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Ch-18 His Dark Obssession

राम ने उसकी तरफ देखा और अपनी शांत गंभीर आवाज़ मे कहा, “क्या तुम चाहती हो कि मैं रोज तुम्हारी सेवा करता रहूँ? कल से तुम्हें ऑफिस नहीं जाना है। इसलिए खाना खाओ और मेडिसिन लो, ताकि सुबह तक तुम बिल्कुल ठीक हो जाओ।

और अब चुपचाप यहीं बैठी रहना... इधर-उधर जाने की जरूरत नहीं है। मैं अभी आता हूँ।” इतना कहकर राम उसकी तरफ एक आखिरी नजर डालता है और कमरे से बाहर चला जाता है।

दरवाजा बंद होते ही अनुराधा कुछ पल तक उसी तरफ देखती रही। उसके चेहरे पर जो हल्की-सी मजबूर मुस्कान थी, वह धीरे-धीरे गायब होने लगी। जैसे ही राम की कदमों की आवाज दूर हुई, उसकी आँखों में ठहरे आँसू अचानक बह निकले।

उसने तुरंत दोनों हाथों से अपना मुँह ढक लिया, ताकि उसके रोने की आवाज बाहर तक न पहुँचे, लेकिन अगले ही पल उसके भीतर दबा हुआ दर्द उसकी सिसकियों को रोक नहीं पाया।

“क्यों... क्यों मेरे साथ ही...?” उसके होंठ काँपते हुए बुदबुदाए।

वह बिस्तर के किनारे सिकुड़कर बैठ गई। उसकी साँसें तेजी से चलने लगीं। राम के कुछ देर पहले कहे शब्द उसके कानों में घूम रहे थे, लेकिन उन शब्दों के पीछे जैसे कोई और ही आवाज छिपी हुई थी... एक पुरानी आवाज, एक पुरानी रात, एक ऐसा अतीत जिसे उसने पाँच साल से अपने भीतर दफन कर रखा था।

अचानक उसका हाथ काँपते हुए अपनी गर्दन के पीछे चला गया।वहाँ मौजूद वह पुराना निशान उसकी उँगलियों के नीचे आते ही उसकी साँस जैसे अटक गई।उसकी आँखों के सामने कुछ धुंधली तस्वीरें कौंधीं।अँधेरा...डर...किसी की आवाज...और फिर वही घुटन।

“नहीं...” अनुराधा ने घबराकर अपना सिर हिलाया। “नहीं... मुझे कुछ याद नहीं करना...”लेकिन यादें जैसे उसकी बात सुन ही नहीं रही थीं।

उसने बेचैनी में अपनी गर्दन के पीछे उस निशान को खरोंचना शुरू कर दिया, जैसे उस निशान के साथ जुड़ी हर याद को अपनी त्वचा से ही मिटा देना चाहती हो। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं और आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे।

“मुझे छोड़ दो... प्लीज... मुझे छोड़ दो...”उसकी आवाज इतनी धीमी थी कि खुद उसके कानों तक मुश्किल से पहुँच रही थी।वह कुछ पल बाद खुद ही अपनी हरकत से डर गई और दोनों हाथों को सीने से लगाकर बैठ गई। उसका पूरा शरीर काँप रहा था।

लेकिन इस बार उसके दर्द की सबसे बड़ी वजह वह पुरानी घटना नहीं थी।उसे डर था कि कहीं राम को उसके इस दर्द का सच पता न चल जाए।

क्योंकि पाँच साल से जिस राज़ को उसने दुनिया से छिपाकर रखा था, अब पहली बार उसे लग रहा था कि शायद कोई उसकी खामोशी के पीछे छिपे दर्द को पढ़ने लगा है और यही एहसास उसे सबसे ज्यादा डरा रहा था।

इधर राम नीचे आ चुका था। उसने खुद अनुराधा के लिए खाना लिया और वापस ऊपर आने लगा। सीढ़ियाँ चढ़ते हुए उसके चेहरे पर वही गंभीरता थी, लेकिन मन में सिर्फ अनुराधा की बातें घूम रही थीं।

"अनु... तुम कभी कुछ नहीं भूलती। बस अपने आसपास के लोगों को परेशान नहीं करना चाहतीं और न ही चाहती हो कि कोई तुमसे सवाल करे। इसलिए हर बार सबके सामने यही दिखाती हो कि तुम्हें कुछ याद नहीं। तुम्हारी जुबान झूठ बोल सकती है... लेकिन तुम्हारी आँखें नहीं। तुम्हारी आँखें हर बार तुम्हारा सच बता देती हैं।"

राम के कमरे के पास पहुँचते ही अनुराधा को उसके कदमों की आहट सुनाई दे गई। वह घबरा गई। उसने जल्दी से अपने आँसू पोंछे और राम के आने से पहले ही वॉशरूम में चली गई। वह नहीं चाहती थी कि राम उसकी आँखों में छिपे दर्द को पढ़ ले।

कुछ देर बाद राम कमरे में आया तो उसकी नजर सबसे पहले बिस्तर पर गई, लेकिन अनुराधा वहाँ नहीं थी। उसने परेशान होकर चारों तरफ देखा और आवाज दी, “अनु...?”

अंदर से पानी चलने की आवाज सुनाई दी। राम की नजर वॉशरूम के बंद दरवाजे पर टिक गई। वह कुछ नहीं बोला और वहीं खड़ा इंतजार करने लगा।

कुछ देर बाद दरवाजा खुला और अनुराधा बाहर आई। सामने राम को खड़ा देखकर उसके कदम एक पल के लिए रुक गए। उसने तुरंत अपनी नजरें झुका लीं और फिर बेवजह इधर-उधर देखने लगी, जैसे उसे समझ ही नहीं आ रहा हो कि राम की नजरों से अपनी आँखें कैसे बचाए।

राम ने उसकी तरफ देखा। उसकी नजरों से कुछ भी छिपा नहीं था।वह धीरे-धीरे अनुराधा की तरफ बढ़ा।अनुराधा ने उसे अपनी ओर आते देखा तो अनजाने में एक कदम पीछे हट गई।राम ने दूसरा कदम आगे बढ़ाया।वह फिर पीछे हटी।

उसके चेहरे पर घबराहट साफ दिखाई देने लगी थी। राम की आँखें लगातार उसके चेहरे को पढ़ रही थीं और अनुराधा हर बार अपनी नजरें चुराकर उससे बचने की कोशिश कर रही थी।राम एक कदम और आगे बढ़ा।अनुराधा फिर पीछे हुई,लेकिन इस बार उसके पीछे दीवार थी।उसकी पीठ दीवार से लग गई और उसके कदम वहीं रुक गए। राम अब उसके बिल्कुल सामने था।

अनुराधा ने धीरे से अपना चेहरा उठाया। उसकी नजर राम की आँखों से मिली और अगले ही पल उसने घबराकर अपनी आँखें बंद कर लीं। उसकी साँसें कुछ तेज हो गई थीं।

राम ने उसे कुछ पल वैसे ही देखा। वह आसानी से समझ सकता था कि उसकी घबराहट सिर्फ इस वक्त की नहीं थी। उसके भीतर कुछ और चल रहा था... कुछ ऐसा, जिसे वह उससे छिपाने की पूरी कोशिश कर रही थी।

राम ने धीरे से पूछा, “रोई थीं?”अनुराधा की पलकों पर ठहरे आँसू काँप उठे, लेकिन उसने आँखें नहीं खोलीं, “नहीं...” उसके होंठों से बहुत धीमी आवाज निकली।राम के चेहरे पर हल्की-सी कठोरता आई, मगर उसकी आवाज अब भी शांत थी। “मेरी आँखों में देखकर बोलो।”

अनुराधा ने धीरे-धीरे अपनी आँखें खोलीं, लेकिन जैसे ही उसकी नजर राम से मिली, उसकी आँखों में फिर नमी उतर आई।राम कुछ नहीं बोला..बस उसे देखता रहा।और अनुराधा को पहली बार डर इस बात का लग रहा था कि शायद वह अपने अतीत से जितना भाग रही है... राम उतनी ही आसानी से उसकी खामोशी के पीछे छिपे सच तक पहुँच रहा है।

राम की गर्म साँसें अनुराधा के चेहरे से टकरा रही थीं। उसकी मौजूदगी इतनी करीब थी कि अनुराधा को अपने सीने में धड़कते दिल की आवाज तक साफ महसूस हो रही थी। वह अभी भी आँखें बंद किए खड़ी थी और राम उसे उसी तरह देख रहा था।

राम ने अपनी गहरी आवाज में कहा, "अपनी आँखें खोलो, मिस ठाकुर। और इतनी उछल-कूद मत करो। पैर में चोट लगी है तुम्हें।"अनुराधा ने आँखें बंद किए हुए ही होंठ सिकोड़कर कहा, "आप इतना डरा कर बोलोगे तो मैं कैसे खोलूँ अपनी आँखें?"

राम की भौंहें सिकुड़ गईं। वह उसे कुछ पल तक घूरता रहा, फिर बोला, "मैं तुम्हें कैसे डरा रहा हूँ?"

अनुराधा ने धीरे-धीरे अपनी पलकें खोलीं। सामने राम को उसी गंभीर चेहरे और घूरती हुई आँखों के साथ खड़ा देखकर उसकी नजरें एक पल के लिए उसके चेहरे पर टिक गईं।

फिर उसने उसकी तरफ देखते हुए कहा, "ऐसे... इतनी करीब आकर कोई इतनी डरावनी आँखों से देखेगा तो डर ही लगेगा ना।"राम ने कुछ नहीं कहा, बस उसे घूर रहा था।

अनुराधा ने आखिरकार गुस्से में अपनी आँखें खोल दीं। सामने राम को इतनी करीब खड़ा देखकर उसकी धड़कन एक पल के लिए और तेज हो गई। लेकिन अगले ही पल उसने अपनी झेंप को गुस्से के पीछे छिपाते हुए दोनों हाथों से उसे हल्का-सा पीछे धकेल दिया।

"इतनी करीब आकर ये ड्रैकुला की तरह डरावनी आँखों से कोई क्या करता है?" वह उसे घूरते हुए बोली, "मेरी जैसी मासूम बच्ची डर ही जाएगी ना!"

राम ने बस अपनी भौंहें उठाकर उसे देखा। उसके चेहरे पर ऐसा भाव था, जैसे उसे अनुराधा की इस शिकायत का कोई मतलब ही समझ नहीं आ रहा हो।

अनुराधा ने उसकी तरफ देखकर फिर अपने पैर की तरफ नजर डाली। वहाँ बंधी मोटी-सी पट्टी देखकर उसका चेहरा और बिगड़ गया।

"और ये इतनी मोटी पट्टी क्यों बाँध रखी है आपने?" उसने पैर की तरफ इशारा करते हुए कहा, "समझ में ही नहीं आ रहा कि मैं अपने पैरों पर खड़ी हूँ या कपड़ों के ढेर पर!"

राम ने नीचे उसके पैर की तरफ देखा, फिर वापस उसके चेहरे पर नजर टिकाई।अनुराधा ने उसकी तरफ हाथ उठाकर तुरंत कहा, "और अब मैं ठीक हूँ। बिल्कुल ठीक हूँ।"

इतना कहकर उसने राम के जवाब का इंतजार भी नहीं किया और उसके बगल से निकल गई।

दो कदम आगे जाते ही वह रुक गई।उसने चुपके से अपने सीने पर हाथ रखा और एक लंबी साँस अंदर खींची। उसका दिल अब भी जाने क्यों इतनी तेज धड़क रहा था।

वह मन ही मन बड़बड़ाई, "हे भगवान... ये रावण रघुवंशी एक दिन मेरी जान लेकर ही मानेगा!"

कुछ पल बाद उसने खुद को सामान्य किया और बिना पीछे देखे आगे बढ़ गई।

पीछे खड़ा राम उसे जाते हुए देखता रहा। उसके चेहरे पर अब भी वही गंभीरता थी, लेकिन उसकी आँखों में अनुराधा की इस अजीब-सी मासूम हरकत को लेकर हल्की-सी हैरानी जरूर उतर आई थी।

राम कुछ पल तक अनुराधा की पीठ को घूरता रहा। उसके चेहरे पर हल्की-सी हैरानी थी, जैसे आज पहली बार किसी लड़की ने उसके चार्म की ऐसी बेइज्जती की हो। वह मन ही मन बड़बड़ाया,

“मेरे चार्म पर पूरी दुनिया की लड़कियाँ मरती हैं और ये लड़की है कि मुझे ड्रैकुला, रावण और जाने क्या-क्या कहती रहती है। लगता है भगवान ने इसे मेरी परीक्षा लेने के लिए ही भेजा है।” फिर उसने अपनी मुस्कान दबाई और उसके पास जाकर बोला, “चलो, खाना खा लो।”

अनुराधा ने पलटकर उसे घूरा और बोली, “सर, रात के दो बजे कौन खाना खाता है?”

राम ने बिल्कुल गंभीर चेहरा बनाकर कहा, “मैडम, जो बीमार होता है, वो रात के दो बजे भी खाना खाता है। इसलिए बिना किसी ड्रामे के चुपचाप खाना खा लीजिए।”

अनुराधा ने अपनी भौंहें सिकोड़ते हुए कहा, “लेकिन मैं बीमार नहीं हूँ।”

राम की नजर तुरंत उसकी पट्टी बंधी टाँग पर गई और फिर वापस उसके चेहरे पर आकर टिक गई। उसने शांत स्वर में कहा, “अच्छा? तो ये पट्टी फैशन के लिए बंधी है?”

अनुराधा कुछ बोलने के लिए मुँह खोलती, उससे पहले राम ने कहा, “और अभी कुछ देर पहले कमरे का कबाड़ किसने बनाया था? वो भी शायद इंटीरियर डिजाइनिंग का नया तरीका था?”

अनुराधा ने उसे घूरकर देखा। “आप हर बात में मेरी बेइज्जती क्यों करते हैं?”

राम ने सहजता से कहा, “क्योंकि तुम हर बात में बहस क्यों करती हो?”अनुराधा ने तुरंत मुँह बनाया और दूसरी तरफ देखने लगी।राम ने टेबल पर रखा खाना उसकी तरफ बढ़ाते हुए कहा, “अब ज्यादा बहस नहीं। खाना खाओ।”

अनुराधा ने प्लेट की तरफ देखा और फिर राम की तरफ। “और अगर मैंने नहीं खाया तो?”

राम के होंठों पर धीमी-सी मुस्कान आई। वह थोड़ा उसकी तरफ झुककर बोला, “तो मुझे मालूम है मुझे क्या करना है।”

अनुराधा की आँखें तुरंत बड़ी हो गईं। “क्या करना है?”राम ने बिल्कुल मासूम चेहरा बनाते हुए कहा, “पहले खाना खा लो... फिर जरूरत पड़ी तो बताऊँगा।”

अनुराधा ने उसे शक भरी नजरों से देखा। उसे साफ समझ आ गया था कि इस आदमी के साथ ज्यादा बहस करना मतलब खुद ही मुसीबत को बुलावा देना है। उसने आखिरकार प्लेट उठा ली और बड़बड़ाते हुए बोली, “आपसे बहस करना ही मेरी सबसे बड़ी गलती है।”राम उसके पीछे खड़ा मुस्कुरा दिया। “ये बात कम से कम समझ में तो आई।”

अनुराधा आखिरकार चुपचाप खाना खाने लगी। राम सामने खड़ा उसे देख रहा था, लेकिन उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था। फिर भी उसके मन में एक बात लगातार घूम रही थी, “तुम कुछ नहीं भूली हो, अनु... बस ऐसे दिखाती हो जैसे कुछ हुआ ही नहीं। तुम हर बार अपनी यादों से ज्यादा अपनी आँखों को संभालने की कोशिश करती हो... लेकिन तुम्हारी आँखें हर बार तुम्हारा सच बता देती हैं।”

अनुराधा ने खाना खत्म किया तो राम ने उसकी तरफ दवा बढ़ा दी। दवा देखते ही अनुराधा का चेहरा ऐसा बन गया, जैसे राम ने उसके सामने कोई बहुत बड़ा दुश्मन खड़ा कर दिया हो। वह दवा को इस उम्मीद से घूरने लगी कि शायद उसकी नजरों की गर्मी से गोली खुद ही गायब हो जाए।

राम उसकी हरकत देखे बिना नहीं रह सका। उसने सपाट आवाज में कहा, “Take your medicine. Now.”अनुराधा ने दवा से नजरें हटाए बिना कहा, “लेकिन सर...”

राम ने भौंहें उठाईं। “No.”

अनुराधा ने मुँह बनाया। “रावण कहीं का।”राम ने तुरंत उसकी तरफ देखा। “सुन रहा हूँ मैं।”

अनुराधा ने भी उसी अंदाज में कहा, “सुना रही हूँ मैं भी।”

राम के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आई, लेकिन उसने उसे दबा लिया। “बहुत अच्छा। अब ये बहादुरी दवा खाते समय भी दिखाइए।”

अनुराधा ने आखिरकार दवा उसकी तरफ से ली और शिकायत भरे स्वर में बोली, “सर, मुझे मेडिसिन बिल्कुल अच्छी नहीं लगती। जुबान पूरी कड़वी हो जाती है।”

राम ने बिना किसी दया के कहा, “अच्छा? तो कड़वे को कड़वा ही काटता है।”

अनुराधा ने तुरंत उसकी तरफ देखा। “क्या मतलब आपका?”

राम ने बिल्कुल गंभीर चेहरा बनाकर कहा, “मेरा मतलब ये है, मिस ठाकुर, कि आप कौन-सा बहुत मीठा बोलती हैं जो ये दवा कड़वी लगने पर आपको इतना दुख हो रहा है? जल्दी खाइए।”

अनुराधा ने उसे कुछ पल घूरा। फिर मुँह बनाते हुए दवा पानी के साथ निगल ली।दवा खाते ही उसने चेहरे पर ऐसी शिकन डाली, जैसे सच में पूरी दुनिया की कड़वाहट उसी एक गोली में भर दी गई हो।

राम ने पानी का गिलास उसकी तरफ बढ़ाया। “पानी पी लो।”अनुराधा ने पानी पीकर गिलास नीचे रखा और कुछ पल चुप रहने के बाद बोली, “सर... मैं अपने कमरे में जाऊँ?”

राम ने तुरंत कहा, “नहीं। अभी यहीं सो जाइए।”

अनुराधा ने हैरानी से उसे देखा। “क्या मतलब? मैं यहाँ क्यों रहूँगी?”राम ने उसकी तरफ देखते हुए शांत स्वर में कहा, “कल से अपने कमरे में चली जाना। आज रात तुम यहीं रहोगी।”

“लेकिन...”

“कल बात करेंगे इस पर।”

राम ने उसकी बात बीच में ही रोक दी और थोड़ा थके हुए अंदाज में कहा, “अभी मुझे भी थोड़ी देर आराम करने की जरूरत है।”

अनुराधा उसे देखती रह गई। उसे समझ ही नहीं आया कि यह आदमी हर बात का फैसला खुद ही कैसे कर लेता है।राम ने लाइट धीमी की और बिस्तर की तरफ बढ़ गया।अनुराधा वहीं बैठी उसे घूरती रही और मन ही मन बड़बड़ाई, “रावण... पूरा का पूरा रावण!”

राम की ऑर्डर भरी बात सुनकर अनुराधा कुढ़ते हुए बार-बार मुँह बनाने लगी। आखिरकार उसने हार मानते हुए कहा, "ठीक है... ठीक है... आप बिस्तर पर सो जाइए, मैं सोफे पर सो जाऊँगी।"

इतना कहकर वह सोफे की तरफ बढ़ी और उस पर बेतरतीब ढंग से लेट गई। पैर में लगी चोट के कारण उसे आराम से लेटने में थोड़ी परेशानी हो रही थी, लेकिन फिर भी उसने खुद को जैसे-तैसे सोफे पर जमा लिया।

राम कुछ पल तक उसे देखता रहा। फिर आराम से उसके पास जाकर सोफे के किनारे बैठ गया।अनुराधा ने उसे वहाँ बैठा देखा तो तुरंत आँखें खोलकर बोली, "सर, आप यहाँ क्यों बैठ गए? आप जाइए ना... सो जाइए।"

राम ने बिल्कुल सहजता से कहा, "हम्म... चला जाऊँगा। तुम सो जाओ।"अनुराधा ने भौंहें सिकोड़ लीं। "तो फिर यहाँ बैठे क्यों हैं?"

राम ने उसकी तरफ देखते हुए कहा, "जब तुम सो जाओगी, तब तुम्हें उठाकर बिस्तर पर सुला दूँगा।"अनुराधा तुरंत उठकर बैठ गई। "क्या?"राम ने बिना किसी परेशानी के अपनी बात दोहराई, "तुम सो जाओ। तुम्हें सोफे पर नहीं सोने दूँगा।"

लेकिन क्यों?मेरी मर्जी।अनुराधा उसे अविश्वास से घूरने लगी।राम ने आगे कहा, "अब या तो तुम खुद बिस्तर पर जाकर सो जाओ...! वह एक पल के लिए रुका और फिर हल्की-सी मुस्कान के साथ बोला, "नहीं तो मैं तुम्हारे सोने का इंतजार करूँगा और फिर तुम्हें उठाकर बिस्तर पर सुला दूँगा।"

अनुराधा की आँखें बड़ी हो गईं। आप ऐसा नहीं कर सकते!राम ने भौंह उठाते हुए पूछा, "क्यों नहीं कर सकता?"

"क्योंकि..." अनुराधा कुछ पल सोचती रही, फिर झुंझलाकर बोली, "क्योंकि मैं खुद चलकर बिस्तर तक जा सकती हूँ!"राम के होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आ गई। "तो फिर इतनी देर से बहस किस बात की?"

अनुराधा ने उसे घूरते हुए मुँह बनाया।राम उठते हुए बोला, "चलो।"अनुराधा कुछ पल वहीं बैठी उसे देखती रही। फिर मन ही मन बड़बड़ाई, "रावण कहीं का... चैन से सोने भी नहीं देगा।"

अनुराधा ने मुँह बनाते हुए आखिरकार हार मान ली और बड़बड़ाकर बोली, “ठीक है... मैं बिस्तर पर सो जाती हूँ। जिद्दी रघुवंशी... शैतान!”

राम ने तुरंत उसकी तरफ देखते हुए कहा, “सुन रहा हूँ मैं।”

अनुराधा ने उसे घूरकर जवाब दिया, “तो मैं भी सुना रही हूँ... हुँह!”

राम के होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आ गई। अनुराधा जैसे ही सोफे से उठने लगी, उसके घायल पैर में हल्का-सा दर्द उठा और वह एक पल को लड़खड़ा गई। इससे पहले कि वह खुद को संभाल पाती, राम ने आगे बढ़कर उसे अपनी बाँहों में उठा लिया।

“अरे... आप...!” अनुराधा बस इतना ही कह पाई।राम ने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया। वह उसे लेकर सीधे बिस्तर तक आया और बेहद सावधानी से उसे बिस्तर पर लिटा दिया। इस बार अनुराधा ने कोई बहस नहीं की।

शायद दवा का असर भी शुरू हो चुका था और शायद वह खुद भी समझ चुकी थी कि राम से इस वक्त बहस करना बेकार है।वह चुपचाप दूसरी तरफ करवट लेकर लेट गई और अपनी पीठ राम की तरफ कर ली।

राम कुछ देर तक वहीं खड़ा उसे देखता रहा। अनुराधा की आँखें बंद थीं और उसकी साँसें धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं। कमरे में हल्की रोशनी थी और रात की खामोशी पूरे कमरे में पसरी हुई थी।

कुछ देर बाद राम भी बिस्तर के अपने हिस्से में लेट गया, लेकिन उसकी नजरें अब भी अनुराधा की पीठ पर टिकी थीं।वह कुछ देर तक उसे यूँ ही देखता रहा।फिर धीरे से उठकर उसके पास गया।

अनुराधा दवा के असर से गहरी नींद में जा चुकी थी। नींद में वह खुद को सिकोड़े हुए, घुटनों को हल्का-सा मोड़कर सो रही थी। उसके चेहरे पर दिनभर की थकान और दर्द की हल्की छाप अब भी साफ दिखाई दे रही थी।

राम कुछ पल चुपचाप उसके पास बैठा रहा।उसने धीमे से उसके माथे पर बिखरे बालों को हटाया और उसे देखते हुए मन ही मन सोचा, “इतना कुछ अपने अंदर दबाकर आखिर कब तक खुद को मजबूत दिखाओगी, अनु?”

अनुराधा नींद में हल्का-सा करवट बदलकर और सिकुड़ गई।राम ने उसकी चादर ठीक की और कुछ पल वहीं बैठा रहा।उसका सिर तकिए पर सही जगह टिकाया, फिर उसकी करवट देखकर तकिए को थोड़ा ठीक किया, ताकि उसके घायल पैर पर किसी तरह का दबाव न पड़े। इसके बाद उसने धीरे से कंबल उठाकर उसके कंधों तक ओढ़ा दिया।

कुछ पल तक राम वहीं खड़ा रहा।कमरे में हल्की पीली रोशनी थी और खिड़की से आती चाँदनी सीधे बिस्तर के एक हिस्से पर पड़ रही थी। उसी चाँदनी में अनुराधा का चेहरा और भी शांत और मासूम नजर आ रहा था।

फिर जाने क्यों उसकी नजरें उसके चेहरे से हट ही नहीं पाईं। खिड़की से छनकर आती चाँदनी सीधे उसके चेहरे पर पड़ रही थी। उस हल्की सफेद रोशनी में उसकी दूधिया रंगत और भी निखर उठी थी। उसकी बड़ी-बड़ी आँखें नींद में बंद थीं और दायीं आँख के नीचे बना छोटा-सा काला तिल उसके चेहरे की मासूमियत को और भी खूबसूरत बना रहा था। उसकी लंबी नाक, पतले गुलाबी होंठ और चेहरे पर पसरी हुई वह निश्चिंत-सी खामोशी... राम बस उसे देखता रहा।

दिनभर की उथल-पुथल के बाद पहली बार उसके चेहरे पर कोई डर नहीं था। न कोई घबराहट, न कोई सवाल... बस गहरी नींद थी। राम की नजर अनायास ही उसके चेहरे पर ठहर गई और उसके भीतर एक अनकहा-सा एहसास उठने लगा।

उसने कभी किसी चेहरे को इस तरह ठहरकर नहीं देखा था, लेकिन आज जाने क्यों अनुराधा को देखकर उसे ऐसा लग रहा था जैसे उसकी नजरें खुद उसकी इजाजत के बिना उसके चेहरे की हर मासूमियत को अपने भीतर उतार लेना चाहती हों।

राम के होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आई। उसने बहुत धीमे स्वर में खुद से कहा, “खुदा ने एक बार तुम्हें बनाकर... शायद फुर्सत से बैठकर तुम्हें खुद ही निहारा होगा। तभी तो तुम्हारे चेहरे में इतनी मासूमियत और आँखों में इतना दर्द एक साथ रख दिया।”

वह कुछ क्षण चुप रहा। उसकी नजर फिर अनुराधा के चेहरे पर टिक गई। उसे याद आया कि कुछ ही देर पहले यही लड़की उससे बहस कर रही थी, उसे ड्रैकुला और रावण कह रही थी और अब उसी की मौजूदगी से बेखबर उसकी बाहों से कुछ ही दूर गहरी नींद में सो रही थी।

राम धीरे से झुका और उसके माथे पर सिद्दत से मोहब्बत भरे अहसास के साथ अपने होठो क़ो रख कर एक गहरा चुंबन दिया। उसके होंठों से धीमी आवाज निकली, “इंतजार रहेगा, अनु... तुम्हारे दर्द का हिस्सेदार बनने का। तुम्हें जितना याद है, उससे ज्यादा तुम्हारे भीतर दबा हुआ है... और जब तक तुम खुद उस अँधेरे से बाहर नहीं आ जातीं, मैं तुम्हें अकेला नहीं छोड़ूँगा।”

कुछ पल वह वहीं खड़ा रहा। फिर धीरे से सीधा हुआ और सोफे की तरफ चला आया। उसने सोने की कोशिश की, लेकिन आँखें बंद करते ही बार-बार अनुराधा का चेहरा सामने आ जाता।

कुछ देर बाद उसने करवट बदली।फिर दूसरी तरफ करवट ली।नींद जैसे उससे रूठ गई थी।

आखिरकार वह सोफे पर आधा उठकर बैठ गया और दूर बिस्तर पर सो रही अनुराधा को देखने लगा। चाँदनी अब भी उसके चेहरे पर ठहरी हुई थी। राम की आँखों में जाने कैसी गंभीरता उतर आई थी।

वह खुद से भी यह सवाल नहीं कर पा रहा था कि उसे अनुराधा की इतनी चिंता क्यों होने लगी थी।बस इतना जानता था कि आज रात वह आँखें बंद करके सो नहीं पाएगा।

क्योंकि पहली बार उसके सामने कोई ऐसी लड़की थी, जिसके चेहरे की मासूमियत के पीछे एक पूरा तूफान छिपा था... और राम उस तूफान से मुँह मोड़ने के बजाय उसके भीतर उतरने का फैसला कर चुका था।

Continue..........

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