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9.His Dark Obssession

राम की नज़र उसके चेहरे पर ही थी।उसे देखकर उसके होंठों पर फिर वही हल्की-सी मुस्कान लौट आई।अगले ही पल उसने अपने होंठों की हल्की-सी हरकत से उसके बालों में लगा जूड़ा पिन खींच लिया।

पिन ढीला पड़ते ही अनुराधा के घने कर्ली बाल एक झटके में खुलकर उसकी पीठ और कंधों पर बिखर गए। कुछ लटें उसके चेहरे के दोनों तरफ़ आकर ठहर गईं।राम कुछ क्षण तक उन खुले बालों को देखता रहा।

जाने क्यों... उसे हमेशा लगता था कि यह लड़की खुले बालों में ज़्यादा खूबसूरत लगती होगी।

उसने धीरे से उसकी कलाई छोड़ दी और बहुत हल्के से उसे अपनी तरफ़ घुमा दिया।अब दोनों फिर आमने-सामने खड़े थे।

अनुराधा ने जैसे ही आँखें खोलीं, सामने राम को उसी शांत भाव से खड़ा पाया। उसके चेहरे पर अब गुस्से की जगह एक अजीब-सी गंभीर मुस्कान थी, जिसे पढ़ पाना आसान नहीं था।

कुछ पल तक वह बिना कुछ बोले उसे देखता रहा, फिर बेहद शांत, लगभग रहस्यमयी लहजे में बोला,

"Punishment... punishment... बहुत खेल चुकी हो, मिस ठाकुर।"उसने हल्का-सा सिर तिरछा किया और उसी सहज अंदाज़ में आगे कहा,"अब थोड़ा काम भी कर लेते हैं।"एक ही पल में उसका पूरा व्यक्तित्व बदल चुका था।

अभी तक जो आदमी उसे लगातार छेड़ रहा था, वही अब एक प्रोफेशनल सी.ई.ओ. की तरह सामने खड़ा था।

"आज जो कुछ हुआ..." उसने अपनी घड़ी पर एक नज़र डालते हुए कहा, "उसे यहीं ख़त्म समझिए। आज की आपकी हर गलती मैं माफ़ करता हूँ। लेकिन कल से..." उसकी नज़र फिर सीधे अनुराधा पर टिक गई, "...मुझे ज़रा-सी भी लापरवाही पसंद नहीं आएगी।"

वह एक कदम पीछे हटते हुए बोला,"इसलिए अब मेरा चेहरा देखना बंद कीजिए... और जाकर मेरी सारी मीटिंग्स का शेड्यूल फिक्स कीजिए। आखिर मेरी Personal Secretary तो आप ही हैं।"

इतना कहकर वह मुड़ा और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ गया।अनुराधा अभी भी वहीं खड़ी थी।उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि सामने वाला आदमी आखिर था क्या। कुछ मिनट पहले वही व्यक्ति उसे गुस्से में डाँट रहा था, फिर उसी ने उसकी जान बचाने की बात कही, फिर उसे छेड़ा... और अब ऐसे बात कर रहा था, जैसे अभी कुछ हुआ ही न हो।

राम दरवाज़े तक पहुँचकर रुका।उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा।बस कंधे के ऊपर से इतना कहा,

"टेबल पर मेडिसिन रखी है... टाइम से ले लीजिए।"दो सेकंड की खामोशी के बाद उसने अपने उसी रूखे, लेकिन चिढ़ाने वाले अंदाज़ में जोड़ा,"वरना अगली बार अगर फिर बेहोश हुईं... तो अपने कमरे में लाने की बजाय...! वह जानबूझकर रुका,"...सीधे नीचे फेंक दूँगा।"

बात पूरी करके वह बिना उसकी प्रतिक्रिया देखे केबिन से बाहर निकल गया।दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ पूरे कमरे में गूँजी।और अनुराधा...वह अब भी वहीं खड़ी थी।खुले बाल कंधों पर बिखरे हुए थे, आँखों में गुस्सा अब भी बाकी था... लेकिन उस गुस्से के पीछे एक ऐसा सवाल भी जन्म ले चुका था, जिसका जवाब उसके पास नहीं था, " आख़िर राम रघुवंशी सच में है कैसा इंसान ?

अनुराधा गुस्से से भरी तेज़ क़दमों से आगे बढ़ी और राम के सामने आकर रास्ता रोक लिया। उसने दोनों हाथ सीने पर बाँध लिए और बिना पलक झपकाए उसे घूरने लगी। उसके चेहरे पर साफ़ लिखा था कि अभी यह बात यहीं खत्म होने वाली नहीं है।

राम ने उसकी इस हरकत को देखा तो बस हल्के से 'ना' में सिर हिला दिया। जैसे उसे पहले से पता हो कि अब सामने वाली क्या कहने वाली है।बस... यही बात अनुराधा को और चिढ़ा गई।

उसने भौंहें सिकोड़ते हुए कहा, "और... जो अभी आपने किया, उसका क्या?"राम ने पूरी मासूमियत से उसकी तरफ़ देखा।"मैंने क्या किया?"

अनुराधा का मुँह खुला का खुला रह गया। उसे कुछ पल तो विश्वास ही नहीं हुआ कि सामने खड़ा आदमी इतनी सफ़ाई से अनजान बनने की कोशिश कर रहा है।

"हाउ मीन...!" उसने झुँझलाकर कहा। "अभी... अभी जो आपने मेरी पहली kiss चुरा ली... उसी की बात कर रही हूँ मैं।"

राम के चेहरे पर जैसे अब जाकर समझ आने वाले भाव आए।"ओह..." उसने धीमे से कहा, "तो तुम उसकी बात कर रही हो।"

वह कुछ पल तक उसे देखता रहा। और उसकी तरफ हल्का झुकने लगा। जिसे देख कर अनुराधा खुद क़ो पीछे की तरफ झुकने लगी। उस की यह हरकत देख उसके होठो पर दबी मुस्कान उभर आयी और उसने बोला, "लेकिन मिस ठाकुर... आपने भी तो मेरी पहली kiss चुरा ली थी।"

अनुराधा ने उसे घूर कर देखा और हैरानी से चिखी, "क्या...?"

राम ने भी अपने चेहरे पर हाथ रखते हुए बिल्कुल सहज स्वर में कहा, " हाँ ! सोचो जरा, अगर तुम अचानक मेरी तरफ़ नहीं मुड़तीं... तो वो होता ही नहीं।जो हुआ ! "

फिर उसके चेहरा पर ऐसे भाव आ गए। जैसे उसने तो कुछ किया ही नही।वह थोड़ा रुका, फिर हल्की मुस्कान के साथ बोला, "मैंने तो उसकी शिकायत नहीं की।"

अनुराधा उसे बस घूरे जा रही थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि इस आदमी से बहस करे या अपना सिर पकड़ ले। हर बात का जवाब उसके पास पहले से तैयार रहता था।

राम ने उसकी उलझन का पूरा आनंद लेते हुए आगे कहा, "इसलिए... अगर नहीं चाहती कि अपनी दूसरी kiss भी मुझसे हार जाओ..."

उसने टेबल पर रखी दवाइयों की तरफ़ इशारा किया।"...तो चुपचाप अपनी मेडिसिन लो... और पाँच मिनट बाद बाहर आ जाओ। आज से तुम मेरी पर्सनल सेक्रेटरी हो। मेरे पास बेकार की बहस के लिए ज़्यादा समय नहीं है।"

इतना कहकर वह उसके बराबर से निकलने लगा।पीछे से अनुराधा की बड़बड़ाहट उसके कानों तक साफ़ पहुँची।

"जल्लाद... दुष्ट... शैतान... आदिमानव की प्रजाति... कहीं के...! पता नही किस मनहूस घड़ी मे इस सनकी इंसान से पाला पड़ गया मेरा ! गोविन्द क्या मैंने एक लड्डू कम चढ़ा दिए थे। जो ऐसे बॉस मेरे मथे मढ़ दिया।

राम के कदम एक पल को रुक गए। उसने बिना पीछे मुड़े ही मुस्कुराकर कहा,"मैं सब सुन रहा हूँ, मिस ठाकुर।"

अनुराधा भी कहाँ चुप रहने वाली थी।वह भी अपने चेहरे क़ो आरी टेढ़ी घुमाती हुई बोली, "मैं भी आपको सुना रहीं हु..Mr. Raghuvanshi! हुह ! बड़ बोले कही के !"

उसकी आवाज़ में जितना गुस्सा था, उतनी ही झुँझलाहट भी।राम इस बार सचमुच मुस्कुरा दिया। उसने पलटकर उसे नहीं देखा, बस हल्के से सिर हिलाया और कमरे से बाहर निकल गया।

दरवाज़े तक पहुँचकर उसके कदम अनायास धीमे पड़ गए। उसने अपने अंगूठे से हल्के से अपने होंठों को छुआ। कुछ पल तक यूँ ही खड़ा रहा, फिर खुद से बुदबुदाया,"उफ़्फ़..."एक गहरी साँस उसके सीने से निकली।

"क्या कर रहा हूँ मैं...?"उसने खुद ही अपने सवाल का कोई जवाब नहीं दिया। बस होंठों पर आई मुस्कान दबाई और केबिन से बाहर चला गया।

अनुराधा के भीतर सब कुछ अब भी असामान्य था। पिछले कुछ घंटों की घटनाएँ बार-बार उसके मन में घूम रही थीं। उसने कई बार खुद को समझाने की कोशिश की, पर हर बार उसका आत्मसम्मान उसी निष्कर्ष पर आकर ठहर जाता।वह इस आदमी के साथ अब और काम नहीं कर सकती।

काफ़ी देर तक सोचने के बाद उसने अपने कंप्यूटर पर एक छोटा-सा इस्तीफ़ा टाइप किया। शब्द बहुत कम थे, लेकिन हर पंक्ति उसके निर्णय की तरह स्पष्ट थी। प्रिंट निकालकर उसने काग़ज़ को मोड़ा, एक गहरी साँस ली और राम के केबिन की ओर बढ़ गई।

दरवाज़े के सामने पहुँचकर उसने अपनी धड़कनों को काबू में करने की कोशिश की। फिर धीरे से दरवाज़े पर दस्तक दी।

"May I come in, Sir?"

राम अपनी लैपटॉप स्क्रीन पर नज़रें टिकाए किसी ज़रूरी फ़ाइल में व्यस्त था। उसकी उँगलियाँ लगातार कीबोर्ड पर चल रही थीं। बिना सिर उठाए ही उसने शांत लहज़े में कहा, "Yes... come in."

अनुराधा ने दरवाज़ा खोला और अंदर चली आई।राम अपनी कुर्सी पर बैठा पूरी तरह लैपटॉप की स्क्रीन में डूबा हुआ था। उसकी उँगलियाँ बिना रुके कीबोर्ड पर चल रही थीं। ऐसा लग रहा था मानो कमरे में किसी और की मौजूदगी का उसे कोई एहसास ही न हो।

अनुराधा धीरे-धीरे उसकी टेबल तक पहुँची।बिना कुछ बोले उसने अपने हाथ में पकड़ा हुआ लिफ़ाफ़ा उसके सामने रख दिया।टेबल पर कागज़ के टकराने की हल्की-सी आवाज़ हुई।

राम की उँगलियाँ रुक गईं।

उसने धीरे से नज़र उठाई और सामने पड़े लिफ़ाफ़े पर नज़र डाली। फिर उसे खोला और अंदर रखा कागज़ बाहर निकाला।जैसे ही उसकी नज़र ऊपर लिखे बड़े अक्षरों पर पड़ी, उसकी आँखें हल्की-सी सिकुड़ गईं, " Resignation Letter."

कुछ पल तक वह बिना कुछ बोले उसे पढ़ता रहा।कमरे में ऐसा सन्नाटा था कि दोनों की साँसों की आवाज़ तक साफ़ सुनाई दे रही थी।अनुराधा ने उसी ख़ामोशी को तोड़ते हुए कहा,"ये मेरा रिज़ाइनेशन है, मिस्टर रघुवंशी। मैं आपके साथ अब और काम नहीं करना चाहती।"

राम ने कोई जवाब नहीं दिया और ना कोई सवाल नहीं किया।न यह पूछा कि क्यों...! न यह जानना चाहा कि अचानक ऐसा फैसला लेने की वजह क्या है।

उसने एक बार फिर पूरे कागज़ पर नज़र दौड़ाई।फिर बिल्कुल शांत चेहरे के साथ उस कागज़ को दोनों हाथों से मोड़ा...और अगले ही पल...चर्र...कागज़ बीच से फट गया।रेज़िग्नेशन लेटर उसके हाथों में दो टुकड़ों में बदल चुका था।

जैसे ही कागज़ बीच से फट गया।अनुराधा की आँखें फैल गईं।लेकिन राम यहीं नहीं रुका।

उसने उन दोनों टुकड़ों को फिर से फाड़ा...फिर एक बार और...जब तक कि पूरा रिज़ाइनेशन छोटे-छोटे टुकड़ों में बदलकर उसकी टेबल पर बिखर नहीं गया।

अनुराधा अविश्वास से उसे देखती रह गई।"आपने..." उसकी आवाज़ में गुस्सा साफ़ झलक रहा था, "...मेरा रिज़ाइनेशन फाड़ दिया?"राम ने बिखरे हुए कागज़ों पर एक सरसरी नज़र डाली और फिर बेहद शांत स्वर में बोला,"अब ये सिर्फ़ रद्दी का कागज़ है।"

"मैं नौकरी छोड़ रही हूँ। " तुम छोड़ना चाहती हो..." राम ने उसकी बात बीच में ही काट दी, ...लेकिन मैंने तुम्हारा इस्तीफ़ा मंज़ूर नहीं किया।"

आप कौन होते हैं मुझे रोकने वाले?राम अपनी कुर्सी से उठ खड़ा हुआ।दोनों अब आमने-सामने थे।उसकी लंबी कद-काठी और शांत चेहरा हमेशा की तरह उतना ही प्रभावशाली था।

"तुमने कॉन्ट्रैक्ट साइन किया होगा , मिस ठाकुर। जब तुमने नौकरी ज्वाइन की होगी ! "

उसकी आवाज़ में कोई ऊँचापन नहीं था, लेकिन हर शब्द आदेश जैसा महसूस हो रहा था।

जब तक वो कॉन्ट्रैक्ट खत्म नहीं होता... तुम इस कंपनी की पर्सनल सेक्रेटरी हो।अनुराधा ने गुस्से में कहा,"मुझे इस नौकरी में एक पल भी नहीं रहना।"

राम ने उसकी बात जैसे सुनी ही नहीं।वह वापस अपनी कुर्सी पर बैठ गया, लैपटॉप खोला और स्क्रीन पर नज़रें जमा दीं।कुछ सेकंड बाद बिना उसकी तरफ़ देखे बोला,"मेरे लिए एक स्ट्रॉन्ग ब्लैक कॉफ़ी लेकर आओ।"

अनुराधा को अपनी ही कानों पर यकीन नहीं हुआ।क्या कहा आपने? राम की नज़रें अब भी स्क्रीन पर थीं।सुना नहीं तुमने? उसने बिल्कुल सपाट आवाज़ में कहा,"एक स्ट्रॉन्ग ब्लैक कॉफ़ी... बिना शक्कर।"

अनुराधा का गुस्सा अब सातवें आसमान पर था।मैं यहाँ इस्तीफ़ा देने आई हूँ... और आपको कॉफ़ी की पड़ी है? राम ने इस बार धीरे से नज़र उठाई।दोनों की आँखें मिलीं।उसकी आवाज़ पहले से भी ज़्यादा ठंडी थी।

तुम यहाँ मेरी पर्सनल सेक्रेटरी हो... बहस करने नहीं। एक पल रुककर वह फिर बोला," अब जाओ..! और हाँ...! उसने टेबल पर बिखरे हुए कागज़ के टुकड़ों की तरफ़ इशारा किया।

अगली बार अगर रेज़िग्नेशन देना हो, तो पहले मुझसे पूछ लेना। क्योंकि मेरी परमिशन के बिना मेरी पर्सनल सेक्रेटरी नौकरी छोड़ नहीं सकती।

उसके स्वर में ऊँचाई नहीं थी, मगर निर्णय ऐसा था जिसमें बहस की कोई गुंजाइश नहीं बचती थी।

अनुराधा ने गुस्से से अपने होंठ भींच लिए।एक पल के लिए उसका मन हुआ कि सामने रखा कॉफ़ी मग उठाकर उसी पर फेंक दे। लेकिन वह अपनी जगह से बिल्कुल नहीं हिली। राम ने सर उठा कर अपनी भोवे उठा ली। आप अभी तक गयी नही।

उसने पूरी दृढ़ता से राम की तरफ़ देखा और शांत, लेकिन साफ़ लहज़े में बोली, "शायद आपने ठीक से सुना नहीं, सर... मैं आपके साथ काम नहीं करूँगी।"

राम ने धीरे से अपनी नज़र लैपटॉप से हटाई और कुर्सी की बैक पर टिक गया। उसके चेहरे पर कोई खास भाव नहीं था, लेकिन उसकी आँखें पहले से कहीं ज़्यादा गहरी हो चुकी थीं। वह अपने गुस्से को साफ़ तौर पर दबाए हुए था।

"मिस ठाकुर..." उसने बेहद संयत आवाज़ में कहा, "मुझे एक ही बात बार-बार दोहराने की आदत नहीं है। आपको मेरे साथ ही काम करना होगा।"

वह कुछ पल रुका। फिर उसकी आँखों में देखते हुए बोला, "और अगर फिर भी आपके छोटे-से दिमाग़ में ये बात नहीं बैठ रही है..."

इतना कहकर उसने टेबल की दराज़ खोली। अंदर से कुछ कागज़ निकाले और अपनी कुर्सी से उठकर धीरे-धीरे उसके सामने आ खड़ा हुआ। दोनों के बीच वह कागज़ रखते हुए उसने कहा, "तो नौकरी छोड़ने से पहले इन्हें एक बार ध्यान से पढ़ लीजिए।"

अनुराधा ने झुँझलाकर वे कागज़ उसके हाथ से लिए। शुरू के दो-तीन पन्ने पढ़ते ही उसके चेहरे का रंग बदल गया। उसकी आँखें हैरानी से फैल गईं। उसने दोबारा उन कागज़ों को देखा, फिर अविश्वास से राम की तरफ़ देखने लगी।

"ये... ये आपने... कब किया?"उसकी आवाज़ में हैरानी से ज़्यादा झटका था।

अगले ही पल उसने कागज़ नीचे कर दिए और गुस्से से बोली, "आप एक नंबर के झूठे और फरेबी इंसान हैं। मैं नहीं मानती ऐसे किसी पेपर को।"

राम के चेहरे पर हल्की-सी भी बेचैनी नहीं आई। उसने बहुत इत्मीनान से जवाब दिया, "तुम्हारे मानने या न मानने से कुछ बदल नहीं जाएगा, मिस ठाकुर।"

उसने कागज़ वापस उसके हाथों में रखते हुए कहा, "अब तुम्हारे पास सिर्फ़ दो रास्ते हैं। या तो मुझे पाँच करोड़ रुपये दो... या फिर बिना किसी सवाल के चुपचाप अपना काम करो।"

उसकी आवाज़ अब भी शांत थी, लेकिन उसमें ऐसा ठहराव था कि बहस की कोई गुंजाइश नहीं बचती थी।

अनुराधा ने दाँत भींच लिए। गुस्से में उसकी उँगलियाँ उन कागज़ों को कसकर पकड़ चुकी थीं।

"मैं आपको छोड़ूँगी नहीं, मिस्टर राम रघुवंशी।"

राम के होंठों पर हल्की-सी तिरछी मुस्कान उभरी। वह थोड़ा-सा उसकी तरफ़ झुका और बेहद सहज लहज़े में बोला, "तो किसने कहा है... मुझे छोड़ने के लिए?"

अनुराधा उसे बस घूरती रह गई।राम सीधा खड़ा हो गया, जैसे अभी-अभी हुई पूरी बहस उसके लिए कोई मायने ही नहीं रखती हो।

"अब जाइए... मेरे लिए कॉफ़ी लेकर आइए।" उसने अपनी घड़ी पर नज़र डालते हुए आगे कहा, "और ठीक आधे घंटे बाद हमें होटल सम्राट पहुँचना है।"

फिर उसने उसी अधिकार भरे अंदाज़ में कहा, "Now go."

अनुराधा गुस्से में पैर पटकती हुई मुड़ी। दरवाज़े तक पहुँचते-पहुँचते वह खुद से बड़बड़ाई, "रावण रघुवंशी... हुंह..."

उसके होंठों से निकले शब्द साफ़ सुनाई दे गए।राम ने बिना सिर उठाए ही कहा, "सुन रहा हूँ मैं।"अनुराधा भी बिना रुके पलटी और उसी तुनकते अंदाज़ में बोली, "तो मैं भी सुना रही हूँ।"उसने मुठ्ठी कस ली और अगले ही पल उसने खुद को रोक लिया।राम को आख़िरी बार घूरते हुए वह पलटी और तेज़ क़दमों से केबिन से बाहर निकल गई।दरवाज़ा ज़ोर से बंद होने की आवाज़ पूरे फ़्लोर पर गूँज उठी।

राम ने एक नज़र बंद दरवाज़े पर डाली।फिर उसके होंठों पर हल्की-सी मुस्कान उभरी। उस की नज़र एक बार फिर डस्टबिन मे बिखरे रेज़िग्नेशन के टुकड़ों पर गई।

"इतनी आसानी से भागने नहीं दूँगा तुम्हें, जिद्दी मिस ठाकुर...! Silly girl... but only mine "उसने धीमे से बुदबुदाया और दोबारा अपने लैपटॉप पर काम करने लगा।

अनुराधा बुडबदती हुई सीधे पेंटरी एरिया की तरफ गयी और युहीं भूनभूनाती हुई कॉफी भी बनाने लगी थी।करीब दस मिनट बाद अनुराधा एक बार फिर राम के केबिन के बाहर खड़ी थी।

अनुराधा ने राम के केबिन का दरवाज़ा हल्के से नॉक किया।

इस बार उसके चेहरे पर पहले वाली झुँझलाहट नहीं थी। जाने क्यों, होंठों पर एक हल्की-सी मुस्कान खेल रही थी, जैसे मन ही मन वह किसी शरारत पर खुद ही खुश हो रही हो। उसने दरवाज़े पर दस्तक दी और हमेशा की तरह संयत स्वर में बोली, "May I come in, Sir?"

अंदर से राम की आवाज़ आई, "Yes... come in."

अनुराधा कॉफ़ी का मग हाथ में लिए अंदर आई और बिना कुछ कहे उसे राम की टेबल पर रख दिया। "सर... आपकी कॉफ़ी।"

राम उस समय लैपटॉप पर नज़रें गड़ाए किसी ज़रूरी फ़ाइल में व्यस्त था। उसने मग उठाने से पहले एक नज़र अनुराधा पर डाली। उसके चेहरे पर खिली वह मुस्कान देखकर उसकी भौंहें अनायास ऊपर उठ गईं। अभी कुछ देर पहले तक इस्तीफ़ा लेकर खड़ी थी... अब इतनी खुश किस बात पर है? उसने मन ही मन सोचा, ज़रूर कुछ गड़बड़ है।

फिर भी उसने बिना कुछ कहे कॉफ़ी का मग उठाया और एक घूँट लिया।कॉफ़ी जैसे ही उसके गले से उतरी, उसके चेहरे के भाव एक पल में बदल गए। उसने तुरंत मग टेबल पर रखा और गहरी आवाज़ में बोला, "What the hell! इस कॉफ़ी में दूध और शुगर किसने डाली?"

अनुराधा ने पूरी मासूमियत से उसकी तरफ़ देखा, जैसे सवाल ही समझ में न आया हो।

"सर... मैंने। और कौन डालेगा?"

राम ने आँखें बंद करके एक गहरी साँस ली, फिर उसे देखते हुए बोला, "मिस ठाकुर... तुम्हें मालूम नहीं है कि मैं सिर्फ़ ब्लैक कॉफ़ी पीता हूँ... without sugar?"

"मालूम है।" अनुराधा ने बिना झिझक जवाब दिया।

"फिर ये सब क्यों?"

"क्योंकि मुझे लगा..." उसने बड़ी सहजता से कहा, "...ज़िंदगी में थोड़ी मिठास होनी चाहिए। हर चीज़ इतनी कड़वी भी अच्छी नहीं लगती।"राम बस उसे देखता रह गया।

अनुराधा ने होंठ गोल करते हुए बहुत धीरे से बुदबुदाया, "हुँह... इसलिए तो इनकी ज़ुबान भी इस कॉफ़ी की तरह कड़वी है। बिना शुगर... सीधा ज़हर।"

"मैं सुन रहा हूँ, मिस ठाकुर।"राम ने बिना एक पल गँवाए कहा।

अनुराधा तुरंत उसकी तरफ़ मुड़ी। "तो मैं भी आपको सुना रही हूँ, सर।"अपनी दोनों भोवों को ऊपर करते हुए, वह उसे देख रहीं थी।

दोनों कुछ क्षण तक एक-दूसरे को देखते रहे। फिर राम ने मग एक तरफ़ सरका दिया। उसके चेहरे पर गुस्सा तो था, लेकिन जाने क्यों वह उस लड़की की बचकानी हरकत पर नाराज़ भी खुलकर नहीं हो पा रहा था।

कुछ क्षण के लिए केबिन में सन्नाटा फैल गया। दोनों की नज़रें एक-दूसरे से टकराईं। अनुराधा के चेहरे पर शरारती संतोष था, जबकि राम अपनी झुँझलाहट को भीतर ही भीतर दबा रहा था।

आख़िरकार अनुराधा ने औपचारिक स्वर अपनाते हुए पूछा, "अगर चाहें तो मैं आपके लिए दूसरी कॉफ़ी बना लाती हूँ।"

राम ने मग को एक तरफ़ सरका दिया। "ज़रूरत नहीं है।" उसने घड़ी पर नज़र डाली, फिर कुर्सी से उठते हुए अपना कोट सीधा किया। "मीटिंग के लिए पहले ही देर हो रही है। चलो।"

अनुराधा ने उसके पीछे मुँह बनाते हुए धीरे से बुदबुदाया, "कड़वी कॉफ़ी वाले बॉस..."

राम चलते-चलते अचानक उसकी तरफ मुड़ा और बिना नजर हटाए कहा, "मैं सुन रहा हूँ।"

अनुराधा ज़रा भी नहीं घबराई। उलटे उसने ठुड्डी हल्की-सी ऊपर उठाई और उसी बेपरवाही से बोली, "तो मैं भी सुनाने के लिए ही बोल रही हूँ।"

अनुराधा ने मेज़ पर रखी फ़ाइलें उठाईं। उसके होंठों पर अब भी वैसी ही हल्की मुस्कान खेल रही थी। पहली बार उसे लगा था कि उसने राम की अकड़ में एक छोटी-सी दरार डाल दी है।

राम ने इस बार कोई जवाब नहीं दिया। बस सिर हिलाया और आगे बढ़ गया। उसे अच्छी तरह समझ चुका था कि मिस ठाकुर इतनी आसानी से हार मानने वालों में से नहीं है। शायद यही वजह थी कि उसकी झुँझलाहट के पीछे एक हल्की-सी मुस्कान भी दबे पाँव जन्म ले चुकी थी।

जबकि अनुराधा भी उसके पीछे-पीछे होटल सम्राट के लिए निकल पड़ी।

राम तेज़ क़दमों से पार्किंग की तरफ़ बढ़ने लगा। उसके चेहरे पर वही गंभीरता थी और चाल में हमेशा की तरह आत्मविश्वास। पीछे-पीछे फ़ाइलें संभालती हुई अनुराधा भी चली आ रही थी। उसके चेहरे पर झुँझलाहट अब भी साफ़ दिखाई दे रही थी। कुछ दूर चलने के बाद उसने थोड़ा ऊँची आवाज़ में कहा,"सर... आप चलिए। मैं कैब से पहुँच जाऊँगी।"

उसने यह बात कहते हुए अपनी चाल नहीं रोकी। उसकी नज़र सामने की बजाय दूसरी ओर थी, इसलिए उसे एहसास ही नहीं हुआ कि राम उसके शब्द सुनकर अचानक रुक चुका था। उसने धीरे-से पलटकर उसकी तरफ़ देखा और फिर दोनों हाथ पैंट की जेबों में डालकर वहीं खड़ा हो गया। उसकी निगाहें सीधी अनुराधा पर टिकी थीं।

अनुराधा अब भी बड़बड़ाते हुए आगे बढ़ रही थी।अगले ही पल..."उफ़्फ..."वह सीधे राम से जा टकराई।मज़बूत दीवार की तरह खड़े राम को तो कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा, लेकिन अनुराधा एक कदम पीछे लड़खड़ा गई। उसने तुरंत अपना माथा सहलाया और दर्द से आँखें सिकोड़ लीं। फिर सिर उठाकर सामने देखा।

राम बिल्कुल उसी शांति के साथ उसके सामने खड़ा था। दोनों हाथ अब भी जेबों में थे। चेहरे पर कोई भाव नहीं, बस आँखों में हल्की-सी कठोरता थी।अनुराधा ने उसे घूरा, फिर बिना एक पल गँवाए उसकी बाँह को उँगलियों से छूते हुए बोली,"माना कि आपका शरीर पत्थर से भी ज़्यादा पथरीला है..."

उसने अपना माथा सहलाया और मुँह बनाते हुए आगे कहा,"...लेकिन मैं ना, फूलों से भी ज़्यादा नाज़ुक हूँ।"

राम बिना कुछ बोले उसे देखता रहा।अनुराधा ने गहरी साँस ली और पूरी गंभीरता से बोली,

"और इस तरह मेरे रास्ते में खड़े होकर मेरा सिर फोड़ने का जो आपका नेक इरादा है ना... उसे प्लीज़ अपने दिमाग़ से बाहर निकाल दीजिए।"

उसने अपनी तर्जनी उसकी तरफ़ उठाई।"क्योंकि... मेरा सिर अगर फूटा न... तो हथौड़े से मैं आपको फोड़ दूँगी।"उसकी बात पूरी होते ही कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।

राम की आँखों में एक क्षण के लिए हल्की-सी चमक उभरी। वह जानता था कि अनुराधा गुस्से में जितनी ख़तरनाक लगती है, उतनी ही बेबाक बातें भी कर जाती है।उसने बिना मुस्कुराए बस इतना कहा,"धमकी दे रही हो, मिस ठाकुर?"

अनुराधा ने बिना झिझके जवाब दिया,"नहीं... पहले से सूचना दे रही हूँ। बाद में मत कहिएगा कि बताया नहीं था।"राम ने एक गहरी साँस ली, हल्का-सा सिर हिलाया और उसके पास से निकलते हुए आगे बढ़ गया।

"चलो... होटल सम्राट के लिए पहले ही देर हो रही है।"अनुराधा ने होंठ सिकोड़ते हुए उसे जाते देखा, फिर धीमे से बुदबुदाई,"हूँह... अकड़ू कहीं के..."

राम के कदम नहीं रुके। बिना पीछे मुड़े ही उसने कहा,"मैं ये भी सुन रहा हूँ, मिस ठाकुर ! "

अनुराधा ने तुरंत जवाब दिया,"अच्छी बात है... सुनाने के लिए ही तो बोल रही हूँ सर और धीरे से बुडबदाई रावण रघुवंशी ।"राम ने इस बार कोई उत्तर नहीं दिया। बस आगे बढ़ता रहा, जबकि अनुराधा मन ही मन उसे कोसती हुई उसके पीछे-पीछे चल दी।

Continue.......

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