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14.His Dark Obssession

अभिमन्यु ने आरोही की कलाई पकड़ी और उसे लगभग खींचते हुए पास के कमरे में ले गया। आरोही को जैसे ही समझ आया कि वह उसे सबसे अलग क्यों लेकर आया है, वह गुस्से में कुछ कहने के लिए मुँह खोलती, लेकिन उससे पहले ही अभिमन्यु ने उसके मुँह पर हाथ रख दिया।

उसने अपनी आँखों से उसे चुप रहने का इशारा किया।आरोही की आँखें गुस्से से फैल गईं। उसने उसके हाथ को हटाने की कोशिश की, मगर अभिमन्यु ने कुछ पल उसे उसी तरह देखा और फिर धीरे से अपना हाथ उसके मुँह से हटा लिया।

आरोही तुरंत बोलने ही वाली थी कि अभिमन्यु ने अपनी एक उँगली उसके होंठों पर रख दी।

"श्श्श्श...!"

उसकी आवाज़ धीमी थी, लेकिन लहजे में इतनी सख्ती थी कि आरोही वहीं रुक गई।

"अभी अगर तुमने कुछ कहा ना..." अभिमन्यु ने उसकी आँखों में देखते हुए धीरे-धीरे कहा, "तो मैं कुछ ऐसा कर दूँगा, जो तुम्हें बिल्कुल पसंद नहीं आएगा।"

आरोही ने आँखें सिकोड़कर उसे घूरा।अभिमन्यु ने उँगली उसके होंठों से हटाई और कहा, "और एक बात... पहले सुनना सीखो, फिर बोलना। हर बार अपनी तरफ से फैसला करके बीच में कूद पड़ना बंद करो।"

आरोही ने तुरंत कुछ कहने के लिए मुँह खोला।

"और हाँ..." अभिमन्यु ने उसकी तरफ उँगली उठाकर उसे फिर रोक दिया, "अभी-अभी जिस शेर के आगे तुम म्याऊँ-म्याऊँ कर रही थीं ना..."उसके चेहरे पर हल्की-सी तंज भरी मुस्कान आई।"...उसके सामने तुम्हारी एक नहीं चलती।"

आरोही का मुँह खुला का खुला रह गया।अभिमन्यु ने उसकी हालत देखते हुए आगे कहा, "तुम्हारी किस्मत अच्छी थी कि आज बच गई। वरना जिस तरह तुम राम के सामने खड़ी होकर उसे सुनाए जा रही थीं, मुझे तो सच में लग रहा था कि अगले पाँच मिनट में मुझे तुम्हारी लाश उठाकर बाहर लानी पड़ेगी।"

"क्या...!" आरोही ने घूरते हुए कहा।

"हाँ, क्या?" अभिमन्यु ने तुरंत बात काट दी। "तुम्हें अंदाज़ा भी है तुम किसके सामने खड़ी थीं?"

आरोही ने गुस्से में कहा, "मुझे किसी से डर नहीं लगता।"

अभिमन्यु कुछ पल उसे देखता रहा।फिर बेहद सपाट आवाज़ में बोला, "वो तो दिख ही रहा था।"

"क्या मतलब?"

"मतलब ये कि तुमने आज बहादुरी और बेवकूफी के बीच की लाइन इतनी बार क्रॉस की है कि मुझे खुद समझ नहीं आया तुममें से कौन-सी चीज़ ज्यादा है।"आरोही ने उसे घूरते हुए अपनी बाँहें बाँध लीं।"मैं सिर्फ़ अपनी दोस्त के लिए बोल रही थी।"

इस बार अभिमन्यु का चेहरा थोड़ा गंभीर हो गया और यही बात मैं समझ रहा हूँ, आरोही। उसने शांत लेकिन सख्त आवाज़ में कहा। "अनुराधा तुम्हारी दोस्त है, इसलिए तुम्हारा परेशान होना गलत नहीं है। लेकिन पूरी बात जाने बिना राम पर इल्ज़ाम लगाना... ये गलती थी।"

आरोही कुछ पल चुप रही।

अभिमन्यु ने उसकी आँखों में देखते हुए आखिरी बात कही,"और अगली बार अगर राम के सामने जाना ही है, तो पहले ये याद रखना... वो आदमी तुम्हारी तरह सिर्फ़ गुस्से में नहीं बोलता। उसके गुस्से का नतीजा भी होता है।"

आरोही ने मुँह बनाया।हुँह... फिर भी मुझे उससे डर नहीं लगता।अभिमन्यु ने माथे पर हाथ रख लिया।हे भगवान... ये लड़की सुधरने वाली नहीं है।

आरोही ने अपने दोनों हाथ आपस में बाँध लिए और अभिमन्यु को घूरते हुए बोली, "क्यों? क्या मैं किसी चिड़ियाघर में हूँ, जो तुम इस जुबान में बात कर रहे हो? और कौन-से शेर के पास खड़ी थी मैं?"

अभिमन्यु ने उसकी तरफ देखा और एक पल के लिए जैसे सोचने लगा कि इस लड़की को समझाए कैसे। फिर उसने माथे पर हाथ फेरते हुए कहा, "तुम सच में हद से ज्यादा बेवकूफ हो।"

आरोही की आँखें तुरंत बड़ी हो गईं। "ए! क्या कहा तुमने?"

"कुछ नहीं, मेरी माँ।"

"मेरी माँ किसे कहा तुमने?"

अभिमन्यु ने उसकी बात को वहीं छोड़ दिया। इस बार उसके चेहरे पर मजाक नहीं था। उसने गंभीर होते हुए कहा, "मिस ठाकुर हमारे साथ मीटिंग में गई थीं। उसके बाद जो कुछ हुआ है, वो सुनो।"

आरोही का चेहरा धीरे-धीरे गंभीर हो गया।अभिमन्यु ने उसे मीटिंग से लेकर अब तक की पूरी बात बता दी। अनुराधा का वॉशरूम जाने के बाद वापस न आना, राम का उसे ढूँढने जाना, उसकी चूड़ियों की आवाज़ सुनाई देना और फिर उस जगह पहुँचने पर अनुराधा को उन लोगों के बीच उस हालत में देखना। वह सब कुछ आरोही को बताता चला गया।

आरोही बिना कुछ बोले सुनती रही।लेकिन जैसे-जैसे अभिमन्यु आगे बढ़ता गया, उसके चेहरे के भाव बदलते गए। कुछ देर पहले तक जिस लड़की की आँखों में राम के लिए गुस्सा था, अब उन्हीं आँखों में डर और दर्द उतर आया था।

अभिमन्यु ने उसे बताया कि अनुराधा के कपड़े कंधे की तरफ से फट गए थे, गर्दन पर चोट के निशान थे और वह बुरी तरह डरी हुई थी। फिर उसने बताया कि राम ने वहाँ पहुँचकर उसे उन लोगों से छुड़ाया और अपनी बाँहों में लेकर बाहर आया था।

आरोही के होंठ काँपने लगे और जब अभिमन्यु ने उसे बताया कि राम की बाँहों में आने के बाद भी अनुराधा डर के कारण बस इतना ही बोल पाई थी, "राम..." तो आरोही ने अचानक अपना हाथ अपने मुँह पर रख लिया।उसकी आँखों से आँसू निकल पड़े।

वह कुछ कदम पीछे हुई और दीवार से टिकते हुए धीरे-धीरे नीचे बैठ गई।"अनु..." उसके मुँह से बस इतना ही निकला।अगले ही पल उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। उसने अपने चेहरे को दोनों हाथों में छिपा लिया और सिसकते हुए रोने लगी।

अभिमन्यु वहीं खड़ा उसे देखता रहा।उसे समझ ही नहीं आया कि वह क्या करे।अभी कुछ देर पहले तक यही लड़की उसके सामने अकड़कर खड़ी थी, राम को सुनाने से भी नहीं डर रही थी और अब अनुराधा के बारे में सुनकर इस तरह टूट गई थी।

अभिमन्यु ने एक लंबी साँस ली और आखिरकार उसके पास जाकर फर्श पर बैठ गया।कुछ पल तक वह चुप रहा।फिर उसने झिझकते हुए अपना हाथ आरोही के कंधे पर रखा।आरोही ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। वह अब भी चेहरा छिपाए रो रही थी।

अभिमन्यु ने उसे दिलासा देने के लिए कुछ कहने की कोशिश की, लेकिन उसे समझ ही नहीं आया कि ऐसे वक्त में क्या कहा जाता है। वह कुछ पल चुप रहा और फिर बस धीमी आवाज़ में बोला,

"हेय..."

आरोही की सिसकियाँ कुछ पल के लिए धीमी हुईं।अभिमन्यु ने उसके कंधे पर हाथ रखे हुए फिर कहा,"हेय... बस।"लेकिन आरोही के आँसू नहीं रुके और इस बार अभिमन्यु ने उसे चुप कराने की कोशिश नहीं की। वह बस उसके पास बैठा रहा, क्योंकि इस वक्त शायद उसे किसी जवाब की नहीं, बस किसी के पास बैठे रहने की जरूरत थी।

आरोही की सिसकियाँ लगातार बढ़ती जा रही थीं। अभिमन्यु अब भी उसके पास बैठा था और उसके कंधे पर हाथ रखे हुए उसे संभालने की कोशिश कर रहा था। तभी अचानक आरोही ने खुद को रोक नहीं पाई। वह आगे बढ़ी और सीधे अभिमन्यु के गले से लिपट गई।

उसकी आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे।

"फिर से..." वह रोते हुए बोलने लगी, लेकिन आवाज़ बीच में ही काँप गई। उसने अभिमन्यु की शर्ट को कसकर पकड़ लिया। "फिर से वो दर्द उसके अंदर उभर आया तो... मैं कैसे संभालूँगी उसको?"

अभिमन्यु एक पल के लिए बिल्कुल स्थिर रह गया। उसे शायद उम्मीद नहीं थी कि आरोही इस तरह अचानक उसके गले लग जाएगी। वह कुछ समझ पाता, उससे पहले ही आरोही ने फिर बोलने की कोशिश की।

"वो... वो..."लेकिन गले में अटकी सिसकी ने उसकी आवाज़ रोक दी। वह ठीक से बोल भी नहीं पा रही थी।अभिमन्यु ने उसके चेहरे की तरफ देखा। उसकी हालत देखकर उसके चेहरे की सारी झुँझलाहट गायब हो गई।

उसने बिना कुछ कहे अपनी दोनों बाँहें आरोही के चारों ओर रख दीं और उसे संभालते हुए अपने सीने से लगा लिया।"शांत हो जाओ..." उसने बहुत आराम से कहा। "इतना मत रो। कुछ नहीं होगा। सब ठीक हो जाएगा।"आरोही अब भी उसके सीने से लगी सिसक रही थी।

अभिमन्यु ने उसके कंधे पर हाथ फेरते हुए धीरे से कहा, "और तुम्हारी दोस्त को मेरा दोस्त कुछ होने नहीं देगा।"आरोही की सिसकियाँ कुछ पल के लिए धीमी हुईं।"राम है उसके साथ..." अभिमन्यु ने उसे भरोसा दिलाते हुए कहा, "तुम्हें उसकी चिंता करने की जरूरत नहीं है। वो उसे कुछ नहीं होने देगा। समझी?"

उसने एक पल रुककर फिर कहा, "बस... पहले खुद को शांत करो। तुम इस तरह रोती रहोगी तो अनुराधा को संभालोगी कैसे?"आरोही ने कुछ नहीं कहा।वह अब भी अभिमन्यु के गले से लगी हुई थी और उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे।

अभिमन्यु भी चुप हो गया।उसने बस अपनी बाँहों का घेरा थोड़ा और मजबूत कर लिया और उसे उसी तरह रो लेने दिया।इस वक्त उसके पास अनुराधा के पुराने दर्द का कोई जवाब नहीं था...लेकिन कम से कम आरोही को अकेले उस दर्द के साथ बैठने भी नहीं देना था।

आरोही ने धीरे-धीरे अपना चेहरा अभिमन्यु की गर्दन से उठाया। आँसुओं के कारण उसकी नाक लाल हो चुकी थी और आँखें अब भी पूरी तरह भीगी हुई थीं। उसने मासूमियत से अभिमन्यु की तरफ देखते हुए पूछा, “सच?”

अभिमन्यु ने उसके आँसुओं से भीगे चेहरे को देखा और उसके होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आ गई। उसने झुककर अपनी नाक उसकी लाल नाक से हल्के से छुआते हुए शरारती अंदाज़ में कहा, “मुच!”

आरोही कुछ पल उसे देखती रही। अभी कुछ देर पहले तक वह जिस तरह रो रही थी, उसके चेहरे पर अब भी उस दर्द की परछाईं साफ़ थी। अभिमन्यु ने उसकी तरफ देखते हुए धीरे से मुस्कुराकर कहा, “क्या आपके दोस्त...”

आरोही अपनी बात पूरी कर पाती, उससे पहले ही अभिमन्यु ने झुककर उसके होंठों को हल्के से चूम लिया और फिर उतनी ही सहजता से पीछे हट गया, जैसे उसने कुछ असामान्य किया ही न हो।

“तुम बहुत बोलती हो,” उसने बेहद आराम से कहा, “तो थोड़ा कम बोलो और अपने इस छोटे-से दिमाग़ को थोड़ा कम चलाओ।”

उसने उसकी आँखों में देखते हुए हल्के से पलकें झपकाईं और फिर मुस्कुराकर बोला, “बेफ़िक्र रहो। तुम्हें और तुम्हारी दोस्त को कुछ नहीं होगा।”लेकिन अभिमन्यु की बाकी बातों का आरोही तक पहुँचना ही कहाँ था।वह जहाँ बैठी थी, वहीं जैसे जम गई।

अभी कुछ क्षण पहले तक उसकी आँखों में आँसू थे, दिल में अपनी दोस्त को लेकर डर था और सामने बैठा अभिमन्यु उसे समझाने की कोशिश कर रहा था। लेकिन उस अचानक हुए चुंबन के बाद उसके दिमाग़ ने जैसे काम करना ही बंद कर दिया था।

उसकी आँखें पूरी तरह फैल गईं। होंठ हल्के से खुले रह गए और वह बिना पलक झपकाए अभिमन्यु को देखती रही।अभी... ये क्या हुआ?उसके कानों में अभिमन्यु की आवाज़ तो पड़ रही थी, लेकिन शब्द समझ में नहीं आ रहे थे। वह अभी भी उसी एक पल में अटकी हुई थी।

अभिमन्यु ने उसके इस बदले हुए चेहरे को देखा तो उसके होंठों पर फिर वही हल्की-सी मुस्कान आ गई।

आरोही के पास इस वक्त न कोई जवाब था, न कोई सवाल।बस एक ही बात उसके दिमाग़ में बार-बार घूम रही थी।अभिमन्यु ने उसे किस किया था।

अभिमन्यु ने देखा कि आरोही अभी भी उसी तरह बिना पलक झपकाए उसे देख रही थी। उसकी आँखों में ऐसा सदमा था जैसे उसके दिमाग़ ने अभी तक पिछले कुछ सेकंड की घटना को स्वीकार ही नहीं किया हो।

अभिमन्यु ने उसके चेहरे के सामने अपनी उँगली घुमाई और फिर उसके माथे की तरफ इशारा करते हुए बोला, "हैलो... मैडम? दिमाग़ वापस आ गया या अभी भी वहीं अटका हुआ है?"

आरोही ने कोई जवाब नहीं दिया।बस अगले ही पल उसने अचानक दोनों हाथों से अभिमन्यु का चेहरा पकड़ लिया।

अभिमन्यु को कुछ समझने का मौका मिलता, उससे पहले ही आरोही ने उसकी गर्दन पर ज़ोर से काट लिया।

"आआह्ह!"

अभिमन्यु की दर्द से चीख निकल गई। उसने तुरंत अपनी गर्दन पर हाथ रखा और पीछे हट गया। उसकी आँखें अविश्वास से फैल गईं। सामने आरोही खड़ी थी और उसके चेहरे पर अब सदमे की जगह पूरा गुस्सा लौट चुका था।

उसने अभिमन्यु को एक ज़ोरदार धक्का दिया और गुस्से में बोली, "दोबारा मुझे छुआ ना, तो अभी सिर्फ़ गर्दन पर काटा है... अगली बार सीधे गले की नस काट दूँगी। समझे?"

अभिमन्यु ने अपनी गर्दन पकड़े हुए उसे घूरकर देखा। "तुमने काटा है मुझे?"

"हाँ!" आरोही ने बिना ज़रा-सा झिझके जवाब दिया। "और अगली बार इससे भी ज़्यादा ज़ोर से काटूँगी।"

अभिमन्यु के पास पल भर के लिए कोई जवाब नहीं था।आरोही ने उसे ऊपर से नीचे तक घूरा और नाक सिकोड़ते हुए बोली, "छिछोरा कहीं का।"

फिर उसने मुँह बनाया, "हूँ !"और बिना उसकी तरफ दोबारा देखे दरवाज़े की ओर बढ़ गई।

अभिमन्यु अब भी अपनी गर्दन सहला रहा था। उसने आरोही को जाते हुए देखा और दाँत भींचकर बुदबुदाया, "जंगली बिल्ली..."

आरोही ने शायद सुन लिया था, क्योंकि जाते-जाते उसके कदम एक पल के लिए रुके, लेकिन उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा।अभिमन्यु ने अपनी गर्दन पर हाथ फेरते हुए कहा, "तुम्हें तो मैं छोड़ूँगा नहीं। अभिमन्यु राठौर से पंगा लिया है तुमने..."

उसके चेहरे पर गुस्सा था, लेकिन अगले ही पल जाने क्यों उसके होंठों के कोने ऊपर उठ गए।

उसने सिर हल्का-सा हिलाया और खुद से कहा, "वैसे... दम है लड़की में।"

फिर उसने एक बार उस दिशा में देखा, जहाँ से आरोही जा चुकी थी, और गर्दन सहलाते हुए खुद भी कमरे से बाहर निकल गया। चेहरे पर अब भी वही हल्की-सी मुस्कान थी, जैसे उसे पहली बार किसी ने इतनी आसानी से चौंकाया हो... और उसे यह बात बुरी भी नहीं लगी थी।

अभिमन्यु ने कुछ पल तक आरोही को देखा। वह अब भी उसी तरह चुप बैठी थी, जैसे उसके आसपास की हर आवाज़ उससे दूर हो गई हो। उसके चेहरे पर हैरानी साफ़ दिखाई दे रही थी और उसकी आँखें लगातार अभिमन्यु के चेहरे पर टिकी थीं।

कुछ देर बाद राम की आँखें खुलीं। कुछ क्षण तक वह यूँ ही छत की ओर देखता रहा, जैसे उसे याद करने में पल भर लगा हो कि वह कहाँ है। फिर उसकी नज़र अपनी बाँहों में सिमटी अनुराधा पर पड़ी।

अनुराधा अब भी गहरी नींद में थी। उसका चेहरा राम के सीने के पास था और उसकी उँगलियाँ अभी तक उसकी शर्ट को हल्के से पकड़े हुए थीं। सोते हुए उसके चेहरे पर सुबह वाली घबराहट नहीं थी। उसे इस तरह शांत देखकर राम के होंठों पर अनायास हल्की मुस्कान आ गई।

उसने कुछ क्षण उसे देखा और फिर मन ही मन कहा, मैं ये नहीं जानता कि तुम किस बात से इतनी डर रही हो, किस बात का सदमा लगा है तुम्हें... लेकिन तुमसे वादा करता हूँ कि आज के बाद तुम्हारी ज़िंदगी की सारी परेशानियाँ मेरी हुईं।

उसने झुककर उसके माथे को बहुत हल्के से चूम लिया। फिर सावधानी से उसकी उँगलियाँ अपनी शर्ट से अलग कीं और उसे ठीक से बिस्तर पर सुला दिया। तकिया उसके सिर के नीचे ठीक किया, चादर उसके कंधों तक खींची और कुछ पल वहीं खड़ा होकर उसे देखता रहा।

यह सुनिश्चित करने के बाद कि अनुराधा आराम से सो रही है, राम कमरे से बाहर निकल आया।

दरवाज़ा बंद होते ही उसके चेहरे पर आई कोमलता गायब हो गई।उसकी आँखें फिर से कठोर हो चुकी थीं।

बाहर हॉल में विवान, अर्थ, अभिमन्यु और आरोही मौजूद थे। चारों की नज़र राम पर पड़ी, लेकिन राम ने किसी से कुछ नहीं कहा। वह सीधे आरोही की तरफ बढ़ा।

आरोही ने उसे अपनी ओर आते देखा तो उसकी साँस जैसे अटक गई। कुछ देर पहले अभिमन्यु से बात करते हुए वह गुस्से में बहुत कुछ कह चुकी थी, लेकिन अब सामने राम को देखकर उसका वही आत्मविश्वास कहीं गायब हो गया था।

राम उसके सामने आकर रुक गया।उसकी आवाज़ शांत थी, लेकिन सवाल में ऐसी गंभीरता थी कि आरोही की नज़र अपने आप झुक गई।"ऐसा क्या हुआ था मिस ठाकुर के अतीत में... जो उन्हें इतना गहरा सदमा लगा है?"

आरोही ने धीरे से राम की तरफ देखा।उसके चेहरे पर कोई गुस्सा नहीं था, लेकिन उसकी आँखें सीधी आरोही के चेहरे पर टिकी थीं। वह जवाब चाहता था और शायद इस बार उसके सवाल से बच निकलना आसान नहीं था।आरोही के होंठ खुले, लेकिन आवाज़ नहीं निकली।

कुछ देर पहले वह अभिमन्यु के सामने गुस्से में थी, मगर अब उसे याद आ रहा था कि उसने राम के सामने कितनी बड़ी बात कह दी थी। उस समय वह अनुराधा की हालत जानकर भावुक थी और गुस्से में बह गई थी। लेकिन अब राम के सामने खड़े होकर उसे अपने ही शब्द याद आने लगे।

उसने घबराकर अपने हाथ आपस में बाँध लिए।राम ने उसकी झिझक देखी, लेकिन इस बार भी अपनी आवाज़ ऊँची नहीं की।"आरोही..."बस नाम सुनते ही वह और असहज हो गई।

राम की नज़रें अब भी उसी पर थीं।"मुझे सच जानना है। अनुराधा के साथ पहले क्या हुआ था?"

हॉल में बैठे विवान, अर्थ और अभिमन्यु भी चुप थे। किसी ने बीच में बोलने की कोशिश नहीं की।आरोही ने एक लंबी साँस ली। उसके चेहरे पर डर और चिंता दोनों साफ़ दिखाई दे रहे थे। उसे मालूम था कि अब जो भी वह बताएगी, उसके बाद राम की नज़र से अनुराधा के अतीत को छिपाना संभव नहीं होगा।

उसने धीरे से सिर उठाया और राम की आँखों में देखा,"राम..."उसकी आवाज़ काँप रही थी।फिर कुछ पल रुककर उसने कहना शुरू किया।

राम ने आरोही के चेहरे पर छाया डर देख लिया था। उसकी आँखों की सख़्ती थोड़ी नरम पड़ गई। उसने धीरे से अपना हाथ उठाकर आरोही के माथे पर रख दिया और शांत आवाज़ में कहा, “डरो नहीं... मुझे सिर्फ़ इतना बताओ कि हुआ क्या था। जो तुम्हें पता है, वही बताना।”

राम के इस बदले हुए लहजे से आरोही ने धीरे से साँस छोड़ी। उसने कुछ क्षण अपनी नज़रें नीचे रखीं, फिर धीमे-धीमे बोलना शुरू किया, “मुझे ज़्यादा कुछ मालूम नहीं है, क्योंकि उस समय मैं बनारस में मौजूद ही नहीं थी। मैं कुछ दिनों के लिए अपने मम्मी-पापा के साथ कानपुर, नानी के घर गई हुई थी।

मेरे मामा की बेटी की शादी थी। मेरे जाने से पहले तक सब कुछ बिल्कुल ठीक था। अनु भी ठीक थी और उसकी ज़िंदगी में ऐसा कुछ नहीं था, जिससे मुझे लगे कि आगे कुछ होने वाला है।”

आरोही कुछ पल के लिए रुकी। जैसे पुरानी यादों को एक-एक करके जोड़ रही हो।

“फिर एक दिन अचानक पापा ने कहा कि जल्दी चलो, हमें निकलना है। मैंने और माँ ने उनसे पूछा भी था कि शादी में अभी दो दिन बाकी हैं, फिर शादी से पहले ही वापस क्यों जाना है? लेकिन पापा ने ज़्यादा कुछ नहीं बताया। बस इतना कहा कि घर जाना ज़रूरी है।”

राम बिना कुछ बोले उसकी बात सुनता रहा।

आरोही ने उसकी तरफ़ देखा और आगे कहा, “मेरे पापा... शंकर त्रिवेदी और अनुराधा के पापा, सच्चिदानंद ठाकुर... दोनों बचपन के दोस्त हैं। उनकी दोस्ती सिर्फ़ नाम की नहीं है। दोनों परिवारों के बीच भी हमेशा से बहुत अच्छा रिश्ता रहा है। इसलिए मैं और अनु भी बचपन से साथ हैं।”

उसकी आवाज़ में अनुराधा के लिए पुरानी दोस्ती की गर्माहट उतर आई।

“हम दोनों ने साथ बचपन बिताया है। स्कूल की बातें हों, छोटी-छोटी लड़ाइयाँ हों या एक-दूसरे से अपने मन की बातें कहना... अनु मेरे लिए सिर्फ़ दोस्त नहीं थी। वो मेरी बहन जैसी थी। इसलिए जब मैं कानपुर गई थी, तब मेरे मन में ज़रा-सा भी ख्याल नहीं था कि मेरे पीछे उसकी ज़िंदगी में कुछ ऐसा हो सकता है, जिसके बारे में मुझे सालों बाद भी सोचकर डर लगेगा।”

आरोही की आवाज़ आख़िरी शब्दों पर धीमी पड़ गई।राम का चेहरा गंभीर हो चुका था। उसने अपना हाथ आरोही के माथे से हटा लिया, लेकिन उसकी निगाहें उससे नहीं हटीं।अब तक उसे सिर्फ़ इतना पता था कि अनुराधा किसी पुराने सदमे से जूझ रही है।

लेकिन आरोही की बातों से उसे पहली बार एहसास हो रहा था कि उस सदमे की शुरुआत शायद उसी समय हुई थी, जब वह बनारस में मौजूद भी नहीं थी।राम ने धीमे स्वर में पूछा, “फिर?”आरोही ने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में पुरानी यादों की बेचैनी फिर से उतर आई थी।

आरोही कुछ पल तक चुप बैठी रही। जैसे उसे उस रात के बारे में बोलने के लिए अपने अंदर से हिम्मत जुटानी पड़ रही हो। उसकी आँखें सामने थीं, लेकिन नजरें कहीं और अटकी हुई थीं। आखिरकार उसने धीमे से कहना शुरू किया, "हम दोनों ने ज्यादा सवाल नहीं किए थे। पापा ने बस कहा था कि हमें जल्दी निकलना है, इसलिए मैं और माँ भी उनके साथ गाड़ी में बैठ गए। मुझे लगा था। शायद बनारस में कोई जरूरी काम होगा। लेकिन पापा हमें घर लेकर नहीं गए।"

आरोही ने अपनी उँगलियाँ आपस में फँसा लीं।"उन्होंने गाड़ी एक सुनसान जगह पर जाकर रोक दी। वहाँ चारों तरफ इतना अँधेरा था कि मुझे कुछ ठीक से दिखाई भी नहीं दे रहा था। मैं पापा से पूछने ही वाली थी कि हम यहाँ क्यों आए हैं, लेकिन उन्होंने इशारे से मुझे और माँ को चुप रहने के लिए कहा। उनके चेहरे पर ऐसा तनाव था कि उस वक्त मैंने भी कोई सवाल नहीं किया।"

वह एक पल के लिए रुकी।तभी सामने से ठाकुर अंकल आते दिखाई दिए।आरोही की आवाज़ अचानक धीमी हो गई।उनकी गोद में अनु थी।

राम का चेहरा एकदम स्थिर हो गया।वो एक कंबल में लिपटी हुई थी... और बेहोश थी।

आरोही की आँखों में उस रात का दृश्य फिर से उतर आया। उसने निगलकर गले में अटकी रुलाई को नीचे किया और बोली, "मैं उसे देखते ही चीखने वाली थी। मेरे मुँह से आवाज निकलती, उससे पहले माँ ने मेरा मुँह अपने हाथ से बंद कर दिया।

शायद उन्हें डर था कि मेरी आवाज से वहाँ कोई और सुन लेगा... या शायद वो खुद नहीं चाहती थीं कि अनु को उस हालत में देखकर मैं चीखूँ। उसने अपने आँसू पोंछे।

"लेकिन सच कहूँ तो उस वक्त किसी को कुछ बताने की जरूरत ही नहीं थी।

ठाकुर अंकल और सुशील अंकल की आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे। दोनों बस अनु को देख रहे थे। उन्होंने हमें कुछ बताया नहीं, लेकिन उनकी हालत देखकर ही समझ आ गया था कि उसके साथ कुछ बहुत गलत हुआ है।"

आरोही का गला भर आया।माँ से रहा नहीं गया। उन्होंने ठाकुर अंकल से पूछ ही लिया, 'अनु के साथ रे...? आगे के शब्द माँ के गले में ही अटक गए थे।

ठाकुर अंकल अचानक बोल पड़े, 'नहीं!!!!!'"आरोही ने वही शब्द दोहराते हुए आँखें बंद कर लीं।उनकी आवाज़ में इतना दर्द था कि मैं आज तक नहीं भूल पाई। लेकिन कुछ सेकंड बाद उन्होंने जो कहा... उससे तो जैसे हमारे पैरों के नीचे से जमीन ही निकल गई।

वह धीरे से बोली, "उन्होंने कहा था, 'नहीं... लेकिन उससे कम भी नहीं। और अगर यहाँ कुछ और गलत हो गया तो... इसे ले जाओ।'"

राम की आँखों में अब एक अजीब-सी खामोशी उतर आई थी।आरोही ने उसकी तरफ देखा और फिर आगे कहा, "पापा के सामने ठाकुर अंकल हाथ जोड़कर खड़े थे। और उस वक्त अनु का सिर मेरी गोद में था।"

उसकी आवाज काँप गई।उसके शरीर पर जगह-जगह चोट के निशान थे। उसके कपड़े कई जगह से फटे हुए थे... और उसके पैर..." आरोही कुछ पल बोल नहीं पाई। फिर उसने मुश्किल से कहा, "उसके पैर पूरे खून से सने हुए थे।"कमरे में अचानक गहरा सन्नाटा छा गया।

"मुझे आज भी याद है..." आरोही ने धीमे से कहा, "मैं उसकी तरफ देख रही थी और समझ ही नहीं पा रही थी कि मैं अपनी अनु को कैसे पहचानूँ। वही अनु, जो कुछ दिन पहले तक मेरे साथ हँस रही थी, मुझसे लड़ रही थी... और उस रात मेरी गोद में बिल्कुल बेहोश पड़ी थी।"

उसकी आँखों से आँसू निकल आए।पापा ने उसे देखा। फिर ठाकुर अंकल की तरफ देखा और बस इतना कहा..."आरोही की आवाज़ भारी हो गई।

"'वो मेरी बेटी है।'"कुछ पल की खामोशी के बाद उसके पिता की अगली बात जैसे उस कमरे में फिर से गूँज उठी।"'आज से तेरी बेटी मर चुकी सच्ची ।'"

आरोही ने अपना चेहरा दूसरी तरफ कर लिया।"ठाकुर अंकल ने कुछ नहीं कहा। उन्होंने बस अपना सिर हाँ में हिला दिया। उनकी आँखों से आँसू बहते रहे। शायद उनके पास उस वक्त कहने के लिए कुछ बचा ही नहीं था।"

उसने अपनी आँखें पोंछीं।फिर वो उस अँधेरे में चले गए। बस चले गए... बिना पीछे देखे।आरोही की आवाज अब पूरी तरह टूट चुकी थी और पापा अनु को लेकर हमें वहाँ से घर ले आए। उस रात के बाद... मेरे लिए अनु वही थी, लेकिन उसके अंदर कुछ हमेशा के लिए बदल चुका था।"

उसने धीरे से सिर उठाकर राम को देखा।"वो बाहर से हमारे साथ थी, लेकिन उसके अंदर वो रात कहीं अटक गई थी। और शायद..." उसकी आवाज़ काँपी, "आज तक वहीं है।"

Continue......

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