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16.His Dark Obssession

राम ने अपने भीतर उठ रहे तूफ़ान को किसी तरह दबाया। अनुराधा की हालत देखकर उसका दिल बेचैन था, लेकिन वह जानता था कि इस समय अगर उसने अपना गुस्सा या घबराहट उसके सामने आने दी, तो उसकी हालत और बिगड़ सकती है।

उसने बहुत शांत आवाज़ में कहा, “मिस ठाकुर... शांत हो जाओ। देखो, यहाँ कोई नहीं है। तुम सुरक्षित हो। शांत हो जाओ।”अनुराधा जैसे उसकी आवाज़ सुन ही नहीं रही थी। उसकी साँसें अब भी तेज़ थीं और आँखें डर से बंद थीं।

राम ने एक पल उसकी हालत देखी और फिर सावधानी से उसे अपनी गोद में उठा लिया।

अचानक खुद को ज़मीन से ऊपर महसूस करते ही अनुराधा बुरी तरह घबरा गई। वह हाथ-पैर पटकने लगी और घबराई हुई आवाज़ में कुछ कहने की कोशिश करने लगी।

“नहीं... छोड़ो... मुझे जाने दो...”

राम ने उसे और कसकर पकड़ने के बजाय बस इतना किया कि उसे अपने सीने से सुरक्षित ढंग से लगा लिया। उसकी आवाज़ लगातार शांत बनी रही।

“शांत... बस शांत। मैं हूँ।”

कुछ क्षण तक अनुराधा की बेचैनी जारी रही। फिर जैसे ही उसका चेहरा राम के सीने से लगा, उसकी हरकतें धीरे-धीरे कम होने लगीं।राम ने महसूस किया कि उसकी साँसें पहले से कुछ सामान्य हो रही थीं।

उसने उसके सिर पर हाथ रखते हुए बहुत धीमे से कहा, “कुछ नहीं होगा, अनु... मैं हूँ।”

अनुराधा ने कोई जवाब नहीं दिया। वह बस उसकी बाँहों में सिमटी रही।

राम उसे लेकर कमरे से बाहर निकला। दरवाज़े के पास खड़े नौकरों की तरफ देखकर उसने आदेश दिया, “मिस ठाकुर का कमरा पूरी तरह साफ़ करवाओ। टूटे हुए काँच का एक टुकड़ा भी वहाँ नहीं रहना चाहिए। और ध्यान रखना, जब तक मैं न कहूँ, कोई उनके कमरे में नहीं जाएगा।”

“जी, साहब।”

राम अनुराधा को लेकर अपने कमरे में चला गया।उसने उसे बहुत सावधानी से बिस्तर पर लिटाया। तकिया ठीक किया और उसके चेहरे से बिखरे बालों को हटाया।तभी उसे कुछ अजीब महसूस हुआ, “अनु?”उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी ।

राम ने उसके चेहरे को गौर से देखा। उसकी आँखें बंद थीं और शरीर पूरी तरह ढीला पड़ चुका था।राम का चेहरा तुरंत गंभीर हो गया,“अनुराधा...”

उसने उसकी नब्ज़ जाँचने के लिए हाथ बढ़ाया। नब्ज़ चल रही थी, साँसें भी थीं..लेकिन वह पूरी तरह बेहोश हो चुकी थी।राम कुछ क्षण उसके पास बैठा उसे देखता रहा।फिर उसने धीरे से उसके माथे पर हाथ रखा और बेहद धीमी आवाज़ में कहा,“बहुत सह लिया तुमने... अब और नहीं।”उसकी आँखों में चिंता के साथ एक दृढ़ संकल्प उतर आया।

आरोही भी बाकी सबके साथ राम के कमरे में आ गई। अनुराधा को बिस्तर पर उस हालत में देखकर उसकी आँखें फिर भर आईं। कुछ देर पहले तक जो लड़की अपने सामने किसी को टिकने नहीं देती थी, वही अब बिल्कुल बेहोश पड़ी थी। उसके बिखरे बाल, चेहरे पर चोट के निशान और हाथ-पैरों पर लगी चोटें देखकर कमरे में मौजूद हर किसी के चेहरे पर चिंता साफ दिखाई दे रही थी।

अभिमन्यु तुरंत फर्स्ट-एड बॉक्स लेकर आया और राम के पास रख दिया। विवान गरम पानी लेकर आया और उसे भी पास रख दिया।

आरोही बिस्तर के पास बैठ गई। वह काँपते हाथों से अनुराधा के माथे पर आए बालों को धीरे-धीरे पीछे कर रही थी। उसकी आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे। वह कुछ कह नहीं रही थी, बस अपनी दोस्त को देखे जा रही थी।

राम और अभिमन्यु उसके पैरों के पास बैठ गए। राम बहुत सावधानी से उसके पैरों में चुभे काँच के छोटे-छोटे टुकड़े निकाल रहा था। हर बार कोई टुकड़ा निकालते हुए उसकी नजर अनुराधा के चेहरे पर चली जाती, जैसे उसे डर हो कि कहीं उसकी बेहोशी में भी उसे दर्द न हो जाए।

अभिमन्यु भी दूसरे पैर को संभालकर धीरे-धीरे काँच के टुकड़े निकाल रहा था।

विवान ने उसके हाथों को गरम पानी से साफ किया और जहाँ-जहाँ चोट लगी थी, वहाँ दवा लगाकर पट्टी बाँधने लगा। उसके हाथों, पैरों और सिर पर कई जगह चोट के निशान थे। किसी जगह हल्की खरोंच थी तो कहीं चोट ज्यादा गहरी थी। सभी ने मिलकर जितना संभव था, उसकी चोटों को साफ किया और पट्टियाँ बाँध दीं।

आरोही बीच-बीच में उसके चेहरे को देखती और फिर अपने आँसू पोंछ लेती।

कमरे में किसी की आवाज नहीं थी। बस पट्टी खोलने और दवा लगाने की हल्की आवाजें सुनाई दे रही थीं।

तभी बाहर से कदमों की आवाज आई।अथर्व तेजी से कमरे के अंदर आया। उसके साथ डॉक्टर भी थीं।"डॉक्टर आ गई हैं," अथर्व ने धीमे स्वर में कहा।

राम तुरंत अपनी जगह से उठ गया और डॉक्टर को बिस्तर के पास आने की जगह दे दी। डॉक्टर ने अनुराधा की हालत देखी और गंभीरता से उसकी तरफ बढ़ीं। कमरे में मौजूद सभी लोग अब उनकी तरफ देखने लगे।

डॉक्टर ने अनुराधा की अच्छी तरह जाँच करने के बाद धीरे से अपनी साँस छोड़ी। उनके चेहरे पर चिंता साफ़ दिखाई दे रही थी। वह राम की तरफ़ मुड़ीं और गंभीर आवाज़ में बोलीं,

"मिस्टर रघुवंशी... मैं सच कहूँ तो आपकी पत्नी की हालत देखकर काफी परेशान हूँ। एक ही दिन में इन्हें तीन बार ऐसा अटैक आ चुका है।"

राम की आँखें तुरंत डॉक्टर पर टिक गईं।डॉक्टर ने आगे कहा, "पहले भी इनकी हालत चिंताजनक थी, लेकिन इस बार इन्होंने घबराहट में खुद को काफी चोट पहुँचा ली है। पैरों में काँच के टुकड़े चुभे हैं, हाथों पर चोट है और शरीर पर भी कई जगह चोट के निशान हैं।"

कमरे में खड़े सभी लोग चुपचाप डॉक्टर की बात सुन रहे थे।डॉक्टर कुछ पल रुकीं, फिर थोड़ा गंभीर होकर बोलीं, "मुझे माफ़ कीजिएगा... शायद मुझे ये बात नहीं कहनी चाहिए, लेकिन आपको इसे बहुत गंभीरता से लेना होगा।

अगर इन्हें दोबारा इसी तरह का अटैक आया और वह लंबे समय तक रहा, तो इनकी मानसिक स्थिति पर भी गहरा असर पड़ सकता है।"

राम का चेहरा और गंभीर हो गया।

डॉक्टर ने आगे कहा, "मैंने अभी इन्हें दोबारा इंजेक्शन दे दिया है। फिलहाल इन्हें आराम की जरूरत है। लेकिन जब इन्हें होश आए, तब सबसे ज्यादा ध्यान इस बात का रखिएगा कि इन्हें किसी ऐसी चीज़ या बात का सामना न करना पड़े, जिससे इनका डर फिर से जाग जाए।"

उन्होंने अनुराधा की तरफ़ देखा और फिर राम से कहा,"अभी सबसे जरूरी है कि इन्हें सुरक्षित और शांत माहौल मिले। इन्हें अकेला मत छोड़िएगा और कोशिश कीजिए कि होश में आने के बाद इन्हें किसी भी तरह का मानसिक दबाव न हो।"

राम ने धीमे से सिर हिला दिया।डॉक्टर ने अपना सामान समेटते हुए आखिरी बार कहा,"इस बार इनके होश में आने के बाद आप बहुत सावधानी रखिएगा, मिस्टर रघुवंशी। अगर फिर से अटैक के लक्षण दिखाई दें, तो मुझे तुरंत फोन कीजिएगा।"

राम की नजर अब भी अनुराधा के शांत चेहरे पर टिकी हुई थी। उसके चेहरे पर चिंता थी, लेकिन उसके भीतर जैसे एक फैसला और मजबूत हो चुका था।अब अनुराधा को उसके अतीत का कोई डर अकेले नहीं झेलना पड़ेगा।

राम ने डॉक्टर की तरफ़ देखा और बिना किसी अतिरिक्त सवाल के बस इतना कहा, "थैंक यू, डॉक्टर।"डॉक्टर ने हल्का-सा सिर हिलाया और सहज आवाज़ में बोलीं, "इट्स ऑल राइट।" इसके बाद वह अपना सामान समेटकर कमरे से बाहर चली गईं।

डॉक्टर के जाते ही राम की नजर आरोही पर गई। उसकी आवाज़ में गंभीरता थी, लेकिन इस बार उसमें पहले जैसी सख्ती नहीं थी।"बच्चा... इसके कपड़े बदल दो। हमें बाहर जाना है।"

आरोही ने तुरंत सिर हिलाया। "हाँ।"

राम ने एक बार अनुराधा की तरफ़ देखा और फिर कमरे से बाहर निकल आया। उसके पीछे अभिमन्यु, विवान और अथर्व भी बाहर आ गए। दरवाज़ा बंद होते ही राम कुछ पल वहीं खड़ा रहा। उसके चेहरे पर खामोशी थी, लेकिन दिमाग में लगातार एक ही सवाल घूम रहा था।आखिर अनुराधा के साथ उस दिन हुआ क्या था?

उसने अपनी नजर विवान की तरफ़ उठाई।"विवान। "जी, भाई।"राम की आवाज़ अब बिल्कुल ठंडी और गंभीर थी।

"मुझे अनुराधा ठाकुर के बारे में पूरी जानकारी चाहिए। एक-एक चीज़। उसके परिवार से लेकर उसके पुराने जीवन तक... उसके साथ जो कुछ हुआ, उसके बाद उसने कहाँ और कैसे जिंदगी बिताई।मुझे सब पता चाहिए।"

विवान ने ध्यान से उसकी बात सुनी और सिर हिलाया।राम कुछ पल रुका, फिर बोला,"और सबसे जरूरी..."उसकी आँखों में अचानक वही पुराना गुस्सा उतर आया।

"जिस वक्त मिस ठाकुर के साथ वो सब हुआ था, उस समय वहाँ कौन मौजूद था? किसने उसे उस हालत में देखा? किसे उस रात की पूरी सच्चाई मालूम है? मुझे वो इंसान चाहिए। चाहे वो आज कहीं भी हो।"

विवान ने बिना देर किए कहा, "जी भाई। मैं पता लगाता हूँ। जो भी उस वक्त वहाँ मौजूद था, उसके बारे में जानकारी निकालूँगा।"राम ने हल्का-सा सिर हिलाया।मुझे सिर्फ़ जानकारी नहीं चाहिए, विवान। मुझे सच चाहिए। समझ गया, भाई।

राम की नजर एक बार फिर कमरे के बंद दरवाज़े पर चली गई। उसके चेहरे पर चिंता और गुस्सा दोनों साथ दिखाई दे रहे थे।फिर वह धीमे कदमों से आगे बढ़ गया। अब उसके लिए ये सिर्फ़ अनुराधा के अतीत को जानने की बात नहीं थी।उसे उस अतीत तक पहुँचना था, जिसने आज भी अनुराधा को चैन से जीने नहीं दिया था।

आरोही कुछ देर बाद अनुराधा के कपड़े बदलकर कमरे से बाहर आई। उसके चेहरे पर अभी भी चिंता साफ़ दिखाई दे रही थी। राम वहीं खड़ा था। आरोही को देखते ही उसने अपनी नज़र उसकी तरफ उठाई और गंभीर आवाज़ में पूछा, “क्या आप मुझे बताएँगी कि मिस ठाकुर को इस तरह के अटैक कब-कब आते हैं?”

आरोही कुछ पल चुप रही। फिर उसने धीरे से कहा, “जब भी अनुराधा के सामने उस हादसे से जुड़ी कोई चीज़ आ जाती है, तब उसे ऐसा अटैक आता है। लेकिन... इतना भयानक कभी नहीं हुआ।”

राम बिना कुछ बोले उसकी बात सुनता रहा।आरोही ने आगे कहा, “आमतौर पर वो कुछ देर घबराती है, फिर धीरे-धीरे खुद को संभाल लेती है। और जब अटैक खत्म हो जाता है, तो उसे बहुत कुछ याद भी नहीं रहता। ऐसा लगता है जैसे कुछ हुआ ही नहीं था। शायद उसका दिमाग खुद को उस दर्द से बचाने के लिए उन पलों को भूल जाता है।”

राम की भौंहें हल्की सिकुड़ गईं।“लेकिन आज...” आरोही की आवाज़ भर्रा गई, “आज तो एक ही दिन में इतनी बार हुआ है। मैंने उसे कभी इस तरह नहीं देखा।”कुछ क्षण के लिए कमरे में खामोशी छा गई।

आरोही ने अनुराधा के बंद कमरे की तरफ देखते हुए धीमे से कहा, “मुझे नहीं पता कि इस बार जब उसे होश आएगा, तो उसे सब कुछ याद रहेगा या फिर हमेशा की तरह वह भूल जाएगी। सच कहूँ तो... मुझे खुद डर लग रहा है कि वो होश में आने के बाद कैसी होगी।”

राम की नज़र भी उसी बंद दरवाज़े पर टिक गई।उसके चेहरे पर चिंता थी, लेकिन आवाज़ हमेशा की तरह संयत रही।इस बार उसे कुछ भी याद रहे या न रहे... मैं चाहता हूँ कि उसे दोबारा वैसा दर्द न झेलना पड़े।

आरोही ने उसकी तरफ देखा।राम ने आगे कहा, “और अगर उसके अतीत में कोई ऐसी बात है, जो आज भी उसे अंदर से तोड़ रही है, तो मैं उसे जानकर रहूँगा।”उसकी आँखों में एक दृढ़ता उतर आई। क्योंकि अब उसकी परेशानी सिर्फ़ उसकी नहीं है।

राम ने कुछ पल तक अनुराधा के बंद कमरे की तरफ देखा, फिर शांत आवाज़ में कहा, “उम्मीद तो यही करनी चाहिए कि वो भूल जाए। और अगर नहीं भूलती... तो हम हैं। हम उसे याद नहीं आने देंगे। आप सब फ़िक्र मत कीजिए।”

कमरे में मौजूद सभी ने उसकी बात पर धीमे से “हम्म” कहा। रात काफी हो चुकी थी और हर किसी के चेहरे पर दिनभर की थकान साफ़ दिखाई दे रही थी। एक-एक करके सभी वहाँ से जाने लगे।

तभी आरोही रुक गई।“मैं अनु के साथ कमरे में रुकूँगी।”राम ने उसकी तरफ देखा। उसके चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आ गई।

वह आरोही के पास आया और सहज स्वर में बोला, “मैं समझता हूँ कि आप क्या सोच रही हैं। अपनी दोस्त को इस हालत में अकेला छोड़ने का मन नहीं कर रहा है।”

आरोही चुप रही।राम ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा, “लेकिन आप इतनी नादान तो नहीं हैं कि किसी की नीयत को समझ न सकें।”

आरोही ने हल्का-सा सिर उठाकर उसे देखा।राम के चेहरे पर इस बार कोई कठोरता नहीं थी। उसकी आवाज़ भी पहले से कहीं नरम थी।“क्या आपको सच में लगता है कि मेरी नीयत में कोई खोट है?”

आरोही कुछ क्षण उसे देखती रही। राम ने बिना कोई जवाब माँगे बस इतना कहा, “आपको मुझ पर भरोसा करने की कोई जल्दी नहीं है, बच्चे । लेकिन कम-से-कम इतना भरोसा रखिए कि मैं अनु को किसी ऐसी चीज़ से दोबारा नहीं गुजरने दूँगा, जिससे वह डरती है।”

आरोही की आँखें एक पल के लिए झुक गईं।राम ने फिर हल्की मुस्कान के साथ कहा, “आप आराम कीजिए। अगर उसे आपकी ज़रूरत हुई, तो मैं खुद आपको बुला दूँगा।”

आरोही राम की बात सुनकर थोड़ी असहज हो गई। आखिर राम रघुवंशी उसका बॉस था और अनुराधा उसकी सबसे करीबी दोस्त। इतने बड़े हादसे के बाद उसके मन में अपनी दोस्त को लेकर चिंता होना स्वाभाविक था।

उसे इस तरह उलझन में खड़ा देखकर अभिमन्यु ने शांत स्वर में कहा, “ज्यादा तो नहीं कहूँगा, लेकिन अपने दोस्त के बारे में इतना ज़रूर कह सकता हूँ कि तुम्हारी दोस्त इस वक्त सबसे सुरक्षित इंसान के पास है।”

आरोही ने धीरे से उसकी तरफ देखा। फिर उसकी नज़र राम पर चली गई।एक पल के लिए उसकी आँखें दोनों के चेहरों के बीच घूमती रहीं। राम की आँखों में गंभीरता थी और अभिमन्यु की बातों में अपने दोस्त के लिए पूरा भरोसा। दोनों की आँखों में उसे कोई झूठ या बनावटीपन दिखाई नहीं दिया।

आरोही ने आखिरकार धीरे से सिर हिला दिया।“ठीक है... अगर रात के किसी भी वक्त अनु को मेरी ज़रूरत हो, तो मुझे बुला लीजिएगा।”

राम ने सिर हिलाते हुए कहा, “ज़रूर।”

आरोही ने एक आखिरी बार अनुराधा के कमरे की तरफ देखा। उसके चेहरे पर अब भी चिंता थी, लेकिन पहले जैसी बेचैनी नहीं थी।अभिमन्यु ने उसके कंधे की तरफ इशारा करते हुए कहा, “चलो, अब तुम भी आराम कर लो। आज का दिन वैसे ही बहुत लंबा रहा है।”

आरोही उसके साथ आगे बढ़ गई।राम वहीं कुछ क्षण खड़ा रहा। उसकी आँखों में अब भी वही सवाल था। पाँच साल पहले ऐसा क्या हुआ था, जिसने अनु के भीतर आज तक उस डर को ज़िंदा रखा है?और इस बार राम उस सवाल का जवाब जाने बिना रुकने वाला नहीं था।

आरोही जाने के लिए आगे बढ़ ही रही थी कि अचानक राम ने उसे पीछे से आवाज़ देकर रोक लिया। राम की आवाज़ सुनते ही आरोही के कदम रुक गए और उसके साथ चल रहा अभिमन्यु भी वहीं ठहर गया। दोनों ने पलटकर राम की तरफ देखा।

राम कुछ क्षण चुप रहा, जैसे उसके मन में चल रहा कोई सवाल उसे दोबारा परेशान कर रहा हो। फिर उसने आरोही की तरफ देखते हुए कहा, “बच्चे, एक बात और पूछनी है। जब मिस ठाकुर के साथ वो हादसा हुआ था, तब कोई तो ऐसा होगा जिसे उस पूरी घटना के बारे में मालूम हो। कोई ऐसा इंसान, जिसने उस समय कुछ देखा हो या जिसे उस रात की पूरी सच्चाई पता हो।”

आरोही ने कुछ पल राम को देखा और फिर धीरे से अपना सिर ना में हिला दिया। “उस समय तो... सिर्फ मैं और नंदू थे। नंदू का नाम सुनकर राम और अभिमन्यु की नजरें अजीब हो गयी। तभी आरोही ने फिर से कहा, " नंदू ! मेरा मतलब हमारी नंदनी !"

बाकी सब भाई-बहन उस वक्त बनारस में थे ही नहीं। मैं तो शादी के लिए कानपुर गई हुई थी और उसके बाद पापा अचानक मुझे वापस ले आए थे। नंदू भी हमारे साथ थी , लेकिन उस रात के बारे में उसने कभी मुझसे कुछ नहीं कहा। पापा ने भी उस घटना के बाद किसी को कुछ बताने से साफ़ मना कर दिया था।”

राम की आँखें यह सुनते ही कुछ पल के लिए स्थिर हो गईं। उसने धीमे स्वर में पूछा, “नंदू?”

“हाँ,” आरोही ने सिर हिलाते हुए कहा, “नंदू। उस समय वही हमारे साथ थी । लेकिन मुझे नहीं पता कि उसे कितना मालूम है और कितना नहीं।”

राम ने कुछ पल आरोही को देखा, फिर उसके मन में आया अगला सवाल पूछते हुए कहा, "वो सब कहाँ थे?"

आरोही ने धीरे से जवाब दिया, "पार्थ भाई और वेदांश भाई की जॉब एआर कम्पनी में हो गई थी, न्यूयॉर्क में... और वैदेही की पढ़ाई भी पूरी हो चुकी थी, तो वो दोनों भाइयों के पास घूमने चली गई थी।

नंदू की उस वक्त फाइनल ईयर की परीक्षाएँ चल रही थीं, इसलिए वो नहीं जा पाई। अनुराधा भी मेरे और नंदू के लिए रुक गई थी। हम तीनों ने सोचा था कि परीक्षाएँ खत्म होने के बाद साथ में घूमने जाएँगे।"

आरोही कुछ पल के लिए चुप हुई। उसके चेहरे पर सोच के भाव आ गए। फिर उसने धीरे से कहा, "लेकिन मुझे नहीं लगता कि नंदू को उस वक्त कुछ मालूम भी होगा। वो वैसे भी बाहर के लोगों के सामने बहुत मासूम और डरी-सहमी रहती थी।

उसका तो घर से कॉलेज और कॉलेज से घर तक का ही रूटीन था, और वो भी अकेले नहीं। या तो मैं उसके साथ होती थी, या अनुराधा, या फिर घर का कोई और। इसलिए ये पक्का नहीं कह सकती कि उसे उस वक्त की किसी बात के बारे में कुछ पता था या नहीं।"

राम ने उसकी पूरी बात ध्यान से सुनी। फिर कुछ पल सोचने के बाद उसने शांत स्वर में कहा, "ठीक है, बच्चे... अब आप आराम कर लीजिए।"

आरोही ने सिर हिलाया और जाने के लिए मुड़ी ही थी कि राम ने उसे रोकते हुए कहा, "और अनुराधा की ज्यादा चिंता मत कीजिए। आप बेफिक्र होकर जाइए। मैं हूँ उसके साथ।"

राम की बात सुनकर आरोही ने एक पल उसकी तरफ देखा। उसके चेहरे पर अब पहले जैसा डर नहीं था। उसे शायद पहली बार पूरी तरह यकीन हुआ कि अनुराधा इस वक्त अकेली नहीं है।उसने हल्की-सी मुस्कान के साथ कहा, "गुड नाइट।"

"गुड नाइट।"

आरोही वहाँ से अपने कमरे की तरफ चली गई। उसके कदमों की आवाज़ धीरे-धीरे गलियारे में खो गई। राम कुछ पल वहीं खड़ा रहा, फिर उसकी नजर दोबारा अनुराधा के कमरे के दरवाज़े पर जाकर ठहर गई।

राम कुछ देर तक बिना कुछ बोले उसे देखता रहा। उसके चेहरे पर अब पहले जैसी बेचैनी नहीं थी, बल्कि एक गहरी गंभीरता उतर आई थी। जैसे उसके दिमाग में किसी पुराने बंद दरवाज़े की पहली कुंडी मिल गई हो।

अभिमन्यु जाते-जाते एक बार राम की तरफ देखने लगा। वह अपने दोस्त को अच्छी तरह जानता था। राम के चेहरे की वह खामोशी बता रही थी कि उसके दिमाग में अब सिर्फ एक ही नाम घूम रही थी।

कुछ देर बाद राम अपने स्टडी रूम में चला गया। कमरे का दरवाज़ा बंद होते ही वह अपनी कुर्सी पर बैठ गया और कुछ देर तक चुपचाप सामने रखी फाइलों को देखता रहा। उसके दिमाग में अनुराधा से जुड़ी बातें लगातार घूम रही थीं। कुछ ही देर में अभिमन्यु, अथर्व और विवान भी स्टडी रूम में आकर उसके सामने खड़े हो गए।

राम ने अपनी नजरें उठाकर सीधे विवान की तरफ देखा और शांत आवाज़ में पूछा, "विवान, एआर कम्पनी मालूम है ना... किसकी कम्पनी है?"विवान ने तुरंत सिर हिलाया, "जी भाई, मालूम है।"

राम कुछ पल उसे देखता रहा, फिर बिना किसी भूमिका के बोला, "तो तुम दोनों भाई न्यूयोर्क के लिए निकलो। अभी के अभी।"विवान और अथर्व ने एक-दूसरे की तरफ देखा, लेकिन दोनों ने कोई सवाल नहीं किया। राम का फैसला सुनते ही उन्हें समझ आ गया था कि वह किस दिशा में जाना चाहता है।

राम ने आगे कहा, "यहाँ मैं और अभिमन्यु हैं। बाकी वहाँ जाकर क्या करना है... तुम दोनों समझ चुके होगे।"विवान ने गंभीरता से सिर हिलाया। "जी भाई, समझ गया।"अथर्व ने भी कहा, "जी भाई।"

राम ने बस सिर हिलाकर उन्हें जाने का इशारा कर दिया।दोनों बिना कोई और सवाल किए स्टडी रूम से बाहर निकल गए। उनके जाते ही कमरे में फिर से खामोशी छा गई।

अभिमन्यु वहीं खड़ा राम को देख रहा था। वह समझ चुका था कि राम ने न्यूयोर्क का नाम यूँ ही नहीं लिया था। अनुराधा के अतीत की एक-एक कड़ी अब उसके सामने जुड़ने लगी थी और राम किसी भी कड़ी को अधूरा छोड़ने वाला नहीं था।

अभिमन्यु कुछ देर तक दरवाज़े की तरफ देखता रहा, जहाँ से विवान और अथर्व अभी-अभी बाहर गए थे। फिर उसने राम की तरफ मुड़कर पूछा, “तुमने दोनों को साथ क्यों भेजा? विवान अकेला भी जा सकता था।”

राम ने मेज़ पर रखी फाइल बंद की और गंभीर नज़रों से अभिमन्यु की तरफ देखा। “विवान अपने गुस्से पर काबू नहीं रख पाता और बहुत जल्दी अपना कंट्रोल खो देता है। गुस्से में वो कब और कैसे प्रतिक्रिया दे दे, ये तो तुम जानते ही हो।”

अभिमन्यु चुपचाप उसकी बात सुनता रहा।राम ने आगे कहा, “लेकिन अथर्व... गुस्से में भी अपना विवेक और संयम नहीं खोता। वो हालात को समझकर कदम उठाता है। इसलिए दोनों को साथ भेजा है। एक का गुस्सा दूसरे का संतुलन संभाल लेगा।”

अभिमन्यु हल्का-सा मुस्कुराया। हाँ, ये बात सही है।राम ने घड़ी की तरफ देखा। रात काफी हो चुकी थी। उसने अभिमन्यु से कहा, “अब तुम भी जाओ। आराम कर लो। कल सुबह बहुत काम है।”

अभिमन्यु ने सिर हिलाया, “ठीक है। गुड नाइट। “गुड नाइट, यार ।”

अभिमन्यु कमरे से बाहर निकल गया। राम भी कुछ देर वहीं खड़ा रहा, फिर धीमे कदमों से अपने कमरे की तरफ बढ़ गया।

दूसरी तरफ, अभिमन्यु सीधे अपने कमरे में जाने के बजाय किचन की तरफ चला गया। उसने एक प्लेट में खाना निकाला और उसे लेकर आरोही के कमरे की तरफ बढ़ गया।

दरवाज़े के पास पहुँचकर उसने हल्की दस्तक दी, लेकिन अंदर से कोई जवाब नहीं आया।

उसने धीरे से दरवाज़ा खोला।आरोही अभी तक जाग रही थी।वह कमरे की खिड़की के पास खड़ी थी और बाहर आसमान की तरफ देख रही थी। आज आसमान पर बादलों का घेरा था। चाँद कहीं दिखाई नहीं दे रहा था। कमरे में खिड़की से आती हल्की-सी ठंडी हवा के अलावा एक अजीब-सी खामोशी पसरी हुई थी।

अभिमन्यु कुछ पल दरवाज़े पर खड़ा उसे देखता रहा। उसके हाथ में अब भी खाने की प्लेट थी।फिर उसने धीमे से कहा, “इतनी रात हो गई है... और मैडम अभी तक आसमान से बातें कर रही हैं?”

आरोही ने आवाज़ सुनकर धीरे से पलटकर उसकी तरफ देखा। उसके चेहरे पर थकान थी, लेकिन आँखों में अब भी अनुराधा की चिंता साफ़ दिखाई दे रही थी।अभिमन्यु ने प्लेट आगे बढ़ाते हुए कहा, “पहले ये खा लो। आज पूरे दिन तुमने ठीक से कुछ नहीं खाया।”

आरोही ने प्लेट की तरफ देखा, फिर उसकी तरफ।“मुझे भूख नहीं है।”अभिमन्यु ने बिना बहस किए प्लेट पास की मेज़ पर रख दी।“भूख हो या न हो, खाना पड़ेगा। वरना कल तुम खुद बीमार पड़ जाओगी और फिर तुम्हारी दोस्त को संभालने के लिए एक और मरीज मिल जाएगा।”

आरोही उसे घूरने लगी।अभिमन्यु हल्का-सा मुस्कुराया। “अब ऐसे मत देखो। खाना है।”

Continue........

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