अनुराधा उसके सामने खड़ी होकर थोड़ी असहज महसूस कर रही थी। उसकी नजरें बार-बार इधर-उधर जा रही थीं, जैसे उसे समझ ही नहीं आ रहा हो कि इस वक्त वहाँ खड़े रहना ठीक है या नहीं।
राम उसकी झिझक समझ गया। उसके चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आई और उसने जानबूझकर माहौल को सहज करते हुए कहा, “तुम कहो तो, मिस ठाकुर... तुम्हारे सामने ही कपड़े बदल लूँ?”
अनुराधा ने तुरंत अपनी बड़ी-बड़ी आँखें उसकी तरफ उठा दीं। “वो... मैं... माफ कीजिए... सॉरी!”इतना कहकर वह बिना एक पल रुके बाहर निकल गई।
राम उसे जाते हुए देखकर मुस्कुरा दिया। उसकी घबराहट उसे परेशान करने के बजाय कुछ पल के लिए बेहद प्यारी लगी। फिर उसने अपना सिर हल्का-सा झटककर कपड़े बदलने के लिए कदम बढ़ा दिए।
नीचे डाइनिंग एरिया में आरोही और अभिमन्यु आमने-सामने बैठे थे। दोनों के सामने नाश्ता रखा था, लेकिन दोनों का ध्यान खाने से ज्यादा एक-दूसरे पर था। उनकी नजरें इस तरह एक-दूसरे पर टिकी थीं, जैसे बस किसी एक को मौका मिले और वह दोनों एक दूसरे का खुन कर दें।
उसी वक्त अनुराधा सीढ़ियों से उतरकर नीचे आई। उसने दोनों को देखा और कुछ पल उन्हें घूरती रही। फिर आखिरकार अपनी हँसी रोकते हुए बोली, “अगर आप दोनों का पानीपत का युद्ध खत्म हो जाए तो बता देना। तब तक मैं नाश्ता कर लेती हूँ।”
आरोही और अभिमन्यु दोनों एक साथ उसकी तरफ देखने लगे। अगले ही पल दोनों थोड़े झेंप गए।
“नहीं... ऐसे कुछ नहीं है,” दोनों ने लगभग एक साथ कहा।
अनुराधा ने भौंहें उठाईं। “हाँ, बिल्कुल। मैं भी अंधी हूँ और सामने कुछ देख नहीं रही।”आरोही ने उसे घूरा तो अनुराधा मुस्कुरा दी और कुर्सी खींचकर बैठने लगी।तभी ऊपर से कदमों की आवाज आई।
अनुराधा की नजर अनायास सीढ़ियों की तरफ उठ गई।राम सीढ़ियों से नीचे उतर रहा था।
ब्लैक थ्री-पीस सूट के साथ ब्लू शर्ट में उसका व्यक्तित्व पहले से कहीं ज्यादा प्रभावशाली लग रहा था। सलीके से सेट किए हुए बाल, चेहरे पर वही गंभीरता और उसकी चाल में मौजूद सहज आत्मविश्वास...वह कमरे में आते ही जैसे बाकी सारी चीजों से अलग नजर आने लगा।
अनुराधा की नजर कुछ पल के लिए उस पर ठहर गई। कल तक जिस आदमी को वह मन ही मन “रावण रघुवंशी” कहकर कोस रही थी, आज उसी को देखकर उसके मन में अनायास एक ही ख्याल आया, “ये आदमी हर बार इतना दिलकश क्यों लगने लगता है?”
उसे खुद समझ नहीं आ रहा था कि राम में ऐसा क्या था, जो हर बार उसे पहले से ज्यादा आकर्षक दिखाई देने लगता था।अनुराधा को जैसे ही अपनी ही सोच का एहसास हुआ, उसने तुरंत नजरें नीचे कर लीं और खुद को मन ही मन झिड़क दिया।
“बस अनु... फिर से शुरू मत हो जाना।”लेकिन इस बार उसके दिल ने भी जैसे चुपचाप उसकी बात सुनने से इनकार कर दिया।
अनुराधा की नजर जैसे ही राम पर पड़ी, उसके मन में अचानक एक ख्याल आया, “हाय!!!!” लेकिन अगले ही पल उसने खुद को संभाला। “ये क्या सोच रही है अनु तू... वो कहाँ राम रघुवंशी और तू कहाँ... उसकी कम्पनी की एक छोटी-सी एम्प्लोयी।” उसने खुद को समझाते हुए धीरे से सिर ना में हिलाया और नजरें झुकाकर बैठ गई।
राम के नीचे आते ही सभी नाश्ते के लिए बैठ गए। माहौल सामान्य था, लेकिन अनुराधा खुद को बार-बार राम से नजरें मिलाने से रोक रही थी। वह चुपचाप नाश्ता करने में लगी रही।
इसी बीच खाते-खाते उसके होंठों के किनारे थोड़ा-सा खाना लग गया। राम की नजर उस पर पड़ गई। उसने बिना कुछ कहे अपना हाथ बढ़ाया और अपने अंगूठे से उसके होंठ के किनारे लगा खाना धीरे से पोंछ दिया।
अनुराधा एकदम ठिठक गई।उसकी आँखें हैरानी से राम के चेहरे पर टिक गईं।
राम ने जैसे कुछ हुआ ही न हो, अपना हाथ वापस खींच लिया और आराम से नाश्ता करता रहा।अनुराधा कुछ पल उसे देखती रही, फिर जल्दी से अपनी नजरें नीचे कर लीं।
उसके चेहरे पर आई हल्की झिझक आरोही की नजरों से भी नहीं बची।नाश्ता खत्म होने के बाद अभिमन्यु अपनी कुर्सी से उठते हुए बोला, “अब चलें?”राम ने हल्का-सा सिर हिलाया, “हम्म्म।”
वह उठने ही वाला था कि अनुराधा ने तुरंत कहा, “सर... मुझे कुछ कहना है।”
राम वापस बैठ गया और उसकी तरफ देखते हुए बोला, “कहिए, मिस ठाकुर।”
अनुराधा ने थोड़ा संकोच किया, फिर बोली, “सर... आरोही ने मुझे बताया कि कुछ दिन हमें यहीं रहना है। तो मैं ये कह रही थी कि मैं यहाँ बिना पैसे के मुफ्त में नहीं रहना चाहती।
इसलिए... मैं रहने और खाने-पीने का खर्च देना चाहती हूँ। अगर आपको मंजूर हो तो हम यहाँ रहेंगे, नहीं तो...”वह अपनी बात पूरी कर पाती, उससे पहले ही राम ने सहजता से कहा, “ठीक है। आप जिस तरह से रहना चाहें, रह सकती हैं। अब चलें?”
अनुराधा कुछ पल उसे देखती रही। उसे उम्मीद थी कि राम शायद बहस करेगा, लेकिन उसने इतनी आसानी से उसकी बात मान ली थी कि वह खुद ही थोड़ी हैरान रह गई।“जी...” उसने धीरे से कहा।चारों बाहर निकलने लगे।
लेकिन जैसे ही दरवाजे के पास पहुँचे, अनुराधा, आरोही और अभिमन्यु की नजर एक साथ सामने पड़ी और तीनों अचानक वहीं रुक गए।उनके चेहरों पर एक साथ हैरानी उतर आई।
राम उनसे कुछ कदम आगे था। उसने भी सामने देखा, लेकिन उसके चेहरे पर कोई घबराहट नहीं आई। वह उसी तरह स्थिर खड़ा रहा, उसकी नजरें सामने टिकी थीं।
कुछ पल के लिए पूरे माहौल में ऐसी खामोशी छा गई, जैसे अगले ही क्षण कुछ बड़ा होने वाला हो।सामने पंचदेव जी, जानकी जी, मृत्युंजय जी, माधुरी, अर्जुन, केतकी, सौम्या और रुहिका खड़े थे।
दरवाजे पर राम के साथ अनुराधा को देखते ही सभी के चेहरे पर एक साथ हैरानी उभर आई। किसी को भी उम्मीद नहीं थी कि सुबह-सुबह उन्हें यहाँ अनुराधा दिखाई देगी।
लेकिन सबसे अलग प्रतिक्रिया माधुरी जी की थी। उनकी नजर अनुराधा पर इस तरह टिक गई थी, जैसे राम के पास खड़ी वह लड़की उनके लिए कोई ऐसी चीज हो, जिसे उन्होंने अपना समझ रखा था और अब किसी ने उनसे छीन लिया हो। उनके चेहरे पर नाराजगी साफ दिखाई दे रही थी और आँखों में अनुराधा के लिए बढ़ती हुई चिढ़ को छिपाना उनके लिए मुश्किल हो रहा था।
कुछ पल तक वह खुद को रोकती रहीं, लेकिन आखिरकार उनका धैर्य जवाब दे गया। वह तीखे स्वर में बोलीं, “पापा जी, हम तो यहाँ आए थे कि कल हमें इतनी बड़ी प्रोजेक्ट मिली है, तो बच्चे को आशीर्वाद दे देते हैं... लेकिन यहाँ तो कुछ और ही...” कहते-कहते उनकी नजर अनुराधा पर गई और उनके चेहरे पर घृणा का भाव और गहरा हो गया।
अनुराधा उनकी नजरों का मतलब पूरी तरह समझ तो नहीं पाई, लेकिन इतना जरूर महसूस कर गई कि सामने खड़ी महिला उसे बिल्कुल पसंद नहीं कर रही थीं। वह असहज होकर एक पल के लिए राम की तरफ देखने लगी।
माधुरी जी अभी अपनी बात आगे बढ़ाने ही वाली थीं कि जानकी जी ने गंभीर स्वर में उन्हें रोक दिया।
“माधुरी बहू!”उनकी आवाज में इतनी सख्ती थी कि माधुरी वहीं रुक गईं।जानकी जी ने उनकी तरफ देखते हुए कहा, “जब हम सभी यहाँ खड़े हैं और आपको बोलने की इजाजत हमने नहीं दी है, तो अब आप कुछ नहीं बोलेंगी।”
कमरे में अचानक खामोशी छा गई।माधुरी जी का चेहरा गुस्से से तमतमा उठा। उन्होंने एक पल के लिए जानकी जी की तरफ देखा, फिर अपनी नजरें झुका लीं। मन में उठ रहे आक्रोश को जैसे जबरदस्ती निगलते हुए वह चुप हो गईं।
अनुराधा चुपचाप सब देख रही थी। उसे समझ आ रहा था कि आखिर उसके यहाँ होने से इतना बड़ा मुद्दा क्यों बन रहा था।राम अब तक शांत खड़ा था। उसकी नजरें सामने मौजूद सभी लोगों पर थीं, लेकिन चेहरे पर वही स्थिर गंभीरता थी। जैसे उसे पहले से अंदाजा हो कि आने वाला समय आसान नहीं होने वाला है।
पंचदेव जी ने माहौल को थोड़ा सहज करने की कोशिश करते हुए राम की तरफ देखा और कहा, “राम, हम लोग शायद गलत वक्त पर आ गए हैं... आप ऑफिस जा रहे हैं?”
राम ने आगे बढ़कर सभी के पैर छुए, लेकिन जब वह मृत्युंजय जी और माधुरी जी के सामने पहुँचा तो बिना कुछ कहे आगे बढ़ गया। उसके इस व्यवहार से एक पल के लिए माहौल फिर से भारी हो गया, लेकिन राम ने जैसे किसी बात की परवाह ही नहीं की।
वह पंचदेव जी की तरफ देखते हुए बोला, “आप आइए, दादू। हम कुछ देर बाद ऑफिस चले जाएँगे।“हम्म्म...” पंचदेव जी ने सिर हिलाया।सभी अंदर आकर बैठ गए। अनुराधा ने धीरे से राम की तरफ देखा और धीमी आवाज में कहा, “सर, हम दोनों ऑफिस निकलते हैं।”
राम ने उसकी तरफ देखा और थोड़े कठोर लहजे में कहा, “मिस ठाकुर... बॉस मैं हूँ या तुम?”
अनुराधा तुरंत चुप हो गई।राम ने बिना कोई और जवाब दिए अपनी जगह संभाली और अभिमन्यु के साथ बैठ गया।
अनुराधा और आरोही अभी भी थोड़ी दूरी पर खड़ी थीं। दोनों को समझ नहीं आ रहा था कि अचानक इतने लोगों के बीच बैठना ठीक होगा या नहीं।तभी पंचदेव जी ने स्नेह से उनकी तरफ देखते हुए कहा, “आप दोनों इतनी दूर क्यों खड़ी हैं? आइए, हम सबके साथ बैठिए।”
अनुराधा और आरोही ने एक-दूसरे की तरफ देखा। फिर दोनों आगे बढ़ीं और बारी-बारी से सभी के पैर छूकर आशीर्वाद लेने लगीं।अनुराधा जब मृत्युंजय जी के सामने पहुँची और झुककर उनके पैर छूने लगी, तभी राम की आवाज गूँज उठी।
“हो गया।”अनुराधा वहीं रुक गई और पलटकर राम की तरफ देखने लगी।राम ने शांत लेकिन बेहद स्पष्ट स्वर में कहा, “अब आप यहाँ आकर बैठ जाइए।”अनुराधा कुछ समझ पाती, उससे पहले राम ने अपनी नजर मृत्युंजय जी की तरफ उठाई और सपाट लहजे में कहा, “हर कोई सम्मान के काबिल नहीं होता है।”
उसकी बात सुनकर कमरे का माहौल एक पल में बदल गया।मृत्युंजय जी के चेहरे पर कठोरता उतर आई, जबकि माधुरी जी की आँखों में गुस्सा और भड़क उठा। लेकिन राम के चेहरे पर कोई बदलाव नहीं था।
अनुराधा ने राम की बात सुनते ही चिढ़कर उसकी तरफ देखा और बिना ज्यादा सोचे बोल पड़ी, “ये बात हर किसी पर लागू नहीं होती है। सर ने मुझे हमेशा पिता की तरह सम्मान दिया है और ये मेरे लिए पिता की तरह हैं। जरूरी नहीं कि जो बात आपको पसंद नहीं, वो मुझे भी पसंद न हो।”
उसकी बात सुनते ही कमरे में बैठे सभी लोगों की नजरें एक साथ राम और अनुराधा पर टिक गईं। सबसे ज्यादा हैरानी इस बात की थी कि अनुराधा ने राम को इस तरह जवाब दे दिया था और राम... हमेशा की तरह अपनी बात मनवाने वाला राम रघुवंशी... बिल्कुल चुप खड़ा था।
उसने अनुराधा को रोकने की कोशिश तक नहीं की।
शायद इसलिए कि वह जानता था, अनुराधा ने जो कहा था, पूरे विश्वास के साथ कहा था।
कुछ पल की खामोशी के बाद अनुराधा बिना किसी झिझक के मृत्युंजय जी के सामने झुकी और उनके पैर छूकर आशीर्वाद लिया।
मृत्युंजय जी ने उसके सिर पर बड़े स्नेह से हाथ रखा और आशीर्वाद दिया। उनके चेहरे पर उस वक्त कठोरता नहीं, बल्कि एक बुजुर्ग का सहज अपनापन था।लेकिन माधुरी जी ने अनुराधा को अपने पैर छूने के लिए झुकते देखा तो उन्होंने तुरंत अपने पैर पीछे खींच लिए।
“मैं हर किसी को अपने पैर नहीं छूने देती।”उनके शब्दों में साफ तिरस्कार था।अनुराधा एक पल के लिए वहीं रुक गई।इससे पहले कि वह कुछ कहती, आरोही ने धीमे से बुदबुदाया, “हम्म्म... कोई छूता भी होगा तब ना।”
आवाज धीमी थी, लेकिन इतनी भी नहीं कि माधुरी जी सुन न सकें।माधुरी जी ने तुरंत उसकी तरफ देखा। “ए लड़की! क्या कहा तुमने?”आरोही ने बिना घबराए उनकी आँखों में देखते हुए कहा, “आरोही नाम है उनका... ‘ए लड़की’ नहीं।”
माधुरी जी कुछ कहने ही वाली थीं कि राम की गंभीर और कठोर आवाज पूरे कमरे में गूँज उठी।
“आरोही नाम है उनका... ए लड़की नहीं।”उसकी आवाज में ऐसी सख्ती थी कि आरोही भी एक पल के लिए शांत हो गई।
राम ने माधुरी जी की तरफ देखते हुए आगे कहा, “नाम से बुलाइए। अगर किसी का नाम याद रखने में परेशानी हो रही हो, तो मैं याद दिला दूँगा।”कमरे में फिर से सन्नाटा छा गया।
अभिमन्यु ने एक नजर राम पर डाली, फिर आरोही की तरफ देखा। आरोही ने भी उसकी तरफ देखा, लेकिन इस बार दोनों के चेहरे पर कोई शरारत नहीं थी।अनुराधा चुपचाप खड़ी राम को देख रही थी।उसे पहली बार महसूस हुआ कि राम की कठोरता सिर्फ उसके लिए नहीं थी। जब बात अपने लोगों के सम्मान की आती थी, तो वह किसी के सामने भी खड़ा हो सकता था।
राम ने कुछ पल कमरे में छाई खामोशी को देखा, फिर पंचदेव जी की ओर देखते हुए सहजता से बोला, “दादू, बताइए... इतनी सुबह-सुबह यहाँ आने का क्या कारण है?”
पंचदेव जी मुस्कुरा दिए। “अरे, कोई खास कारण नहीं है बेटा। बस तुमसे मिलने का मन था। और कल जो इतना बड़ा प्रोजेक्ट मिला है, उसकी खुशी भी तो मनानी है।”
राम कुछ कहता, उससे पहले पंचदेव जी ने उत्साह से आगे कहा, “इसलिए आज शाम होटल ब्लू मून में पार्टी रखी है। एक तो तुम्हारे इतने दिनों बाद वापस आने की खुशी... और ऊपर से आते ही इतनी बड़ी सफलता। दोनों खुशियाँ एक साथ मनाएँगे।”
फिर उन्होंने अपनी उंगली उठाकर राम को चेतावनी देने वाले अंदाज में कहा, “और सुनो, कोई बहाना नहीं चलेगा। तुम्हें हर हाल में आना है।”
पंचदेव जी की बात सुनकर कमरे में बैठे सभी लोगों की नजरें राम पर टिक गईं। जैसे हर कोई पहले से जानता हो कि राम पार्टी के नाम पर क्या जवाब देने वाला है।
राम ने कुछ क्षण चुप रहकर सामने देखा। फिर थोड़ी झिझक के साथ बोला, “दादू... मेरा वहाँ आना इतना जरूरी है क्या?”
पंचदेव जी ने उसे घूरा। “क्यों? अब अपने दादू के साथ दो घंटे बैठना भी जरूरी नहीं रहा?”
राम तुरंत बोला, “ऐसी बात नहीं है दादू। बस... कंपनी की कंडीशन अभी भी पूरी तरह ठीक नहीं हुई है। बहुत कुछ संभालना बाकी है। मुझे लगता है पार्टी थोड़ी बाद में रखेंगे तो बेहतर रहेगा।”
अर्जुन जी अब तक चुपचाप दोनों की बातें सुन रहे थे। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “बेटा, पार्टी का मन हमारा है। तुम्हारे लिए ही तो रखी है। इसलिए हमारे लिए ही थोड़ा वक्त निकाल लो।”
राम ने उनकी तरफ देखा।अर्जुन जी ने हल्के मजाकिया अंदाज में कहा, “एक बात हमने तुम्हारी मान ली... अब एक बात तुम भी हमारी मान लो।”राम के चेहरे पर हल्की मुस्कान आई। वह कुछ पल सोचता रहा, फिर बोला, “चाचू... अगर पार्टी आज की जगह दो दिन बाद रख लें तो?”
“दो दिन बाद?” अर्जुन जी ने पूछा।
राम ने सिर हिलाया। “हाँ। अगले दो दिन मैं बहुत ज्यादा बिजी रहूँगा। अभी-अभी ऑफिस ज्वाइन किया है, और वहाँ काफी कुछ लाइनअप करना है। पुराने काम देखने हैं, टीम के साथ बैठना है और प्रोजेक्ट की आगे की प्लानिंग भी करनी है।”
उसकी आवाज में इस बार बहानेबाजी नहीं, बल्कि जिम्मेदारी का भाव था।
“आज अगर मैं पार्टी में आया भी,” राम ने आगे कहा, “तो शायद दिमाग वहीं ऑफिस के काम में लगा रहेगा। लेकिन दो दिन बाद तक चीजें थोड़ी व्यवस्थित हो जाएँगी। तब मैं बिना किसी टेंशन के आपके साथ पूरा वक्त बिता पाऊँगा।”
अर्जुन जी ने पंचदेव जी की ओर देखा। पंचदेव जी कुछ पल राम को देखते रहे, फिर उनके चेहरे पर मुस्कान आ गई।
“ठीक है,” उन्होंने आखिरकार कहा, “दो दिन बाद ही सही। लेकिन उस दिन तुम्हारा कोई काम बीच में नहीं आएगा।”
राम ने मुस्कुराकर कहा, “पक्का, दादू।”पंचदेव जी ने तुरंत कहा, “और हाँ, इस बार पार्टी तुम्हारे लिए है... तो पार्टी से गायब होने का कोई रास्ता मत ढूँढ लेना।”
राम ने शांत लहजे मे कहा, “नहीं दादू, इस बार कोई बहाना नहीं।”
कमरे का माहौल भी उनकी बात के साथ थोड़ा हल्का हो गया। मगर एक कोने में बैठी अनुराधा चुपचाप सब सुन रही थी। उसके मन में बस एक ही सवाल घूम रहा था। दो दिन बाद होने वाली उस पार्टी में आखिर क्या होने वाला था?
सभी उसकी बात सुनकर चुप हो गए। मृत्युंजय जी ने कुछ पल राम को देखा और फिर सहज स्वर में बोले, “ठीक है, तो दो दिन बाद ही पार्टी रखेंगे।” उनकी बात पर केतकी और जानकी जी ने भी हामी भर दी। जानकी जी ने अनुराधा और आरोही की तरफ देखते हुए कहा, “कम से कम आज रात तुम सभी हमारे साथ खाने पर तो आ सकते हो।”
अनुराधा ने संकोच से उनकी तरफ देखते हुए कहा, “मैम, हम सभी... लेकिन हम तो...” वह अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाई थी कि जानकी जी ने उसकी बात काटते हुए कहा, “मैं कुछ नहीं सुनूँगी। तुम दोनों आज रात खाने पर आना, बस। बाकी किसी बात की जरूरत नहीं है।” उनके स्नेह भरे अधिकार के आगे अनुराधा के पास मना करने का कोई कारण नहीं था, इसलिए उसने हल्के से सिर हिला दिया।
लेकिन अगले ही पल माधुरी जी की आवाज ने माहौल का रंग बदल दिया। वह अनुराधा और आरोही को देखते हुए बोलीं, “क्या ये दोनों लड़कियाँ यहीं रहती हैं?” उनके सवाल में जितनी हैरानी थी, उससे कहीं ज्यादा उनके स्वर में आपत्ति थी।
उन्होंने अपनी नजरें दोनों पर टिकाए रखते हुए कहा, “जहाँ दो जवान लड़के रहते हैं, उनके बीच इन दोनों का इस तरह रहना क्या सही है? इनके माँ-बाप को मालूम है कि ये दोनों यहाँ रह रही हैं या नहीं? या इनके परिवार को ही इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनकी जवान बेटियाँ किन लोगों के साथ और कहाँ रह रही हैं?”
अनुराधा का चेहरा धीरे-धीरे उतरने लगा। वह समझ चुकी थी कि माधुरी जी की बात किस दिशा में जा रही है, फिर भी शायद उसे उम्मीद थी कि बात यहीं रुक जाएगी। मगर माधुरी जी के मन में जमा हुआ तिरस्कार आज जैसे शब्दों का रास्ता खोज चुका था।
वह राम की तरफ एक नजर डालकर फिर अनुराधा को देखते हुए बोलीं, “आखिर रघुवंशी परिवार का बड़ा बेटा है राम। जिसके पीछे बड़े-बड़े घरों की कितनी लड़कियाँ रहती हैं, वहाँ तुम जैसी मिडिल क्लास लड़कियों को भी शायद अपनी जगह बनाने का एक अच्छा तरीका मिल जाता है। अपनी खूबसूरती दिखाओ और बदले में पैसे और ऐशो-आराम हासिल कर लो। आखिर इससे आसान तरीका और क्या होगा?”
उनके शब्दों के साथ ही जैसे अनुराधा के कानों में बाकी सारी आवाजें बंद हो गईं। कुछ क्षण पहले तक वह सबके बीच सहज होकर खड़ी थी, लेकिन अब उसे लग रहा था जैसे कमरे में मौजूद हर नजर उसी पर आकर ठहर गई हो।
उसके चेहरे पर अपमान की तपिश फैल गई और आँखें अनायास ही नम हो गईं। उसने होंठ भींचकर उन आँसुओं को रोकने की कोशिश की, क्योंकि वह सबके सामने रोना नहीं चाहती थी। खासकर राम के सामने तो बिल्कुल नहीं। मगर कुछ शब्द ऐसे होते हैं जो कानों से नहीं, सीधे आत्मसम्मान पर लगते हैं और माधुरी जी के शब्द भी उसी तरह उसके भीतर उतर चुके थे।
अनुराधा ने कोई सफाई नहीं दी। उसने बस अपनी नजरें झुका लीं और धीमे कदमों से वहाँ से बाहर निकल गई। उसके जाते ही आरोही का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। वह कुछ कहने के लिए आगे बढ़ी, लेकिन तभी उसकी नजर राम पर पड़ी।
राम अब भी अपनी जगह बैठा था, मगर उसके चेहरे की शांति गायब हो चुकी थी। उसकी आँखें उस दरवाजे पर टिकी थीं, जिसके पार अनुराधा जा चुकी थी। उसके हाथ की उँगलियाँ धीरे-धीरे मुट्ठी में बदल रही थीं और जबड़ा इस कदर भींचा हुआ था कि चेहरे की नसें तक उभर आई थीं।
उसने माधुरी जी की तरफ देखा तक नहीं, क्योंकि शायद इस वक्त उसके भीतर उठ रहे गुस्से को शब्द देना उसके लिए खुद को रोकने से भी ज्यादा मुश्किल था।कमरे में बैठे हर व्यक्ति ने राम के चेहरे को देख लिया था। किसी ने कुछ नहीं कहा। सब जानते थे कि राम की नाराजगी आवाज उठाकर नहीं, बल्कि उसकी इस खामोशी से समझ आती है और इस बार उसकी खामोशी सिर्फ गुस्से की नहीं थी।
वह उस लड़की के अपमान की थी, जो अभी कुछ देर पहले तक उसके सामने खड़ी होकर बेझिझक उसे “रावण रघुवंशी” कह रही थी और अब उन्हीं लोगों की बात सुनकर सिर झुकाए कमरे से बाहर चली गई थी।
“मिसेज माधुरी रघुवंशी...!”
राम की तेज और गूँजती हुई आवाज पूरे कमरे में फैल गई। उसकी आवाज में इतना गुस्सा था कि एक पल के लिए वहाँ मौजूद हर व्यक्ति सहम गया। माधुरी जी के चेहरे का रंग उड़ गया और माथे पर पसीने की महीन बूंदें उभर आईं। उन्होंने धीरे से राम की तरफ देखा, जो अब अपनी जगह से उठकर सीधे उनकी ओर बढ़ रहा था।
राम उनके सामने आकर रुक गया। उसकी आँखों में ऐसा कठोर भाव था कि माधुरी जी की नजरें खुद-ब-खुद झुकने लगीं। राम ने बेहद ठंडे, लेकिन चेतावनी से भरे स्वर में कहा, “आज के बाद आपके मुँह से मैंने मिस ठाकुर के लिए एक शब्द भी सुना, तो आप अच्छी तरह जानती हैं कि राम रघुवंशी कौन है।
शुक्र मनाइए कि आप रघुवंशी परिवार की सदस्य हैं, जिसकी वजह से आपकी इस गलती को मैं सिर्फ एक बार माफ कर रहा हूँ। वैसे आपको तो मालूम ही होगा कि राम रघुवंशी किसी की पहली गलती भी माफ नहीं करता। आइंदा ख्याल रखिएगा।”
माधुरी जी के पास उसकी बात का कोई जवाब नहीं था। वह बस उसे देखती रह गईं। राम ने एक पल भी वहाँ और रुकना जरूरी नहीं समझा। वह पलटा और तेज कदमों से बाहर निकल गया।
बाहर आते ही उसकी नजरें अनुराधा को तलाशने लगीं। उसने आसपास देखा, फिर घर के दूसरे हिस्से की तरफ गया, लेकिन अनुराधा कहीं दिखाई नहीं दी। उसके भीतर की बेचैनी लगातार बढ़ती जा रही थी। वह तेजी से बाहर आया, अपनी कार का दरवाजा खोला और ड्राइविंग सीट पर बैठते ही फोन निकालकर किसी को कॉल लगाया।
“मुझे अभी उसकी लोकेशन चाहिए,” उसने फोन पर बेहद गंभीर आवाज में कहा और बिना एक पल गंवाए कार स्टार्ट कर दी।
दूसरी तरफ कमरे में माधुरी जी अभी भी राम के शब्दों से भीतर तक आहत खड़ी थीं। उन्हें अपने ही घर में सबके सामने इस तरह सुनाया जाना अपमान जैसा लग रहा था। आखिरकार वह मृत्युंजय जी की तरफ देखते हुए बोलीं, “देख लीजिए... कहीं ऐसा न हो कि घर का बड़ा बेटा आगे चलकर कुछ ऐसा कर जाए, जिसका असर हमारे खानदान की इज्जत पर पड़े।”
मृत्युंजय जी ने उनकी तरफ गंभीर नजरों से देखा । लेकिन तब तक। जानकी जी ने बिना किसी नरमी के कहा, “चुप हो जाओ, माधुरी । आज के लिए तुमने बहुत तमाशा कर लिया है और हमने बहुत कुछ देख भी लिया। अब घर चलो।”
माधुरी जी कुछ पल चुप रहीं। फिर अपनी नाराजगी को भीतर दबाते हुए बोलीं, “ठीक है, मम्मी जी... जैसा आपको ठीक लगे।”
जानकी जी ने कोई जवाब नहीं दिया। कमरे में फिर एक भारी खामोशी उतर आई, लेकिन राम के जाने के बाद भी उसके गुस्से की गर्मी वहाँ मौजूद हर व्यक्ति महसूस कर रहा था।
अर्जुन जी ने अभिमन्यु के पास आकर उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, “तुम दोनों बच्चियों के साथ राम को लेकर आ जाना।”
अभिमन्यु ने सिर हिलाते हुए कहा, “ठीक है, चाचू।”
कुछ ही देर बाद सभी वहाँ से निकलने लगे। पंचदेव जी और मृत्युंजय जी साथ-साथ आगे बढ़ रहे थे। बाकी लोग उनसे कुछ दूरी पर थे। चलते-चलते मृत्युंजय जी ने धीमी आवाज में अपने पिता से पूछा, “पापा... आपने वो देखा, जो मैंने देखा?”
पंचदेव जी ने उनकी तरफ देखा। कुछ पल उनके चेहरे पर गंभीरता बनी रही, फिर उन्होंने धीमे स्वर में कहा, “हाँ, जय... मैंने भी वही देखा है।”
मृत्युंजय जी कुछ कहने ही वाले थे कि पंचदेव जी ने उन्हें रोकते हुए कहा, “लेकिन अभी चुप रहने में ही भलाई है। कुछ रिश्तों को नाम देने से पहले उन्हें थोड़ा वक्त देना चाहिए। जो हमने देखा है, उसके बारे में अभी किसी से कुछ कहने की जरूरत नहीं है।”
तभी पीछे से अर्जुन जी उनके पास आ गए। उन्होंने दोनों की बात सुन ली थी। मुस्कुराते हुए बोले, “और माधुरी भाभी को थोड़ा दूर रखने में भी।”पंचदेव जी ने उनकी तरफ देखा और हल्की-सी मुस्कान के साथ कहा, “ठीक कहा तुमने, अर्जुन।”
फिर उन्होंने अपने बड़े बेटे की तरफ देखते हुए गंभीर स्वर में कहा, “जय, तुम माधुरी को समझा देना कि राम के सामने अपनी जुबान संभालकर रखें। आज उन्होंने जो कहा, उसके बाद राम ने उन्हें सिर्फ इसलिए छोड़ दिया क्योंकि वह इस परिवार की सदस्य हैं।
अगली बार अगर उन्होंने वही गलती दोहराई, तो शायद राम उन्हें चेतावनी देने के लिए रुकेगा भी नहीं।”मृत्युंजय जी ने गंभीरता से सिर झुकाते हुए कहा, “जी, पापा। मैं समझा दूँगा।”
इतना कहकर सभी रघुवंशी मेंशन के लिए निकल गए।
इधर दूसरी तरफ आरोही अब भी बेहद परेशान थी। उसके चेहरे से चिंता साफ झलक रही थी। वह अभिमन्यु के पास आकर बोली, “अनुराधा कहाँ गई होगी? कल ही तो वह इतनी बड़ी मुसीबत से निकलकर आई है और आज फिर...”
अभिमन्यु ने उसे शांत करते हुए कहा, “तुम परेशान मत हो। वह जल्दी मिल जाएगी। राम उसे ढूँढ़ने गया है।”
“लेकिन अनुराधा...” आरोही ने बेचैनी से फिर कहा।अभिमन्यु ने उसकी बात पूरी होने से पहले ही कहा, “जब राम खुद उसे ढूँढ़ रहा है, तो तुम चिंता मत करो। वह उसे ढूँढ़ लेगा। अब चलो, ऑफिस चलते हैं।”
आरोही ने एक बार फिर पीछे मुड़कर उस घर की तरफ देखा, जहाँ अनुराधा नहीं थी। मन अभी भी पूरी तरह आश्वस्त नहीं था।“लेकिन अगर उसे हमारी जरूरत हुई तो?”अभिमन्यु ने शांत स्वर में कहा, “राम है उसके साथ। और अगर किसी की जरूरत होगी, तो राम खुद हमें बुला लेगा। अभी तुम मेरे साथ ऑफिस चलो।”
आरोही ने अनमने मन से सिर हिलाया।दोनों अपनी कार की तरफ बढ़ गए और कुछ ही देर बाद ऑफिस के लिए निकल गए। पीछे उस घर में सिर्फ अनुराधा की खामोशी और उसके अचानक चले जाने से पैदा हुई बेचैनी रह गई थी।
राम बेचैनी में मुंबई की सड़कों पर गाड़ी दौड़ा रहा था। उसका चेहरा हमेशा की तरह शांत नहीं था। आँखों में साफ बेचैनी थी और उँगलियाँ स्टीयरिंग पर लगातार कसती जा रही थीं।
“कहाँ हो तुम, अनु?” उसने धीमे से खुद से कहा, “क्यों चली गईं बिना बताए? क्यों नहीं समझतीं कि मैं तुम्हें लेकर परेशान हूँ... क्यों तुम्हें मुझ पर भरोसा नहीं है?”
तभी उसका फोन बजा। राम ने तुरंत कॉल उठाया। दूसरी तरफ से मिली जानकारी सुनते ही उसकी आँखों में एक अलग-सी गंभीरता उतर आई।
“ठीक है।”
बस इतना कहकर उसने फोन काट दिया और गाड़ी का रुख समुद्र किनारे की तरफ मोड़ दिया।
कुछ देर बाद उसकी कार बीच के पास जाकर रुकी। राम लगभग तुरंत बाहर निकला। उसकी नजरें बेचैनी से इधर-उधर घूमने लगीं। दूर तक फैला समुद्र, किनारे पर आती-जाती लहरें और लोगों की हल्की आवाजाही के बीच उसकी नजर आखिरकार एक जगह जाकर ठहर गई।
एक बड़े से पत्थर पर अनुराधा बैठी थी।वह बिल्कुल शांत बैठी सामने समुद्र को देख रही थी, जैसे उन लहरों में अपने भीतर का शोर डुबो देना चाहती हो।राम धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ा।
अनुराधा को उसके आने का एहसास उसकी आहट से पहले ही हो गया था। फिर भी उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
राम उसके पास जाकर कुछ पल खड़ा रहा। उसके चेहरे को देखते ही उसका दिल कसक उठा। रोने के कारण अनुराधा की दोनों आँखें लाल थीं और पलकों पर अब भी नमी ठहरी हुई थी।
“अनु...” राम ने बहुत धीमे से पुकारा।
अनुराधा ने धीरे से उसकी तरफ देखा।राम ने बिना कोई सवाल किए पानी की बोतल और रुमाल उसकी तरफ बढ़ा दिया।
अनुराधा की नजर पहले उन दोनों चीज़ों पर गई और फिर राम के चेहरे पर। उसकी आँखों में अचानक वही गुस्सा लौट आया, जिसे वह कुछ देर से समुद्र के सामने बैठकर दबाए हुए थी।
राम ने हाथ वापस नहीं खींचा।
“मुझे आपसे कुछ नहीं चाहिए,” उसने सख्त आवाज़ में कहा। “चले जाइए यहाँ से।”
राम फिर भी खामोश रहा।वह उसी तरह उसके सामने पानी और रुमाल लिए खड़ा रहा।
अनुराधा ने कुछ पल उसे घूरा। जब उसे लगा कि राम अपनी जगह से हिलने वाला नहीं है, तो वह झुंझलाकर पत्थर से उठ खड़ी हुई।
“क्यों आए हैं आप यहाँ?” उसने गुस्से में अपनी उँगली उसकी तरफ उठाई। “क्या और कुछ कहना-सुनना बाकी रह गया था?”
राम ने उसे रोकने की कोशिश नहीं की।अनुराधा की आवाज़ अब भर्रा रही थी।
“एक बात और कान खोलकर सुन लीजिए... मैं अब आपकी कोई गलत बात नहीं सुनूँगी। और आपके उस बड़े से घर में भी नहीं रहूँगी। समझे आप?”
उसकी आँखों में आँसू फिर से भर आए, लेकिन इस बार उसने उन्हें गिरने नहीं दिया।
“मुझे आपके पैसे का कोई लालच नहीं है। और...” उसने एक पल के लिए नजरें फेर लीं, जैसे अगला वाक्य बोलना उसके लिए और ज्यादा मुश्किल हो, “मैं कभी आपके पीछे-पीछे नहीं आई थी।”
वह वापस राम की तरफ देखने लगी।“तो क्यों नहीं बताया आपने उन सबको कि मैंने आप पर कोई डोरे नहीं डाले? क्यों उन्हें ये सोचने दिया कि मैं...”उसकी आवाज़ वहीं टूट गई।
उसने खुद को संभाला और फिर बोली, “आप कंपनी के मालिक हैं तो क्या हुआ? मैं ऐसी-वैसी लड़की नहीं हूँ!”उसकी आवाज़ में इस बार सिर्फ गुस्सा नहीं था। उसमें चोट थी... अपने सम्मान के लिए लड़ने की जिद थी।
“मेरी भी इज्जत है, सर। मैं किसी के पैसे के पीछे नहीं भागती। किसी के घर में रहना मेरी मजबूरी हो सकती है, मेरी नीयत नहीं।”राम की आँखें उसके चेहरे पर टिकी थीं।अनुराधा ने गुस्से में उसके सीने पर हल्का-सा धक्का दिया।
“अब आप जाइए।”राम वहीं खड़ा रहा।“सुना नहीं आपने?” उसने फिर उसके सीने पर हल्का धक्का दिया। “जाइए यहाँ से!”राम ने उसका हाथ नहीं पकड़ा, न उसे रोका। बस उसकी तरफ देखता रहा।
अनुराधा की आँखों से आखिरकार आँसू छलक पड़े।“क्यों खड़े हैं अभी भी?” उसने लगभग टूटे हुए स्वर में कहा, “मैंने कहा ना... मुझे अकेला छोड़ दीजिए।”राम ने कुछ क्षण उसे देखा। फिर बेहद शांत आवाज़ में कहा, “तुम्हें अकेला छोड़ने के लिए नहीं आया हूँ, अनु।”
अनुराधा ने तुरंत उसकी तरफ देखा।राम की आवाज़ में इस बार न बॉस वाली सख्ती थी, न कोई शरारत।“तुम्हें ढूँढ़ने आया हूँ... क्योंकि तुम्हारे बारे में ऐसी कोई बात मुझे चैन से बैठने नहीं देती।”
Continue........


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