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12.His Dark Obssession

कॉरिडोर में खड़े हर व्यक्ति के चेहरे का रंग उड़ चुका था। कुछ क्षण पहले तक जो लोग अपने प्रभाव और हैसियत के घमंड में खड़े थे, अब किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी कि राम की तरफ़ नज़र उठाकर भी देख सके।

वहाँ ऐसा सन्नाटा पसरा था कि लोगों को अपनी ही धड़कनों की आवाज़ साफ़ सुनाई दे रही थी। राम का क्रोध किसी तूफ़ान की तरह शोर नहीं मचा रहा था, बल्कि उसकी ख़ामोशी ही सबके भीतर भय पैदा कर रही थी।

तभी भीड़ को चीरता हुआ कमल रावत आगे आया। उसने एक नज़र दर्द से तड़पते कुणाल पर डाली और दूसरी राम पर। अगले ही पल वह बिना कुछ सोचे राम के पैरों में गिर पड़ा।

"सर...!" उसकी आवाज़ काँप रही थी। "प्लीज़... मेरे भाई को माफ़ कर दीजिए। उससे बहुत बड़ी गलती हो गई। पहली बार है... पहली गलती समझकर छोड़ दीजिए। मैं वादा करता हूँ, दोबारा ऐसी गलती कभी नहीं होगी।"

वह सचमुच गिड़गिड़ा रहा था। उसकी आवाज़ में घमंड का नामोनिशान नहीं था।

"सर... पहली गलती तो भगवान भी माफ़ कर देते हैं... प्लीज़... इसे माफ़ कर दीजिए।"

राम ने कुछ क्षण तक उसकी ओर देखा। उसके चेहरे पर दया का कोई भाव नहीं था। उसने धीरे से अपने जूते की नोक कमल की ठुड्डी के नीचे रखी और उसका चेहरा ऊपर उठा दिया ताकि वह उसकी आँखों में देख सके।

"गलत इंसान से दया माँग रहे हो..."उसकी आवाज़ पहले की तरह ही धीमी थी, लेकिन उसमें ऐसा ठंडापन था कि कमल का शरीर काँप उठा।

"मैं... भगवान नहीं हूँ।"राम कुछ क्षण चुप रहा। फिर एक-एक शब्द पर ज़ोर देते हुए बोला,

"फिर भी..."उसने कुणाल की ओर देखा, जो दर्द से कराहते हुए फर्श पर पड़ा था।..आज इसकी जान छोड़ रहा हूँ।

कमल की आँखों में उम्मीद की हल्की-सी चमक उभरी ही थी कि राम ने अपनी बात पूरी की

"लेकिन इसकी ज़िंदगी... मौत से भी बदतर होगी।"उसके शब्द किसी फैसले की तरह गिरे।

कमल का चेहरा फिर से सफ़ेद पड़ गया। वह समझ गया था कि राम जो कह देता है, उसे बदलता नहीं।

राम ने अब एक पल भी वहाँ रुकना उचित नहीं समझा। उसकी पूरी चिंता इस समय अनुराधा थी, जो अब तक उसके सीने से लगी हुई थी। उसने नीचे देखा। अनुराधा का शरीर पूरी तरह ढीला पड़ चुका था। उसके होंठों का रंग उड़ गया था और आँखें बंद थीं।

"जाना ..."उसने बहुत धीमे स्वर में पुकारा, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला।राम के चेहरे की कठोरता एक पल को बदल गई। उसने तुरंत उसे अपनी बाँहों में संभाला। अगले ही क्षण वह झुककर उसे सावधानी से गोद में उठा चुका था।

अनुराधा बिल्कुल निश्चल थी।उसका सिर राम के कंधे से टिक गया।राम ने एक बार उसकी साँसों को परखा। यह देखकर कि वह बेहोश हो चुकी है, उसकी बेचैनी और बढ़ गई।

उसने बिना कुछ कहे अभिमन्यु की ओर देखा।दोनों की नज़रें मिलीं और राम को कुछ कहने की ज़रूरत नहीं पड़ी।अभिमन्यु उसके हर इशारे को समझता था।उसने हल्का-सा सिर हिलाकर संकेत दिया कि यहाँ का बाकी मामला वह संभाल लेगा।

राम अनुराधा को अपनी बाँहों में उठाए तेज़ क़दमों से वहाँ से निकल गया। इस समय उसके लिए न मीटिंग मायने रखती थी, न करोड़ों का प्रोजेक्ट। उसके मन में बस एक ही बात थी की अनुराधा को तुरंत सुरक्षित जगह और इलाज की ज़रूरत थी।

राम के जाते ही स्वाति और कविता दूर खड़ी यह सब देख रही थीं। दोनों के चेहरे पर अलग-अलग भाव थे, लेकिन आँखों में एक जैसी चुभन थी।

कविता ने होंठ भींचते हुए धीमे स्वर में कहा,"हुँह... देखती हूँ, मिस्टर रघुवंशी... कब तक इस गुड़िया को इस तरह सँभालकर रखते हैं।"

स्वाति ने भी उसी दिशा में देखते हुए हल्की-सी व्यंग्यात्मक मुस्कान दी, लेकिन कुछ बोली नहीं।

उधर अभिमन्यु ने एक गार्ड को हाथ के इशारे से अपने पास बुलाया। उसका चेहरा पूरी तरह गंभीर था। उसने धीमे स्वर में कुछ निर्देश दिए। गार्ड ने तुरंत सिर हिलाया और बाकी सुरक्षा कर्मचारियों को संकेत देने के लिए आगे बढ़ गया।

अथर्व भी वहीं खड़ा था। उसकी नज़र अब भी कुणाल और उसके साथियों पर टिकी हुई थी। वह समझ चुका था कि यह घटना यहीं समाप्त नहीं हुई है। यह तो सिर्फ़ शुरुआत थी।

राम बिना एक पल रुके अनुराधा को अपनी बाँहों में उठाए होटल से बाहर निकला। उसकी चाल तेज़ थी, लेकिन इतनी संभली हुई कि अनुराधा को ज़रा-सा भी झटका न लगे।

होटल के बाहर पहले से खड़ी कार का दरवाज़ा ड्राइवर ने तुरंत खोल दिया। राम ने बड़ी सावधानी से अनुराधा को पिछली सीट पर अपने पास बैठाया। उसका सिर अब भी उसके कंधे से टिका हुआ था। वह पूरी तरह बेहोश थी।

"मेंशन चलो।"

राम की आवाज़ हमेशा की तरह धीमी थी, लेकिन उसमें ऐसा कठोर आदेश था कि ड्राइवर ने बिना कुछ पूछे तुरंत गाड़ी आगे बढ़ा दी।

कार सड़क पर दौड़ने लगी। बाहर शहर की चहल-पहल थी, लेकिन कार के भीतर अजीब-सी ख़ामोशी पसरी हुई थी।

राम ने जेब से अपना मोबाइल निकाला और अभिमन्यु को एक छोटा-सा मैसेज भेज दिया। संदेश में सिर्फ़ कुछ निर्देश थे। उसे पता था कि बाकी सब अभिमन्यु संभाल लेगा। मैसेज भेजने के बाद उसने मोबाइल एक तरफ़ रख दिया। उसकी सारी तवज्जो अब अनुराधा पर थी।

वह कुछ क्षण तक चुपचाप उसे देखता रहा।डर और सदमे की वजह से अनुराधा का चेहरा पूरी तरह पीला पड़ चुका था। उसके खुले हुए बाल बार-बार चेहरे पर आ रहे थे। राम ने बहुत सावधानी से वे लटें हटाकर उसके कान के पीछे कर दीं, ताकि उसके चेहरे पर साफ़ नज़र पड़ सके।

जैसे ही उसकी नज़र अनुराधा के चेहरे पर गई, उसकी साँस एक पल को भारी हो गई।

दोनों गालों पर सूख चुका खून साफ़ दिखाई दे रहा था। नाखूनों के गहरे निशान उसकी मुलायम त्वचा पर लाल लकीरों की तरह उभर आए थे। गर्दन पर दाँतों के निशान अब भी ताज़ा थे और वहाँ से निकला खून जमकर गहरा पड़ चुका था।

राम की उँगलियाँ अनायास मुट्ठी में बदल गईं।उसकी कनपटियों की नसें तन गईं।

वह बिना पलक झपकाए उन ज़ख्मों को देखता रहा। हर निशान उसके भीतर जलते हुए क्रोध को और भड़का रहा था। उसे बार-बार यही एहसास हो रहा था कि अगर वह कुछ मिनट पहले पहुँच जाता, तो अनुराधा को यह सब सहना नहीं पड़ता।

उसने धीरे से अपनी नज़रें बंद कीं और एक लंबी साँस ली, लेकिन भीतर उठ रहा तूफ़ान शांत नहीं हुआ।

कुछ क्षण बाद उसने बहुत सावधानी से अपना हाथ अनुराधा के सिर पर रखा। उसका स्पर्श इतना हल्का था, मानो उसे डर हो कि कहीं उसकी तकलीफ़ और न बढ़ जाए।

अनुराधा बेहोशी में भी हल्का-सा सिहर उठी और अनजाने में उसका सिर राम के कंधे की ओर और झुक गया।

राम ने उसे फिर से सहारा दिया और खिड़की के बाहर देखने लगा।उसके चेहरे पर वही ठंडी ख़ामोशी लौट आई थी।

लेकिन उसकी भींची हुई मुट्ठियाँ इस बात की गवाही दे रही थीं कि आज जो हुआ था... उसका हिसाब वह किसी भी कीमत पर अधूरा नहीं छोड़ेगा।

अवंतिका विला...

कुछ ही देर बाद काली बीएमडब्ल्यू अवंतिका विला के पोर्टिको में आकर रुकी। गाड़ी रुकते ही ड्राइवर जल्दी से नीचे उतरा और पीछे का दरवाज़ा खोल दिया।

राम बिना एक पल गँवाए अनुराधा को उसी तरह अपनी बाँहों में उठाए गाड़ी से नीचे उतरा। उसका पूरा ध्यान सिर्फ़ अनुराधा पर था। वह बेहोश थी और उसका चेहरा अब भी दर्द और थकान से बिल्कुल निढाल लग रहा था।

विला के मुख्य दरवाज़े पर खड़े सिक्योरिटी गार्ड से लेकर अंदर मौजूद नौकर-चाकर तक, सबकी नज़रें एक साथ राम पर टिक गईं।

पूरा माहौल कुछ पल के लिए जैसे थम गया।रघुवंशी परिवार में काम करने वाले ज़्यादातर लोग कई सालों से इस विला में थे। उन्होंने राम को बचपन से लेकर आज तक देखा था। उसका सख़्त स्वभाव, उसका अनुशासन और औरतों से उसकी दूरी... यह सब पूरे स्टाफ़ को अच्छी तरह मालूम था।

लेकिन आज...आज पहली बार उन्होंने किसी लड़की को राम रघुवंशी की बाँहों में देखा था।

सबके चेहरों पर हैरानी साफ़ दिखाई दे रही थी।

किसी के मन में सौ सवाल उठ रहे थे, लेकिन किसी की इतनी हिम्मत नहीं थी कि राम से कुछ पूछ सके। सब बस चुपचाप उसे जाते हुए देख रहे थे।

राम किसी की तरफ़ देखे बिना तेज़ कदमों से अंदर बढ़ गया। उसने एक पल भी नीचे रुकना ज़रूरी नहीं समझा। सीढ़ियाँ लगभग बिना रुके चढ़ते हुए वह सीधे पहली मंज़िल पर पहुँचा और अपने कमरे का दरवाज़ा खोलकर अंदर चला गया।

राम का कमरा उसकी पूरी शख़्सियत की तरह ही अलग था।कमरे की दीवारों पर पीच और क्रीम रंग का बेहद खूबसूरत कॉम्बिनेशन था, जो सादगी के साथ शाही एहसास भी देता था। हर चीज़ अपनी तय जगह पर रखी हुई थी। कमरे का इंटीरियर आधुनिक था, लेकिन उसमें घर जैसा सुकून भी महसूस होता था।

बीचों-बीच रखा बड़ा-सा किंग साइज़ बेड पूरे कमरे का आकर्षण था। उसके ठीक ऊपर क्रिस्टल का शानदार झूमर लगा था, जिसकी हल्की सुनहरी रोशनी पूरे कमरे को और भी खूबसूरत बना रही थी।

कमरे की एक तरफ़ पूरी काँच की दीवार थी, जिसके पार एक प्राइवेट इनडोर स्विमिंग पूल दिखाई देता था। उससे आगे एक छोटी-सी ओपन टैरेस थी। टैरेस पर तरह-तरह के रंग-बिरंगे फूलों और हरे पौधों से सजा हुआ छोटा-सा गार्डन बना था। उसी गार्डन के बीच लकड़ी का एक खूबसूरत झूला लगा था, जो हल्की हवा के साथ धीमे-धीमे हिल रहा था।

कमरे का हर कोना यह बता रहा था कि उसके मालिक को शोर-शराबे से ज़्यादा सुकून पसंद है।लेकिन इस समय न राम की नज़र उस कमरे की खूबसूरती पर थी और न ही उसके मन में किसी और चीज़ की जगह बची थी।

राम ने बहुत सावधानी से अनुराधा को बिस्तर पर लिटाया। उसके सिर के नीचे तकिया ठीक किया और कंधों पर चादर डाल दी। कुछ पल तक वह वहीं खड़ा उसे देखता रहा। बेहोशी में भी उसके चेहरे पर डर की रेखाएँ साफ़ दिखाई दे रही थीं। ऐसा लग रहा था, जैसे उसका मन अब भी उस भयावह घटना से बाहर नहीं निकल पाया हो।

राम धीरे-धीरे पीछे हटने लगा। उसने सोचा, डॉक्टर के आने तक ज़रूरी सामान की व्यवस्था कर ले। लेकिन जैसे ही वह मुड़ा, उसे अपने कदम रुकते हुए महसूस हुए।

उसने नीचे देखा।अनुराधा की उँगलियाँ उसकी शर्ट को कसकर पकड़े हुए थीं।बेहोशी की हालत में भी उसकी मुट्ठी ढीली नहीं हुई थी। उसकी पकड़ में इतनी घबराहट थी कि कपड़े पर सिलवटें पड़ गई थीं।

ऐसा लग रहा था, मानो उसका अवचेतन मन भी उसे जाने देने को तैयार नहीं था। जैसे उसे डर हो कि अगर उसने यह सहारा छोड़ दिया, तो वह फिर उसी अँधेरे में अकेली रह जाएगी।

राम कुछ क्षण तक निःशब्द उसे देखता रहा।

उसने धीरे से अपनी उँगलियाँ अनुराधा की मुट्ठी पर रखीं। वह चाहता तो आसानी से अपना हाथ छुड़ा सकता था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। उस काँपती हुई पकड़ ने उसके भीतर कहीं गहरा घाव कर दिया था।

उसकी आँखों में पहली बार नमी उतर आई।वह पलंग के किनारे बैठ गया। बहुत धीरे से उसने दूसरी हथेली अनुराधा के सिर पर फेरी। उसके बिखरे बालों को कान के पीछे किया और कुछ क्षण तक उसके शांत चेहरे को देखता रहा।

उसके मन में बार-बार वही एक बात गूँज रही थी! अगर मैं कुछ मिनट पहले पहुँच जाता...शायद यह सब नहीं होता।उसने झुककर बहुत हल्के से अनुराधा के माथे को चूम लिया।

"सॉरी, जाना ..." उसकी आवाज़ फुसफुसाहट से भी धीमी थी। "मैं... तुम्हारा ध्यान नहीं रख पाया।"

उसके शब्दों में पहली बार वह राम नहीं था, जिसे दुनिया जानती थी। उसमें एक ऐसा अपराधबोध था, जो उसे भीतर ही भीतर खाए जा रहा था।उसी समय कमरे के बाहर हल्की-सी दस्तक हुई।

राम ने तुरंत अपनी आँखों की नमी समेट ली। एक ही पल में उसके चेहरे पर फिर वही परिचित कठोरता लौट आई। उसने धीरे से अनुराधा की मुट्ठी से अपनी शर्ट छुड़ाई। इस बार उसने अपनी हथेली उसकी उँगलियों के नीचे रख दी, ताकि उसे अचानक खालीपन महसूस न हो।

तभी दरवाजा खुला और अंदर सबसे पहले अभिमन्यु आया। उसके पीछे आरोही थी और सबसे आखिर में अथर्व, जिसके हाथ में एक मेडिकल बैग था।

आरोही की नज़र जैसे ही बिस्तर पर लेटी अनुराधा पर पड़ी, उसके कदम वहीं रुक गए।

बिखरे हुए बाल...चेहरे पर खरोंचों के निशान...गर्दन पर चोट...और बेहोशी की हालत...

एक पल के लिए उसे समझ ही आया गया था की आखिर हुआ क्या था ।वह घबराकर कभी अनुराधा को देखती, कभी राम को।

राम खिड़की के पास जाकर खड़ा हो चुका था। उसकी पीठ सबकी ओर थी। कमरे में गहरा सन्नाटा पसरा हुआ था और उस सन्नाटे में किसी की भी हिम्मत नहीं हो रही थी कि सबसे पहला सवाल पूछे।

आरोही अभी भी स्तब्ध खड़ी थी...क्योंकि कुछ ही देर पहले तक उसे इस बात का ज़रा-सा भी अंदाज़ा नहीं था कि होटल में ऐसा कुछ घट चुका है।

कुछ देर पहले...

होटल से निकलने के कुछ ही मिनट बाद अभिमन्यु के मोबाइल पर राम का मैसेज आया। मैसेज छोटा था, लेकिन उसके शब्दों से साफ़ समझ आ रहा था कि मामला बेहद गंभीर है। राम ने लिखा था, "मिस आरोही त्रिवेदी को लेकर तुरंत मेंशन पहुँचो।

अथर्व से कहो, अनुराधा के लिए कुछ कपड़े लेकर आए।" मैसेज पढ़ते ही अभिमन्यु के चेहरे का रंग बदल गया। वह राम को इतने वर्षों से जानता था। राम कभी भी बेवजह किसी को आदेश नहीं देता था, और अगर उसने अनुराधा के लिए कपड़े मँगवाने को कहा है।

तो इसका मतलब ज़रूर कुछ ऐसा हुआ है, जिसके बारे में सोचकर ही उसका मन बेचैन हो उठा। उसने बिना समय गंवाए अथर्व को फोन करके सारी बात समझाई और खुद सीधे उस कंपनी की ओर निकल गया, जहाँ आरोही काम करती थी।

उस समय ऑफिस में रोज़ की तरह काम चल रहा था। कर्मचारी अपनी-अपनी सीटों पर बैठे कंप्यूटर स्क्रीन में व्यस्त थे। कोई क्लाइंट से बात कर रहा था, तो कोई मीटिंग की तैयारी में लगा था।

ऐसे माहौल में जब अभिमन्यु तेज़ कदमों से अंदर आया, तो कई लोगों की नज़रें अनायास उसकी ओर उठ गईं। वह बिना इधर-उधर देखे सीधे उस केबिन तक पहुँचा, जहाँ आरोही बैठी काम कर रही थी।

आरोही ने सामने किसी की आहट महसूस की तो सिर उठाकर देखा। वह कुछ समझ पाती, उससे पहले ही अभिमन्यु उसके सामने आकर खड़ा हो चुका था। उसने बिना किसी भूमिका के कहा, "चलिए, मेरे साथ।" इतना कहकर उसने उसका हाथ पकड़ लिया और लगभग उसे साथ लेकर बाहर की ओर चल पड़ा।

सब कुछ इतनी जल्दी हुआ कि आरोही कुछ पल के लिए समझ ही नहीं पाई कि आखिर हो क्या रहा है। उसने अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश करते हुए कहा, "सुनिए... आप हैं कौन? और इस तरह मेरा हाथ पकड़कर मुझे कहाँ ले जा रहे हैं?

लेकिन अभिमन्यु ने उसकी बात का जवाब नहीं दिया। उसके कदम लगातार बाहर की ओर बढ़ते रहे।

उधर पूरे ऑफिस में जैसे अचानक काम रुक गया था। जिस किसी ने भी यह दृश्य देखा, वह हैरानी से दोनों को देखता रह गया। एम्प्लोयी के बीच धीरे-धीरे फुसफुसाहट शुरू हो गई। कई लोग एक-दूसरे से पूछने लगे कि आखिर अभिमन्यु राठौर खुद ऑफिस आकर आरोही को इस तरह क्यों ले जा रहे हैं।

कुछ महिला कर्मचारी, जो अब तक अभिमन्यु को सिर्फ़ बिज़नेस मैगज़ीन या अख़बारों में देखा करती थीं, अब उन्हें अपने सामने देखकर पहले ही चौंकी हुई थीं। ऊपर से उसे आरोही का हाथ पकड़कर ले जाते देख उनके चेहरों पर हैरानी के साथ हल्की-सी जलन भी साफ़ दिखाई देने लगी। किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था।

ऑफिस से बाहर निकलकर जैसे ही अभिमन्यु उसे कार तक लाया, आरोही ने इस बार ज़ोर से अपना हाथ छुड़ाया। उसकी साँसें तेज़ चल रही थीं। वह गुस्से और घबराहट, दोनों से भरी हुई थी। "पहले ये बताइए कि आप हैं कौन? और मुझे इस तरह जबरदस्ती कहाँ ले जा रहे हैं?"

अभिमन्यु पहली बार रुका। उसने महसूस किया कि अगर उसने अब भी कुछ नहीं बताया, तो आरोही उसके साथ नहीं जाएगी। उसने शांत रहने की कोशिश करते हुए कहा, "देखिए, मिस... प्लीज़ मुझे गलत मत समझिए। मेरा नाम अभिमन्यु राठौर है। मैं राम रघुवंशी के साथ काम करता हूँ।"

राम रघुवंशी का नाम सुनकर भी आरोही के चेहरे पर कोई विशेष भाव नहीं आया। वह अब भी उसी सवाल का जवाब चाहती थी।

अभिमन्यु ने बिना बात घुमाए कहा, "आपकी दोस्त अनुराधा ठाकुर की तबीयत अचानक बिगड़ गई है। राम ने मुझे आपको तुरंत वहाँ लाने के लिए भेजा है।"

अनुराधा का नाम सुनते ही आरोही का चेहरा एकदम सफ़ेद पड़ गया। अभी तक उसके मन में जो गुस्सा था, उसकी जगह डर ने ले ली।

"अनु...?" उसकी आवाज़ काँप गई। "क्या हुआ उसे? वो ठीक तो है ना?

अभिमन्यु ने कुछ क्षण उसे देखा। उसके मन में बहुत कुछ था, लेकिन वह जानता था कि सड़क के बीच खड़े होकर यह सब बताना ठीक नहीं होगा।

उसने कार का दरवाज़ा खोलते हुए धीमे स्वर में कहा, "रास्ते में जितना बता सकता हूँ, बता दूँगा। लेकिन अभी हमें एक-एक मिनट की कीमत समझनी होगी।"

अभिमन्यु की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि आरोही ने उसे सिर से पैर तक ऐसे देखा, जैसे उसकी पूरी पर्सनैलिटी का एक्स-रे निकाल रही हो। अगले ही पल उसने फुर्ती से उसके हाथ से कार की चाबी झपट ली।

अभिमन्यु एक पल के लिए समझ ही नहीं पाया कि हुआ क्या है। जब तक वह कुछ सोचता, आरोही चाबी अपनी मुट्ठी में दबाकर उससे दो कदम दूर जा चुकी थी।

उसने अपनी आँखें छोटी करते हुए उसे घूरा, फिर बोली, "देखो मिस्टर... सबसे पहले तो अपनी ये हीरोगिरी किसी और को दिखाना।

"सुनो मिस्टर..." उसने पूरी गंभीरता से कहा, "मैं आरोही त्रिवेदी हूँ। कोई स्कूल की बच्ची या कॉलेज की बेवकूफ़ लड़की नहीं, जिसे तुम दो मीठी बातें सुनाओ और मैं तुम्हारे पीछे-पीछे चल दूँ।"

वह उसकी तरफ़ थोड़ा झुककर और उसकी आवाज़ की नकल उतार कर बोली, "आजकल सबसे पहले यही बोला जाता है, 'आपके मम्मी-पापा का एक्सीडेंट हो गया है... आपके दोस्त की तबीयत खराब है... जल्दी चलिए...'। और सामने वाला घबराकर बिना कुछ सोचे उनके साथ निकल पड़ता है।"

उसने अपनी उँगली हवा में लहराते हुए कहा, "लेकिन अफ़सोस... तुम गलत लड़की के पास आ गए हो।"इतना कहकर उसने चाबी अपनी जेब में रख ली और होंठ टेढ़े करते हुए बोली, "तो ये इमोशनल ड्रामा किसी और पर ट्राय करना। मुझ पर नहीं चलेगा।"

फिर उसने खुद ही मुँह बनाया और दोनों हाथ हवा में फैलाकर बोली,"क्यों...? और मैं इतनी बड़ी बुद्धू दिखती हूँ तुम्हें कि तुम्हारी बात सुनते ही गाड़ी में बैठ जाऊँ?"

अभिमन्यु कुछ बोलने के लिए मुँह खोलता, उससे पहले ही उसने उँगली उठाकर उसे रोक दिया।"नो... एक शब्द भी नहीं। पहले तुम बताओ हो कौन? कहाँ से आए हो? और मुझे कैसे जानते हो?"

वह एक कदम उसकी तरफ़ बढ़ी और चाबी हवा में हिलाते हुए बोली,"और अगर तुम्हारे दिमाग़ में ये चल रहा है कि मेरा हाथ पकड़ोगे, गाड़ी में बैठाओगे और मैं चुपचाप चली जाऊँगी..."

उसने हल्की-सी हँसी छोड़ी।"...तो भाईसाहब, बहुत गलत लड़की चुन ली है तुमने।"

इतना कहकर उसने अपनी दोनों बाँहें मोड़ीं, कराटे की मुद्रा बनाई और पूरी शान से बोली,

"मैं नेशनल लेवल मार्शल आर्ट्स चैंपियन हूँ। इसलिए शरीफ़ी से अपनी गाड़ी की चाबी वापस माँग लो... वरना अगले पाँच मिनट में तुम्हें खुद समझ नहीं आएगा कि ज़मीन पर पड़े हो या आसमान देख रहे हो।"

उसने फिर आँखें तरेरीं।"और हाँ... एक कदम भी मेरी तरफ़ बढ़ाया ना..."उसने चाबी से उसकी तरफ़ इशारा किया।"...तो सिर फोड़ने में मुझे दो सेकंड भी नहीं लगेंगे।"

आरोही पूरी अकड़ के साथ उसके सामने खड़ी थी। दूसरी तरफ़ अभिमन्यु उसे देख रहा था। उसे पहली बार एहसास हुआ कि सामने वाली लड़की सिर्फ़ बातूनी नहीं... बल्कि किसी को भी अपने शब्दों से चकरा देने का हुनर रखती है।

"इसलिए चुपचाप रास्ते से हट जाओ... नहीं तो त डॉक्टर भी एक्स-रे देखकर पूछेगा, 'भाई, हुआ क्या था?'"

उसकी आँखों में ज़रा-सा भी डर नहीं था। वह पूरे आत्मविश्वास के साथ अभिमन्यु के सामने खड़ी थी, मानो अगला वार करने के लिए बस उसके एक कदम बढ़ाने का इंतज़ार कर रही हो।

Continue........

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