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Ch-6. His Forever Women

रात गहरी हो चुकींठी और प्रताप मेंशन मे रौशनी धीमी पड़ गयी थी।आर्यन को सुलाने के बाद अनिरुद्ध सीधे अपने स्टडी रूम में चला गया। कमरे का दरवाजा बंद करते ही उसने अपनी जेब से फोन निकाला और बिना किसी भूमिका के एक नंबर डायल कर दिया। कुछ ही सेकंड में दूसरी तरफ से कॉल उठ गई।

अनिरुद्ध की आवाज हमेशा की तरह गंभीर थी। उसने सीधे पूछा, “जिसके बारे में पता करने के लिए कहा था, उस पर कहाँ तक बात पहुँची?”दूसरी तरफ से कुछ कहा गया।

अनिरुद्ध कुछ पल चुपचाप सुनता रहा। उसकी आँखों में एक गहरी गंभीरता उतर आई थी।

“ठीक है... जितनी जल्दी हो सके, मुझे पूरी जानकारी चाहिए। छोटी से छोटी बात भी मुझसे छिपनी नहीं चाहिए।”

इतना कहकर उसने कॉल काट दी। फोन टेबल पर रखते हुए उसकी नजर कुछ पल के लिए सामने की खिड़की पर टिक गई। उसके दिमाग में वही सवाल फिर से घूमने लगे, जिनका जवाब वह जल्द से जल्द चाहता था।

वहीं दूसरी तरफ, डिनर खत्म करने के बाद राध्या आर्या को लेकर दूसरे कमरे में चली गई थी। दिनभर की भागदौड़ के बाद आर्या भी अब काफी थक चुकी थी। राध्या ने उसे बिस्तर पर लिटाया और उसके बालों को प्यार से सहलाने लगी।

कुछ पल बाद आर्या ने उनींदी आवाज में पुकारा, “मम्मा...! “हम्म...” राध्या ने प्यार से जवाब दिया।अब हम यहीं रहेंगे ना?राध्या ने उसकी तरफ देखा। उसकी मासूम आँखों में जैसे पिछले कुछ दिनों की सारी परेशानियाँ छिपी हुई थीं।

आर्या ने फिर धीरे से पूछा, “अब वो गंदे और बुरे लोग हमें परेशान नहीं करेंगे ना?”

राध्या के चेहरे पर एक पल के लिए उदासी उतर आई, लेकिन उसने उसे तुरंत छिपा लिया। उसने आर्या के माथे पर हाथ फेरते हुए कहा, “हम्म... अब कोई तुम्हें परेशान नहीं करेगा, बेटू।

कल तुम्हारा यहाँ किसी अच्छे स्कूल में एडमिशन करवा दूँगी। अब हम यहीं रहेंगे और एक नई शुरुआत करेंगे।उसने आर्या के छोटे-से चेहरे को अपनी हथेलियों में लेते हुए कहा, “और मेरी बेटू को कोई परेशान करने की कोशिश भी नहीं करेगा। मम्मा हमेशा अपनी बेटू का ध्यान रखेगी। Love you, मेरी जान।”

राध्या ने प्यार से उसके दोनों गालों और माथे पर किस कर दी।आर्या के चेहरे पर प्यारी-सी मुस्कान आ गई,“Love you too... आपकी जान की प्यारी मम्मा।”राध्या की आँखें भी हल्की-सी नम हो गईं। उसने मुस्कुराते हुए आर्या को अपने सीने से लगा लिया।

कुछ पल बाद आर्या ने जम्हाई लेते हुए कहा, “हम्म... अब निनी करनी है। राध्या हँस पड़ी।

“हाँ मेरी जान, अब सो जाओ। “Okay, मॉम्मा...”कुछ ही देर में आर्या की आँखें बंद हो गईं और उसकी साँसें धीरे-धीरे सामान्य होने लगीं।

राध्या कुछ देर तक उसके मासूम चेहरे को देखती रही, फिर एक गहरी साँस लेकर उसके ऊपर ठीक से कम्बल ओढ़ाने लगी।तभी उसकी नजर कमरे के दरवाजे पर पड़ी।

स्वाति वहाँ खड़ी थी। उसके दोनों हाथों में कॉफी के दो कप थे और चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान थी।राध्या ने उसे देखते हुए धीमे से पूछा, “तुम कब से खड़ी हो वहाँ?”

राध्या ने एक बार फिर सोती हुई आर्या के चेहरे को देखा, उसके माथे पर हल्के से हाथ फेरा और फिर कमरे की लाइट बंद कर दी। वह धीरे से दरवाजा बंद करके बाहर आ गई।

स्वाति अब भी वहीं खड़ी थी। उसने मुस्कुराते हुए राध्या की तरफ कॉफी का एक कप बढ़ा दिया।

“लो... तुम्हारे लिए।”राध्या ने कप लेते हुए हल्की मुस्कान के साथ कहा, “थैंक यू।”स्वाति ने उसे घूरकर देखा तो राध्या तुरंत अपनी बात सुधारते हुए हँस पड़ी, “सॉरी... अब नहीं बोलूँगी।”

“बेहतर है,” स्वाति ने मुस्कुराते हुए कहा।

दोनों धीरे-धीरे बाहर गार्डन में आ गईं। रात की ठंडी हवा पूरे माहौल में घुली हुई थी। शिमला की पहाड़ियों पर रात उतर चुकी थी और खुले आसमान में अनगिनत सितारे टिमटिमा रहे थे। दूर कहीं पहाड़ों के बीच बसी रोशनियाँ तारों की तरह ही चमक रही थीं।

राध्या ने कॉफी का कप दोनों हाथों में थाम रखा था और चुपचाप आसमान की तरफ देख रही थी। ठंडी हवा उसके खुले बालों को बार-बार चेहरे पर ला रही थी। उसने उन्हें कान के पीछे किया और फिर आसमान की तरफ देखने लगी।

पिछले दस सालों में उसकी जिंदगी ने उससे बहुत कुछ छीन लिया था। शायद यही वजह थी कि आज इतने लंबे समय बाद उसे अपने भीतर एक अजीब-सा सुकून महसूस हो रहा था। जैसे जिंदगी ने पहली बार उसे थोड़ी देर के लिए रुकने और साँस लेने की इजाजत दी हो।

स्वाति भी कुछ देर तक खामोश रही। फिर उसने धीरे से कहा, “राध्या...”

“हम्म?”

“हमारी बॉन्डिंग इतनी जल्दी हो गई कि मैं तुमसे ठीक से कुछ पूछ ही नहीं पाई।”

राध्या ने उसकी तरफ देखा।

स्वाति ने थोड़ी झिझक के साथ पूछा, “अगर तुम्हें कोई एतराज न हो तो... कुछ अपने बारे में बताओगी? मेरा मतलब... तुम यहाँ इस शहर में पाँच साल की बच्ची के साथ अकेली आई हो। न कोई परिवार, न कोई अपना... आखिर ऐसी क्या बात थी कि तुम्हें सब छोड़कर यहाँ आना पड़ा?”

राध्या की मुस्कान धीरे-धीरे फीकी पड़ गई।उसने कुछ पल तक हाथ में पकड़े कॉफी के कप को देखा, जैसे उसके अंदर ही अपने अतीत का जवाब ढूँढ़ रही हो। फिर उसकी नजर दोबारा आसमान पर टिक गई।

“कुछ जख्म ऐसे होते हैं, स्वाति...” उसकी आवाज धीमी हो गई, “जिन्हें कुरेदना जितना आसान होता है, उन्हें सहना उतना ही मुश्किल।”स्वाति चुपचाप उसकी तरफ देखती रही।

राध्या ने एक गहरी साँस ली और फिर उसकी तरफ देखते हुए कहा, “लेकिन तुमने इस अजनबी शहर में मुझे सिर्फ रहने की जगह नहीं दी। तुमने मुझे एक रिश्ता दिया, एक घर दिया... और सबसे बढ़कर, एक ऐसा सहारा दिया जिसकी शायद मुझे सबसे ज्यादा जरूरत थी।”

उसकी आँखों में हल्की नमी उतर आई, लेकिन इस बार उसने उसे छिपाने की कोशिश नहीं की।“इसलिए... तुम्हें जरूर बताऊँगी। सब कुछ।”

स्वाति ने कुछ नहीं पूछा। बस चुपचाप राध्या के पास आकर बैठ गई।रात की ठंडी हवा के बीच दोनों कुछ देर यूँ ही खामोश बैठी रहीं।क्योंकि कुछ कहानियाँ सवाल पूछने से नहीं, भरोसा बनने के बाद खुद-ब-खुद सामने आती हैं।

स्वाती ने धीमी आवाज़ मे कहा, अगर तुम्हें दर्द हो तो मुझे बताने के लिए तुम्हें अतीत मे जाने की जरूरत नही है। अतीत है उसे अतीत रहने दो। राध्या हलकी दर्द भरी मुस्कान लिए उसे देख रहीं थी। जब नयी शुरुआत करनी हो तो एक बार अतीत क़ो जरूर याद कर लेनी चाहिए। ताकी वर्तमान और भविष्य सुकून भरा हो।

दोनों ने एक साथ गहरी सांस भरी और शिमला की ठंडी हवाओं मे गार्डन मे बैठी थी। जहाँ स्वाती इंतजार मे थी राध्या के अतीत क़ो सुनने के लिए। वही राध्या खुद मे हिम्मत कर रहीं थी। एक बार फिर से उस दर्द क़ो जीने के लिए।

राध्या कुछ देर तक खामोश बैठी रही। उसकी नजरें आसमान में टिमटिमाते तारों पर टिकी थीं, लेकिन जैसे उसकी आँखों के सामने अब शिमला की रात नहीं, बल्कि उसका बीता हुआ वक्त घूम रहा था। हाथ में पकड़ी कॉफी कब ठंडी हो गई, उसे इसका भी एहसास नहीं हुआ।

फिर उसने धीमी आवाज में कहना शुरू किया, “मैं जमशेदपुर की रहने वाली हूँ। राध्या झा मेरा पूरा नाम है। मैंने मनोविज्ञान से डॉक्टरेट की है।”

वह कुछ पल रुकी और फिर हल्की-सी मुस्कान के साथ बोली, “मैं एक बहुत बड़े और भरे-पूरे परिवार से थी, स्वाति। हमारे घर में माँ-पापा के साथ दादा-दादी, चाचा-चाची, भाई-बहन... इतने लोग थे कि घर कभी शांत ही नहीं रहता था।

किसी न किसी की आवाज हमेशा सुनाई देती रहती थी। हमारा अपना बिजनेस था, वी. जे. कंस्ट्रक्शन कंपनी। मेरे दादा जी ने उसे शुरू किया था और धीरे-धीरे वह हमारे परिवार की पहचान बन गई थी।राध्या के चेहरे पर बीते दिनों की एक हल्की-सी चमक आई।

“मेरे दादा जी, विश्वनाथ झा... अट्ठहत्तर साल के हैं। परिवार में उनका बहुत सम्मान है। स्वभाव से शांत हैं, लेकिन उनकी मौजूदगी ही इतनी दमदार है कि उनके सामने कोई भी अपनी आवाज ऊँची करने से पहले सोचता था।

उन्होंने अपनी मेहनत से वी. जे. कंस्ट्रक्शन को एक बड़ा नाम बनाया था। दादी, शांति झा... बहत्तर साल की हैं। दादा जी के बिल्कुल विपरीत, बहुत शांत, सौम्य और ममता से भरी हुई। घर में किसी को भी उनकी गोद में सिर रख देने भर से सुकून मिल जाता था।”

राध्या की आवाज में अपने दादा-दादी के लिए प्यार साफ सुनाई दे रहा था।

“मेरे पापा विपुल झा... पचपन साल के हैं। दादा जी के साथ कंपनी संभालते थे। बहुत ईमानदार और उसूलों वाले इंसान हैं। लेकिन उनके लिए बिजनेस से भी ज्यादा जरूरी उनका परिवार था... और शायद सबसे ज्यादा मैं।”

यह कहते हुए राध्या के होंठों पर मुस्कान आई, मगर उसकी आँखें अचानक नम हो गईं।

“मेरी माँ मधु झा... चौवन साल की हैं। वो डॉक्टर हैं। बहुत दयालु और समझदार महिला हैं। बचपन में मुझे कभी किसी चीज की जरूरत महसूस नहीं होने दी। सच कहूँ तो माँ मेरे लिए सिर्फ माँ नहीं, मेरी सबसे अच्छी दोस्त भी थीं।”

राध्या ने एक लंबी साँस ली और आगे कहा, “मेरा एक बड़ा भाई भी है... वंश झा। तीस साल का। करीब छह फीट दो इंच लंबा, गोरा रंग और काफी हैंडसम। स्वभाव थोड़ा गुस्सैल और एरोगेंट है, लेकिन मेरे लिए वो हमेशा सबसे अलग रहा। वो एक सीक्रेट एजेंट है, इसलिए कभी महीनों तक घर से बाहर रहता है, तो कभी सालों तक उसका कोई अता-पता नहीं होता। लेकिन जब भी वापस आता था, सबसे पहले मुझे ढूँढ़ता था।”

उसके चेहरे पर कुछ पल के लिए भाई की याद में सच्ची मुस्कान आई, लेकिन अगले ही पल वह फिर गंभीर हो गई।

“मेरे चाचा विशाल झा भी पापा के साथ कंपनी में काम करते हैं। पचास साल के हैं। और चाची विधि झा... अड़तालीस साल की। वो घर संभालती हैं। हमारे घर के हर बच्चे को उन्होंने अपने बच्चों की तरह प्यार दिया है। सच में, हमारे घर का पूरा परिवार उनकी ममता से जुड़ा हुआ था।”

“चाचा-चाची के दो बच्चे हैं। उनका बेटा विवेकानंद झा... पच्चीस साल का है। पाँच फीट दस इंच लंबा, साँवला रंग और काफी हैंडसम। वो वी. जे. कंस्ट्रक्शन कंपनी का सीईओ है। दिमाग बहुत तेज है और अपनी मेहनत से उसने कंपनी को एशिया की बेहतरीन कंस्ट्रक्शन कंपनियों में जगह दिलाने में बहुत योगदान दिया है।”

राध्या के होंठों पर हल्की शरारती मुस्कान आई।“हालाँकि उसकी जिंदगी में भी एक राज है... उसकी एक सीक्रेट गर्लफ्रेंड है।स्वाति की आँखों में उत्सुकता उभरी, लेकिन राध्या ने मुस्कुराकर कहा, “उसकी कहानी फिर कभी।”

फिर उसने आगे कहा, “उसकी छोटी बहन रूही है। अठारह साल की। अभी कॉलेज शुरू किया है। गेहुँआ रंग, बड़ी-बड़ी भूरी आँखें, भूरे बाल और करीब पाँच फीट दो इंच की। पूरे घर की लाडली है। उसकी एक छोटी-सी मुस्कान पर घर का माहौल बदल जाता था। बहुत मासूम है वो... और सबकी प्यारी।”

राध्या कुछ पल चुप रही। मेरी बुआ वैदेही मिश्रा हैं। तिरपन साल की। उनके पति शशिकांत मिश्रा पचपन साल के हैं। दोनों कॉलेज के जूलॉजी डिपार्टमेंट में प्रोफेसर हैं। उनका बेटा कुणाल मिश्रा है, उसकी पत्नी काव्या।

दोनों इंजीनियर हैं और ऑस्ट्रेलिया में सेटल हैं। उनकी बेटी सोनल चौधरी है, उसके पति अनील चौधरी। दोनों सरकारी अधिकारी हैं और हैदराबाद में रहते हैं।

इतना कहते-कहते राध्या की आवाज भारी हो चुकी थी। जिन लोगों का जिक्र करते हुए कुछ देर पहले उसके चेहरे पर मुस्कान थी, अब उन्हीं यादों के साथ उसकी आँखों में नमी उतर आई थी।

स्वाति ने धीरे से उसके हाथ पर अपना हाथ रख दिया।“राध्या... जब दिल करे तब आगे बताना। खुद को इतना तकलीफ मत दो।”राध्या ने उसकी तरफ देखा। कुछ पल तक उसकी आँखें नम रहीं, फिर उसने अपना सिर हल्का-सा हिलाया।

“नहीं स्वाति... आज बोल लेने दो।”उसकी आवाज में दबा हुआ दर्द साफ महसूस हो रहा था।

“बहुत सालों से सब कुछ अपने अंदर दबाकर रखा है। आत्मा पर बहुत बोझ है मेरे... आज अगर नहीं बोला तो शायद फिर कभी नहीं बोल पाऊँगी।”

स्वाति ने बिना कुछ कहे उसका हाथ थामे रखा।राध्या ने गहरी साँस ली और अपनी नजरें फिर आसमान की तरफ उठा दीं।तुमने मेरे परिवार के बारे में पूछा था ना... तो अब मेरी कहानी भी सुनो।उसकी आवाज अचानक धीमी पड़ गई।

“क्योंकि मेरी जिंदगी हमेशा ऐसी नहीं थी, स्वाति... कभी मैं भी बहुत खुश थी। मेरा परिवार ही मेरी पूरी दुनिया था... और मुझे जरा भी अंदाजा नहीं था कि एक दिन वही दुनिया मेरी जिंदगी से इस तरह छिन जाएगी।”

राध्या की आँखों से आखिरकार एक आँसू निकलकर उसके गाल पर ठहर गया।

और यहीं से उसकी जिंदगी के उस अतीत की शुरुआत होने वाली थी, जिसे वह पिछले दस सालों से अपने सीने में दफन किए बैठी थी।

उधर उसी समय प्रताप मेंशन के स्टडी रूम में अनिरुद्ध के फोन की घंटी बजी। उसने फोन उठाकर कॉल रिसीव किया।

“Hello।”

दूसरी तरफ से आवाज आई, “सर, आपने जिस मैम के बारे में पता करने के लिए कहा था, उनकी पूरी जानकारी मैंने आपको मेल कर दी है। आप चेक कर लीजिए।”

“ठीक है।”

अनिरुद्ध ने कॉल काट दी और तुरंत अपने लैपटॉप की तरफ बढ़ गया। कुछ ही पलों में उसकी मेल खुल गई।स्क्रीन पर सबसे ऊपर एक नाम लिखा था, "राध्या झा।अनिरुद्ध की नजर उसी नाम पर टिक गई।उसने पढ़ना शुरू किया।

जैसे-जैसे वह राध्या की जिंदगी के बारे में जानता गया, उसके चेहरे के भाव बदलते चले गए। कभी उसकी भौंहें सिकुड़ जातीं, कभी उसका जबड़ा गुस्से से कस जाता। कुछ बातों को पढ़ते हुए उसकी आँखों में गुस्सा साफ नजर आता, तो कुछ जगहों पर वही आँखें दर्द और तकलीफ से भर उठतीं।वह लगातार स्क्रीन पर नजरें गड़ाए बैठा था।

जिस लड़की को वह सुबह से सिर्फ एक अजीब-सी, खुद में रहने वाली और attitude वाली लड़की समझ रहा था, उसकी जिंदगी के पीछे इतनी बड़ी कहानी छिपी होगी, यह उसने कभी नहीं सोचा था।

अनिरुद्ध ने मेल को ऊपर से नीचे तक पढ़ा और फिर कुछ देर तक बिल्कुल शांत बैठा रहा। उसके चेहरे पर कोई साफ भाव नहीं था, लेकिन उसके भीतर क्या चल रहा था, यह शायद सिर्फ वही जानता था।

राध्या ने अपनी हथेली से आँसू पोंछे और धीमी आवाज में कहा, “तुमने आज मेरी जिंदगी का सिर्फ एक छोटा-सा हिस्सा देखा है, स्वाति। असली कहानी तो उसके बाद शुरू हुई थी।”

उसने एक गहरी साँस ली।

“उस दिन से लेकर आज तक... मैंने जो जिया है, शायद उसे याद करना भी मेरे लिए किसी सजा से कम नहीं है।”और फिर राध्या अपने अतीत की उन परतों को एक-एक करके खोलने लगी, जिन्हें उसने दस सालों से दुनिया से छिपाकर रखा था।

Continue......

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