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17.His Dark Obssession

अभिमन्यु के कमरे में आने का आरोही को जरा भी एहसास नहीं हुआ। वह अब भी खिड़की के पास खड़ी आसमान को देख रही थी। बाहर बादलों ने चाँद को पूरी तरह ढक रखा था और आरोही जाने कब से उसी खामोश आसमान में अपनी उलझनों का जवाब ढूँढ रही थी।

अभिमन्यु ने बिना उसे परेशान किए टेबल पर खाने की प्लेट रखी और कुछ पल उसे देखता रहा। फिर उसके पीछे जाकर शांत आवाज़ में बोला, "तुम इतना परेशान मत हो। तुम्हारी दोस्त ठीक हो जाएगी।"

अचानक पीछे से आई आवाज़ सुनकर आरोही चौंक गई। वह तेजी से पलटी, लेकिन सामने अभिमन्यु को इतनी करीब खड़ा देखकर संभल नहीं पाई और सीधे उसके सीने से टकरा गई।

दोनों कुछ पल के लिए एक-दूसरे को देखते रहे।

आरोही तुरंत एक कदम पीछे हुई और अपनी भौंहें सिकोड़ते हुए बोली, "आप... और यहाँ?"

अभिमन्यु ने बिल्कुल सहज अंदाज़ में कहा, "हाँ... कोई प्रॉब्लम है?"

आरोही ने उसे घूरते हुए कहा, "इतनी रात को किसी लड़की के कमरे में चुपके से आना आपको प्रॉब्लम नहीं लगता?"

अभिमन्यु ने टेबल पर रखी प्लेट की तरफ इशारा किया। "चुपके से नहीं आया था। तुम ही इतनी खोई हुई थी कि तुम्हें पता नहीं चला। तुम्हारे लिए खाना लेकर आया हूँ।"

आरोही कुछ कहती, उससे पहले अभिमन्यु ने आगे कहा, "राम ने सुबह से कुछ नहीं खाया है। जब तक वो मिस ठाकुर को अपनी आँखों से ठीक नहीं देख लेता, तब तक वो खाना नहीं खाएगा। और उसे कोई जबरदस्ती खिलाने की कोशिश करे, तो वो किसी की सुनेगा भी नहीं।"

फिर उसने आरोही की तरफ देखते हुए कहा, "और तुम भी सुबह से भूखी हो। इसलिए सोचा, कम से कम तुम तो खाना खा लो।"आरोही ने कुछ पल उसे देखा। फिर अपनी भौंहें ऊपर उठाईं और थोड़ी हैरानी से पूछा, "क्यों?"

अभिमन्यु ने उसकी तरफ देखा। "क्या?"आरोही ने अपनी बाँहें सीने पर बाँध लीं और सीधे उसकी आँखों में देखते हुए बोली, "मैं कौन हूँ आपकी?"

अभिमन्यु कुछ पल चुप रहा। फिर उसके होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आ गई। "ये सवाल खाना खाने के बाद भी पूछा जा सकता है, मिस त्रिवेदी। पहले बैठिए... खाना ठंडा हो रहा है।"

अभिमन्यु ने जैसे ही आरोही का चेहरा देखा, वह समझ गया कि उसके दिमाग में अब कोई न कोई उल्टी-सीधी खुराफात जरूर चल रही है। उसने मन ही मन सोचा, ये उलटी खोपड़ी की लड़की अब जरूर कुछ उल्टा सोचेगी।

अगले ही पल उसके होंठों पर शरारती-सी मुस्कान आ गई। वह थोड़ा उसकी तरफ झुका और धीमी आवाज़ में बोला, “वो इसलिए... क्योंकि सुबह में जो तुमने किया था, याद है ना?”

अभिमन्यु की बात सुनते ही आरोही को सुबह की घटना याद आ गई। उसके चेहरे के भाव तुरंत बदल गए। उसने अनायास ही अपने कदम पीछे खींचे और थोड़ी हड़बड़ाई आवाज़ में बोली, “तो... तो आपको भी याद है ना कि आपने क्या किया था?”

अभिमन्यु ने मुस्कुराते हुए कहा, “अच्छी तरह से। इसलिए तो आया हूँ हिसाब पूरा करने।”

आरोही ने उसे उलझन से देखा। “क्या... क्या मतलब आपका?”

अभिमन्यु उसके और करीब झुकते हुए बोला, “मेरा मतलब ये है कि कोई तो बहाना होना चाहिए, जिसको कारण बनाकर मैं तुमसे उस गलती का बदला ले सकूँ... जैसे तुमने लिया था मुझसे।”

आरोही की आँखें फैल गईं।अभिमन्यु ने टेबल पर रखी प्लेट की तरफ इशारा किया और मुस्कुराते हुए कहा, “मुझे मालूम था कि तुम मेरे हाथों से लाया खाना नहीं खाओगी। और बस... मुझे कारण मिल जाएगा।”

वह जानबूझकर उसकी तरफ थोड़ा और झुका..“और...”अभिमन्यु की बात पूरी होने से पहले ही आरोही ने तुरंत अपने दोनों हाथों से उसे हल्का-सा पीछे धकेल दिया।

“बस!”वह झट से टेबल की तरफ गई, वहाँ रखी प्लेट उठाई और बिना उसकी तरफ देखे खाना खाने लगी।अभिमन्यु कुछ पल उसे देखता रहा।फिर उसके चेहरे पर वही शरारती मुस्कान लौट आई।

“देखा... आखिर खाना तो तुम्हें खाना ही था।”आरोही ने निवाला लेते हुए उसे घूरकर देखा, लेकिन इस बार उसके चेहरे पर नाराजगी से ज्यादा झेंप थी।

अभिमन्यु चुपचाप वहीं खड़ा रहा और मन ही मन मुस्कुरा दिया। उसे पता था। इस लड़की को परेशान करना शायद उसके लिए आने वाले दिनों का सबसे मनोरंजक काम बनने वाला था।

अभिमन्यु के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आ गई, लेकिन उसने तुरंत अपने होंठों को सीधा कर लिया, जैसे आरोही को अपनी खुशी की भनक तक नहीं लगने देना चाहता हो। वह कुछ पल वहीं खड़ा उसे देखता रहा। आरोही बेखबर होकर खाना खा रही थी, लेकिन बीच-बीच में उसकी नजर भी अभिमन्यु पर चली जाती थी।

कुछ देर बाद उसे फिर महसूस हुआ कि अभिमन्यु लगातार उसे ही देख रहा है। उसने मुँह में खाना लिए हुए ही भौंहें सिकोड़कर पूछा, "ऐसे क्या घूर रहे हो मुझे? अफसोस हो रहा है क्या कि अब मुझे परेशान करने का कोई कारण नहीं मिला?"

अभिमन्यु ने कोई जवाब नहीं दिया, बस उसे देखता रहा।आरोही ने प्लेट की तरफ इशारा करते हुए कहा, "देखो, मैं खाना खा रही हूँ। अब तो तुम्हारा बहाना भी खत्म हो गया ना? इसलिए जाओ यहाँ से... और मुझे शांति से खाना खाने दो।"

अभिमन्यु ने धीरे से सिर हिलाया और मुस्कुराहट दबाते हुए दरवाज़े की तरफ बढ़ गया। वह अभी दो कदम ही आगे बढ़ा था कि पीछे से आरोही की आवाज़ आई, "और हाँ..."अभिमन्यु रुक गया, लेकिन पीछे मुड़कर नहीं देखा।

आरोही ने थोड़ा सख्त होकर कहा, "अब मुझसे दूर रहना। समझे?"अभिमन्यु के होंठों पर फिर वही शरारती मुस्कान आ गई। वह धीरे से पीछे मुड़ा और कुछ पल तक उसे देखता रहा। आरोही को उसकी खामोशी देखकर लगा कि शायद इस बार उसने बात समझ ली है।

लेकिन अगले ही पल अभिमन्यु वापस उसकी तरफ आया। आरोही कुछ समझ पाती, उससे पहले उसने झुककर उसके गाल क़ो जोर से चूम कर दाँत काट लिया।

आरोही की आँखें हैरानी से फैल गईं। उसके हाथ में पकड़ा हुआ चम्मच हवा में ही रुक गया।

अभिमन्यु दरवाज़े की तरफ बढ़ते हुए बिल्कुल बेफिक्र अंदाज़ में बोला, "बिल्कुल नहीं समझा।"

"अभिमन्यु!" आरोही ने उसे घूरते हुए कहा, लेकिन तब तक वह दरवाज़े तक पहुँच चुका था।

वह पीछे मुड़ा और मुस्कुराते हुए बोला, "गुड नाइट। और हाँ, दरवाज़ा बंद कर लेना। नहीं तो मेरा मूड बन गया तो मैं फिर आ जाऊँगा।"

आरोही कुछ सेकंड तक उसे अविश्वास से देखती रही। फिर झुंझलाकर बोली, "तुम्हारी इतनी हिम्मत जो मुझे काटा ! पागल इंसान !"अभिमन्यु ने बाहर निकलते हुए बस हाथ हिलाया। "ये बात तो तुम सुबह से साबित कर चुकी हो कि तुम्हारी नजर में मैं क्या हूँ।"

इतना कहकर उसने दरवाज़ा बाहर से छोड़ दिया।आरोही कुछ पल वहीं खड़ी उसे देखती रही, फिर उसे उसकी आखिरी बात याद आई और उसने तुरंत दरवाज़ा बंद कर दिया। दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ गलियारे में गूँज गई।

बाहर खड़ा अभिमन्यु उस आवाज़ को सुनकर मुस्कुरा दिया। उसने एक पल बंद दरवाज़े की तरफ देखा और फिर धीमे से अपना सिर हिलाया।

"कहाँ फँस रहे हो, अभिमन्यु राठौर?" उसने खुद से कहा।फिर उसकी मुस्कान थोड़ी और गहरी हो गई। "एक ऐसी लड़की के साथ... जो तुम्हें चैन से साँस भी नहीं लेने देगी।"

वह खुद ही अपनी बात पर हल्का-सा हँसा और अपने कमरे की तरफ बढ़ गया। लेकिन कमरे तक पहुँचने के बाद भी उसके चेहरे से वह मुस्कान पूरी तरह गायब नहीं हुई थी।

राम अपने कमरे में बिस्तर पर लेटा हुआ था। अनुराधा अब भी उसकी बाहों में थी और उसका सिर राम के सीने से लगा हुआ था। राम की एक बाँह उसे संभाले हुए थी, जबकि दूसरी हाथ उसके बालों पर धीरे-धीरे चल रहा था।

पूरे दिन की घटनाओं ने दोनों को इस कदर थका दिया था कि अनुराधा को संभालते-संभालते ना जाने कब राम की भी आँख लग गई थी।

आधी रात के करीब अनुराधा की पलकों में हल्की-सी हरकत हुई। धीरे-धीरे उसकी आँखें खुलीं। कमरे में बहुत हल्की रोशनी थी और कुछ पल तक उसे समझ ही नहीं आया कि वह कहाँ है। उसने आसपास देखने की कोशिश की, लेकिन तभी उसे महसूस हुआ कि वह किसी की मजबूत बाहों में सुरक्षित लेटी हुई है।

उसका शरीर एक पल के लिए सिहर उठा और उसकी आँखें थोड़ी बड़ी हो गईं। लेकिन अजीब बात यह थी कि इस स्पर्श में उसे डर या अजनबीपन महसूस नहीं हुआ। इसके बजाय उसके भीतर एक अनजाना-सा सुकून था। जैसे उसकी नींद में भी उसका मन पहचान चुका हो कि वह सुरक्षित है।

अनुराधा ने बिना कोई आवाज़ किए धीरे से अपना चेहरा ऊपर उठाया।तभी उसकी नजर राम के चेहरे पर पड़ी।राम गहरी नींद में था। दिनभर के तनाव और गुस्से के बावजूद सोते समय उसके चेहरे पर एक अलग ही शांति थी। माथे पर कुछ बाल बिखरे हुए थे और चेहरे की तीखी बनावट नींद में कुछ नरम-सी लग रही थी।

अनुराधा कुछ पल तक बस उसे देखती रही।उस वक्त उसके दिमाग में ना बीती हुई रात थी, ना वो डर, ना ही अस्पताल और डॉक्टर की बातें। जैसे कुछ क्षणों के लिए उसके आसपास की सारी दुनिया रुक गई हो। उसकी नजरें राम के चेहरे से हट ही नहीं रही थीं।

उसके भीतर एक अजीब-सी जिज्ञासा उठी।धीरे-धीरे उसका हाथ ऊपर उठा। शायद वह खुद भी नहीं जानती थी कि वह क्या करने जा रही है। उसकी उंगलियाँ राम के चेहरे की तरफ बढ़ने लगीं।

लेकिन उसका हाथ राम के चेहरे तक पहुँचता, उससे पहले ही राम की आँखें खुल गईं।नींद से जागते ही उसकी नजर सबसे पहले अनुराधा के हाथ पर गई। उसने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया और दूसरे हाथ से बेडसाइड लैंप की रोशनी जला दी।

कमरे में रोशनी फैलते ही दोनों की नजरें एक-दूसरे से मिलीं।अनुराधा कुछ पल के लिए बिल्कुल स्थिर रह गई। उसका हाथ अब भी राम की पकड़ में था और उसके चेहरे पर अचानक घबराहट उतर आई।

राम की नजरें लगातार अनुराधा पर टिकी हुई थीं। अनुराधा को ऐसा महसूस हो रहा था, जैसे उसकी चोरी पकड़ी गई हो। वह घबराकर अपनी नजरें झुका लेती है और हकलाते हुए कहती है, "वो... वो... मैं..."

लेकिन इससे पहले कि वह अपनी बात पूरी कर पाती, राम की गंभीर आवाज उसके कानों में पड़ती है।"मिस ठाकुर... क्या आप ठीक हैं?"

राम के मुँह से खुद के लिए "मिस ठाकुर" सुनते ही अनुराधा के दिल में एक अजीब-सी टीस उठी। उसे याद था कि कुछ देर पहले तक, उसकी बेहोशी की हालत में भी राम उसे "अनु" कहकर पुकार रहा था। उसके मुँह से अचानक इतनी फॉर्मल आवाज सुनकर जैसे वह खुद भी अपनी सोच से बाहर आ गयी।

अनुराधा ने पल भर के लिए अपनी आँखें बंद कर लीं।उसे खुद पर ही अफसोस होने लगा कि कुछ क्षण पहले वह क्या सोचने लगी थी। राम रघुवंशी जैसा इंसान और वह... दोनों के बीच जमीन-आसमान का फर्क था। जिस ख्याल को उसने अभी अपने मन में जगह दी थी, वह उसकी जिंदगी में हकीकत बनना तो दूर, शायद उसके ख्वाबों में भी आने का हक नहीं रखता था।

वह खुद को समझाते हुए चुप रही।अनुराधा को इस तरह खामोश देखकर राम ने फिर पूछा, "मिस ठाकुर... क्या आप ठीक हैं?"इस बार अनुराधा ने धीरे से उसकी तरफ देखा और बस इतना कहा, "हम्म... मैं ठीक हूँ।"उसकी आवाज में पहले जैसी मजबूती नहीं थी।

वह धीरे से बिस्तर से उठने लगी। शायद उसे लगा कि जितनी जल्दी हो सके, उसे यहाँ से चले जाना चाहिए। वह राम के पास से निकलने के लिए एक कदम आगे बढ़ी ही थी कि राम ने उसकी बाजू पकड़ ली।अनुराधा अचानक रुक गई।

उसने हैरानी से अपनी बाजु पर राम की पकड़ को देखा और फिर धीरे-धीरे उसकी तरफ नजर उठाई।"ये... आप?"राम ने उसकी आँखों में देखते हुए पूछा, "तुम कहाँ जा रही हो?"

अनुराधा कुछ कह नहीं पाई।राम की आवाज पहले से थोड़ी नरम थी।

"अभी तुम्हारी तबीयत पूरी तरह ठीक नहीं हुई है। इतनी जल्दी उठकर कहाँ जाओगी?"

राम की बात सुनते ही अनुराधा की आँखों में अचानक नमी उतर आई। उसने तुरंत अपना चेहरा दूसरी तरफ कर लिया, ताकि राम उसकी आँखों में आए आँसू न देख सके।

लेकिन राम की नजरों से वह नमी छिप नहीं सकी।उसने साफ देखा था कि अनुराधा की आँखें भर आई थीं।फिर भी राम ने उससे यह नहीं पूछा कि वह रो क्यों रही है।उसने बस अपनी पकड़ थोड़ी ढीली कर दी और शांत स्वर में कहा,"बैठो। अभी तुम्हें आराम की जरूरत है।"

अनुराधा कुछ पल उसे देखती रही। उसके मन में जाने कितने सवाल थे, लेकिन उनमें से एक भी उसके होंठों तक नहीं आया।आखिरकार वह चुपचाप वापस बिस्तर पर बैठ गई।

राम सामने खड़ा उसे देखता रहा। उसे समझ नहीं आ रहा था कि कुछ देर पहले तक उसकी बाँहों में सुकून से सो रही यह लड़की अचानक इतनी खामोश और उदास क्यों हो गई थी।

अनुराधा ने अपनी आँखों में आए आँसुओं को छिपाते हुए होंठों पर हल्की-सी मुस्कान लाई और बोली, “मुझे क्या हुआ था? मैं तो बिल्कुल ठीक हूँ। बल्कि मैं तो आपसे पूछना चाहती हूँ कि मैं यहाँ कैसे आई?”

राम उसकी तरफ ही देख रहा था, लेकिन उसके सवाल का कोई जवाब नहीं दिया। उसकी खामोश निगाहें जैसे अनुराधा के चेहरे पर ही टिकी हुई थीं।

राम को लगातार अपनी तरफ देखते देखकर अनुराधा थोड़ी चिढ़ गई। उसने अपनी बाज़ू छुड़ाने की कोशिश करते हुए कहा, “अगर नजर लगाना हो गया हो तो मेरा हाथ छोड़ेंगे?”

राम ने बिना किसी भाव के कहा, “नहीं।”अनुराधा ने हैरानी से उसे देखा।राम ने उसकी तरफ देखते हुए कहा, “लेकिन तुम बैठो। मैं तुम्हारे लिए कुछ खाने को लाता हूँ।”

अनुराधा ने तुरंत उसे रोकते हुए कहा, “रुकिए, सर। इतनी रात को कौन खाना खाता है? मैं कल सुबह खा लूँगी।”राम ने उसकी बात अनसुनी करते हुए बस इतना कहा, “तुम बैठो।”

अनुराधा उसे देखती रह गई।

उसे समझ नहीं आ रहा था कि यह वही राम रघुवंशी है, जो दिनभर अपने आसपास किसी को ज़्यादा बोलने तक नहीं देता, या फिर उसके सामने खड़ा यह कोई दूसरा इंसान है।

वह आखिरकार वापस बिस्तर पर बैठ गई और मन ही मन बुदबुदाई, “इतने गुस्सैल इंसान को मेरी इतनी चिंता क्यों हो रही है?”

Continue.......

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