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10.His dark Obssession

अनुराधा की लगातार चलती बातें सुनकर राम ने एक गहरी साँस ली। उसने अपनी आँखें क्षणभर के लिए बंद कीं और दो उँगलियों से अपना माथा दबाने लगा, मानो उसका धैर्य धीरे-धीरे जवाब दे रहा हो। मन ही मन उसने झुँझलाकर सोचा, "हे भगवान... ये लड़की इतना बोलती कैसे है?"

लेकिन अनुराधा को उसकी खामोशी से कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। वह अब भी उसी रफ़्तार से बोले जा रही थी, "सर, आप क्यों नहीं समझते? मैं कैब से आ जाऊँगी। आपके साथ जाने की कोई ज़रूरत नहीं है।"

राम ने उसकी बात पूरी होने का इंतज़ार किया। फिर बहुत शांत स्वर में बोला, "बोल लिया?"

अनुराधा ने भौंहें चढ़ाकर कहा, "अभी तो शुरू किया है।"

राम ने हल्की-सी साँस छोड़ी, गाड़ी का पिछला दरवाज़ा खोला और उसकी तरफ़ देखते हुए बोला, "मीटिंग में तुम मेरी पर्सनल सेक्रेटरी के तौर पर चल रही हो, मेहमान बनकर नहीं। इसलिए बहस बाद में कर लेना... अभी गाड़ी में बैठो।"

" मैंने कहा ना मै कैब से आउंगी। " अनुराधा ने अपने कमर पर हाथ रख कर, एक बार फिर से उसे घूरा और इन्कार किया।

राम गहरी सांस भर रहा था लेकिन उसने अपनी झुँझलाहट को चेहरे पर आने नहीं दिया। अगले ही पल वह बिना किसी चेतावनी के अनुराधा के बिल्कुल करीब आया। इससे पहले कि अनुराधा कुछ समझ पाती, उसने सहजता से उसे अपनी बाँहों में उठा लिया।

"आ... आप...!" अनुराधा घबरा गई। उसका पूरा शरीर एक पल के लिए सख्त पड़ गया। उसने तुरंत उसके कंधे पर हाथ रखते हुए छूटने की कोशिश की।

"छोड़िए मुझे, मिस्टर... रावण रघुवंशी!" वह झुँझलाकर बोली। "नहीं तो अच्छा नहीं होगा।"

राम बिना कुछ कहे आगे बढ़ता रहा।अनुराधा की बड़बड़ाहट भी जारी रही।

"सुन रहे हैं आप? मुझे नीचे उतारिए... वरना... वरना मुझे बचाने खुद कृष्ण भगवान आ जाएँगे।"

उसकी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि राम ठिठक गया।उसने धीरे से अपना सिर घुमाकर अनुराधा की ओर देखा।वह कोई साधारण नज़र नहीं थी।उसकी गहरी, स्थिर आँखें बिना कुछ कहे ही बहुत कुछ कह रही थीं।

अनुराधा की आवाज़ वहीं थम गई।अभी तक जो होंठ बिना रुके बोले जा रहे थे, वे अचानक शांत हो गए। उसने सकपकाकर अपनी नज़रें दूसरी ओर फेर लीं। पहले दाईं तरफ़ देखा... फिर बाईं तरफ़... फिर सामने। जैसे उसे अचानक आसपास की हर चीज़ बेहद दिलचस्प लगने लगी हो, बस राम की आँखों में देखना छोड़कर।

राम ने कुछ नहीं कहा।बस हल्की-सी साँस छोड़ते हुए उसे लेकर कार तक पहुँचा।ड्राइवर ने पीछे का दरवाज़ा पहले ही खोल दिया था।

राम ने पूरी सावधानी से अनुराधा को पिछली सीट पर बैठाया। उसके बैठ जाने के बाद वह स्वयं भी उसके बगल में आकर बैठ गया और दरवाज़ा बंद कर दिया।फिर उसने सामने बैठे ड्राइवर की ओर देखते हुए संक्षिप्त स्वर में कहा,"सम्राट होटल।"

"जी, सर।"ड्राइवर ने तुरंत गाड़ी आगे बढ़ा दी।कार सड़क पर दौड़ने लगी। भीतर फिर वही ख़ामोशी लौट आई, जिसे तोड़ने का काम शायद कुछ ही क्षणों में अनुराधा करने वाली थी।

सम्राट होटल शहर के सबसे प्रतिष्ठित बिज़नेस होटलों में गिना जाता था। आज उसके कॉन्फ़्रेंस विंग में असामान्य चहल-पहल थी। देश की कई नामी कंपनियों के प्रतिनिधि वहाँ पहले से मौजूद थे। एक बहुचर्चित प्रोजेक्ट को लेकर आयोजित इस हाई-प्रोफाइल मीटिंग में शामिल होने के लिए बड़े-बड़े उद्योगपति और उनके प्रतिनिधि एक-एक कर पहुँच चुके थे।

मीटिंग रूम के भीतर लंबी ओवल टेबल के चारों ओर सभी अपनी-अपनी जगह पर बैठे हुए थे। सामने लगी बड़ी एलईडी स्क्रीन पर प्रोजेक्ट की शुरुआती परजेटेंशन दिखाई दे रही थी, जबकि कुछ लोग आपस में धीमी आवाज़ में चर्चा कर रहे थे।

रघुवंशी ग्रुप की ओर से अभिमन्यु और अथर्व पहले ही पहुँच चुके थे। दोनों इम्पोर्टेन्ट डाक्यूमेंट्स की अंतिम बार जाँच कर रहे थे। बीच-बीच में उनकी नज़र दरवाज़े की तरफ़ उठ जाती, मानो वे किसी का इंतज़ार कर रहे हों।

दूसरी ओर, रघुवंशी ग्रुप की सबसे बड़ी प्रतिद्वंद्वी कंपनी मेहता कॉर्प के मालिक हर्षित मेहता अपनी कुर्सी पर पूरे आत्मविश्वास के साथ बैठे थे। उनके बगल में उनकी छोटी बहन कविता मेहता शांत भाव से मीटिंग की फ़ाइलें देख रही थी। कुछ दूरी पर कुणाल रावत और कमल रावत भी मौजूद थे। दोनों के चेहरों पर गंभीरता साफ़ झलक रही थी।

प्रवीण गोयल भी अपनी बेटी स्वाति गोयल के साथ समय से पहले पहुँच चुके थे। स्वाति बार-बार अपने टैबलेट पर नोट्स देख रही थी, जबकि प्रवीण गोयल बीच-बीच में वहाँ बैठे अन्य उद्योगपतियों से औपचारिक बातचीत कर रहे थे।

कमरे में बातचीत का शोर धीमे-धीमे चल ही रहा था कि अचानक कॉन्फ़्रेंस रूम का दरवाज़ा खुला।एक क्षण के लिए जैसे पूरा माहौल ठहर गया।सबकी नज़रें अनायास उसी दिशा में उठ गईं।

सबसे आगे राम रघुवंशी था। चारकोल ग्रे रंग का थ्री-पीस सूट, सफ़ेद शर्ट, गहरे नीले रंग की टाई और हमेशा की तरह आत्मविश्वास से भरे हुए कदम। उसके चेहरे पर न घमंड था, न बनावटी मुस्कान,बस एक सहज गंभीरता, जो उसके व्यक्तित्व का हिस्सा बन चुकी थी।

उसके पीछे फ़ाइल और टैबलेट संभाले अनुराधा चल रही थी। अब वह पूरी तरह अपनी पेशेवर भूमिका में थी। चेहरे पर संयम, हाथों में व्यवस्थित दस्तावेज़ और आँखों में वही सजगता, जो एक कुशल पर्सनल सेक्रेटरी में होनी चाहिए।

राम ने कमरे में प्रवेश करते ही किसी की ओर विशेष ध्यान नहीं दिया। उसकी नज़र एक बार पूरे कॉन्फ़्रेंस रूम पर घूमी और फिर वह सीधे अपनी निर्धारित सीट की ओर बढ़ गया।

लेकिन कमरे में मौजूद लगभग हर व्यक्ति की निगाह कुछ क्षणों के लिए उसी पर ठहर गई थी।

यह केवल उसके पॉजिशन का प्रभाव नहीं था। राम रघुवंशी की मौजूदगी में एक ऐसा आत्मविश्वास और प्रभाव था, जो बिना कुछ कहे भी लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लेता था। बिज़नेस जगत में उसका नाम जितना उसकी सफलता के लिए जाना जाता था, उतना ही उसके अनुशासन, तेज़ निर्णयों और समझौता न करने वाले स्वभाव के लिए भी।

हर्षित मेहता ने अपनी कुर्सी पर बैठे-बैठे राम को देखा। उसके होंठों पर हल्की-सी मुस्कान उभरी, लेकिन आँखों में प्रतिस्पर्धा की चमक साफ़ दिखाई दे रही थी। दूसरी ओर, प्रवीण गोयल ने औपचारिक मुस्कान के साथ सिर हिलाकर उसका अभिवादन किया।

राम ने भी उतनी ही औपचारिकता से सबका अभिवादन किया और अपनी सीट पर बैठ गया। उसके बैठते ही कॉन्फ़्रेंस रूम में फैली धीमी बातचीत अपने आप थम गई।

उसके बैठते ही कमरे का वातावरण फिर से औपचारिक हो गया, लेकिन एक बात स्पष्ट थी।अब इस मीटिंग का केंद्र केवल वह करोड़ों का प्रोजेक्ट नहीं था... बल्कि राम रघुवंशी भी था।

राम अपने हमेशा वाले कोल्ड एक्सप्रेशन के साथ मीटिंग रूम के अंदर आया। उसने कमरे में मौजूद लोगों पर बस एक सरसरी नज़र डाली और बिना किसी औपचारिकता के अपनी चेयर पर बैठ गया। उसके चेहरे पर न मुस्कान थी, न किसी से मिलने की उत्सुकता। जैसे वहाँ मौजूद लोगों का उसके लिए कोई विशेष महत्व ही न हो।

उसके ठीक पीछे अनुराधा अंदर आई। सफ़ेद रंग का सूट, खुले कर्ली बाल और चेहरे पर वही मासूमियत, जो पहली नज़र में किसी का भी ध्यान खींच ले। वह हल्का-सा झिझकती हुई राम के बगल वाली सीट पर बैठ गई। उसके दूसरी तरफ़ अभिमन्यु और अथर्व पहले से बैठे हुए थे। दोनों की नज़र एक पल के लिए अनुराधा पर गई, फिर चुपचाप सामने देखने लगे।

राम के बैठते ही कमरे में मौजूद कई लोगों की निगाहें उसी पर टिक गईं।तभी सामने बैठे मिस्टर मेहता मुस्कुराए और बोले, "Long time no see, Mr. Ram Raghuvanshi. आपके पिता नहीं आए?"

राम ने उनकी तरफ़ देखा ज़रूर, लेकिन कोई जवाब नहीं दिया। उसका चेहरा पहले की तरह निर्विकार था।

अनुराधा ने कनखियों से राम को देखा और मन ही मन बड़बड़ाई, "देखो तो कितना घमंडी है। सामने इतने बड़े बुज़ुर्ग बैठे हैं, और इन्हें उठकर सम्मान देना तो दूर... जवाब देना भी ज़रूरी नहीं लगा।"

उसकी सोच अभी पूरी भी नहीं हुई थी कि अचानक राम बिना उसकी तरफ़ देखे हल्का-सा उसकी ओर झुका और बेहद धीमी आवाज़ में बोला,"मैं सुन रहा हूँ।"

अनुराधा का दिल जैसे एक पल को उछल पड़ा।उसने फौरन अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से राम की तरफ़ देखा। वह पहले की तरह बिल्कुल सामान्य बैठा था, जैसे अभी कुछ हुआ ही न हो।

अनुराधा ने तुरंत नज़रें सामने कर लीं और मन ही मन बोली, "हे महादेव...! ये इंसान है या चलता-फिरता टेलीपैथी मशीन? मैं जो सोचती हूँ, इन्हें सब कैसे सुनाई दे जाता है?"

उसने इस बार समझदारी इसी में समझी कि चुपचाप बैठी रहे।उधर मिस्टर मेहता ने एक बार फिर मुस्कुराते हुए बात आगे बढ़ाई।

"राम..."उन्होंने अपने दाईं तरफ़ बैठे युवक और युवती की तरफ़ इशारा करते हुए कहा,

"Meet my son... Harshit Mehta... and my daughter... Kavita Mehta."

राम की नज़र एक बार दोनों पर गई। उसके चेहरे पर अब भी कोई विशेष भाव नहीं था। बस उसने हल्का-सा सिर हिलाकर औपचारिक अभिवादन किया और फिर उतनी ही शांति से अपनी नज़र सामने रखी फाइल पर टिक गई, मानो उसके लिए परिचय का यह दौर सिर्फ़ एक औपचारिक प्रक्रिया भर हो।

मिस्टर मेहता के शब्दों के बाद भी राम के चेहरे पर कोई बदलाव नहीं आया। उसने न हर्षित की तरफ़ देखा, न कविता की तरफ़। जैसे वहाँ मौजूद लोगों से उसका कोई लेना-देना ही न हो। वह अपनी कुर्सी पर उसी ठंडे, स्थिर भाव के साथ बैठा रहा। उसकी यही बेरुख़ी हर्षित मेहता को भीतर तक चुभ गई।

हर्षित ने होंठ भींच लिए। उसके जबड़े तन गए। वह मन ही मन बोला, "बहुत घमंड है न तुम्हें अपने नाम और अपनी ताकत पर... वेट एंड वॉच, राम रघुवंशी। तुम्हारी ये सारी गर्मी मैं ही उतारूँगा।"

उसी पल...राम की नज़र धीरे-धीरे उठी।उसने कुछ कहा नहीं, बस एक बार सीधा हर्षित की आँखों में देखा। उसकी इतनी गहरी... इतनी ठंडी नज़र... थी कि हर्षित का पूरा आत्मविश्वास जैसे एक पल में डगमगा गया। उसे लगा, मानो राम उसकी आँखों में देखकर ही कह रहा हो।

"I'll watch..."

हर्षित का गला सूख गया। उसने तुरंत अपनी नज़रें झुका लीं। अनजाने में उसके हाथ अपनी घड़ी की स्ट्रैप ठीक करने लगे। "ये... ये मेरी मन की बातें भी पढ़ लेता है क्या? इसकी आँखें इतनी डरावनी क्यों हैं?" उसने खुद से ही पूछा और फिर दोबारा राम की तरफ़ देखने की हिम्मत नहीं जुटा पाया।

वहीं दूसरी तरफ़ कविता मेहता और स्वाति गोयल की नज़रें लगातार राम पर ही टिकी हुई थीं। दोनों की आँखों में एक अलग-सी दिलचस्पी साफ़ दिखाई दे रही थी। अनुराधा से यह बात छिपी नहीं रही। उसने एक बार दोनों को देखा, फिर राम की तरफ़ देखा और जाने क्यों उसके भीतर हल्की-सी चिढ़ उठी। ऐसे अहसास उसे हुआ क्यों ! यह वह नही समझ पायी लेकिन चिढ़न था।

उसने तुरंत खुद को समझाया।"मुझे क्या... रावण को तो चुड़ैल ही देखेंगी। कोई सीता थोड़े ही देखेगी।वैसे भी इस रावण के लिए तो चुड़ैल और डायन दोनों ही ठीक है ! हुह! मुझे क्या !"

उसके मन में यह ख़याल आया ही था कि बिना उसकी तरफ़ देखे राम की धीमी आवाज़ उसके कानों तक पहुँची,"लेकिन... इस रावण को सीता नहीं..."राम एक पल को रुका। उसकी नज़र अब भी सामने रखी फाइल पर ही थी, "...राधा मिलेगी।"

अनुराधा की साँस जैसे एक पल के लिए अटक गई। उसने फौरन गर्दन घुमाकर राम की तरफ़ देखा। वह पहले की तरह बिल्कुल सामान्य बैठा था। चेहरे पर वही कोल्ड एक्सप्रेशन... जैसे अभी-अभी उसने कुछ कहा ही न हो।

अनुराधा ने धीरे से गहरी साँस भरी और मन ही मन खुद को डाँटते हुए बोली, "शांत... अनु... शांत। बिल्कुल शांत। नहीं तो ये रावण सच में तेरे मन की सारी बातें सुन लेगा। अब ज़रा संभलकर रहना पड़ेगा। पता नही क्या टोटके आते है इसे !"

यह सोचकर उसने अपने होंठ भींच लिए और पूरी मीटिंग में चुप रहने का फैसला कर लिया, जबकि उसके बगल में बैठा राम बिना उसकी तरफ़ देखे भी उसके चेहरे पर आते-जाते हर भाव को जैसे आसानी से पढ़ ले रहा था ।

मीटिंग आगे बढ़ने लगी, लेकिन राम का ध्यान सिर्फ़ प्रोजेक्ट पर नहीं था।

हॉल में बैठे कुछ लोगों की नज़रें बार-बार अनुराधा पर जाकर ठहर रही थीं। कोई उसे एक नज़र देखकर नज़रें हटा लेता, तो कोई ज़रूरत से ज़्यादा देर तक उसे देखे जा रहा था। अनुराधा पूरी तरह अनजान थी। उसका ध्यान सामने लगी स्क्रीन और मीटिंग में चल रही बातों पर था।

लेकिन राम से यह सब छिपा नहीं था।उसकी तेज़ नज़रें हॉल के एक-एक कोने पर घूम रही थीं। किसकी नज़र कितनी देर और किस इरादे से अनुराधा पर टिक रही है... वह सब देख रहा था।

एक पल के लिए उसकी आँखों में ठंडा गुस्सा उतर आया।उसने अपनी उँगलियों को आपस में कस लिया। जबड़े हल्के-से भींच गए। मन तो कर रहा था कि उसी वक़्त उन लोगों को उनकी हद याद दिला दे, लेकिन यह एक ऑफिशियल मीटिंग थी। करोड़ों के प्रोजेक्ट का सवाल था। इसलिए उसने धीरे से अपनी आँखें बंद कीं, एक लंबी साँस ली और अपने गुस्से को भीतर ही भीतर दबा लिया।

कुछ सेकंड बाद उसने फिर आँखें खोलीं। चेहरा पहले की तरह शांत था, मानो अभी कुछ हुआ ही न हो।इधर मीटिंग अपने तय एजेंडे के मुताबिक़ आगे बढ़ती रही।

एक-एक करके सभी कंपनियों ने अपनी-अपनी प्रेज़ेंटेशन दी। हर कंपनी अपने प्रोजेक्ट को सबसे बेहतर साबित करने में लगी थी। कोई अपने आँकड़ों पर ज़ोर दे रहा था, तो कोई भविष्य की योजनाओं पर।

करीब डेढ़ घंटे बाद रघुवंशी ग्रुप की बारी आई।अभिमन्यु अपनी सीट से उठा। उसने पूरे आत्मविश्वास के साथ प्रेज़ेंटेशन शुरू की। उसकी आवाज़ में वही ठहराव था, जो वर्षों के अनुभव से आता है। स्क्रीन पर एक-एक स्लाइड बदलती जा रही थी और पूरे हॉल में सन्नाटा पसरा हुआ था। बीच-बीच में कुछ सवाल भी पूछे गए, जिनका जवाब अभिमन्यु ने बिना किसी हड़बड़ाहट के दिया।

प्रेज़ेंटेशन खत्म होते ही कुछ क्षण के लिए पूरा हॉल शांत रहा, फिर निर्णायक मंडल ने आपस में नज़रें मिलाईं।सभी कंपनियों की प्रेज़ेंटेशन पूरी हो चुकी थी।जजों ने अंतिम निर्णय लेने के लिए तीस मिनट का ब्रेक घोषित कर दिया।

"रिज़ल्ट ठीक तीस मिनट बाद अनाउंस किया जाएगा। तब तक आप सभी बाहर लाउंज एरिया में स्नैक्स और ड्रिंक्स के साथ आराम कर सकते हैं।"

अनाउंसमेंट होते ही मीटिंग हॉल का माहौल थोड़ा हल्का हो गया। लोग अपनी-अपनी सीटों से उठने लगे। कोई अपने बिज़नेस पार्टनर से चर्चा करने लगा, तो कोई मोबाइल पर कॉल करने लगा। वहीं होटल स्टाफ़ मेहमानों को स्नैक्स और ड्रिंक्स वाले हॉल की तरफ़ गाइड करने लगा।

शाम हो चुकी थी और सम्राट होटल के मीटिंग हॉल का माहौल थोड़ा हल्का हो गया। सभी लोग अपनी-अपनी सीटों से उठकर स्नैक्स और कॉफी काउंटर की तरफ़ बढ़ने लगे। उसी बीच अनुराधा धीरे से राम के करीब आई। वह थोड़ा झुककर उसके कान के पास धीमे स्वर में बोली, "सर... मैं वॉशरूम जा रही हूँ।"

राम ने उसकी तरफ़ देखे बिना बस हल्के से पलकें झपकाईं और उतनी ही धीमी आवाज़ में कहा, "ठीक है... लेकिन जल्दी वापस आना। वहाँ जाकर किसी से बातें करने मत लग जाना।"

अनुराधा ने तुरंत उसकी तरफ़ घूरकर देखा।"जैसे मैं कोई पाँच साल की बच्ची हूँ..." मन ही मन बड़बड़ाती हुई वह वहाँ से चली गई।

उसके जाते ही राम फिर अभिमन्यु और अथर्व के साथ प्रोजेक्ट की कुछ ज़रूरी बातों में व्यस्त हो गया। तीनों किसी मुद्दे पर चर्चा कर ही रहे थे कि तभी सामने से मिस्टर मेहता, उनकी बेटी कविता मेहता, प्रवीण गोयल और उनके साथ उनकी बेटी स्वाति गोयल उनकी तरफ़ बढ़ते हुए आए।

सामने पहुँचकर सभी ने एक साथ मुस्कुराते हुए कहा, "Hello, Mr.RamRaghuvanshi."

राम ने बस हल्का-सा सिर हिलाकर औपचारिक अभिवादन स्वीकार कर लिया। उसके चेहरे पर पहले की तरह कोई भाव नहीं था।

प्रवीण गोयल मुस्कुराते हुए आगे बढ़े और अपनी बेटी की तरफ़ इशारा करते हुए बोले, "मिस्टर रघुवंशी... ये मेरी बेटी स्वाति गोयल है। इसी साल इसने हमारे बिज़नेस को जॉइन किया है... एंड शी इज़ वेरी टैलेंटेड।"

राम ने उनकी बात पूरी सुनी, लेकिन उसके चेहरे से साफ़ पता चल रहा था कि उसे इस परिचय में कोई विशेष रुचि नहीं थी। उसने न कोई सवाल किया, न कोई प्रतिक्रिया दी।

उसी समय पीछे से किसी ने आवाज़ दी, "प्रवीण जी... एक्सक्यूज़ मी।"

"ओह... एक्सक्यूज़ मी।" कहते हुए प्रवीण गोयल वहाँ से चले गए।

अब वहाँ सिर्फ़ राम, अभिमन्यु, अथर्व, स्वाति और कविता खड़े थे।

कुछ पल की चुप्पी के बाद स्वाति ने खुद ही बात शुरू करने का फैसला किया। वह हल्की-सी मुस्कुराई, एक कदम आगे बढ़ी और अपना हाथ राम की तरफ़ बढ़ाते हुए बोली, "Hello, Ram... आपके बारे में बहुत कुछ सुना था, लेकिन आज पहली बार आपसे मिलने का मौका मिला। आपसे मिलकर बहुत अच्छा लगा।"

राम ने उसकी तरफ़ देखा तक नहीं।उससे पहले कि वह कुछ कहता, अथर्व एक कदम आगे बढ़ा। उसके चेहरे पर विनम्रता थी, लेकिन आवाज़ में वही दृढ़ता।

"मैडम... don't call him Ram."

स्वाति का बढ़ा हुआ हाथ धीरे-धीरे वापस नीचे आ गया। उसने हैरानी से अथर्व की तरफ़ देखा।

अथर्व ने शांत स्वर में आगे कहा, "आप इन्हें Mr. Raghuvanshi कहकर बुलाइए। इनके नाम से इन्हें सिर्फ़ परिवार के लोग और बहुत चुनिंदा लोग ही बुलाते हैं।"

"ओह..." स्वाति हल्का-सा झेंप गई। "सॉरी... मिस्टर रघुवंशी।"अथर्व ने सिर हिलाया, लेकिन बात वहीं खत्म नहीं की।"मैडम... शायद आप अभी भी मेरी बात पूरी तरह समझी नहीं हैं।"

स्वाति और कविता दोनों उसकी तरफ़ देखने लगीं।अथर्व ने पूरी शालीनता के साथ कहा, "मिस्टर रघुवंशी को आपसे बात करने में कोई दिलचस्पी नहीं है। इसलिए... अगर आप बुरा न मानें, तो आप दोनों हमें एक्सक्यूज़ कर सकती हैं।"

इतना सुनते ही स्वाति के चेहरे की मुस्कान फीकी पड़ गई, जबकि कविता के चेहरे पर भी असहजता साफ़ दिखाई देने लगी। दूसरी तरफ़ राम अब भी बिल्कुल शांत खड़ा था। उसने अथर्व की एक भी बात को न रोका, न टोका... मानो अथर्व ने वही कहा हो, जो वह खुद कहना चाहता था।

स्वाति के चेहरे पर आई बेइज़्ज़ती कविता मेहता से छिपी नहीं रही। उसने राम की तरफ़ देखा। सामने खड़ा इंसान अब भी पहले की तरह निर्विकार था। उसके चेहरे पर न किसी के जाने का अफ़सोस था, न किसी को रोकने की इच्छा।

स्वाति की बात खत्म होते ही कुछ पल के लिए वहाँ हल्की-सी ख़ामोशी छा गई। तभी अब तक चुप खड़ी कविता ने राम की तरफ़ देखा। उसके होंठों पर एक बनावटी मुस्कान थी, लेकिन आँखों में साफ़ चुनौती दिखाई दे रही थी।

उसने बड़े सलीके से अपने बाल कान के पीछे किए और उसी मोहक आवाज़ में बोली, "शायद... मिस्टर रघुवंशी के मुँह में ज़ुबान नहीं है... या फिर..." वह जानबूझकर कुछ पल रुकी, "...शायद मिस्टर रघुवंशी को हम जैसी क्लासी लड़कियों से ज़्यादा सड़क छाप लड़कियों में दिलचस्पी है।"

कविता ने बात पूरी करते हुए स्वाति की तरफ़ देखा और मुस्कुराकर बोली, "Let's go, Swati."

स्वाति भी मुस्कुरा दी। जाते-जाते उसने एक बार फिर राम की तरफ़ देखा और बोली, "हाँ... तुमने सही कहा, कविता। तभी तो वो अपनी उस बहन जी के साथ कुछ ज़्यादा ही बिज़ी थे।"

दोनों वहाँ से आगे बढ़ गईं।

अथर्व के चेहरे पर गुस्सा साफ़ दिखाई देने लगा था। उसका मन कर रहा था कि अभी जाकर दोनों को उनकी औकात याद दिला दे, लेकिन राम अब भी बिल्कुल शांत खड़ा था। उसके चेहरे पर न गुस्सा था, न कोई प्रतिक्रिया। वह जैसे उनकी एक भी बात सुन ही नहीं रहा था।

लेकिन अगले ही पल उसकी आँखों में एक अलग-सा भाव उभरा।मिस ठाकुर...यह नाम जैसे उसके दिमाग़ में अचानक गूँज उठा।

उसे याद आया कि अनुराधा काफ़ी देर पहले वॉशरूम जाने की बात कहकर गई थी। उसने सहज ही अपनी कलाई घड़ी पर नज़र डाली। समय उम्मीद से कहीं ज़्यादा बीत चुका था।

राम की भौंहें हल्के से सिकुड़ गईं।इतनी देर...?उसने बिना कुछ कहे अभिमन्यु की तरफ़ देखा। दोनों की नज़रें मिलीं। राम ने बस बहुत हल्का-सा इशारा किया और अभिमन्यु तुरंत समझ गया कि मामला क्या है।

अगले ही पल राम तेज़ क़दमों से हॉल से बाहर निकल गया।हॉल से बाहर आते ही उसने जेब से अपना मोबाइल निकाला और बिना एक पल गँवाए अनुराधा का नंबर डायल कर दिया। फोन की घंटी लगातार बजती रही, लेकिन दूसरी तरफ़ से कोई जवाब नहीं आया। उसने कॉल काटी और तुरंत दोबारा मिला दी।

इस बार भी वही...रिंग बज रही थी...लेकिन अनुराधा फोन नहीं उठा रही थी।

राम कुछ सेकंड तक मोबाइल की स्क्रीन को देखता रहा। फिर उसने एक बार फिर कॉल लगाया। इस बार उसके चेहरे का ठहराव पहले जैसा नहीं था। आँखों में चिंता की हल्की-सी परछाईं उतर आई थी, जिसे शायद कोई और न देख पाता, लेकिन उसे जानने वाला एक इंसान आसानी से पहचान सकता था कि राम रघुवंशी अब बेचैन होने लगा है।

Continue........

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