अनुराधा सुबह से ही राम की हरकत और अपनी अंदर की बेचैनी मे उलझी हुई वाशरूम की तरफ बढ़ गयी।वॉशरूम की ओर जाते हुए अनुराधा को अचानक ऐसा महसूस हुआ, जैसे कोई उसके पीछे-पीछे चल रहा हो।
पहले तो उसने इसे अपना भ्रम समझा, लेकिन कुछ कदम आगे बढ़ते ही उसके भीतर बेचैनी और गहरी हो गई। वह एकदम से मुड़ी। लंबा-सा कॉरिडोर लगभग खाली था। दूर कुछ होटल स्टाफ अपनी-अपनी ड्यूटी में व्यस्त दिखाई दे रहे थे। उसके पीछे कोई नहीं था।
उसने गहरी साँस ली और खुद को समझाया कि शायद वह बेवजह घबरा रही है। फिर भी मन का डर पूरी तरह गया नहीं। वह तेज़ी से वॉशरूम के भीतर चली गई।
कुछ मिनट बाद जब वह बाहर निकली, तभी अचानक पीछे से किसी ने उसका मुँह कसकर दबा दिया।सब कुछ इतनी तेजी से हुआ कि उसे चीखने तक का मौका नहीं मिला।
उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। घबराहट से उसकी साँसें अटक गईं। उसने पूरी ताकत से उस हाथ को हटाने की कोशिश की, लेकिन पकड़ बेहद मजबूत थी। दूसरे हाथ ने उसके शरीर को पीछे से जकड़ रखा था।
तभी वो शख्स उसके कानों के पास झुकता है। अनुराधा घृणा मे अपनी आँखे बंद कर लेती है। वह अपनी जुबान क़ो हल्का निकाल कर उसकी त्वचा क़ो छू लेते है, " ह्ह्ह्हह्ह.! तुम इतनी नमकीन हो की तुमने चखने के चाहत और बढ़ गयी है।
उसके खुले गर्दन पर अपनी उंगलियों को घुमाते हुए, " उफ्फ्फ ! तुम्हारा ये सोने जैसा दमकता बदन! उसके बदन की खुशबु क़ो गहराई से अपनी सांसों मे भरता हुआ बोला, " उउउउम्म्म्म तुम्हारी खुशबु किसी को भी पागल कर देगी। "
अनुराधा ने पूरी ताकत से छूटने की कोशिश की। उसके हाथ लगातार उस आदमी की पकड़ ढीली करने में लगे थे, लेकिन हर कोशिश बेकार साबित हो रही थी।
उसकी आँखों में डर साफ़ उतर आया। आँसू अनायास बहने लगे, मगर उसने हार नहीं मानी। वह लगातार अपने हाथ-पैर चलाकर खुद को छुड़ाने की कोशिश करती रही।
पीछे से दबे स्वर में एक आवाज़ आई,"जितना छटपटाना है, छटपटा लो। यहाँ तुम्हारी मदद करने कोई नहीं आएगा। तुम हो कौन! तुम कोई बड़े बाप की बेटी नहीं हो। जो कोई तुम्हारे लिए आए।एक मामूली सी नौकर तो तुम औऱ कौन सा पहली बार मजे दोगी बेबी ! उम्म! फिर उसके गर्दन पर जोर से दाँत कांट लिया ! हम्म्म्म। बहुत मजा आएगा। "
अनुराधा की चीख अंदर डब गयी थी और उसके भीतर दहशत और गहरी हो गई।उसी समय अँधेरे कोने से दो और आदमी बाहर आए।
उनमें से एक ने धीमे स्वर में कहा, "चलो, कुणाल... यहाँ ज़्यादा देर रुकना ठीक नहीं। इसे कमरे में ले चलते हैं।"
"ठीक है," कुणाल ने कठोर स्वर में कहा और अनुराधा को लगभग घसीटते हुए आगे बढ़ने लगा।
अनुराधा ने पूरी ताकत लगाकर पास लगे दरवाज़े के हैंडल को पकड़ लिया। उसकी उँगलियाँ इतनी ज़ोर से जकड़ गईं कि पोर सफ़ेद पड़ गए।
"छोड़ इसे!" उनमें से एक आदमी गुर्राया और उसे और ज़ोर से खींचने लगा।
खींचातानी में उसके कंधे के पास से कुर्ता फट गया, लेकिन उसने दरवाज़ा नहीं छोड़ा। उसकी हथेलियाँ दर्द से जल रही थीं, साँसें बेकाबू थीं और आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे। उसे समझ आ गया था कि अगर उसने यह पकड़ छोड़ दी, तो शायद खुद को बचाने का कोई मौका नहीं बचेगा।
उसने अपनी बची हुई सारी ताकत उसी दरवाज़े की पकड़ में समेट दी, जबकि वे लोग उसे निर्दयता से अपनी ओर घसीटने में लगे हुए थे।
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उधर राम की बेचैनी हर बीतते पल के साथ बढ़ती जा रही थी। अनुराधा का फोन लगातार बज रहा था, लेकिन हर बार बिना उठे कट जा रहा था। अब उसके भीतर उठ रही आशंका साफ़ चिंता में बदल चुकी थी। तेज़ कदमों से चलता हुआ वह वॉशरूम वाले कॉरिडोर की तरफ़ पहुँचा। चारों ओर नज़र दौड़ाते हुए उसने ऊँची आवाज़ में पुकारा,
"मिस ठाकुर...!"
उसकी आवाज़ सुनते ही अनुराधा को पकड़े हुए लोग एक पल के लिए चौकन्ने हो गए। उन्होंने तुरंत उसे दीवार की ओट में खींच लिया और खुद भी छिप गए। पूरे कॉरिडोर में फिर से सन्नाटा छा गया।
वहीं दूसरी ओर...राम की आवाज़ जैसे ही अनुराधा के कानों में पड़ी, उसकी पलकों पर ठहरे आँसू ढुलक पड़े। उसने एक पल के लिए आँखें बंद कर लीं।
"राम..."यह शब्द उसके होंठों तक नहीं आया, लेकिन उसके मन ने पूरी ताक़त से उसे पुकारा।
उधर राम अचानक ठिठक गया।न जाने क्यों उसे एक अजीब-सा एहसास हुआ, जैसे किसी ने बहुत बेचैनी से उसे आवाज़ दी हो। उसने धीरे-धीरे अपनी नज़रें पूरे कॉरिडोर में दौड़ाईं। उसका चेहरा पहले से भी ज़्यादा गंभीर हो गया।
"मिस ठाकुर..." उसने इस बार पहले से ऊँची आवाज़ में कहा, "अगर ये आपकी कोई शरारत है तो अभी के अभी बाहर आ जाइए।"
उसकी आवाज़ में झुँझलाहट थी, लेकिन उसके भीतर चिंता साफ़ महसूस की जा सकती थी।
अनुराधा ने छूटने की एक और नाकाम कोशिश की। उसके हाथ कसकर पकड़े हुए थे। वह चाहकर भी कोई आवाज़ नहीं निकाल पा रही थी। बेबसी से उसने फिर आँखें बंद कर लीं। उसी क्षण उसकी नज़र अपनी कलाई पर पड़ी।
उसकी चूड़ियाँ...अगले ही पल उसके मन में उम्मीद की एक किरण जागी।"
उसने मन ही मन प्रार्थना की और अपनी बची हुई सारी ताक़त दोनों हाथों में समेट ली। जिन हाथों को वे लोग पकड़े हुए थे, उन्हें उसने बार-बार पूरी शक्ति से झटकना शुरू कर दिया।
शुरू में बस हल्की-सी खनक सुनाई दी।फिर...खन... खन... खन...कॉरिडोर की ख़ामोशी में काँच की चूड़ियों की आवाज़ साफ़ गूँज उठी।
राम की आँखें एकदम से सिकुड़ गईं।उसने सिर हल्का-सा घुमाया।यह आवाज़...वह इस खनक को पहचानता था।उसकी नज़र तुरंत कॉरिडोर के उस बंद हिस्से की ओर गई, जहाँ से आवाज़ आ रही थी।
एक पल के लिए उसकी भौंहें ऊपर उठीं।अगले ही क्षण उसका चेहरा पत्थर की तरह सख़्त हो गया।बिना एक सेकंड गँवाए वह उसी दिशा में तेज़ी से दौड़ पड़ा, जहाँ चूड़ियों की खनक उसे लगातार रास्ता दिखा रही थी।
कॉरिडोर में गूँजते राम के तेज़ कदमों की आवाज़ अब लगातार नज़दीक आती जा रही थी। उसे सुनते ही वहाँ मौजूद सभी लोगों के चेहरों का रंग उड़ गया। कुछ ही क्षण पहले तक जो लोग अनुराधा को अपनी पकड़ में जकड़े हुए थे, अब उनके चेहरों पर घबराहट साफ़ दिखाई देने लगी।
किसी ने फुसफुसाकर कहा, "जल्दी... इसे यहाँ से ले चलो।" लेकिन अब निकलने का कोई रास्ता नहीं बचा था। जिस दिशा से कदमों की आवाज़ आ रही थी, उसी तरफ़ से अगले ही पल राम सामने आ खड़ा हुआ।
राम ने जैसे ही उस कोने में नज़र डाली, उसके कदम वहीं रुक गए।उसके सामने जो दृश्य था, उसने उसके भीतर वर्षों से जमा हुआ धैर्य एक ही पल में तोड़ दिया।
अनुराधा लगभग लड़खड़ाती हुई खड़ी थी। उसके खुले घुँघराले बाल पूरी तरह बिखर चुके थे। आँखों के चारों ओर फैला हुआ काजल बता रहा था कि वह कितनी देर से रो रही थी। उसके कंधे के पास से कपड़ा फटा हुआ था और गर्दन पर दाँतों के निशान के साथ खून की पतली-सी लकीर अब भी रिस रही थी।
उसके चेहरे पर ऐसा भय था, जैसा किसी ऐसे इंसान के चेहरे पर होता है जिसने कुछ ही पल पहले अपने जीवन का सबसे डरावना अनुभव झेला हो।राम की नज़र एक-एक निशान पर ठहरती चली गई।उसने कुछ नहीं कहा।
उसकी आँखों में उतरती हुई लालिमा ही उसके भीतर उठ रहे तूफ़ान की गवाही दे रही थी। उसके जबड़े इतने कस चुके थे कि कनपटियों की नसें साफ़ उभर आई थीं। उसकी मुट्ठियाँ धीरे-धीरे भिंचती चली गईं। वह उन लोगों को नहीं देख रहा था, बल्कि उनके किए हुए हर काम का हिसाब अपनी आँखों में उतार रहा था।
उस क्षण वहाँ मौजूद किसी भी आदमी की हिम्मत नहीं हुई कि उसकी आँखों में आँखें डाल सके। कमरे में ऐसा सन्नाटा फैल गया, मानो सबकी साँसें थम गई हों।
राम की आवाज़ जब निकली, तो वह ऊँची नहीं थी। लेकिन उसमें ऐसा ठंडा क्रोध था कि सुनने वालों की रीढ़ में सिहरन दौड़ गई।
"उसे... छोड़ दो...! बस तीन शब्द कहे उसने...न कोई चीख, न कोई धमकी दी थी ।फिर भी उन शब्दों का असर ऐसा था कि अनुराधा को पकड़े हुए दो लोगों के हाथ अपने आप ढीले पड़ गए।
राम ने उनके जवाब का इंतज़ार नहीं किया। वह तेज़ी से आगे बढ़ा। एक झटके में उसने अनुराधा को उनकी पकड़ से अपनी ओर खींच लिया। इतने ज़ोर से नहीं कि उसे दर्द हो, बल्कि इतनी मजबूती से कि अब कोई उसे दोबारा छू भी न सके।
अनुराधा का शरीर पूरी तरह काँप रहा था। उसके पैरों में इतनी ताक़त नहीं बची थी कि वह अपने बल पर खड़ी रह सके। जैसे ही वह उन लोगों की पकड़ से छूटी, उसका संतुलन बिगड़ गया और वह सीधे राम के सीने से आ लगी।
राम ने बिना एक पल गँवाए उसे अपनी बाँहों में संभाल लिया। एक हाथ उसकी पीठ पर था, दूसरा उसके कंधे के पास, ताकि उसका फटा हुआ कपड़ा और न खिसके। उस समय उसके मन में न मीटिंग थी, न करोड़ों का प्रोजेक्ट, न वहाँ खड़े लोग। उसके लिए उस क्षण सिर्फ़ एक ही सच था..अनुराधा सुरक्षित नहीं थी।
उसने धीरे से उसकी ठुड्डी उठाई।अनुराधा ने काँपती पलकों के साथ उसकी ओर देखा।
उसकी आँखें आँसुओं से इतनी भर चुकी थीं कि सामने खड़ा चेहरा भी धुँधला दिखाई दे रहा था। लेकिन उस धुँधलेपन में भी उसने राम को पहचान लिया।
पहचानते ही उसके चेहरे पर एक अजीब-सी राहत उतर आई। जैसे बहुत देर तक डूबते रहने के बाद किसी को किनारा दिखाई दे गया हो।उसे पहली बार लगा...वह बच गई है।उसकी आँखों से आँसू और तेज़ी से बह निकले। काँपते हुए होंठ मुश्किल से हिले। बहुत धीमी, लगभग टूटती हुई आवाज़ में उसके मुँह से सिर्फ़ एक नाम निकला, "राम..."आवाज़ इतनी धीमी थी कि शायद कोई और सुन भी न पाता।
लेकिन राम ने सुन लिया।यह पहली बार था जब अनुराधा ने उसे इस तरह पुकारा था! न "सर", न "मिस्टर रघुवंशी"... सिर्फ़ "राम"।
अपने नाम को उस आवाज़ में सुनते ही राम के भीतर कुछ टूट-सा गया।वह वही लड़की थी, जो कुछ देर पहले तक उसे "रावण रघुवंशी" कहकर चिढ़ा रही थी। लेकिन इस वक़्त... डर की उस हालत में उसके होंठों से सबसे पहले उसी का नाम निकला था।
राम ने बिना एक पल गँवाए उसे अपने सीने से लगा लिया। ऐसा नहीं कि वह उसे दुनिया से छिपा रहा था... बल्कि जैसे उसे यह भरोसा दिला रहा हो कि अब उसे कोई हाथ भी नहीं लगा सकेगा।
उसने धीरे से उसकी पीठ पर हाथ फेरा। उसकी अपनी साँसें भी अब सामान्य नहीं थीं। आँखों में उतर आया गुस्सा अभी भी जल रहा था, लेकिन उस गुस्से से कहीं ज़्यादा उसके भीतर एक कसक थी। वह कुछ मिनट पहले क्यों नहीं पहुँचा?
कुछ क्षण तक वह कुछ बोल ही नहीं पाया।फिर बहुत धीमी आवाज़ में, जो शायद सिर्फ़ अनुराधा तक पहुँची, उसके होंठ हिले, "सॉरी..."उसने आँखें एक पल के लिए बंद कर लीं।
"सॉरी... अनु..! मैं देर से पहुँचा... और यही मेरी सबसे बड़ी गलती थी।"
उसकी आवाज़ में पहली बार राम रघुवंशी का घमंड नहीं था। वहाँ सिर्फ़ पछतावा था... ऐसा पछतावा, जो उसे भीतर ही भीतर खाए जा रहा था कि जिस लड़की की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी उसने अनकहे ही अपने ऊपर ले ली थी, वही लड़की आज उसकी आँखों के सामने इस हालत में खड़ी थी।
राम ने अनुराधा को अब भी अपने सीने से इस तरह थाम रखा था, मानो वह उसे यकीन दिला रहा हो कि अब उसके रहते कोई उसे छू भी नहीं सकता। उसका एक हाथ अनुराधा के काँपते हुए कंधे पर था, जबकि दूसरी बाँह उसे अपने संरक्षण में लिए हुए थी। अनुराधा का चेहरा उसके सीने से लगा हुआ था। उसकी साँसें अब भी बुरी तरह काँप रही थीं।
लेकिन राम की निगाहें अब उसके सामने खड़े उन लोगों पर टिक चुकी थीं।उसकी आँखों में ऐसा ठंडा क्रोध उतर आया था, जो चीखता नहीं था... फैसला सुनाता था। उसका चेहरा बिल्कुल शांत था, पर वही शांति सबसे अधिक भयावह थी। वहाँ मौजूद हर आदमी को ऐसा महसूस हो रहा था, जैसे उनके सामने कोई इंसान नहीं, बल्कि उनके अपराधों का न्याय खड़ा हो।
कुछ क्षण तक वह बिना कुछ बोले उन्हें देखता रहा।फिर उसकी भारी, बर्फ़ जैसी ठंडी आवाज़ उस सुनसान कॉरिडोर में गूँजी,"इतनी हिम्मत..."वह एक-एक शब्द पर रुकते हुए बोला,"...कि राम रघुवंशी की इज़्ज़त पर हाथ डालने की कोशिश की।"
उसकी आँखें धीरे-धीरे उन सभी चेहरों पर घूमीं।"लगता है... तुम लोगों का अपनी ज़िंदगी से मोह खत्म हो चुका है।"अचानक उसकी नज़र एक चेहरे पर आकर ठहर गई।
"और तुम..."उसने सीधे उसकी आँखों में देखते हुए कहा,"कुणाल रावत हो... है न?"
कुणाल का गला अनायास सूख गया, लेकिन उसने अपने चेहरे पर झूठा आत्मविश्वास बनाए रखने की कोशिश की।
राम की आवाज़ पहले जैसी ही धीमी थी।"क्या... यही परवरिश दी है तुम्हारे बाप ने?"
कॉरिडोर में ऐसी ख़ामोशी थी कि सबको अपनी धड़कनों की आवाज़ तक सुनाई दे रही थी। राम ने आवाज़ ऊँची नहीं की थी, फिर भी उसके शब्दों का भार इतना था कि वहाँ खड़े बाकी लोगों का खून जैसे जमने लगा।
उनमें से कोई उसकी आँखों में देखने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था।सिर्फ़ कुणाल को छोड़कर।उसने होंठों पर एक भद्दी मुस्कान लाते हुए व्यंग्य से कहा,"इतना गुस्सा किस बात का है, मिस्टर रघुवंशी?"
उसने अनुराधा की ओर तिरछी नज़र डालते हुए बेहूदा लहजे में कहा,"सेक्रेटरी ही तो है..."
वह हँसा, "और सेक्रेटरी होती ही किसलिए है? अपने बॉस को खुश करने के लिए।"
उसने जानबूझकर राम को उकसाने की कोशिश की।"जब राम रघुवंशी इसके साथ मज़े ले सकता है..."उसके होंठों पर गंदी मुस्कान और चौड़ी हो गई"...तो हमें क्यों नहीं? आखिर हम भी किसी से कम नहीं हैं।"
उसका वाक्य पूरा भी नहीं हुआ था की अगले ही क्षण...कॉरिडोर में एक दर्दनाक चीख गूँज उठी।आह्ह्ह...!
किसी को समझने का मौका तक नहीं मिला कि हुआ क्या था।
राम ने अनुराधा को सावधानी से अपने पीछे किया और बिजली की-सी रफ़्तार से उसके सामने पहुँचा था।अगले ही पल उसकी एक ज़बरदस्त किक सीधे कुणाल के पैरों के बीच जा लगी।
वार इतना तेज़ था कि कुणाल का पूरा शरीर हवा में उछलते-उछलते वहीं दोहरा हो गया।
उसकी आँखें पलटने लगीं। मुँह से चीख़ के अलावा कोई आवाज़ नहीं निकली। दोनों हाथ दर्द से उसी जगह पर चले गए और वह वहीं घुटनों के बल गिर पड़ा।कॉरिडोर में कुछ सेकंड के लिए ऐसा सन्नाटा छा गया कि सिर्फ़ कुणाल की दर्दभरी कराहें सुनाई दे रही थीं।दर्द से उसका चेहरा विकृत हो चुका था। वह ठीक से साँस तक नहीं ले पा रहा था।
बाकी सभी लोग जड़ होकर खड़े रह गए।उन्हें अब पहली बार एहसास हुआ था कि उन्होंने किस इंसान को ललकार दिया था।
राम के भीतर उठ रहा क्रोध अब किसी के नियंत्रण में नहीं था। उसकी साँसें सामान्य थीं, चेहरा भी वैसा ही शांत था, लेकिन उसकी आँखों में उतर आई कठोरता देखकर अच्छे-अच्छों का साहस जवाब दे जाता।
अनुराधा ने अनजाने में उसकी शर्ट को और कसकर पकड़ लिया। अभी कुछ देर पहले तक वह उन दरिंदों से छूटने के लिए संघर्ष कर रही थी, और अब राम के भीतर उमड़ते उस भयानक क्रोध को देखकर उसके भीतर एक नया डर जन्म ले चुका था। वह बिना कुछ कहे और सिमटकर उसके सीने से लग गई।
राम ने उसकी उस हरकत को महसूस किया।
उसने एक पल के लिए अपना हाथ उसके सिर पर रख दिया। उसकी पकड़ में वही दृढ़ता थी, लेकिन स्पर्श में अजीब-सी कोमलता थी। जैसे वह उसे यह भरोसा दे रहा हो कि अब उसे किसी बात से डरने की ज़रूरत नहीं है। उसने अनुराधा को अपनी बाँहों की ओट में वैसे ही छिपाए रखा, जैसे कोई अपने सबसे अनमोल ख़ज़ाने को हर बुरी नज़र से बचाकर रखता है।
फिर उसकी नज़र दोबारा कुणाल पर टिक गई।
कुणाल दर्द से कराहता हुआ घुटनों के बल पड़ा था। वह उठने की कोशिश कर ही रहा था कि राम ने आगे बढ़कर अपने जूते का तलवा उसके चेहरे पर रख दिया।
कुणाल की कराह और तेज़ हो गई।राम ने बिना किसी जल्दबाज़ी के अपने जूते को उसके चेहरे पर दबाते हुए कहा,
"तुझे अंदाज़ा भी नहीं है कि तूने किसे हाथ लगाने की जुर्रत की है। तूने राम रघुवंशी की सबसे बेशकीमती चीज़ को छूने की कोशिश की है।"
उसकी आवाज़ में चीख नहीं थी।वह उतनी ही ठंडी थी जितनी किसी ऐसे आदमी की होती है, जो अपना फैसला सुना चुका हो।
उसने जूते का दबाव थोड़ा और बढ़ाया।
"तुम जैसे लोग ही किसी स्त्री के मान-सम्मान को कुचलते हैं। अपने आपको ताक़तवर समझते हो, क्योंकि सामने वाली औरत है। एक बार भी यह नहीं सोचते कि उसके भी सपने हैं, उसका भी आत्मसम्मान है, और उसकी ज़िंदगी से खेलने का हक़ इस दुनिया में किसी को नहीं मिला।"
राम कुछ पल के लिए रुका। उसकी आँखें अब भी कुणाल पर जमी थीं।
"स्त्री का सम्मान करना सिखाया जाता है... लेकिन जिसके संस्कार ही सड़े हुए हों, उससे ऐसी उम्मीद करना भी बेकार है। और जिसकी परवरिश ही ऐसी हो..." उसके होंठों पर तिरस्कार भरी मुस्कान उभरी, "...उसे औरत में सिर्फ़ शिकार ही दिखाई देता है।"
कुणाल दर्द से छटपटा रहा था, लेकिन राम के चेहरे पर कोई बदलाव नहीं आया। उसकी खामोशी और उसके शब्द ..दोनों मिलकर वहाँ मौजूद हर आदमी के दिल में ऐसा डर भर रहे थे, जिसे वे शायद ज़िंदगी भर भूल नहीं पाते। आखिर उन्हें समझ आ चुका था कि उन्होंने सिर्फ़ एक लड़की पर हाथ नहीं उठाया था... उन्होंने उस इंसान की सीमा लाँघ दी थी, जिसके लिए यह अपराध माफ़ करने योग्य नहीं था।
तभी कॉरिडोर में एक साथ कई लोगों के तेज़ कदमों की आहट गूँज उठी। अभिमन्यु, अथर्व और मीटिंग में मौजूद लगभग सभी लोग शोर सुनकर वहाँ तक पहुँच चुके थे। लेकिन जैसे ही अनुराधा के कानों में इतने लोगों की आवाज़ें पड़ीं, उसका डर और बढ़ गया। अभी-अभी जो भय उसने झेला था, उससे उसका पूरा शरीर अब भी काँप रहा था।
उसने बिना कुछ सोचे राम की शर्ट को अपनी मुट्ठियों में और कसकर पकड़ लिया और अपना चेहरा उसके सीने में छिपा लिया। वह इस तरह उससे लिपट गई, मानो खुद को दुनिया की नज़रों से नहीं, बल्कि राम के अंदर ही छिपा लेना चाहती हो।
उसकी काँपती हुई साँसें लगातार राम के सीने से टकरा रही थीं। राम ने उसकी हालत महसूस की। उसने अपना एक हाथ उसके सिर पर रख दिया और दूसरे हाथ से उसे और मजबूती से अपनी बाँहों में समेट लिया। उसने कुछ कहा नहीं, लेकिन उसकी पकड़ ही अनुराधा को यह भरोसा दिलाने के लिए काफ़ी थी कि अब उसके रहते कोई उसे छू भी नहीं सकता।
उधर वहाँ मौजूद हर इंसान की नज़र जब ज़मीन पर पड़ी, तो सबके चेहरे का रंग उड़ गया। कुणाल रावत दर्द से ज़मीन पर पड़ा तड़प रहा था। बिज़नेस वर्ल्ड का एक बड़ा नाम... इस वक़्त राम रघुवंशी के पैरों के नीचे कराह रहा था।
किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी कि आगे बढ़कर उसे छुड़ा सके। सभी जानते थे कि राम का गुस्सा ख़तरनाक होता है, लेकिन आज पहली बार वे उसे अपनी आँखों से देख रहे थे।
राम का एक पैर अब भी कुणाल के सिर पर रखा हुआ था, जबकि दूसरा उसी हाथ को अपने जूते के नीचे कुचल रहा था, जिस हाथ से उसने अनुराधा को पकड़ने की कोशिश की थी। कुणाल दर्द से बार-बार अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश कर रहा था, लेकिन जितनी बार वह हिलता, राम अपने जूते का दबाव उतना ही बढ़ा देता। उसकी आँखों में अब दया जैसी कोई चीज़ नहीं बची थी।
उसने धीरे-धीरे अपनी नज़र वहाँ खड़े हर आदमी पर घुमाई। उसकी लाल आँखों से नज़र मिलाने की हिम्मत किसी में नहीं थी। फिर उसकी ठंडी, मगर रूह तक कंपा देने वाली आवाज़ पूरे कॉरिडोर में गूँजी, "अगर... किसी ने भी... गलती से भी राम रघुवंशी की ज़िंदगी पर नज़र उठाकर देखने की कोशिश की... तो समझ लेना, वही उसकी ज़िंदगी का आख़िरी दिन होगा।"
उसने बोलते हुए अपने जूते का दबाव कुणाल के हाथ पर और बढ़ा दिया। कुणाल दर्द से तड़प उठा, लेकिन राम के चेहरे पर कोई बदलाव नहीं आया। वह उसी कठोर स्वर में आगे बोला, "राम रघुवंशी अपनी सबसे छोटी चीज़ पर भी किसी और की नज़र बर्दाश्त नहीं करता... और तुम..." उसकी आवाज़ अचानक और भारी हो गई, "...तुमने तो मेरी रूह को हाथ लगाने की कोशिश की है।"
इतना कहते ही उसका धैर्य जैसे पूरी तरह टूट गया। उसने अपने जूते से कुणाल के चेहरे पर लगातार कई वार कर दिए। कुणाल की दर्द भरी चीखें पूरे कॉरिडोर में गूँज उठीं, लेकिन वहाँ मौजूद किसी भी आदमी के पैर आगे नहीं बढ़े।
सब पत्थर बने खड़े थे। उस पल किसी की नज़र कुणाल पर नहीं, बल्कि राम रघुवंशी के चेहरे पर थी। उसके चेहरे पर उबलता हुआ क्रोध साफ़ बता रहा था कि जिसने आज अनुराधा की तरफ़ ग़लत नज़र उठाई है, उसके लिए यह सज़ा अभी शुरुआत भर है।
Continue.........


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