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2.His ForEver Women

राध्या अब इस पूरे झमेले से बुरी तरह परेशान हो चुकी थी। उसकी नज़र बार-बार अपनी कलाई पर बंधी घड़ी पर जा रही थी। इंटरव्यू का समय लगातार नज़दीक आ रहा था और यहाँ दोनों ड्राइवर अपनी-अपनी गलती सही साबित करने में लगे हुए थे।

“देखिए, प्लीज़ आप लोग बहस मत कीजिए। अगर हमारी तरफ़ से गलती हुई है तो मैं माफ़ी माँग रही हूँ। गाड़ी का जो भी नुकसान हुआ है, हम बाद में बात कर लेंगे। लेकिन मुझे अभी बहुत ज़रूरी काम से जाना है।”उसकी आवाज़ में विनम्रता के साथ-साथ जल्दबाज़ी भी साफ़ झलक रही थी।

तभी BMW का पिछला दरवाज़ा खुला।अब तक चुपचाप गाड़ी के भीतर बैठा वह शख्स आखिरकार बाहर निकल आया।

उसकी लंबाई करीब छह फ़ुट दो इंच थी।उसका गेहुँआ रंग पर साफ़-सुथरी, तराशी हुई दाढ़ी उसके चेहरे को एक परिपक्व और आकर्षक रूप दे रही थी।

उसके घने, करीने से सँवारे हुए काले बाल माथे पर हल्के-से झुक रहे थे। तीखी जॉलाइन, सीधी नाक और हल्की-सी उभरी हुई भौंहें उसके चेहरे को एक सख्त लेकिन बेहद आकर्षक रूप दे रही थीं। आँखों पर लगा काला चश्मा उसकी आँखों को तो छिपा रहा था, लेकिन उसके व्यक्तित्व में मौजूद गंभीरता को नहीं।

उसने गहरे रंग की शर्ट और फिटेड ट्राउज़र पहन रखी थी। उसकी चाल में जल्दबाज़ी नहीं थी, बल्कि एक अजीब-सा आत्मविश्वास था। जैसे उसे अपनी मौजूदगी का एहसास करवाने के लिए किसी कोशिश की जरूरत ही न हो। उसकी उम्र लगभग पैतिस साल की थी। लेकिन उसकी पर्सनलिटी से उम्र का आकलन करना मुश्किल था क्यों की वह मुश्किल से चौबीस पचचीस का नौजवान लग रहा था।

गाड़ी से बाहर आते ही उसने सामने चल रही बहस पर नजर डाली।"ये क्या हो रहा है?"

उसकी आवाज़ बहुत ऊँची नहीं थी, लेकिन उसमें इतना अधिकार था कि दोनों ड्राइवरों की बहस कुछ पल के लिए रुक गई।

राध्या की पीठ उसकी तरफ थी।उसने उसकी आवाज़ सुनी जरूर, लेकिन इस वक्त उसके पास किसी और चीज़ पर ध्यान देने का समय नहीं था।

"प्लीज़, आप लोग बाद में जो भी बात करनी हो कर लीजिए," वह कैब ड्राइवर से कह रही थी। "मुझे बहुत जरूरी जगह पहुँचना है। मेरा इंटरव्यू है और मैं पहले ही लेट हो चुकी हूँ।"

उसने सामने वाले ड्राइवर की तरफ मुड़कर विनम्रता से कहा, "आई एम सॉरी। हमारी तरफ से जो भी हुआ है, उसके लिए मैं माफ़ी चाहती हूँ। अगर आपकी कार को नुकसान हुआ है तो हम इस बारे में बाद में बात कर सकते हैं, लेकिन अभी मुझे जाना होगा।"

उसकी आवाज़ में घबराहट थी, मगर उसके व्यवहार में फिर भी एक अजीब-सी शालीनता थी।

उसे अपनी परेशानी के बावजूद किसी से बदतमीज़ी करना नहीं आता था।

वह आदमी कुछ दूर खड़ा उसे देख रहा था।शायद उसे पहली बार किसी ऐसी लड़की से सामना हुआ था, जो उसकी मौजूदगी से प्रभावित होने के बजाय अपनी ही दुनिया में परेशान थी।उसने कुछ पल उसे देखा और फिर आवाज़ दी,"हे, मिस!"

राध्या ने नहीं सुना।वह अभी भी अपने ड्राइवर से जल्द से जल्द चलने के लिए कह रही थी।

इस बार उसकी आवाज़ थोड़ी सख्त हुई।

"मिस!"राध्या रुक गई और उसने धीरे से पलटकर देखा।और उसी पल...उसकी नजर उस शख्स से मिली।कुछ क्षणों के लिए दोनों के बीच जैसे एक अजीब-सी खामोशी ठहर गई।

धूप की हल्की किरणें राध्या के चेहरे पर पड़ रही थीं।वह आज बेहद खूबसूरत लग रही थी।

उसकी गुलाबी रंगत पर धूप की सुनहरी चमक पड़ रही थी। बड़ी-बड़ी गहरी कत्थई आँखें, जिनमें इस वक्त हल्की घबराहट और जल्दबाज़ी साफ दिखाई दे रही थी, उसके चेहरे की सबसे खूबसूरत चीज़ थीं। उसकी आँखों की गहराई में कुछ ऐसा था, जो अनजाने में ही किसी को दोबारा देखने पर मजबूर कर दे।

उसने मरून रंग की साड़ी पहन रखी थी। साड़ी का रंग उसकी गोरी-सी गुलाबी रंगत को और निखार रहा था। बिना किसी भारी गहने या बनावटी श्रृंगार के भी वह बेहद आकर्षक लग रही थी।

उसके लंबे, काले और हल्के घुँघराले बाल खुले हुए थे, जिनकी कुछ लटें हवा के साथ उसके चेहरे पर आ रही थीं। उसने एक हाथ से उन लटों को कान के पीछे किया।उस छोटे-से हावभाव में भी एक सहज सुंदरता थी।

वह ऐसी खूबसूरत नहीं थी जिसे देखकर सिर्फ़ पहली नजर में तारीफ़ की जाए।उसकी खूबसूरती में एक ठहराव था।एक सादगी थी और उसकी आँखों में छिपी उदासी उस खूबसूरती को और गहरा बना रही थी।

सामने खड़ा आदमी कुछ पल के लिए उसे देखता रह गया।उसके लिए यह एक अनपेक्षित पल था।वह आमतौर पर लोगों को देखकर उनके चेहरे पर ज्यादा ध्यान नहीं देता था। लेकिन इस लड़की में कुछ ऐसा था, जिसने अनजाने में उसकी नजर रोक दी थी।

शायद उसकी आँखें...या शायद वह सादगी, जिसके पीछे जाने कितनी अनकही बातें छिपी थीं।

राध्या ने उसकी तरफ देखा और उसकी खामोशी से थोड़ा असहज होकर बोली,"जी... आपने मुझे बुलाया?"

उसकी आवाज़ सुनते ही वह जैसे अपने ख्यालों से बाहर आया।उसने अपनी नजरें एक पल के लिए हटाईं और फिर गंभीर स्वर में कहा,"हाँ। पहले ये बताइए... आपकी कैब ने मेरी कार को टक्कर मारी है और आप बिना रुके जाने की बात कर रही हैं?"

राध्या ने बेचैनी से अपनी घड़ी देखी।"मैं भाग नहीं रही हूँ। मैं सच में माफ़ी चाहती हूँ। लेकिन मेरा इंटरव्यू है और मैं पहले ही बहुत लेट हो चुकी हूँ। अगर आप चाहें तो मैं अपना नंबर दे सकती हूँ। कार के नुकसान की बात हम बाद में कर लेंगे।"

उसके चेहरे पर परेशानी साफ थी, लेकिन उसकी आवाज़ में अब भी वही शालीनता थी।

उस आदमी ने पहली बार गौर किया कि इतनी परेशानी में होने के बावजूद यह लड़की खुद को संभालकर खड़ी थी।

और शायद यही बात उसकी खूबसूरती से ज्यादा उसके ध्यान में रह गई।उसे अभी उसका नाम तक नहीं पता था।लेकिन न जाने क्यों...उसकी आँखों में ठहरी वह बेचैनी उसे याद रह गई।

उसकी नज़रें कुछ पल तक राध्या के चेहरे पर टिकी रहीं। जैसे अचानक उसे कुछ कहना ही याद न रहा हो। सामने खड़ी राध्या उसकी खामोशी का कारण समझ नहीं पा रही थी। उसे तो बस अपनी घड़ी की चिंता थी और इस बात की कि किसी भी तरह समय पर यूनिवर्सिटी पहुँच जाए।

उसने हाथ के इशारे से उसका ध्यान अपनी ओर खींचते हुए कहा, “हेलो, मिस्टर... कहिए भी। मुझे देर हो रही है। अगर आपको मुझसे कुछ कहना है तो प्लीज़ जल्दी कहिए।”

राध्या की आवाज़ सुनते ही वह जैसे अपने ख्यालों से बाहर आया। उसने एक पल के लिए उसे देखा और फिर उसके होंठों पर एक बेहद हल्की, मगर तंज से भरी मुस्कान उभरी।

राध्या उस मुस्कान का मतलब समझ नहीं पाई।वह कुछ पूछती, उससे पहले ही उस आदमी ने अपने कोट की जेब में हाथ डाला। अगले ही पल उसने नोटों की दो गड्डियाँ बाहर निकालीं।

राध्या की भौंहें हल्की-सी सिकुड़ गईं।उसने कोई जवाब नहीं दिया।वह बस एक कदम आगे बढ़ा, राध्या का हाथ अपने हाथ में लिया और बिना किसी झिझक के दोनों गड्डियाँ उसकी हथेली पर रख दीं।

उस अचानक हुए स्पर्श से राध्या की उँगलियाँ अनायास काँप गईं। पल भर के लिए उसकी साँस भी जैसे अटक गई, लेकिन उसने तुरंत खुद को संभाल लिया और हाथ वापस खींचने की कोशिश की।

उस आदमी ने उसका हाथ छोड़ दिया।“जिस नुकसान की वजह से यहाँ इतना तमाशा हो रहा है, ये उसके पैसे हैं। रखो।”

राध्या ने अविश्वास से अपनी हथेली में रखे नोटों को देखा, फिर उसकी तरफ।वह आदमी अब भी उतनी ही बेपरवाही से खड़ा था, जैसे उसके लिए यह कोई बड़ी बात ही न हो।

“और अब यहाँ से जाओ,” उसने सपाट आवाज़ में कहा। “बीच सड़क पर खड़े होकर तमाशा बनाने की कोई ज़रूरत नहीं है।”

राध्या के चेहरे पर अविश्वास साफ़ उतर आया।

शिमला की सुनहरी, हल्की धूप उस सड़क पर फैली हुई थी, लेकिन उस वक्त राध्या का ध्यान मौसम की खूबसूरती पर बिल्कुल नहीं था। सामने खड़े उस शख्स के चेहरे पर अब भी गुस्सा साफ दिखाई दे रहा था और उसकी आँखों में राध्या के लिए एक ऐसी नाराजगी थी, जिसमें न जाने क्यों उसे घृणा की झलक भी महसूस हो रही थी।

राध्या ने पहले तो नासमझी से अपनी हथेली में रखी नोटों की गड्डियों को देखा। उसे समझ ही नहीं आया कि वह शख्स आखिर उसे इस तरह पैसे क्यों दे रहा था। फिर उसकी नजर धीरे-धीरे उन गहरी आँखों तक जा पहुँची, जिनमें इस वक्त उसके लिए सिर्फ गुस्सा और नफरत दिखाई दे रही थी।

उस नजर ने राध्या को भीतर तक चोट पहुँचा दी। उसकी आँखों में अचानक नमी उतर आई। उसने पल भर के लिए पलकें झुका लीं और अपने चेहरे पर आए उन भावों को छिपाने की कोशिश की। वह नहीं चाहती थी कि एक अजनबी उसकी आँखों में अपने लिए आए आँसू देखे। उसने जल्दी से अपनी भावनाओं को संभाला, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी।

उस शख्स की नजर उसकी आँखों पर पड़ चुकी थी।

राध्या की आँखों में आई वह हल्की-सी नमी देखकर न जाने क्यों उसके भीतर एक अनजानी-सी टीस उठी। वह खुद भी उस एहसास को समझ नहीं पाया। कुछ पल के लिए उसकी नजर राध्या के चेहरे पर ठहर गई, जैसे उसके भीतर कोई अनजाना सवाल उठकर उसे परेशान कर रहा हो। मगर अगले ही पल उसने उस एहसास को झटक दिया और अपने चेहरे पर फिर वही कठोरता ले आया।

राध्या की तरफ देखते हुए उसने ठंडे और सख्त लहजे में कहा, "जब तुम जैसे लोग बेवजह, अपनी गलती होने के बावजूद झगड़ा करते हो, तो इसका मतलब मैं अच्छी तरह समझता हूँ। तुम्हें जो चाहिए, वो तुम्हें दे रहा हूँ। अब यहाँ से हटो और अपना ये तमाशा बंद करो।"

राध्या को उसकी बातों का मतलब समझते देर नहीं लगी। उसके भीतर एक पल में गुस्सा भड़क उठा। सामने खड़े उस अजनबी का उसे इस तरह जज करना और बिना उसकी बात जाने उसे नीचा दिखाने की कोशिश करना उसे बिल्कुल बर्दाश्त नहीं हुआ। फिर भी उसने खुद को किसी तरह संभाला। वह इस वक्त सड़क के बीच खड़े होकर किसी अजनबी से बहस करके अपना समय और खराब नहीं करना चाहती थी।

उसने गहरी साँस ली और उसकी तरफ देखते हुए संयमित, मगर स्पष्ट आवाज में कहा, "देखिए, मिस्टर... आप जो कोई भी हैं और मेरे बारे में जो कुछ भी सोच रहे हैं या कह रहे हैं, वो बिल्कुल गलत है। शायद आपको कोई गलतफहमी हुई है।"

उसकी बात सुनते ही उस शख्स की भौंहें तन गईं। उसने राध्या को कुछ पल देखा और फिर उसी कठोर लहजे में बोल पड़ा, "तुम जैसी मिडिल क्लास "

वह अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाया था कि राध्या ने उसकी तरफ सीधी नजरों से देखा। उसकी बड़ी-बड़ी कत्थई आँखों में अब गुस्सा साफ दिखाई दे रहा था। अगले ही पल उसने अपना हाथ उठाकर उसकी बात बीच में रोक दी।

"बस।"

एक शब्द था, लेकिन उसके स्वर में इतना संयम और दृढ़ता थी कि वह शख्स आगे कुछ कहने से रुक गया।

राध्या ने अपनी कलाई पर बंधी घड़ी की तरफ देखा। फिर उसकी आँखों में देखते हुए बोली, "मुझे वैसे ही बहुत देर हो चुकी है। और आपकी ये मिडिल क्लास वाली बात सुनकर उस पर बहस करने का मेरे पास न वक्त है, न इच्छा। मुझे अपने काम के लिए देर हो रही है।"

उसने अपनी हथेली में रखी नोटों की दोनों गड्डियों को देखा। अगले ही पल उन्हें उठाकर उसने सामने खड़ी BMW के बोनट पर रख दिया।

"ये पैसे आपको मुबारक। मुझे इनकी जरूरत नहीं है।"इतना कहकर उसने उसके जवाब का इंतजार तक नहीं किया।राध्या ने दोनों हाथ जोड़कर हल्के से कहा, "अब अगर आपका हो गया हो, तो मुझे जाने दीजिए।"

फिर वह तेजी से अपनी कैब की तरफ बढ़ी।दरवाजा खोलने से पहले उसने ड्राइवर की तरफ देखा और कुछ झुंझलाकर बोली, "चलोगे या मैं दूसरी कैब कर लूँ?"

उसकी बड़ी-बड़ी आँखों में भरा गुस्सा देखकर कैब ड्राइवर तुरंत सीधा हो गया।"जी... जी मैडम, चलिए।"वह जल्दी से ड्राइविंग सीट पर जाकर बैठ गया।

राध्या भी कैब में बैठ गई। दरवाजा बंद करने से पहले उसने एक बार पीछे मुड़कर देखा।उसकी नजर उस शख्स से मिली।उसकी आँखों में अब भी वही नाराजगी थी, लेकिन इस बार उसमें किसी जवाब की जरूरत नहीं थी।

राध्या ने कुछ नहीं कहा। बस एक पल उसे देखकर कैब में बैठ गई।अगले ही क्षण कैब सड़क पर आगे बढ़ गई।राध्या खिड़की से बाहर देखने लगी, लेकिन उसके चेहरे पर अभी भी उस आदमी की बातों का गुस्सा साफ था।

वहीं सड़क पर खड़ा वह शख्स कुछ पल तक उस जाती हुई कैब को देखता रहा।

राध्या की कैब धीरे-धीरे सड़क के मोड़ से आगे निकल गई और कुछ ही पलों में उसकी आँखों से ओझल हो गई। वह शख्स अब भी वहीं खड़ा उस रास्ते को देख रहा था, जहाँ कुछ देर पहले तक वह कैब दिखाई दे रही थी। उसके चेहरे पर वही सख़्ती थी, लेकिन उसके भीतर जैसे कुछ अनजाना-सा ठहर गया था।

राध्या की गुस्से से भरी कत्थई आँखें बार-बार उसकी आँखों के सामने आ रही थीं। वह खुद भी नहीं समझ पा रहा था कि एक अनजान लड़की की आँखों में आई नमी ने उसे इस तरह विचलित क्यों किया था। उसने तो बस उसे उसकी गलती की कीमत देकर वहाँ से जाने को कहा था।

फिर उसके चले जाने के बाद उसका ध्यान बार-बार उसी पर क्यों जा रहा था?

उसके होंठों पर अनायास ही एक हल्की-सी मुस्कान आई, मगर अगले ही पल उसने उसे दबा दिया और अपने चेहरे पर फिर वही कठोरता ले आया।

उसने ड्राइवर की तरफ देखा और गंभीर आवाज़ में कहा, “जल्दी चलो... यूनिवर्सिटी।”

“जी, सर।”ड्राइवर तुरंत ड्राइविंग सीट पर बैठा और BMW सड़क पर आगे बढ़ गई।पीछली सीट पर बैठा वह शख्स खिड़की के बाहर देखने लगा। शिमला की पहाड़ियों पर बिखरी सुनहरी धूप और ठंडी हवा के बावजूद उसके दिमाग में कुछ देर पहले हुई मुलाकात ही घूम रही थी।

वह लड़की...उसका गुस्सा...उसका पैसे लौटाना...और जाते-जाते उसकी आँखों में दिखाई देती वह नाराज़गी।उसने हल्के से भौंहें सिकोड़ लीं और खुद को समझाने की कोशिश की कि उसे उस लड़की के बारे में सोचने की कोई जरूरत नहीं है।

आख़िर वह उसके लिए थी ही कौन?

अनिरुद्ध प्रताप शिमला के सबसे प्रभावशाली और चर्चित कारोबारियों में गिना जाता था। करीब छह फीट दो इंच का लंबा कद, गेहुँआ रंग, चौड़े कंधे, तराशे हुए नैन-नक्श और गहरी आँखें उसके व्यक्तित्व को एक अलग ही रौब देती थीं। आँखों पर लगा चश्मा उसके गंभीर चेहरे को और प्रभावशाली बना देता था।

प्रताप ग्रुप का सीईओ होने के साथ-साथ वह अपनी कंपनी A.P. Enterprises का मालिक भी था। अपनी मेहनत और कारोबारी समझ के दम पर उसने बेहद कम उम्र में वह मुकाम हासिल कर लिया था, जहाँ पहुँचने में लोगों को पूरी जिंदगी लग जाती है।पैसा, शोहरत, ताकत और रुतबा..अनिरुद्ध के पास सब कुछ था।

लेकिन उसके व्यक्तित्व की सबसे खास बात उसकी सफलता नहीं थी।वह था उसका स्वभाव।

अनिरुद्ध कम बोलता था, लेकिन उसकी खामोशी भी अपने आप में एक जवाब होती थी। उसका सख्त मिज़ाज, आत्मविश्वास और कभी-कभी दिखाई देने वाला अहंकार लोगों को उससे एक दूरी बनाए रखने पर मजबूर कर देता था।

उसे बेवजह किसी से घुलना-मिलना पसंद नहीं था और अपनी निजी जिंदगी को लेकर वह बेहद सतर्क रहता था।लोग उसके बारे में बहुत कुछ जानते थे, लेकिन सब कुछ नहीं।उसकी जिंदगी में कुछ ऐसे राज़ थे, जिन्हें उसने अपने तक ही सीमित रखा था।

और शायद यही वजह थी कि इतने लोगों के बीच रहते हुए भी अनिरुद्ध प्रताप के बारे में कोई यह दावा नहीं कर सकता था कि वह उसे पूरी तरह जानता है।BMW यूनिवर्सिटी की तरफ बढ़ती जा रही थी।

अनिरुद्ध ने एक बार फिर खिड़की के बाहर देखा।उसे नहीं पता था कि कुछ मिनट पहले सड़क पर हुई वह छोटी-सी मुलाकात महज़ एक संयोग थी...या उसकी जिंदगी में आने वाले किसी बड़े बदलाव की शुरुआत।

राध्या बेचैनी से यूनिवर्सिटी पहुँचने का इंतजार कर रही थी। उसकी नजर बार-बार घड़ी पर जा रही थी और मन में बस यही डर था कि कहीं देर से पहुँचने की वजह से उसका इंटरव्यू न छूट जाए। तभी कैब ड्राइवर की आवाज सुनाई दी, "मैडम, आप पहुँच गईं।"

राध्या ने जैसे ही बाहर देखा, उसने जल्दी से सिर हाँ में हिलाया और कैब का किराया चुकाकर लगभग भागती हुई नीचे उतर गई। सामने खड़े भव्य गेट पर उसकी नजर पड़ी, जहाँ बड़े-बड़े अक्षरों में Y.P. Degree College लिखा हुआ था।

शिमला के सबसे प्रतिष्ठित कॉलेजों में गिने जाने वाले इस कॉलेज को देखकर एक पल के लिए उसकी नजरें ठहर गईं, लेकिन अगले ही पल उसे अपने इंटरव्यू का ख्याल आया और वह तेजी से अंदर की ओर बढ़ गई।

राध्या जल्दी-जल्दी रिसेप्शन तक पहुँची। वहाँ पहुँचकर उसने अपने फोन में आया इंटरव्यू का मैसेज रिसेप्शन पर बैठी महिला को दिखाया और थोड़ी हाँफती हुई बोली, "हेलो मैम... मुझे यहाँ मनोविज्ञान के प्रोफेसर के पद के लिए इंटरव्यू के लिए बुलाया गया है।"

रिसेप्शन पर बैठी महिला, जिसका नाम जया शर्मा था, ने राध्या की ओर देखकर मुस्कुराते हुए कहा, "जी मैम, आप अपने सभी डॉक्यूमेंट्स के साथ वहाँ दाईं तरफ मुड़कर बैठ जाइए। आपको थोड़ी देर में बुलाया जाएगा।"

राध्या ने राहत की साँस ली और धन्यवाद कहने ही वाली थी कि जया ने मुस्कुराते हुए आगे कहा, "वैसे आपका इंटरव्यू आज थोड़ा खास होने वाला है।"राध्या ने हल्के आश्चर्य से उसकी ओर देखा। "खास?"

"जी," जया ने सिर हिलाते हुए कहा, "संयोग से आज हमारे कॉलेज के ट्रस्टी खुद कॉलेज विजिट के लिए आए हुए हैं। उन्होंने ही आज के इंटरव्यू लेने की इच्छा जताई है।"

यह सुनते ही राध्या के चेहरे पर आई हल्की राहत फिर से गायब हो गई। उसने अनायास अपने हाथ में पकड़ी फाइल को थोड़ा कसकर पकड़ लिया।कॉलेज के ट्रस्टी खुद इंटरव्यू लेने वाले थे।

अब उसके लिए यह इंटरव्यू पहले से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया था।

राध्या ने जया की बात सुनी तो अपने डॉक्यूमेंट्स को संभालते हुए कॉरिडोर से आगे बढ़ने लगी। उसके कदम थोड़े तेज थे, क्योंकि वह पहले ही इंटरव्यू के लिए देर से पहुँच चुकी थी और अब किसी भी तरह की और देरी नहीं चाहती थी। लेकिन शायद किस्मत को अभी उसका इम्तिहान लेना बाकी था।

कॉरिडोर के एक मोड़ पर अचानक वह किसी से टकरा गई। टक्कर इतनी अचानक हुई कि राध्या का संतुलन बिगड़ गया और उसके हाथों में पकड़े सारे डॉक्यूमेंट्स हवा में उछल गए। उसकी आँखें डर के मारे बंद हो गईं। उसे लगा कि अगले ही पल वह जमीन पर गिर जाएगी, लेकिन उससे पहले ही किसी के मजबूत हाथों ने उसे थाम लिया।

एक पल के लिए समय जैसे ठहर गया।राध्या उस शख्स के मजबूत बाहों में थी और उसके बिखरे हुए डॉक्यूमेंट्स हवा से होते हुए धीरे-धीरे जमीन पर गिर रहे थे। वहीं वह शख्स उसे बड़ी शिद्दत से निहार रहा था। उसकी नजर राध्या के चेहरे पर ठहर गई थी।

धूप में दमकता उसका गुलाबी चेहरा, मासूमियत से भरी खूबसूरत सूरत, हल्के गुलाबी होंठ और बंद पलकों के पीछे छिपी उसकी गहरी कत्थई आँखें... वह उसे एकटक देखता रह गया। कुछ ही देर पहले सड़क पर जिस लड़की से उसकी इतनी तीखी बहस हुई थी, वही लड़की इस वक्त उसके इतने करीब थी।

उसके ठंडे हाथों की पकड़ अब भी राध्या की खुली कमर पर थी। उसकी मखमली बदन की छुवन ने उसके अंदर की धड़कन क़ो तेज कर दिया था। लेकिन वह खुद इस बात से अनजान था।

उसे खुद भी इस बात का एहसास नहीं था कि वह उसे अब तक उसी तरह थामे हुए था। उसकी नज़र राध्या के चेहरे से हटने का नाम ही नहीं ले रही थी।

इधर राध्या को जब महसूस हुआ कि वह गिरी नहीं है और किसी ने उसे संभाल रखा है, तो उसने बहुत मासूमियत से पहले अपनी एक आँख खोली। फिर धीरे-धीरे दूसरी आँख भी खोल दी।उसकी बड़ी-बड़ी कत्थई आँखें जैसे ही पूरी तरह खुलीं, सामने खड़े उस शख्स की नज़र उनसे जा मिली।

उस एक पल में राध्या की मासूमियत और उसकी खूबसूरती ऐसी थी कि कोई भी उसकी आँखों में एक बार देखने के बाद अपनी नज़रें हटाना भूल सकता था। और शायद यही वजह थी कि सामने खड़ा वह शख्स भी कुछ क्षणों के लिए अपनी सारी बात, अपना गुस्सा और अपने आसपास की दुनिया तक भूल गया था।

उसकी गहरी कत्थई आँखों में जाने कौन-सा खिंचाव था कि अनिरुद्ध कुछ पल के लिए उनमें खो-सा गया। राध्या ने जब महसूस किया कि वह अब भी उसी की बाँहों में थमी हुई है, तो उसने अपनी बड़ी-बड़ी आँखें धीरे-से उठाईं और मासूमियत से कहा, “आप...”

उसकी आवाज़ सुनते ही जैसे अनिरुद्ध की तंद्रा टूटी, लेकिन अगले ही पल उसने न जाने क्यों उसकी कमर पर अपनी पकड़ थोड़ी और मजबूत कर दी और उसे अपनी तरफ खींच लिया। अचानक हुए इस खिंचाव से राध्या की नाक उसके सीने से जा टकराई। वह एक पल के लिए सकपका गई और फिर अपना चेहरा ऊपर उठाकर उसे देखने लगी।

इतनी नज़दीक से राध्या को देखकर अनिरुद्ध को उसकी खुशबू और भी स्पष्ट महसूस हुई। उसकी हल्की-सी महक जैसे उसकी साँसों में उतर रही थी और एक पल के लिए उसका खुद पर से नियंत्रण ढीला पड़ने लगा।

मगर अगले ही क्षण उसने अपने भीतर उठते उस अनजाने एहसास को दबा दिया। उसका दिल उसे छोड़ने के लिए तैयार नहीं था, फिर भी उसके चेहरे पर हमेशा की तरह वही अकड़ और बेरुखी लौट आई।

उसने राध्या को धीरे से अपनी बाँहों से अलग करते हुए कुछ कदम पीछे किया और अपने उसी रौबदार अंदाज़ में कहा, “मोहतरमा, अगर आप देखकर नहीं चल सकतीं तो हर बार किसी न किसी से यूँ ही टक्कर होती रहेगी आपकी। वैसे आपको देखकर तो ऐसा बिल्कुल नहीं लगता कि आपकी आँखें खराब हैं।”

उसके लहजे में साफ़ तंज था।राध्या ने उसकी तरफ देखा तक नहीं। शायद वह उसके शब्दों को कोई महत्व देना ही नहीं चाहती थी। वह नीचे बिखरे अपने डॉक्यूमेंट्स उठाने के लिए झुक गई और एक-एक करके कागज़ समेटने लगी।

अनिरुद्ध कुछ क्षण वहीं खड़ा उसे देखता रहा।उसने उम्मीद की थी कि राध्या उसकी बात का कोई जवाब देगी, शायद उससे बहस करेगी या कम-से-कम उसकी तरफ देखकर कुछ कहेगी। लेकिन वह तो जैसे उसकी मौजूदगी से ही बेपरवाह होकर अपने कागज़ समेटने में लगी थी।

उसकी इस बेरुखी ने अनिरुद्ध के भीतर जाने क्यों चिढ़ पैदा कर दी।उसके चेहरे की कठोरता और गहरी हो गई।उसे बिल्कुल पसंद नहीं आया कि राध्या उसकी बात को इस तरह अनदेखा कर रही थी।

Continue......

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