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1.His Forever Women

ट्रेन अपनी रफ्तार से अपनी मंज़िल की ओर बढ़ी जा रही थी। रात गहरा चुकी थी। खिड़की के बाहर घना अँधेरा था और बीच-बीच में किसी छोटे-से स्टेशन या गाँव की रोशनी कुछ पल के लिए दिखाई देती, फिर उसी तेजी से पीछे छूट जाती। राध्या की निगाहें खिड़की के बाहर टिकी हुई थीं, लेकिन उसका ध्यान उन भागती हुई रोशनियों पर नहीं था। उसकी आँखों में एक अजीब-सा खालीपन था, जैसे वह बाहर की दुनिया को नहीं, बल्कि अपने भीतर दबे किसी दर्द को देख रही हो।

अचानक उसके कानों में अतीत की वही कड़वी आवाज़ गूँज उठी—"तेरे जैसी बदचलन और बेहूदा लड़की का मर जाना ही अच्छा है। जो किसी की नहीं हुई, तुम निकल जाओ मेरे घर से। मैं तुम्हारी शक्ल भी देखना नहीं चाहता।"

उन शब्दों ने जैसे उसके पुराने जख्म को फिर से कुरेद दिया। राध्या की उँगलियाँ अनजाने में कस गईं और उसने अपनी आँखें बंद कर लीं। कुछ शब्द इंसान जितना भी भूलना चाहे, वे उतनी ही गहराई से उसके भीतर अपनी जगह बना लेते हैं। वक्त गुजर जाता है, लोग बदल जाते हैं, जगहें बदल जाती हैं, लेकिन कुछ आवाज़ें हमेशा मन के किसी कोने में जिंदा रहती हैं।

राध्या ने एक गहरी साँस ली और खुद को संभाला। वह अब पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहती थी। जो कुछ हुआ था, उसे बदलना उसके हाथ में नहीं था, लेकिन अपनी आगे की जिंदगी को किस तरह जीना है, यह फैसला वह जरूर कर सकती थी।

"मम्मा... मम्मा।"

एक नन्ही और मीठी आवाज़ ने उसके विचारों की कड़ी तोड़ दी। राध्या ने पलटकर देखा। उसके सामने पाँच साल की एक गोल-मटोल बच्ची खड़ी थी। दूधिया रंग, छोटे-छोटे घुँघराले काले बाल और गहरी कत्थई आँखें। उसकी बड़ी-बड़ी आँखों में नींद के साथ मासूमियत और जिज्ञासा दोनों झलक रही थीं। वह अपनी माँ को देखते हुए बोली, "मम्मा, हम कहाँ जा रहे हैं?"

राध्या कुछ पल चुप रही। सवाल छोटा था, लेकिन उसके पास उसका कोई सीधा जवाब नहीं था। वह खुद नहीं जानती थी कि वे कहाँ जा रहे थे। शिमला उसके लिए सिर्फ एक शहर नहीं था, बल्कि अपनी पुरानी जिंदगी से दूर जाने का एक बहाना था। वह यह भी नहीं जानती थी कि वहाँ जाकर क्या होगा, कैसे होगा और उसकी जिंदगी किस मोड़ पर पहुँचेगी। फिर भी वह अपनी बेटी के मासूम मन में अपने डर और परेशानियों का बोझ नहीं डालना चाहती थी।

उसने आरु के गाल को प्यार से सहलाया और हल्की मुस्कान के साथ बोली, "आरु बेटू, हम शिमला जा रहे हैं।""शिमला?" आरु ने उत्सुकता से पूछा।

"हाँ।"

"वहाँ बर्फ होती है?"राध्या के चेहरे पर अनायास मुस्कान आ गई। उसने प्यार से अपनी बेटी की नाक छूते हुए कहा, "हाँ, वहाँ बहुत बर्फ होती है।"

आरु की आँखें खुशी से चमक उठीं। उसने अपना सिर हाँ में हिलाया और बोली, "ठीक है।"

उसकी मासूम-सी बात सुनकर राध्या के होंठों पर भी मुस्कान आ गई। न जाने कितने दिनों बाद उसके चेहरे पर ऐसी मुस्कान आई थी। उसकी जिंदगी ने उससे बहुत कुछ छीन लिया था, लेकिन आरु ने उसके जीवन में वह जगह भर दी थी जिसे शायद कोई और कभी नहीं भर सकता था। उसके लिए आरु सिर्फ उसकी बेटी नहीं थी, बल्कि उसकी जीने की सबसे बड़ी वजह थी।

कुछ देर बाद आरु ने अपना सिर माँ की गोद में रख दिया और सफर की थकान के कारण सो गई। राध्या उसके घुँघराले बालों में धीरे-धीरे उँगलियाँ फेरती रही और उसे निहारती रही। अपनी बेटी को देखते हुए उसके मन में एक ही बात बार-बार आ रही थी—वह आरु को कभी वह दर्द नहीं देगी, जिसे उसने खुद सहा है।

ट्रेन अँधेरी रात को चीरती हुई आगे बढ़ती रही। राध्या खिड़की से बाहर देखती रही और मन ही मन सोचती रही कि शायद यह सफर उसकी जिंदगी का भी एक मोड़ है। पीछे उसका अतीत था, जिसे वह भूलना चाहती थी, और आगे एक ऐसा भविष्य था जिसके बारे में उसे कुछ भी पता नहीं था। डर था, अनिश्चितता थी, लेकिन उसके भीतर कहीं एक छोटी-सी उम्मीद भी थी।

कुछ घंटों बाद ट्रेन कालका पहुँची। रात काफी हो चुकी थी। राध्या ने अपना सामान संभाला, आरु को गोद में उठाया और स्टेशन से बाहर आ गई। ठंडी हवा के झोंके ने उसके चेहरे को छुआ तो उसने अपनी शॉल को थोड़ा और कसकर लपेट लिया। स्टेशन के बाहर कुछ टैक्सियाँ खड़ी थीं। उसने एक टैक्सी की और आरु को लेकर शिमला की ओर निकल पड़ी।

जैसे-जैसे टैक्सी पहाड़ी रास्तों पर चढ़ती गई, शहर की चहल-पहल पीछे छूटती गई। चारों ओर अँधेरा और ऊँचे-ऊँचे देवदार के पेड़ दिखाई दे रहे थे। सड़क घुमावदार थी और एक तरफ पहाड़ थे, तो दूसरी तरफ गहरी खाई। दूर पहाड़ियों पर बिखरी रोशनियाँ अँधेरे में टिमटिमाते तारों जैसी लग रही थीं।

आरु पीछे की सीट पर सो रही थी। राध्या ने एक बार उसकी तरफ देखा और फिर खिड़की से बाहर देखने लगी।

उसे नहीं पता था कि शिमला उसके लिए क्या लेकर आया है। वह बस इतना जानती थी कि उसे अपनी पुरानी जिंदगी में वापस नहीं जाना है। अब उसे अपनी बेटी के लिए जीना था और उसके लिए एक ऐसी दुनिया बनानी थी, जहाँ उसे किसी के सामने सिर झुकाकर न जीना पड़े।

रात के करीब दस बजे टैक्सी शिमला पहुँच गई। राध्या ने बाहर देखा। ठंडी हवा, पहाड़ों पर बिखरी रोशनियाँ और चारों तरफ पसरा सन्नाटा उसके लिए बिल्कुल नया था। उसने आरु को जगाया नहीं। सफर की थकान से बच्ची गहरी नींद में थी।

टैक्सी एक होटल के सामने जाकर रुकी। राध्या ने अपना सामान लिया, आरु को गोद में उठाया और होटल के कमरे में चली गई। कमरे में पहुँचते ही उसने अपनी बेटी को बिस्तर पर सुलाया। आरु ने नींद में करवट बदली और फिर से गहरी नींद में चली गई।

राध्या कुछ देर उसके पास बैठी रही। फिर उठकर खिड़की के पास चली गई।सामने शिमला की खूबसूरत रात फैली हुई थी। पहाड़ियों पर दूर-दूर तक रोशनियाँ जगमगा रही थीं। ठंडी हवा खिड़की से होकर कमरे में आ रही थी। राध्या ने आँखें बंद कीं और गहरी साँस ली।

शायद यही वह जगह थी जहाँ से वह अपनी जिंदगी को दोबारा शुरू कर सकती थी। उसे नहीं पता था कि यह फैसला सही था या गलत, लेकिन इतना जरूर पता था कि पीछे लौटने का रास्ता अब उसके लिए बंद हो चुका था।

राध्या झा, अट्ठाईस साल की एक बेहद खूबसूरत औरत थी। पाँच फीट चार इंच का कद, गुलाबी आभा लिए रंग, गहरी कत्थई झील जैसी आँखें और काले, घुँघराले बाल, जो उसके कंधों तक आते थे। उसकी खूबसूरती में एक ऐसी कशिश थी कि कोई भी उसे पहली नजर में देखे तो कुछ पल के लिए अपनी नजरें उस पर रोक दे। लेकिन उसकी खूबसूरती से कहीं अधिक प्रभावशाली उसका व्यक्तित्व था। उसने मनोविज्ञान में डॉक्टरेट की थी और लोगों के व्यवहार तथा उनके मन की गहराइयों को समझने की अच्छी समझ रखती थी।

वह दूसरों की आँखों में छिपे दर्द को पहचान सकती थी, उनकी आवाज़ में छिपी बेचैनी को महसूस कर सकती थी और उनके व्यवहार के पीछे छिपे कारणों को समझ सकती थी। लेकिन विडंबना यह थी कि दूसरों के मन को समझने वाली राध्या आज तक अपने ही अतीत को नहीं समझ पाई थी। आखिर ऐसा क्या हुआ था कि उसे अपना घर छोड़ना पड़ा? क्यों अपनों के कहे हुए कुछ शब्द आज भी उसके दिल में जिंदा थे? और वह किस सच से भागकर शिमला आई थी?

इन सवालों के जवाब अभी बाकी थे।राध्या ने एक बार फिर पीछे मुड़कर अपनी सोती हुई बेटी को देखा। उसके चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आ गई। उसने मन ही मन एक वादा किया कि चाहे जिंदगी उसके सामने कितनी भी मुश्किलें क्यों न खड़ी करे, वह अपनी बेटी को कभी अकेला नहीं छोड़ेगी।

उसे क्या पता था कि शिमला में बिताई जाने वाली यह पहली रात उसकी जिंदगी की आखिरी शांत रातों में से एक होने वाली थी। आने वाले दिनों में उसकी जिंदगी में ऐसा तूफान आने वाला था, जो उसके अतीत के उन सारे दरवाजों को फिर से खोल देगा जिन्हें वह हमेशा के लिए बंद समझ चुकी थी।

होटल के कमरे में बैठी राध्या आने वाली जिंदगी के बारे में सोच रही थी। उसके सामने बहुत सारे सवाल थे, लेकिन किसी का जवाब उसके पास नहीं था। शिमला उसके लिए बिल्कुल नया था और अब उसे इसी अनजान शहर में अपनी और आरु की जिंदगी को दोबारा शुरू करना था। वह इन्हीं ख्यालों में खोई हुई थी कि तभी आरु की आवाज ने उसका ध्यान अपनी तरफ खींचा।

"मम्मा, मुझे नींद आ रही है।"

राध्या ने उसकी तरफ देखा। पूरे सफर की थकान उसके चेहरे पर साफ दिखाई दे रही थी। उसने बिना कुछ कहे आरु को अपनी गोद में उठाया और बिस्तर पर लिटा दिया। कंबल ठीक करने के बाद उसके माथे को प्यार से चूमते हुए बोली, "सो जाओ बेटू, सुबह हमें जल्दी उठना है।"

आरु ने नींद में ही अपनी माँ का हाथ पकड़ लिया और आँखें बंद कर लीं। राध्या कुछ देर उसके पास बैठी उसे देखती रही। अपनी बेटी को देखकर उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई। उसके बाद उसने भी कमरे की लाइट बंद की और आरु के पास ही लेट गई। दिनभर की थकान और आने वाले कल की चिंता के बीच न जाने कब उसकी आँख लग गई।

सुबह उसके फोन की मैसेज टोन से राध्या की नींद खुली। उसने आँखें मलते हुए फोन उठाया और स्क्रीन पर आए मैसेज को खोला। मैसेज पढ़ते ही उसकी नींद पूरी तरह गायब हो गई। उसकी आँखों में अचानक उम्मीद की चमक आ गई थी।

शिमला के एक प्रतिष्ठित कॉलेज से उसे प्रोफेसर के पद के लिए इंटरव्यू का बुलावा आया था।

राध्या कुछ पल तक फोन की स्क्रीन देखती रही। उसके चेहरे पर धीरे-धीरे मुस्कान फैल गई। पिछले कुछ समय से उसकी जिंदगी में जैसे हर रास्ता बंद होता जा रहा था, लेकिन आज पहली बार उसे लगा कि शायद उसके लिए एक नया रास्ता खुल रहा है।

मनोविज्ञान में डॉक्टरेट करने के बाद कॉलेज में पढ़ाना उसके लिए हमेशा से एक अच्छा विकल्प रहा था। क्योंकि वह अपनी अतीत की उस दुनिया क़ो फिर से जीना नही चाहती थी। जो कभी उसकी पहचान हुआ करती थी।

उसने खुद क़ो दुनिया से छिपा लिया था और उसकी यह डिग्री उसमें उसकी मदद कर रहीं थी। वह अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती थी और आरु की जिम्मेदारी किसी और के भरोसे नहीं छोड़ना चाहती थी। इस नौकरी की उसे सख्त जरूरत भी थी और वह इसे पाना चाहती भी थी।

उसने समय बर्बाद किए बिना आरु को उठाया।"आरु, उठो बेटू। हमें जल्दी तैयार होना है।"आरु ने उनींदी आँखों से अपनी माँ की तरफ देखा और फिर कंबल अपने चेहरे तक खींच लिया।

"मम्मा, थोड़ी देर और सोने दो ना।"राध्या उसके पास बैठ गई और प्यार से उसके बाल सहलाते हुए बोली, "नहीं बेटू, आज मम्मा का बहुत जरूरी काम है।"

काफी कोशिशों के बाद आरु बिस्तर से उठी। राध्या ने पहले उसे तैयार किया और फिर खुद जल्दी से तैयार हो गई। उसने आरु को नाश्ता करवाया और खुद भी जल्दी से कुछ खा लिया। इसके बाद सबसे बड़ी चिंता आरु को लेकर थी। इंटरव्यू के दौरान वह अपनी बेटी को अकेला नहीं छोड़ सकती थी, इसलिए उसने फोन पर आसपास के डे-केयर सेंटर तलाशने शुरू कर दिए।

काफी देर देखने के बाद उसे एक डे-केयर पसंद आया। उसने वहाँ फोन करके आरु के लिए जगह की जानकारी ली और बात पक्की कर ली।इसके बाद उसने तुरंत एक कैब बुक की।

कुछ ही देर बाद राध्या आरु का हाथ थामे होटल से बाहर निकल आई। कैब में बैठते ही उसने ड्राइवर को पहले डे-केयर का पता बताया और उसके बाद कॉलेज का पता समझा दिया।

आरु खिड़की के पास बैठकर बाहर का नजारा देखने लगी। शिमला की घुमावदार सड़कों और ऊँचे-ऊँचे पेड़ों को देखकर वह बार-बार अपनी माँ से कुछ न कुछ पूछ रही थी। राध्या उसकी बातें सुनते हुए मुस्कुराती रही, लेकिन उसके मन में आज इंटरव्यू को लेकर हल्की-सी घबराहट भी थी।

उसने एक बार फिर अपने फोन में कॉलेज से आया मैसेज देखा और फिर उसे बंद कर दिया।

आज उसे सिर्फ इंटरव्यू नहीं देना था।उसे अपनी जिंदगी की एक नई शुरुआत के लिए पहला कदम उठाना था।

राध्या ने खिड़की से बाहर देखा। सुबह की हल्की धूप पहाड़ों पर फैल चुकी थी। अनजान शहर की उन सड़कों पर उसकी कैब आगे बढ़ती जा रही थी और उसके साथ उसकी जिंदगी भी एक नए मोड़ की तरफ बढ़ रही थी।

कैब में बैठी राध्या खिड़की के बाहर देखते हुए मन ही मन आने वाले दिनों के बारे में सोच रही थी। उसके मन में बस एक ही उम्मीद थी कि किसी तरह उसे यह नौकरी मिल जाए। नौकरी मिलते ही सबसे पहले वह अपने और आरु के लिए एक छोटा-सा घर ढूँढ़ेगी। फिर आरु का स्कूल देखेगी और धीरे-धीरे अपनी ज़िंदगी को एक सही दिशा देने की कोशिश करेगी।

पिछले कुछ समय में उसकी ज़िंदगी जिस तरह बिखरी थी, उसे समेटने में वक्त तो लगना ही था। लेकिन कम से कम अब उसके पास आगे बढ़ने की एक वजह थी।इन्हीं विचारों में खोई राध्या को पता ही नहीं चला कि कैब कब चाइल्ड केयर सेंटर के सामने आकर रुक गई।

“मैडम, चाइल्ड केयर आ गया।”ड्राइवर की आवाज़ सुनकर राध्या अपने ख्यालों से बाहर आई। उसने बाहर देखा और फिर आरु का हाथ थामकर कैब से उतर गई।

आरु का हाथ पकड़े वह अंदर पहुँची। जगह छोटी थी, लेकिन साफ-सुथरी और बच्चों के लिए काफी अच्छी लग रही थी। आसपास कुछ बच्चे खेल रहे थे और उनकी खिलखिलाहट से माहौल में एक अलग ही गर्माहट थी।

रिसेप्शन के पास पहुँचते ही उसकी मुलाकात एक महिला से हुई।“आप आरु की मम्मा हैं?”

“जी।”महिला ने मुस्कुराते हुए अपना परिचय दिया, “मैं स्वाति हूँ। यहाँ बच्चों की देखभाल करती हूँ।”

स्वाति के चेहरे पर एक सहज मुस्कान थी। उसकी बात करने का तरीका इतना अपनापन भरा था कि राध्या को पहली मुलाकात में ही उसके प्रति एक अजीब-सा भरोसा महसूस हुआ। शायद इसलिए भी कि पिछले कुछ समय से वह जिस तरह के व्यवहार की आदी हो चुकी थी, उसके बीच स्वाति की गर्मजोशी उसे कुछ अलग लगी।

स्वाति ने आरु की तरफ देखा और प्यार से पूछा, “तुम आरु हो?”आरु ने थोड़ी झिझक के साथ सिर हिला दिया।“बहुत प्यारा नाम है।”आरु के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आ गई।

स्वाति ने फिर राध्या की तरफ देखते हुए कहा, “आप बिल्कुल चिंता मत कीजिए। आप आराम से अपना काम कीजिए। आरु यहाँ बिल्कुल ठीक रहेगी।”

राध्या ने स्वाति को देखा। उसके चेहरे पर भरोसा दिलाने वाली ऐसी सहजता थी कि राध्या के मन का तनाव थोड़ा कम हो गया।

“थैंक यू,” उसने मुस्कुराकर कहा, “मैं पहली बार इसे किसी चाइल्ड केयर में छोड़ रही हूँ, इसलिए थोड़ी चिंता हो रही थी।”आप बिल्कुल चिंता मत कीजिए। बच्चों का ध्यान रखना मेरा काम है।”

राध्या ने सिर हिलाया और फिर आरु की तरफ मुड़ी।“बेटू, अच्छे से रहना और कोई बदमाशी मत करना। मम्मा जल्दी वापस आ जाएगी, ठीक है?”

आरु ने अपनी माँ की तरफ देखते हुए बड़ी गंभीरता से सिर हिलाया।ओके मम्मा। आप परेशान मत होना। मैं गुड गर्ल की तरह रहूँगी और आंटी को परेशान भी नहीं करूँगी।”

उसकी बात सुनकर स्वाति हँस पड़ी और राध्या के चेहरे पर भी मुस्कान आ गई।“बस, मेरी गुड़िया ऐसी ही रहना।”

राध्या ने झुककर आरु के माथे को चूमा। एक पल के लिए उसका हाथ बेटी के सिर पर ठहर गया। फिर उसने खुद को संभाला और सीधी हो गई।

आरु उसे जाते हुए देखती रही।राध्या ने एक बार पीछे मुड़कर अपनी बेटी को देखा। आरु वहीं खड़ी उसे हाथ हिला रही थी।राध्या ने भी मुस्कुराकर हाथ हिलाया और फिर बाहर निकल गई।

दिल में अब भी थोड़ी चिंता थी, लेकिन उसके साथ एक उम्मीद भी थी।उसे क्या पता था कि आज की यह छोटी-सी मुलाकात आगे चलकर उसकी ज़िंदगी का एक अहम हिस्सा बनने वाली है।

राध्या जाने के लिए मुड़ी ही थी कि पीछे से आरु की आवाज़ आई।"मम्मा..."राध्या ने पलटकर देखा।

आरु उसके पास आकर खड़ी हो गई और अपनी नन्ही-सी बाँहें उसकी कमर के चारों ओर लपेटते हुए बोली, "आप अपना इंटरव्यू अच्छे से देना। ऑल द बेस्ट, मम्मा... आई लव यू, माय ब्यूटीफुल मम्मा।"

आरु की बात सुनकर राध्या का दिल भर आया। उसने झुककर अपनी बेटी को बाँहों में भर लिया और उसके गाल पर प्यार से किस करते हुए कहा, "आई लव यू टू, माय लिटिल प्रिंसेस।"

आरु खिलखिलाकर मुस्कुरा दी।राध्या ने एक बार फिर उसकी ओर देखा और फिर स्वाति की तरफ मुड़कर बोली, "थैंक यू सो मच, स्वाति जी।"

"आप बिल्कुल चिंता मत कीजिए। आप आराम से अपना इंटरव्यू दीजिए," स्वाति ने मुस्कुराकर कहा।

"जी।"राध्या ने आरु की तरफ हाथ हिलाया।"बाय बेटू। मम्मा जल्दी आएगी।"

"बाय मम्मा। ऑल द बेस्ट!"

राध्या भी मुस्कुराते हुए हाथ हिलाकर बाहर निकल गई। उसे अब जल्दी करनी थी। कॉलेज पहुँचने का समय ग्यारह बजकर तीस मिनट था और घड़ी में साढ़े दस बज चुके थे। अगर वह रास्ते में ट्रैफिक में फँस गई, तो देर हो सकती थी।

चाइल्ड केयर सेंटर से बाहर निकलते ही उसने जल्दी से अपनी कैब बुक की और कॉलेज का पता ड्राइवर को बताया।उधर आरु दरवाज़े के पास खड़ी तब तक अपनी माँ को देखती रही, जब तक वह उसकी आँखों से ओझल नहीं हो गई।

पाँच साल की छोटी-सी उम्र में आरु अपनी उम्र से कहीं ज्यादा समझदार थी। उसका दिमाग काफी तेज था और अपनी माँ के साथ उसका रिश्ता भी बाकी बच्चों से थोड़ा अलग था। वह राध्या के चेहरे को देखकर ही समझ जाती थी कि उसकी माँ कब खुश है और कब उसके मन में कोई परेशानी चल रही है।

राध्या अक्सर अपनी परेशानियाँ उससे छिपाने की कोशिश करती थी, लेकिन आरु की मासूम आँखें उसकी खामोशी को पढ़ लेती थीं।वह जानती थी कि उसकी मम्मा कई बातों को लेकर परेशान रहती है।

इसीलिए आरु अपनी छोटी-सी समझ के हिसाब से हमेशा राध्या का साथ देने की कोशिश करती थी। वह जानबूझकर अपनी माँ को परेशान नहीं करती, उसकी बात मानती और जब भी राध्या उदास होती, अपनी छोटी-छोटी बातों से उसे हँसाने की कोशिश करती।

शायद उसे अपनी माँ की सारी परेशानियाँ समझ नहीं आती थीं...लेकिन इतना जरूर समझ आती थी कि उसकी मम्मा को उसकी जरूरत है और इसी वजह से वह अपनी उम्र से पहले ही थोड़ी बड़ी हो गई थी।

राध्या के लिए भी आरु सिर्फ उसकी बेटी नहीं थी। वह उसकी सबसे बड़ी ताकत थी।कैब आकर उसके सामने रुकी तो राध्या ने दरवाज़ा खोला और बैठ गई।उसने एक बार फिर फोन में कॉलेज का पता देखा और ड्राइवर को पता बताया।

“भैया, जल्दी चलिएगा। मुझे साढ़े ग्यारह बजे तक कॉलेज पहुँचना है।”“जी मैडम।”

कैब आगे बढ़ गई।राध्या ने सीट से सिर टिकाया और गहरी साँस ली।अब उसे सिर्फ अपने इंटरव्यू पर ध्यान देना था, क्योंकि उसे यह नौकरी किसी भी हालत में चाहिए थी।

इधर राध्या की कैब कॉलेज की तरफ बढ़ रही थी और वह बार-बार अपनी कलाई पर बंधी घड़ी देख रही थी। समय तेजी से निकलता जा रहा था। उसे साढ़े ग्यारह बजे तक कॉलेज पहुँचना था, लेकिन ट्रैफिक की वजह से गाड़ी उम्मीद से कहीं धीमी चल रही थी।

राध्या ने बेचैनी से एक बार फिर घड़ी देखी और ड्राइवर से बोली, "भाई, प्लीज थोड़ा जल्दी पहुँचा दीजिए। यूनिवर्सिटी में देर हो रही है।"

ड्राइवर ने सामने सड़क पर नजर रखते हुए कहा, "हाँ मैडम, पूरी कोशिश कर रहा हूँ। लेकिन ऑफिस टाइम है, इसलिए सड़क पर काफी जाम है। फिर भी जितना जल्दी हो सकेगा, पहुँचा दूँगा।"

"ठीक है," राध्या ने कहा, लेकिन उसकी आवाज में चिंता साफ सुनाई दे रही थी।

वह बार-बार फोन की स्क्रीन देखती, फिर घड़ी देखती और बेचैनी से सामने सड़क की तरफ देखने लगती। इंटरव्यू उसके लिए बहुत जरूरी था। वह किसी भी हालत में देर नहीं करना चाहती थी।

"थोड़ा जल्दी कीजिए ना भाई..."कुछ सेकंड बाद उसने फिर कहा।ड्राइवर ने हल्की झुंझलाहट के बावजूद खुद को शांत रखते हुए कहा, "मैडम, कोशिश कर रहा हूँ। आप परेशान मत होइए।"

राध्या ने कुछ नहीं कहा।उसने गहरी साँस ली और सीट पर पीछे टिक गई। लेकिन उसके चेहरे पर चिंता अब भी साफ दिखाई दे रही थी।

सड़क पर गाड़ियों की लंबी कतार थी। ड्राइवर लगातार हॉर्न से बचते हुए अपनी कार को आगे निकालने की कोशिश कर रहा था। तभी राध्या की आवाज फिर सुनाई दी,"भाई, प्लीज थोड़ा"

उसका वाक्य पूरा भी नहीं हुआ था कि ड्राइवर ने सामने से आती एक गाड़ी को बचाने के लिए अचानक ब्रेक लगाया।उसी पल दूसरी तरफ से एक तेज रफ्तार BMW आकर उनकी कैब से टकरा गई।

धड़ाम!टक्कर इतनी अचानक हुई कि राध्या का शरीर जोर से आगे की तरफ झटका खा गया। उसके हाथ से फोन छूटकर नीचे गिर पड़ा।

कुछ पल के लिए उसे समझ ही नहीं आया कि हुआ क्या है।सड़क पर गाड़ियों के हॉर्न बजने लगे।कैब के भीतर सन्नाटा छा गया।राध्या ने घबराकर सामने देखा।

उसकी नजर कुछ दूरी पर खड़ी उस काली BMW पर जाकर ठहर गई, जिसके अगले हिस्से को टक्कर से नुकसान पहुँचा था।उसका दिल तेजी से धड़कने लगा।आज का दिन पहले ही उसकी जिंदगी के लिए बहुत महत्वपूर्ण था।

लेकिन उसे क्या पता था कि कॉलेज पहुँचने से पहले ही उसकी जिंदगी में एक ऐसा मोड़ आने वाला है, जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी।

गाड़ियों की टक्कर होते ही BMW का ड्राइवर एक पल के लिए घबरा गया। उसने तुरंत पीछे मुड़कर देखा। पिछली सीट पर बैठा व्यक्ति बाहर की ओर देख रहा था। ड्राइवर ने हिचकिचाते हुए कहा, "सॉरी सर... वो कैब वाले ने हमारी गाड़ी में टक्कर मार दी।"

पीछे बैठे व्यक्ति के चेहरे पर नाराज़गी साफ उभर आई। उसने अपनी कलाई पर बंधी घड़ी पर नजर डाली और ठंडे लेकिन सख्त लहजे में कहा, "जाकर देखो, क्या हुआ है। मुझे पहले ही देर हो रही है।"

"जी, सर।"ड्राइवर तुरंत गाड़ी से नीचे उतरा और कैब की ओर बढ़ गया। गाड़ी के पास पहुँचते ही उसका गुस्सा फूट पड़ा।

"देखकर गाड़ी नहीं चला सकते क्या? इतनी जोर से टक्कर मार दी!"कैब ड्राइवर भी चुप रहने वालों में से नहीं था। वह अपनी सीट से उतरकर उसके सामने आ खड़ा हुआ।आप मुझे मत सिखाइए कि गाड़ी कैसे चलानी है। आपने भी अचानक गाड़ी आगे बढ़ाई थी।

"अचानक? पीछे से आकर टक्कर तुमने मारी है!"

"सारी गलती मेरी नहीं है!"

दोनों के बीच बहस बढ़ने लगी। कुछ ही पलों में उनकी आवाजें इतनी तेज हो गईं कि आसपास के लोगों का ध्यान भी उनकी तरफ जाने लगा।राध्या अब तक कैब के अंदर बैठी घड़ी देख रही थी। उसकी बेचैनी लगातार बढ़ती जा रही थी। इंटरव्यू का समय सिर पर था और इस हादसे ने उसे पहले ही काफी पीछे कर दिया था।

आखिरकार वह खुद को रोक नहीं पाई और कैब से बाहर उतर आई।"भैया, प्लीज... आप लोग बाद में बात कर लेना। मुझे बहुत जरूरी जगह पहुँचना है।"दोनों ड्राइवरों ने उसकी ओर देखा, लेकिन बहस अभी खत्म होने वाली नहीं थी।राध्या ने अपने कैब ड्राइवर की ओर देखा और विनम्रता से बोली, "अगर हमारी तरफ से गलती हुई है तो आप सॉरी बोल दीजिए। मुझे सच में बहुत देर हो रही है।"

कैब ड्राइवर तुरंत भड़क उठा।"मैडम, हमारी कोई गलती नहीं है। मैं क्यों सॉरी बोलूँ?""लेकिन भैया..." राध्या ने घड़ी की ओर देखते हुए कहा, "आप प्लीज समझने की कोशिश कीजिए। मुझे इंटरव्यू के लिए पहुँचना है।"

"मैडम, आप चिंता मत कीजिए। पहले मैं इसे बताता हूँ कि गाड़ी कैसे चलाते हैं।"

राध्या ने असहाय होकर आँखें बंद कर लीं।उसे समझ नहीं आ रहा था कि इस वक्त वह क्या करे। एक तरफ इंटरव्यू का समय लगातार निकलता जा रहा था और दूसरी तरफ ये दोनों सड़क के बीच खड़े होकर अपनी-अपनी गलती सही साबित करने में लगे थे।

उसने बेचैनी में अपनी घड़ी देखी।समय निकल चुका था।उसने गहरी साँस ली और खुद को शांत करने की कोशिश की, लेकिन उसके चेहरे पर चिंता अब साफ दिखाई दे रही थी।

"बस भी कीजिए..." आखिरकार वह झुंझलाकर बोली, "आप दोनों की बहस खत्म होने तक मेरा इंटरव्यू खत्म हो जाएगा।"

लेकिन तभी BMW का पिछला दरवाजा खुला।राध्या की नजर अनायास उस ओर उठ गई और अगले ही पल उसकी आँखें उस शख्स पर ठहर गईं, जो गाड़ी से बाहर निकल रहा था।

Continue......

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