उसकी सारी हिम्मत जवाब दे गई।आखिरी शब्द के बाद वह चुप हो गई। उसकी नजरें राम की आँखों में अटक गईं और होंठों पर अधूरी-सी बात ठहर गई।
राम उसकी घबराहट को साफ महसूस कर रहा था। उसकी तेज़ होती साँसें, चेहरे पर उतरती झिझक और आँखों में छिपा सवाल...उससे कुछ भी अनदेखा नहीं था।सच तो यह था कि उसके भीतर भी भावनाओं का वही तूफान उठ रहा था। फर्क सिर्फ इतना था कि राम को अपनी भावनाओं को चेहरे पर आने से रोकना आता था।
दोनों कुछ पल तक यूँ ही एक-दूसरे की आँखों में देखते रहे।समुद्र की लहरों का शोर उनके आसपास था, लेकिन उस पल अनुराधा को अपने कानों में सिर्फ अपनी तेज़ धड़कनों की आवाज़ सुनाई दे रही थी।
और राम...वह अब भी उसकी आँखों से नजरें हटाने को तैयार नहीं था।राम उसकी आँखों में देखते हुए कुछ पल खामोश रहा। फिर उसकी आवाज पहले से धीमी हुई, मगर उसमें एक अजीब-सी दृढ़ता थी।
“मुझे कोई परवाह नहीं है कि लोग क्या कहते हैं।”उसकी उँगलियाँ अब भी अनुराधा के कमर पर थी। दोनों की सांसों की गरमाहट एक दूसरे क़ो महसूस हो रहीं थी।
“लेकिन अगर किसी ने तुम्हारे बारे में एक भी गलत शब्द कहा... तो उसे ये समझाने में मुझे एक पल नहीं लगेगा कि राम रघुवंशी के सामने किसी की औकात क्या है।”
अनुराधा उसे देखती रही।राम की नजरें उसके चेहरे पर ठहरी थीं।
“मैं जानता हूँ तुम क्या हो... और क्या नहीं हो। मुझे किसी के कहने से अपना नजरिया बदलने की जरूरत नहीं है। इसलिए लोग तुम्हारे बारे में क्या सोचते हैं... इससे मुझे फर्क नहीं पड़ता।”
अनुराधा ने उसकी बात सुनी, लेकिन उसके चेहरे पर उलझन और गहरी हो गई। तो आपको क्यों फर्क पड़ने लगा?राम कुछ नहीं बोला।
अनुराधा ने फिर पूछा, “और मेरी परवाह क्यों होने लगी आपको? मेरे बारे में कोई कुछ भी बोले... आपको उससे क्या? आप क्यों उसके सामने खड़े होकर मुझे सही साबित करने लगेंगे?”
इस बार राम की आँखों में कुछ बदला।वह धीरे-धीरे उसके और करीब आया।अनुराधा की साँस अटक गई।
राम इतना करीब आ चुका था कि दोनों की साँसें एक-दूसरे के चेहरे से टकराने लगी थीं। उनके बीच की दूरी इतनी कम थी कि अनुराधा को अपनी धड़कनों से ज्यादा राम की खामोशी महसूस हो रही थी।
राम ने उसकी आँखों में देखते हुए बहुत धीमे स्वर में कहा, “पता नहीं...”वह एक पल रुका।
जैसे उसके पास जवाब था, लेकिन उसे खुद उस जवाब को स्वीकार करने में हिचक हो रही थी।
“लेकिन फर्क पड़ता है।”उसकी नजरें एक पल के लिए अनुराधा की आँखों से हटकर उसके चेहरे पर ठहरीं, फिर वापस उसकी आँखों में आ गईं।
“और बहुत ज्यादा पड़ता है।”अनुराधा कुछ समझ पाती, उससे पहले ही उसने झटके से राम को पीछे धकेल दिया।
“बस!”वह खुद भी अपनी अचानक बढ़ी हुई धड़कनों से परेशान थी। गुस्से का सहारा लेकर उसने राम को घूरा और बोली, “पागल इंसान! खुद भी हैं और मुझे भी पागल करने पर तुले हुए हैं।”
राम कुछ कहता, उससे पहले ही वह बोल पड़ी, “और एक बात... मेरे यूँ बार-बार इतने करीब मत आया कीजिए।”वह अपनी साँसें संभालते हुए बोली, “मैं आपकी सेक्रेटरी हूँ...”। एक पल रुककर उसने उसकी आँखों में देखा,“बीवी नहीं।”
राम के चेहरे पर धीमी-सी मुस्कान उभर आई, “सेक्रेटरी हूँ... बीवी नहीं...”वह मन ही मन उसकी कही बात दोहराते हुए हल्का-सा सिर हिलाने लगा।उसे नहीं पता था कि अनुराधा को चिढ़ाने में उसे इतना मजा क्यों आ रहा था।
बस इतना पता था कि जब वह गुस्से में उसकी आँखों में देखकर उसे डाँटती थी... तब उसे वहाँ से जाने का मन बिल्कुल नहीं करता था।
अनुराधा अभी दो कदम ही आगे बढ़ी थी कि राम ने तेजी से उसकी कमर थामकर उसे अपनी तरफ खींच लिया। अचानक हुए इस हरकत से उसकी पीठ राम के सीने से आ लगी। अनुराधा एक पल के लिए बिल्कुल ठिठक गई।
राम ने उसके कंधे पर अपना सिर टिकाते हुए धीमी आवाज में कहा, “पता नहीं तुम क्या हो मेरे लिए... लेकिन जो भी हो, सिर्फ मेरे लिए हो... किसी और की नहीं।”
अनुराधा धीरे से कुढ़ते हुए बोली, “हुँह! इनकी कॉपीराइट हूँ क्या मैं?”
राम के होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आ गई। उसने उसी शांत अंदाज में कहा, “जो तुम समझ लो... अब से तुम मुझे हर घड़ी, हर जगह चाहिए। चाहे ऑफिस हो या घर।” इतना कहकर उसने हल्के से उसके गाल को चूम लिया।
अनुराधा ने तुरंत गुस्से में अपना चेहरा उसकी तरफ घुमा लिया। लेकिन ऐसा करते ही दोनों के चेहरे बेहद करीब आ गए। राम की लंबी, पतली नाक उसके होंठों के बिल्कुल पास थी। राम उसकी आँखों में प्यार भरी नजरों से देख ही रहा था कि अचानक अनुराधा ने उसकी नाक को अपने दाँतों से काट लिया।
“आअह्ह!” राम तुरंत अपनी नाक पकड़कर पीछे हुआ और उसे घूरने लगा।
वहीं अनुराधा के चेहरे पर ऐसी विजयी मुस्कान थी, जैसे उसने अभी-अभी ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीत लिया हो। वह बड़े गर्व से बोली, “जुबान के साथ मेरे दाँत भी चलते हैं... अगली बार बचकर रहिएगा।”
राम कुछ पल तक उसे घूरता रहा। फिर उसके चेहरे पर धीरे-धीरे मुस्कान लौट आई। उसने अनुराधा को दोबारा अपने करीब करते हुए उसके माथे को चूमा और धीमी आवाज में कहा, “फ़ुरसत अगर मिले तो मुझे पढ़ना जरूर... मैं तेरी उलझनों का मुकम्मल जवाब हूँ। ”
अनुराधा कुछ पल उसे देखती रही। फिर जैसे उसकी बात को अपने ऊपर ज्यादा हावी होने से रोकना चाहती हो, वैसे ही धीरे से खुद को उससे अलग करते हुए बोली, “खुद से मिलने की भी फ़ुरसत नहीं है अब मुझे... और वो औरों से मिलने का इल्ज़ाम लगा रहे हैं। ”
राम उसकी बात सुनकर बस उसे देखता रह गया। अनुराधा बिना उसकी तरफ देखे आगे बढ़ गई, जबकि राम के चेहरे पर एक धीमी-सी मुस्कान ठहर गई। शायद दोनों की इस नोकझोंक में जितना कहा जा रहा था, उससे कहीं ज्यादा अनकहा रह जा रहा था।
अनुराधा उसकी केबिन से जाने लगी थी की तभी राम ने उसकी कलाई थाम ली।अनुराधा ने आँखो से सवाल किया की अब क्या रह गया।राम उसके करीब आया और कुछ पल तक उसकी आँखों में देखता रहा। अनुराधा की कुछ लटें उसके चेहरे पर आकर ठहर गई थीं। राम ने बिना उन्हें छुए बस हल्की-सी फूँक मारी, जिससे वे लटें उसके चेहरे से हटकर पीछे उड़ गईं।
अनुराधा ने पल भर के लिए अपनी पलकें झुका लीं। राम की आँखों में एक धीमी-सी मुस्कान उतर आई। वह बेहद धीमे, लगभग फुसफुसाते हुए कहता है,
"फ़ुरसत मिले तो कभी उनका भी हाल पूछ लिया करो,
जिनके सीने में दिल की जगह तुम धड़कती हो...
फ़ुरसत मिले तो कभी इन आँखों में भी झाँक लेना,
जहाँ तुम्हारे अलावा किसी और का ख्वाब ठहरता ही नहीं।
और अगर कभी वक्त मिले तो
दिल की इन गलियों तक भी चली आना...
तुम्हें यकीन दिला देंगे कि
मोहब्बत सिर्फ कहने की चीज़ नहीं,
किसी के साथ हर धड़कन में जीने का नाम है।"
अनुराधा उसकी बात का कोई जवाब नहीं देती। बस कुछ पल उसे देखती है, फिर अपनी नजरें चुराकर बिना कुछ कहे वहाँ से जाने लगती है। राम उसकी जाती हुई परछाईं को कुछ देर तक देखता रहता है। उसने दोनों हाथ सीने के सामने बाँध लिए और दरवाजे की तरफ देखते हुए जैसे उसके खामोश जवाब को समझने की कोशिश करने लगा।
फिर एक हल्की-सी मुस्कान उसके चेहरे पर आई और वह अपनी कुर्सी पर जाकर बैठ गया। उसने सामने रखी फाइल उठाई और दोबारा अपने काम में लग गया।
अभी कुछ ही देर हुई थी कि उसके फोन की स्क्रीन पर "विवान कॉलिंग" दिखाई दिया। राम ने तुरंत फोन उठाकर कहा, "हेलो।"
Continue......


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