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Ch-19.His Dark Obssession

रात काफी गहरी हो चुकी थी। कमरे में चारों तरफ खामोशी पसरी हुई थी और खिड़की से आती चाँदनी अब पहले से भी ज्यादा फीकी लग रही थी। राम सोफे पर बैठे-बैठे अनुराधा को देखते-देखते कब अपनी आँखें बंद कर बैठा, उसे खुद भी पता नहीं चला।

रात के किसी पहर अचानक उसके कानों में अनुराधा के रोने और कुछ बड़बड़ाने की आवाज़ पड़ी। उसकी नींद एकदम से टूट गई। राम ने घबराकर आँखें खोलीं और तुरंत बिस्तर की तरफ देखा।

अनुराधा नींद में बेचैनी से छटपटा रही थी। उसके माथे पर पसीने की बूँदें थीं और देखते ही देखते उसका पूरा चेहरा पसीने से भीग चुका था। उसकी साँसें भी सामान्य नहीं थीं। वह कुछ ऐसा बोल रही थी, जो राम को साफ़ सुनाई नहीं दे रहा था।

राम बिना एक पल गँवाए सोफे से उठा और तेज़ी से उसके पास पहुँचा।“अनु...” उसने धीमे से पुकारा।लेकिन अनुराधा जैसे नींद में किसी और ही दुनिया में थी। उसकी आँखें बंद थीं और चेहरे पर डर साफ़ दिखाई दे रहा था। राम ने उसके पास बैठते हुए उसकी हालत को गौर से देखा। उसकी बेचैनी देखकर राम की चिंता और बढ़ गई।

राम ने तुरंत उसके चेहरे पर आए पसीने को अपने हाथ से धीरे-धीरे पोंछा। अनुराधा की हालत देखकर उसके चेहरे पर चिंता साफ़ दिखाई दे रही थी। अगले ही पल उसने उसे अपनी बाहों में उठा लिया और अपने करीब करते हुए उसके गाल पर हाथ रखकर हल्के-हल्के थपथपाने लगा।

“अनु... उठो।” उसकी आवाज़ पहले से कहीं ज्यादा नरम थी। “देखो, तुम ठीक हो... आँखें खोलो।”

अनुराधा की बंद पलकों में हल्की-सी हरकत हुई। कुछ पल बाद उसने धीरे-धीरे अपनी आँखें खोलीं। उसकी आँखें आँसुओं से भरी हुई थीं और सामने राम का चेहरा धुंधला-सा दिखाई दे रहा था।

राम ने उसे इस तरह अपनी तरफ देखते हुए देखा तो अपना सिर हल्का-सा हाँ में हिलाया और बेहद शांत स्वर में कहा, “तुम ठीक हो... देखो, मैं हूँ तुम्हारे पास।”

अनुराधा कुछ पल तक उसे बस देखती रही। जैसे वह नींद और हकीकत के बीच यह समझने की कोशिश कर रही हो कि वह कहाँ है और उसके सामने कौन है। उसकी साँसें अभी भी तेज़ थीं और आँसू बिना किसी आवाज़ के उसके गालों पर बह रहे थे।

राम ने उसके चेहरे से उन आँसुओं को भी धीरे से पोंछ दिया। “डरो मत... कुछ नहीं हुआ है।”

अनुराधा की उँगलियाँ अनजाने में राम की शर्ट को पकड़ने लगीं। उसकी पकड़ बहुत हल्की थी, लेकिन उसमें छिपा डर साफ़ महसूस हो रहा था।

राम ने उसकी पीठ पर हाथ फेरते हुए कहा, “मैं यहीं हूँ, अनु। तुम अकेली नहीं हो।”

उसकी आवाज़ सुनते-सुनते अनुराधा की घबराहट थोड़ी कम होने लगी। उसने अपनी आँखें फिर से बंद कर लीं और अपना चेहरा राम के सीने के पास छिपा लिया।

अनुराधा ने धीरे-धीरे अपना हाथ उठाया और राम के गाल पर रख दिया। उसकी उँगलियों का हल्का-सा स्पर्श महसूस होते ही राम कुछ क्षण के लिए बिल्कुल स्थिर हो गया। उसने अनायास अपनी आँखें बंद कर लीं।

अनुराधा का इस तरह उसे छूना उसके भीतर एक अजीब-सा एहसास जगा रहा था।ऐसा एहसास जिसे वह उस वक्त कोई नाम देना नहीं चाहता था।

कमरे में कुछ पल तक सिर्फ अनुराधा की धीमी साँसों की आवाज थी।राम ने अपनी आँखें बंद किए हुए ही उसके हाथ को महसूस किया। उसके स्पर्श में कोई बनावट नहीं थी, कोई झिझक नहीं... जैसे वह नींद और बेहोशी के बीच किसी ऐसे भरोसे को तलाश रही हो, जिसे शब्दों में कह पाना उसके लिए संभव नहीं था।

तभी अचानक अनुराधा की आवाज सुनाई दी,“राम...”आवाज इतनी धीमी और दर्द से भरी थी कि राम की आँखें तुरंत खुल गईं।

उसने अनुराधा की तरफ देखा। उसकी आँखें अभी भी पूरी तरह खुली नहीं थीं। शायद दवा के असर के कारण वह अभी पूरी तरह होश में नहीं थी। उसके चेहरे पर थकान और कमजोरी साफ दिखाई दे रही थी।

लेकिन उसके होंठों से निकला वह एक शब्द राम को भीतर तक छू गया था, " राम "!उसने उसे इतने दिनों में पहली बार इस तरह अपना नाम लेते सुना था।

राम ने उसके हाथ को अपने हाथ में थाम लिया और थोड़ा झुकते हुए बहुत धीमे स्वर में कहा, “बोलो, अनु...”अनुराधा ने उसकी तरफ देखने की कोशिश की, लेकिन उसकी पलकें फिर से भारी होने लगीं।

राम वहीं उसके पास बैठा रहा,“मैं यहीं हूँ,” उसने धीमे से कहा, “जो कहना है... कह दो।”

राम कुछ देर तक बिना कुछ कहे उसे अपनी बाहों में थामे रहा, जैसे उसे सिर्फ़ अपनी मौजूदगी से यह यकीन दिलाना चाहता हो कि इस वक्त वह पूरी तरह सुरक्षित है।

राम के “बोलो, अनु...” कहते ही अनुराधा के भीतर दबा हुआ डर जैसे अचानक टूट गया। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे और काँपती हुई आवाज उसके होंठों से निकली, “राम... मुझे दर्द हो रहा है...!!! मुझे खुद के लिए गंदे वाले एहसास हो रहे हैं... उसने मुझे...”

वह बोलते-बोलते रुक गई। फिर काँपते हाथों से अपने गले के पास इशारा करते हुए बोली, “यहाँ... काटा था... मुझे अच्छा नहीं लग रहा है... उसने भी मुझे... हर जगह बहुत गलत तरीके से छुआ और काटा था...”

उसकी आवाज हर शब्द के साथ और टूटती जा रही थी।“राम... मुझे अच्छा नहीं लग रहा... मैं गंदी हो गई हूँ... मैं मर जाऊँगी...”कहते-कहते उसकी आवाज घुट गई। आँसू लगातार उसके गालों पर बह रहे थे और रोने के कारण उसके शब्द साफ निकलना भी मुश्किल हो रहे थे।

राम कुछ पल बिल्कुल शांत रहा। उसकी आँखों में गुस्सा जरूर था, लेकिन अनुराधा के सामने उसने उस गुस्से को आने नहीं दिया। उसने धीरे से उसका हाथ अपने हाथों में लिया और बहुत स्थिर आवाज में कहा, “अनु... मेरी तरफ देखो।”

अनुराधा ने काँपती हुई आँखों से उसकी तरफ देखा।राम ने उसके आँसू पोंछते हुए कहा, “तुम गंदी नहीं हो।”अनुराधा ने सिर हिलाते हुए रोकर कहा, “लेकिन...! “नहीं।” राम ने इस बार थोड़ा दृढ़ होकर कहा, “इसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं थी। तुम्हारे साथ जो हुआ, उसकी गंदगी तुम्हारी नहीं है।”

अनुराधा की आँखों से आँसू और तेज बहने लगे।राम ने उसे अपने करीब करते हुए कहा, “तुम्हें किसी चीज के लिए शर्मिंदा होने की जरूरत नहीं है। तुमने कुछ गलत नहीं किया।”

वह कुछ पल चुप रहा, फिर उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोला, “और मरने की बात दोबारा मत कहना। तुम्हें अभी बहुत कुछ जीना है, अनु। अनुराधा उसके सीने से लगकर सिसकती रही।

राम उसे बस थामे रहा। उसने कोई सवाल नहीं पूछा, कोई जवाब जबरदस्ती नहीं माँगा।

उस वक्त उसके लिए अनुराधा की कहानी जानना जरूरी नहीं था।जरूरी सिर्फ इतना था कि वह लड़की, जो खुद को दोषी समझकर टूट रही थी, उसे यह विश्वास दिलाया जाए कि उसके साथ हुआ अपराध उसकी पहचान नहीं है।

राम ने अनुराधा मुँह से “मैं मर जाऊँगी” सुनते ही तुरंत अपनी उँगली उसके होंठों पर रख दी। उसकी आँखों में उतर आए आँसुओं को अपने अंगूठे से पोंछते हुए उसने बहुत धीमी, मगर दृढ़ आवाज में कहा, “बस... ऐसी बात दोबारा मत कहना, अनु।”

अगले ही पल उसने उसे अपनी बाहों में भर लिया। अनुराधा जैसे उसी पल टूट गई। वह राम के सीने से लगी हुई फूट-फूटकर रोने लगी। उसकी सिसकियों से उसका पूरा शरीर काँप रहा था और उसकी उँगलियाँ राम के कपड़ों को कसकर पकड़े हुए थीं, जैसे इस वक्त उसके पास थामने के लिए बस यही एक सहारा हो।

राम ने उसे और मजबूती से अपने सीने से लगा लिया। उसके हाथ अनुराधा के बालों को बहुत धीरे-धीरे सहला रहे थे। उसकी आवाज में अब कोई कठोरता नहीं थी, सिर्फ गहरा अपनापन था।

“मैं उन सबको जिन्दा नहीं छोड़ऊंगा जिसने तुम्हारे साथ ऐसी हरकत की है।”

अनुराधा की सिसकियाँ कुछ धीमी हुईं, लेकिन आँसू अब भी लगातार बह रहे थे। राम कुछ पल उसे वैसे ही थामे रहा, फिर उसकी नजर उसकी गर्दन पर पड़ी उस जगह पर चली गई, जहाँ वह निशान अब भी मौजूद था। उसे देखते ही उसके भीतर दबा हुआ गुस्सा फिर से जाग उठा, लेकिन उसने उसे अपने चेहरे पर नहीं आने दिया।

अनुराधा की तकलीफ भरी सिसकियाँ सुनकर, राम अपने होठो अनुराधा की गर्दन पर मौजूद निशान क़ो अपने होठो से धीमी लेकिन प्यार से चूमने लगा।उसके होठो क़ो छुवन ने जैसे अनुराधा के अंदर की बेचैनी क़ो सुकून मे तब्दील करने लगी। राम की आँखे बंद थी और अनुराधा भी बस शांत होकर धीरे धीरे एक बार फिर से नींद मे जाने लगी।

अनुराधा कुछ देर बाद ही उसके सीने से लगी हुई सो चुकी होती है। लेकिन राम ने अपने होठों को उसके गर्दन पर से नहीं हटाया, बल्कि धीमे धीमे उसके लब उस हिस्से क़ो चूम ही रहे थे। जाने कब तक। शायद तब तक जब तक राम क़ो यकीन नही हो गया की उसने अनुराधा के दर्द क़ो कम कर दिया ।

कमरे में धीरे-धीरे फिर वही खामोशी लौट आई। अनुराधा की साँसें अब पहले की तरह बिखरी हुई नहीं थीं। उसके चेहरे पर भी धीरे-धीरे शांति उतरने लगी थी। राम उसे अपनी बाहों में वैसे ही थामे रहा, जैसे उसे डर हो कि जरा-सी भी दूरी उसके भीतर छिपे उस डर को फिर जगा देगी।

उसकी आँखें अनुराधा के सोए हुए चेहरे पर टिकी थीं। बाहर रात गहरी होती जा रही थी, लेकिन राम के भीतर अब नींद का कोई नाम नहीं था। उसके मन में सिर्फ एक बात थी। जिस डर ने अनुराधा को इतने वर्षों से अपने भीतर कैद कर रखा था, वह अब उसके सामने था।

और राम उसे अकेले उस डर से लड़ने नहीं देने वाला था।

सुबह की हल्की रोशनी धीरे-धीरे कमरे में उतरने लगी थी। खिड़की से आती सूरज की पहली किरणें पर्दों के बीच से छनकर बिस्तर तक पहुँच रही थीं। रात की बेचैनी के बाद कमरे में अब एक अजीब-सा सुकून पसरा हुआ था।

राम की आँख सबसे पहले खुली।कुछ क्षण तक वह वैसे ही लेटा रहा। फिर जैसे ही उसे अपने बेहद करीब अनुराधा की मौजूदगी का एहसास हुआ, उसकी नजर अनायास उसकी तरफ चली गई। अनुराधा अब भी गहरी नींद में थी।

रात की सारी घबराहट जैसे नींद के साथ कहीं पीछे छूट गई थी। उसके चेहरे पर इस वक्त एक ऐसी शांति थी, जिसे देखकर राम के चेहरे पर भी हल्की मुस्कान आ गई।वह बहुत सावधानी से खुद को उससे अलग करता हुआ उठकर बैठ गया, ताकि उसकी नींद न टूटे।

कुछ पल वह बस उसे देखता रहा।

फिर धीरे से झुककर उसके माथे पर एक हल्का-सा चुंबन रखा और बहुत धीमी आवाज में कहा, “गुड मॉर्निंग, प्रिंसेस।”अनुराधा ने नींद में हल्की-सी करवट बदली, लेकिन उसकी आँखें नहीं खुलीं।

राम के चेहरे पर फिर मुस्कान आ गई।उसने मन ही मन कहा, “उम्मीद है... आज जब तुम उठो तो तुम्हारे चेहरे पर मुस्कान हो। बिना किसी डर के... बिना किसी दर्द के।”फिर उसे अपनी ही बात पर हल्की-सी हँसी आ गई।

वह खुद से बुदबुदाया, “उठ जाओ, राम रघुवंशी... नहीं तो ये देवी उठी और तुम्हें खुद के इतने करीब देखा तो... रावण और ना जाने क्या-क्या नाम दे देगी।”उसने एक बार फिर अनुराधा की तरफ देखा। सुबह-सुबह अपनी इज्जत बचानी है तो निकल ले, रघुवंशी।इतना कहकर वह दबे पाँव उठा, अपने बालों को हाथ से ठीक किया और कमरे से बाहर निकल गया।

दरवाजा बंद करते समय भी उसके चेहरे पर वही हल्की मुस्कान थी।राम कमरे से बाहर निकला ही था कि सामने आरोही मिल गई। वह कुछ पूछ पाती, उससे पहले ही राम ने उसकी तरफ देखकर कहा, “वो ठीक है... अभी सो रही है। चाहो तो मिल लो।”

आरोही ने राहत की साँस लेते हुए सिर हिलाया, “हम्म्म...!”राम रास्ते से हट गया और आरोही सीधे उसके कमरे की तरफ चली गई।

कमरे में पहुँचते ही उसकी नजर बिस्तर पर सो रही अनुराधा पर पड़ी। कुछ पल के लिए आरोही वहीं रुक गई। जिस लड़की को उसने रात में घबराहट, दर्द और आँसुओं के बीच देखा था, वही अनुराधा इस वक्त इतनी सुकून भरी नींद सो रही थी कि उसके चेहरे पर अपने आप मुस्कान आ गई।

आरोही धीरे-धीरे उसके पास जाकर बैठ गई।उसने प्यार से अनुराधा के चेहरे को देखा और धीमे से बोली, “शायद... अब तेरी दर्द की दवा आ गई है।”उसके चेहरे पर एक हल्की-सी शरारती मुस्कान थी।अब मुझे तेरी इतनी फिक्र नहीं है, " कहते हुए उसने बड़े प्यार से अनुराधा के माथे पर हाथ फेरा। उसके बिखरे बालों को धीरे से पीछे किया और कुछ पल तक बस उसे देखती रही।

शायद उसे खुद भी यकीन नहीं हो रहा था कि रात के इतने डरावने हादसे के बाद उसकी दोस्त इस तरह सुकून से सो रही है।अनुराधा को जैसे अपने माथे पर किसी परिचित स्पर्श का एहसास हुआ। उसकी पलकों में हल्की-सी हरकत हुई और कुछ ही क्षण बाद उसने धीरे-धीरे आँखें खोल दीं।

सामने आरोही को देखते ही उसकी आँखों में नींद के बीच एकदम से पहचान वाली चमक आ गई।

“आरोही...”अगले ही पल अनुराधा मुस्कुराते हुए उठी और उसे जोर से गले लगा लिया,“गुड मॉर्निंग... लेडी डॉन!”आरोही हँस पड़ी और उसे अपनी बाँहों में लेते हुए बोली, “गुड मॉर्निंग, ड्रामा क्वीन।”

अनुराधा ने उसके कंधे पर सिर रखते हुए आँखें बंद कर लीं।बहुत याद आई तुम्हारी।आरोही का चेहरा एक पल को गंभीर हुआ। उसने अनुराधा की पीठ पर हाथ फेरते हुए धीमे से कहा, “मुझे भी... बहुत।”

फिर उसने उसे थोड़ा पीछे करके गौर से देखा और मुस्कुराते हुए बोली, “लेकिन एक बात बता... आज चेहरा इतना शांत कैसे है? अनुराधा ने मासूमियत से उसे देखा। क्यों? मेरा चेहरा हमेशा ऐसा ही रहता है।

आरोही ने अपनी भौंहें ऊपर उठाईं। “हाँ... और मैं महारानी विक्टोरिया हूँ।”अनुराधा ने तुरंत उसे तकिया मारने के लिए हाथ बढ़ाया, लेकिन पैर में लगी चोट याद आते ही रुक गई।

आरोही ने उसका हाथ पकड़ लिया और हँसते हुए बोली, “बस-बस... सुबह-सुबह ज्यादा हीरोइन बनने की जरूरत नहीं है। अभी तुम आराम करोगी।”अनुराधा ने मुँह बनाकर कहा, “लेडी डॉन बनकर हुक्म चलाना बंद करो।”

आरोही ने उसके माथे पर फिर से प्यार से हाथ फेरा।तू ठीक रह... फिर जितना चाहे मुझे परेशान करना।

आरोही गुस्से में अनुराधा से खुद को छुड़ाने की कोशिश करते हुए बोली, “छोड़ मुझे... चिपकू! ऐसे कौन करता है यार?”अनुराधा ने उसे और कसकर पकड़ लिया और शरारत से बोली, “ऐसा सिर्फ तेरी ब्यूटी क्वीन करती है। अब जल्दी से गुड मॉर्निंग बोल, तभी छोड़ूँगी।आरोही ने चिढ़कर कहा, “गुड मॉर्निंग!”

बस इतना सुनते ही अनुराधा ने उसे छोड़ दिया और उसके दोनों गालों को प्यार से चूमते हुए खिलखिलाकर बोली, “हाय! जब तू इस तरह रोज़ सुबह-सुबह चिढ़ती है ना, तो मेरा दिन बन जाता है।”

आरोही ने मुँह फुलाते हुए कहा, “हाँ, और रोज़ मेरा दिन खराब हो जाता है।”अनुराधा ने आँखें छोटी करते हुए उसे देखा और हँस पड़ी। होहोहो... झूठी कहीं की!दोनों के बीच कुछ पल के लिए वही पुरानी दोस्ती वाली हँसी गूँज उठी। जैसे बीती रात का डर, दर्द और बेचैनी उस पल कहीं पीछे छूट गए हों।

लेकिन तभी अनुराधा की नज़र अचानक कमरे के चारों तरफ घूमी।उसकी मुस्कान धीरे-धीरे गायब हो गई।जैसे ही उसे एहसास हुआ कि वह अपने कमरे में नहीं, बल्कि राम के कमरे में है, उसका चेहरा बदल गया। उसने बिना कुछ सोचे-समझे आरोही को झटके से दूर कर दिया।

अचानक मिले धक्के से आरोही अपना संतुलन खो बैठी और धड़ाम से नीचे जा गिरी।

“आह्ह!” वह तुरंत अपनी कमर पकड़ते हुए कराह उठी। “मोटी! तूने कितनी ज़ोर से धक्का दिया... आह्ह, मेरी कमर!”

अनुराधा की आँखें डर से बड़ी हो गईं। अरे! मेरी जान... सॉरी! वह तुरंत नीचे उतरी और आरोही को उठाने लगी। सच में सॉरी, मैंने जानबूझकर नहीं किया।

फिर अचानक उसे राम का ख्याल आया और वह थोड़ी झेंपते हुए बुदबुदाई, “वो... रावण रघुवंशी के बारे में सोच रही थी... बस, ऐसे ही हो गया।”आरोही ने अपनी कमर सहलाते हुए उसे घूरा। संभलकर, अनु! अभी पैर में चोट लगी है तुम्हें। कहीं खुद को और चोट मत लगा लेना।

अनुराधा ने उसकी तरफ देखकर हल्की-सी मुस्कान दी। मैं ठीक हूँ यार।फिर उसकी आँखों में अचानक वही पुरानी शरारत लौट आई।“लेकिन उस रावण रघुवंशी ने तो..!

आरोही कुछ पल तक अनुराधा को मुँह खोले देखती रही। फिर जैसे उसे अचानक यकीन ही नहीं हुआ कि उसकी दोस्त इतने बड़े आदमी का इतना अजीब नाम रखकर घूम रही है। उसने हैरानी से कहा, “रावण रघुवंशी...? कहीं तू... ग्रेट बिज़नेस टाइकून राम रघुवंशी के बारे में तो नहीं बोल रही है?”

अनुराधा ने बिल्कुल बेफिक्र अंदाज़ में मुँह बनाते हुए कहा, “हाँ! हाँ! उसी रावण रघुवंशी के बारे में बोल रही हूँ।”आरोही ने तुरंत अपने मुँह पर हाथ रख लिया। उसकी आँखें हैरानी से और बड़ी हो गईं। “तू... उन्हें इस नाम से बुलाती है? फिर भी तू ज़िंदा कैसे है?”

अनुराधा ने उसे घूरकर देखा और बोली, “मैं तुझे पागल दिखती हूँ क्या? जो उनके सामने उन्हें रावण रघुवंशी कहकर बुलाऊँगी?”आरोही ने राहत की साँस लेते हुए सिर हिलाया। ओह्ह... इसलिए तो अभी तक तू ज़िंदा है।”

अनुराधा ने आँखें सिकोड़ते हुए पूछा, “क्या मतलब तेरा?”आरोही ने कोई जवाब नहीं दिया। बस अपना सिर ना में हिलाया और बगल वाले कमरे की तरफ इशारा करते हुए बोली, “छोड़ ये सब। तेरे सारे कपड़े बगल वाले रूम में हैं। मैं तेरे लिए एक सेट कपड़े भी ले आई हूँ। तू पहले जाकर फ्रेश हो जा।”

फिर उसने उंगली उठाकर सख्त हिदायत दी, “और हाँ! पैरों पर पानी बिल्कुल मत गिराना। अभी चोट ठीक नहीं हुई है।”अनुराधा ने उसकी बात सुनी, फिर अचानक उसकी आँखें सिकुड़ गईं।एक मिनट... मेरे कपड़े बगल वाले रूम में क्या कर रहे हैं?

आरोही ने सहजता से कहा, “तेरा रूम आज पूरी तरह ठीक हो जाएगा। फिर रात से तू अपने कमरे में रह सकती है।”अनुराधा कुछ पल उसे देखती रही। उसके चेहरे पर अब साफ़ उलझन थी।

क्या मतलब?उसने धीरे से पूछा, “मेरे कपड़े यहाँ क्या कर रहे हैं? और कौन-सा रूम है जो रात तक ठीक हो जाएगा?आरोही ने उसकी तरफ देखा, फिर कमरे के चारों तरफ एक नज़र डाली और हल्की-सी साँस छोड़ी।तुझे सच में कुछ भी याद नहीं है?

अनुराधा ने तुरंत जवाब दिया, “याद है तो पूछ क्यों रही हूँ? मुझे बस इतना याद है कि मैं रात को अपने कमरे में थी... फिर वह अचानक रुक गई।उसकी नज़र कमरे पर घूमी। बड़ा-सा बिस्तर... सामने सोफा... खिड़की... और फिर उसकी नज़र उस जगह पर पड़ी जहाँ शायद रात की कुछ धुंधली याद उसके मन के किसी कोने को छूकर निकल गई थी।

उसने धीरे से पूछा, “ये... कमरा किसका है?”आरोही ने होंठ दबाकर अपनी हँसी रोकने की कोशिश की।किसका है, ये तो तू खुद ही अंदाज़ा लगा ले... मैडम।अनुराधा ने उसे घूरा,“आरोही... सीधा बोल!”

आरोही ने मुस्कुराते हुए कहा, “ तेरे रावण रघुवंशी..... उपप्स...मतलब राम रघुवंशी का।”अनुराधा की आँखें एकदम फैल गईं, “क्या????”

आरोही ने उसकी तरफ देखते हुए कहा, “मिस्टर रघुवंशी ने कहा है कि अभी कुछ समय के लिए हमें यहीं रहना चाहिए... सुरक्षा के दृष्टिकोण से। तो अब बहस बाद में करना। पहले फ्रेश हो जा।”

इतना कहकर आरोही कमरे से बाहर निकल गई। उसने जानबूझकर अनुराधा को यह नहीं बताया कि पिछली रात उसके कमरे का हाल क्या हुआ था। वह नहीं चाहती थी कि

सुबह-सुबह अनुराधा को फिर से वही सब याद आए और उसकी तबीयत बिगड़ जाए।आरोही के जाते ही अनुराधा ने एक नजर दरवाजे की तरफ देखा और फिर नीचे अपने पैरों की तरफ देखने लगी। पट्टी देखकर उसने तुरंत मुँह बनाया।

“इतनी मोटी पट्टी कौन करता है यार... छोटे-से कट के लिए भी इतना बड़ा तमाशा!”वह बड़बड़ाती हुई बिस्तर से उठने लगी, लेकिन जैसे ही उसने कदम आगे बढ़ाया, पैर में हल्का-सा दर्द हुआ। वह तुरंत रुक गई और नीचे देखकर बोली, “ओह... ठीक है, शायद कट इतना भी छोटा नहीं था।”

फिर वह धीरे-धीरे वाशरूम की तरफ बढ़ने लगी।लेकिन दरवाजे तक पहुँचते-पहुँचते उसका हाथ अचानक अपनी गर्दन के पीछे चला गया।उँगलियाँ उस जगह पर ठहर गईं जहाँ वह निशान था।

अनुराधा कुछ पल बिल्कुल स्थिर खड़ी रही।उसकी भौंहें हल्की-सी सिकुड़ गईं।उसे समझ नहीं आ रहा था कि उस जगह को छूते ही उसके भीतर अचानक कैसी अजीब-सी हलचल क्यों होने लगी थी।कोई साफ याद नहीं थी, बस एक धुंधला-सा एहसास था... जैसे उसकी नींद और जागने के बीच की कोई बात उसके मन के किसी कोने में अटक गई हो. उसने धीरे से अपनी उँगलियाँ वहाँ से हटा लीं।

“कुछ अलग-सा एहसास क्यों है मुझे...?”वह खुद ही अपनी बात सुनकर कुछ पल चुप रही।फिर तुरंत अपना सिर झटकते हुए बुदबुदाई, “पता नहीं क्या-क्या सोच रही हूँ सुबह-सुबह!”उसने दरवाजा खोला और वाशरूम के अंदर चली गई।दरवाजा बंद होते ही बाहर कमरे में फिर से खामोशी छा गई।

अनुराधा वाशरूम में जाती है और फ्रेश होने लगती है। कुछ देर बाद वह अपने गीले बालों को तौलिए से पोछती हुई बाहर निकलती है। उसी समय राम भी जिम से वापस आता है। उसने नीचे लोअर पहन रखा हुआ था और ऊपर उसका बदन खुला था। हाथ में तौलिया लिए वह अपने माथे और सीने पर आए पसीने को पोछ रहा था।

अनुराधा की नज़र जैसे ही उस पर पड़ती है, वहीं ठहर जाती है। उसकी बड़ी-बड़ी आँखें राम के गठीले-मांसल बदन पर टिक जाती हैं। पसीने की बूँदे उसके सीने से फिसलती हुई नाभि तक जा रहीं थी। जिसे अनुराधा आँखे बड़ी बड़ी कर के देख रहीं थी। राम का गठिले शरीर इतना आकर्षक था की अचानक उसे अपना गला सूखता हुआ-सा महसूस होता है।

उसके मन मे राम क़ो लेकर ना जाने कितने विचार आने लगे। अपने सुखते गले क़ो तरर करती हुई वह वह मन ही मन बोली , “ उफ्फ्फ ये रावण रघुवंशी कितना हॉट है... दिल करता है कि...”लेकिन अपनी सोच को वह इससे आगे ले जाती, उससे पहले ही राम की नज़र उस पर पड़ जाती है।

जिस तरह अनुराधा उसे एकटक देख रही थी, उसे देखकर राम के चेहरे पर हल्की-सी शरारती मुस्कान आ जाती है। वह समझ जाता है कि मैडम इस वक्त पूरी तरह उसकी तरफ ध्यान लगाए हुए हैं। उसे थोड़ा परेशान करने के इरादे से राम धीरे-धीरे उसके करीब आने लगता है।

लेकिन अनुराधा अब भी राम के बदन क़ो सिद्द्त से निहार रहीं थी। वह अपनी ही ख्यालों में गुम थी। उसे इस बात का एहसास तक नहीं हुआ कि राम कब उसके इतने करीब आ गया।

राम की गहरी निगाहेँ अनुराधा की गुलाबी चेहरे पर थी। वह उसके सामने आकर थोड़ा झुका और उसके चेहरे पर आए गीले बालों क़ो हल्की-सी फूँक मारी। उसकी गर्म सांसों क़ो अपने चेहरे पर महसूस करते ही अनुराधा की आँखें अनायास बंद हो गयी थी ।

राम के होठो उसके चेहरे के बेहद करीब थे। इतने की हल्के हल्के उसके होंठ अनुराधा के गालों क़ो छू रहे थे। अनुराधा की सांसे तेज थी। वह अपनी गहरी आवाज़ मे बोला, “चाहो तो मुझे छू कर देख सकती हो मिस ठाकुर..... बुरा नहीं मानूँगा।”

राम की आवाज़ सुनते ही अनुराधा की आँखें तुरंत खुल जाती हैं। उसे अचानक एहसास होता है कि वह कब से राम को देख रही थी और अब राम उसे उसी बात के लिए छेड़ रहा था। उसके चेहरे पर झेंप और घबराहट एक साथ उतर आयी थी ।

अनुराधा ने जल्दी से अपनी आँखें खोलीं। राम की बात सुनते ही उसके चेहरे पर झेंप के साथ गुस्सा भी आ गया। उसने मुँह बनाकर कहा, “हूँह... गंदे!”

फिर उसे हल्का-सा धक्का देकर वह उसके बगल से निकलने लगी।

पीछे से राम की हँसी सुनाई दी। वह मुस्कुराते हुए बोला, “जब मुझे घूर रही थी, तब का क्या?”

अनुराधा तुरंत पलटकर बोली, “मैं कब आपको घूर रही थी?”

राम ने भौंह उठाकर उसकी तरफ देखा। “ओह्ह... हाँ! तुम मुझे घूर नहीं रही थी?”

“वही तो मैंने कहा आपसे कि मैं आपको नहीं घूर रही थी!”

राम हल्का-सा मुस्कुराया और उसके करीब आते हुए धीमी आवाज़ में बोला, “हम्म्म... तुम घूर नहीं रही थी... बल्कि अपनी हवस भरी भूखी नजरों से देख रही थी... कि कब मौका मिले और तुम मुझे कच्चा खा जाओ।”

अनुराधा की आँखें एकदम फैल गईं। उसे जैसे समझ ही नहीं आया कि राम ने इतनी बेशर्मी से उसकी चोरी पकड़कर उसे ही कैसे सुना दिया।

“क्... क्या?” उसने हकलाते हुए कहा।

राम के चेहरे पर शरारती मुस्कान और गहरी हो गई। अब इतनी मासूम बनने की जरूरत नहीं है, मिस ठाकुर।अनुराधा ने तुरंत अपनी नज़रें फेर लीं। “आपको बहुत गलतफहमी है अपने बारे में।”

राम ने हँसते हुए कहा, “गलतफहमी है या तुम्हारी नज़रें कुछ और कह रही थीं... ये फैसला तुम खुद कर लो।”

“यक्क... आप एक तो ये नंगे खुले बदन होकर घूम रहे है और मुझे आप मांसाहारी बना रहे है। मैं गोविन्द की पूजा करती हूँ और शुद्ध शाकाहारी हूँ। नॉन वेज नहीं खाती... मैं!!!!!” अनुराधा झुंझलाते हुए बोली।

फिर अपने दाँत किचकिचाते हुए उसकी तरफ उँगली दिखाकर बोली, “और आप भी अभी यहाँ मेरे सामने से नहीं हटे ना तो... मैं कुछ कर दूँगी! जाइए यहाँ से।"राम ने उसकी तरफ देखते हुए बड़ी मासूमियत से पूछा, “क्या कर लोगी?”

अनुराधा ने जवाब देने के बजाय उसे घूरना शुरू कर दिया। उसकी आँखों में साफ चेतावनी थी।

राम ने दोनों हाथ हल्के से ऊपर करते हुए कहा, “ओके... ओके... चिढ़ो मत। जा रहा हूँ मैं फ्रेश होने।”

वह मुस्कुराता हुआ वॉशरूम की तरफ बढ़ गया और अंदर चला गया।दरवाज़ा बंद होते ही अनुराधा ने राहत की साँस ली और खुद से बुदबुदाई, “हे गोविन्द... सुबह-सुबह ही इस रावण रघुवंशी ने मेरा दिमाग खराब कर दिया।”

अंदर से राम की आवाज़ आई, “सुन रहा हूँ मैं!”अनुराधा की आँखें बड़ी हो गईं।“उफ़्फ़... ये आदमी कानों से भी नहीं, दीवारों से सुनता है क्या!”

अनुराधा नीचे झुककर अपने पैरों की पट्टी खोल रही थी। जब राम वाशरूम से नहा कर निकला था। उसके लंबे, घने बाल झुकते ही दोनों कंधों से फिसलकर आगे आ गए थे और चेहरे का आधे से ज्यादा हिस्सा उन रेशमी लटों के पीछे छिप गया था। नीले रंग की अनारकली उसके गोरे रंग पर कुछ इस तरह खिल रही थी, जैसे सुबह के आसमान पर कोई गहरा नीला रंग उतर आया हो।

उसके कानों में झूलते झुमके उसकी हर छोटी-सी हरकत के साथ हल्के से हिल रहे थे। आँखों में लगा काजल उसकी बड़ी-बड़ी आँखों को और गहरा बना रहा था, जबकि गुलाबी होंठों पर बिना किसी कोशिश के ठहरी हल्की-सी रंगत उसके चेहरे को एक अलग ही नज़ाकत दे रही थी।

झुकने के कारण उसकी पीठ का कुछ हिस्सा नज़र आ रहा था। वह दृश्य इतना सहज था कि उसमें कोई बनावट नहीं थी, फिर भी राम की नज़र अनायास उस पर ठहर गई।वह कुछ पल वहीं खड़ा रहा।

अनुराधा को इस बात का ज़रा भी एहसास नहीं था कि कोई उसे देख रहा है। वह पूरी तल्लीनता से पट्टी खोलने में लगी थी, और शायद यही उसकी खूबसूरती को और बढ़ा रहा था। उसे अपनी खूबसूरती का खुद कोई अंदाज़ा ही नहीं था।

राम के होंठों पर अनजाने में हल्की मुस्कान आ गई।“ये लड़की... खुद को देखती भी है कभी?”फिर वह धीरे-धीरे उसके पास आया।

राम बिना कुछ कहे उसके पास आया और जैसे ही उसने पट्टी खोलने के लिए हाथ बढ़ाया, राम ने उसके हाथ थाम लिए।अनुराधा ने चौंककर उसकी तरफ देखा। “वो... मैं पट्टी बदल रही थी।”

मैं कर देता हूँ।नहीं... मैं कर लूँगी। आप क्यों बेवजह परेशान हो रहे हैं? राम ने उसकी तरफ सीधी नज़र से देखा, “बोल ली?”अनुराधा ने हल्का-सा मुँह बनाया,“हम्म्म्म।”तो अब चुप हो जाओ।वह चाहकर भी कुछ नहीं बोली। बस मुँह बनाकर बैठ गई।

राम उसके सामने बैठकर बेहद सावधानी से उसके पैर की पट्टी खोलने लगा। उसकी उँगलियाँ हर बार चोट वाली जगह से बचकर चल रही थीं। अनुराधा चुपचाप उसे देखती रही। उसके चेहरे पर पहली बार वह शरारत नहीं थी; उसकी जगह एक अजीब-सी झिझक थी।

पट्टी बदलते हुए राम ने पूछा, “अब दर्द हो रहा है?”

अनुराधा ने तुरंत मुँह सिकोड़ लिया, “हुहुँ...”।राम ने उसकी तरफ देखा। अगर तुम चाहो तो आज आराम कर लो। नहीं, मैं ठीक हूँ। ठीक हो तो ठीक होने का सबूत देने की जरूरत नहीं है।”l

अनुराधा कुछ कहती, उससे पहले ही राम ने नई पट्टी ठीक से बाँध दी।“लो... हो गई पट्टी।”

वह उठने लगा तो अनुराधा भी धीरे-से खड़ी हो गई। राम ने एक पल उसके चेहरे की तरफ देखा, फिर उसकी नज़र उसके पैर पर चली गई।

आज ज़्यादा चलना मत। अनुराधा ने तुरंत जवाब दिया, “जी, डॉक्टर साहब।”राम ने आँखें सिकोड़कर उसे देखा।अनुराधा के होंठों पर शरारती मुस्कान आ गई।

तभी उसकी नज़र राम पर पड़ी। वह अब भी बाथरोब में था। अनुराधा की नज़र एक पल के लिए उस पर ठहरी, फिर उसे अपनी सुबह की सारी बातें याद आ गईं।उसने तुरंत नज़रें दूसरी तरफ कर लीं।राम ने उसकी इस हरकत को देख लिया और होंठों पर हल्की मुस्कान तैर गई।

Continue.........

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