शिमला की ठंडी शाम धीरे-धीरे रात में बदल रही थी। पहाड़ियों पर बिखरी रोशनी दूर से ऐसे नजर आ रही थी, जैसे आसमान के कुछ सितारे धरती पर उतर आए हों। उसी खूबसूरत रास्ते से एक काली BMW तेज़ी से आगे बढ़ रही थी।
गाड़ी के अंदर अनिरुद्ध खामोशी से बैठा खिड़की के बाहर देख रहा था। दिनभर की घटनाएँ उसके दिमाग में कहीं न कहीं अब भी घूम रही थीं, लेकिन उसके चेहरे पर हमेशा की तरह कोई भाव नहीं था।
कुछ देर बाद गाड़ी शहर के भीड़भाड़ वाले इलाके से निकलकर एक शांत और बेहद खूबसूरत रास्ते पर आ गई। सड़क के दोनों तरफ ऊँचे देवदार के पेड़ खड़े थे और उनके बीच से गुजरती ठंडी हवा पूरे माहौल को और भी रहस्यमयी बना रही थी।
कुछ ही मिनटों बाद सामने लोहे का एक विशाल और खूबसूरत गेट दिखाई दिया।गेट के दोनों तरफ सुरक्षा में खड़े गार्ड्स ने BMW को देखते ही तुरंत सलामी दी और भारी-भरकम गेट धीरे-धीरे खुलने लगा।गाड़ी अंदर दाखिल हुई।यह था प्रताप मेंशन।
शिमला के सबसे प्रतिष्ठित और रसूखदार परिवारों में से एक, प्रताप परिवार का यह आलीशान घर किसी महल से कम नहीं था। ऊँची पहाड़ी पर बना यह मेंशन दूर से ही अपनी भव्यता का एहसास करा देता था।
सफेद और हल्के क्रीम रंग के पत्थरों से बना विशाल भवन, ऊँची मेहराबदार खिड़कियाँ, पुराने राजसी अंदाज की बालकनियाँ और चारों तरफ फैली हरी-भरी हरियाली उसे एक अलग ही शाही रूप देती थी।
मुख्य रास्ते के दोनों ओर करीने से लगे देवदार और चीड़ के ऊँचे पेड़ थे। उनके बीच रंग-बिरंगे फूलों की क्यारियाँ और खूबसूरत लैंडस्केपिंग पूरे परिसर की खूबसूरती में चार चाँद लगा रही थी।
मेंशन के सामने एक बड़ा-सा लॉन था, जहाँ शाम होते ही हल्की पीली रोशनी वाले गार्डन लैंप जल उठते थे। बीच में एक सुंदर फव्वारा था, जिसके आसपास छोटे-छोटे फूलों के पौधे लगे थे। रात की रोशनी में पानी की चमक पूरे माहौल को और भी शानदार बना रही थी।
BMW धीरे-धीरे उस विशाल पोर्टिको के नीचे जाकर रुकी, जिसके ऊपर खूबसूरत नक्काशी और बड़े-बड़े झूमर लगे हुए थे।ड्राइवर तुरंत गाड़ी से उतरकर पीछे का दरवाजा खोलने के लिए आगे बढ़ा।अनिरुद्ध गाड़ी से बाहर निकला और एक नजर अपने आसपास डाली।
प्रताप मेंशन की भव्यता के बावजूद उसके चेहरे पर कोई खास बदलाव नहीं आया। आखिर यह उसके लिए कोई नई चीज नहीं थी। इसी घर की दीवारों के बीच उसने अपना बचपन देखा था और इसी घर ने उसके परिवार की कई पीढ़ियों को अपने भीतर समेट रखा था।वह सीढ़ियों की तरफ बढ़ा।
अंदर प्रवेश करते ही विशाल ड्रॉइंग एरिया नजर आता था। ऊँची छत से लटकता हुआ क्रिस्टल का विशाल झूमर पूरे हॉल को रोशन कर रहा था। दीवारों पर कीमती पेंटिंग्स लगी थीं और फर्श पर बिछे महंगे फारसी कालीन उस जगह की शानो-शौकत को और बढ़ा रहे थे।
पुराने राजसी फर्नीचर और आधुनिक सजावट का खूबसूरत मेल पूरे घर को एक अलग ही रुतबा देता था।लेकिन इस आलीशान घर में अनिरुद्ध की नजर किसी सजावट पर नहीं ठहरी।
उसकी नजर सीधे सामने खड़े एक छोटे से बच्चे पर जाकर रुक गई।
करीब आठ साल का वह बच्चा काफी देर से शायद उसी का इंतजार कर रहा था। जैसे ही उसकी नजर अनिरुद्ध पर पड़ी, उसके चेहरे पर चमक आ गई,“डैड!”वह दौड़कर अनिरुद्ध के पास आया।
अनिरुद्ध के चेहरे की कठोरता उसी पल कुछ नरम पड़ गई। उसने अपनी बाँहें फैलाते हुए कहा, “क्या हुआ, चैंप? इतने परेशान क्यों थे? देखो... डैड आ गए।”आर्यन दौड़कर उससे लिपट गया।
अनिरुद्ध ने उसे अपनी बाँहों में भर लिया और उसके बालों पर प्यार से हाथ फेरते हुए पूछा, “क्या बात है? आज मेरा चैंप इतना शांत क्यों है?”आर्यन कुछ पल उसके सीने से लगा रहा। फिर धीरे से पीछे हटकर अनिरुद्ध की तरफ देखने लगा।“डैड... मुझे आपसे कुछ कहना है।”
अनिरुद्ध ने उसकी आँखों में देखा,“हम्म... बोलो।”आर्यन ने कुछ पल झिझकते हुए कहा, “आप मेरे कमरे में चलोगे?”
अनिरुद्ध ने बिना कुछ पूछे सिर हिलाया और अपने बेटे के साथ कमरे की तरफ बढ़ गया।उसे अभी अंदाजा भी नहीं था कि आज उसका आठ साल का बेटा उससे ऐसी बात कहने वाला था, जो शायद उसकी जिंदगी के सबसे बंद दरवाजे को पहली बार खोलने वाली थी।
कमरे में पहुँचते ही आर्यन चुपचाप अपने बेड के किनारे बैठ गया। अनिरुद्ध भी उसके पास आकर बैठा और उसकी तरफ देखते हुए बोला, “अब बताओ चैंप, ऐसी क्या बात है जो तुम मुझसे अकेले में कहना चाहते थे?”
आर्यन कुछ पल अपने हाथों की उँगलियों से खेलता रहा। जैसे वह अपने मन की बात कहने के लिए सही शब्द ढूँढ़ रहा हो। फिर अचानक वह अनिरुद्ध के करीब आया और अपना सिर उसकी गोद में रख दिया।
अनिरुद्ध ने बिना कुछ पूछे उसके बालों में हाथ फेरना शुरू कर दिया।कुछ पल की खामोशी के बाद आर्यन की धीमी आवाज कमरे में गूँजी,“डैड... मुझे मॉम चाहिए।”अनिरुद्ध की उँगलियाँ उसके बालों में चलते-चलते एक पल के लिए ठहर गईं।
उसने नीचे देखा। आर्यन अभी भी उसकी गोद में सिर रखे हुए था।“मॉम?” अनिरुद्ध ने बहुत धीमे से पूछा।
आर्यन ने सिर उठाकर उसकी तरफ देखा। उसकी आँखों में मासूमियत थी, लेकिन उस मासूमियत के पीछे एक ऐसी कमी थी जिसे वह काफी समय से महसूस करता आ रहा था।
“हाँ, डैड। मुझे भी मॉम चाहिए।”
अनिरुद्ध कुछ नहीं बोला।आर्यन ने धीरे-धीरे अपनी बात आगे बढ़ाई, “स्कूल में जब मैं दूसरे बच्चों को उनकी मॉम के साथ देखता हूँ ना, तो मुझे भी लगता है कि मेरी मॉम होतीं। वो मुझे स्कूल छोड़ने आतीं... मेरे लिए खाना बनातीं... मेरी बातें सुनतीं... और जब मैं स्कूल से वापस आता तो मेरे लिए इंतजार करतीं।”
उसकी आवाज में हल्की उदासी उतर आई।सबके पास मॉम है, डैड... बस मेरे पास नहीं है।
अनिरुद्ध के चेहरे पर कोई भाव नहीं आया, लेकिन उसके भीतर जैसे कुछ चुभ गया था। वह अपने बेटे की इस कमी को जानता था, मगर शायद आज पहली बार आर्यन ने उसे इतने सीधे शब्दों में उसके सामने रख दिया था।
आर्यन ने अनिरुद्ध का हाथ पकड़ लिया,“डैड... प्लीज़ आप शादी कर लो ना।”अनिरुद्ध ने उसकी तरफ देखा,“शादी?”आर्यन ने तुरंत सिर हिलाया,“हाँ। आप शादी कर लो, फिर मेरी भी मॉम आ जाएगी।”
अनिरुद्ध ने एक गहरी साँस ली। उसने आर्यन के माथे पर हाथ फेरते हुए कहा, “आर्यन... शादी इतनी आसान बात नहीं होती।”“तो आप मुश्किल वाला काम कर लेना डैड,” आर्यन ने मासूमियत से जवाब दिया।
अनिरुद्ध उसकी बात सुनकर कुछ पल उसे देखता रहा। फिर उसके होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आ गई,“तुम्हें सच में मॉम चाहिए?”आर्यन ने बिना एक पल सोचे कहा, “बहुत ज्यादा।”
फिर कुछ पल रुककर उसने मासूमियत से पूछा, “आपको नहीं चाहिए?”यह सवाल सुनकर अनिरुद्ध एकदम शांत हो गया।उसके पास उस सवाल का कोई आसान जवाब नहीं था।
उसने बस आर्यन के बालों में हाथ फेरते हुए धीमे से कहा, “हम्म... देखते हैं।”
आर्यन के चेहरे पर तुरंत उम्मीद की चमक आ गई।“मतलब आप शादी करोगे?”अनिरुद्ध ने उसे जवाब देने के बजाय उसके माथे पर प्यार से हाथ रखा।“अब बहुत सवाल हो गए। सो जाओ।”
आर्यन मुस्कुरा दिया और फिर से अनिरुद्ध की गोद में अपना सिर रख दिया।कुछ ही देर में वह अपनी मासूम बातों के बीच नींद की आगोश में चला गया।अनिरुद्ध काफी देर तक उसे देखता रहा।उसके चेहरे पर अब भी वही गंभीरता थी, लेकिन उसके मन में आर्यन की बातें लगातार घूम रही थीं।
“मुझे मॉम चाहिए...”
अनिरुद्ध ने धीरे से आर्यन को अपनी गोद से उठाया और बिस्तर पर लिटा दिया। उसने उसके ऊपर ठीक से कम्बल ओढ़ाया, उसके माथे को चूमा और कुछ पल वहीं खड़ा रहा,“गुड नाइट, चैंप।”
आर्यन नींद में हल्का-सा मुस्कुराया।अनिरुद्ध कमरे से बाहर निकल आया और दरवाजा धीरे से बंद कर दिया।लेकिन वह अपने कमरे में जाने के बजाय सीधे स्टडी की तरफ बढ़ गया।स्टडी रूम में पहुँचकर उसने कोट उतारा और कुर्सी पर रख दिया। फिर खिड़की के पास जाकर खड़ा हो गया।
बाहर प्रताप मेंशन का विशाल लॉन रोशनी से जगमगा रहा था। इतनी बड़ी हवेली, इतना बड़ा परिवार, इतनी दौलत और इतनी सुविधाएँ होने के बावजूद उसके बेटे के मन में एक ऐसी कमी थी, जिसे पैसा कभी पूरा नहीं कर सकता था।
अनिरुद्ध ने आँखें बंद कर लीं और अनजाने ही उसके दिमाग में आज का एक चेहरा उभर आया, " राध्या "!वही गहरी कत्थई आँखें... वही शांत चेहरा... वही आत्मसम्मान से भरी आवाज़ और फिर उसकी नजरों के सामने आर्या का चेहरा भी आ गया, जो अपनी माँ को बार-बार किस कर रही थी।
अनिरुद्ध ने तुरंत अपनी आँखें खोल दीं,“ये क्या सोच रहा हूँ मैं...?”उसने खुद से कहा और माथे पर हाथ फेरते हुए कुर्सी पर बैठ गया।लेकिन जितनी कोशिश वह उस ख्याल को अपने दिमाग से निकालने की कर रहा था, उतनी ही बार वही चेहरा उसके सामने लौट रहा था।
उसे अभी यह नहीं पता था कि आज उसके बेटे की एक मासूम इच्छा ने उसके भीतर एक ऐसा सवाल जगा दिया है, जिसका जवाब आने वाले वक्त में उसकी पूरी जिंदगी बदलने वाला था।
Continue.........


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