अभिमन्यु के मन में सवाल अब भी वैसे ही खड़े थे। डॉक्टर के जाने के बाद से ही वह कई बार कुछ पूछना चाहता था, लेकिन हर बार राम के चेहरे की गंभीरता देखकर रुक जाता। आखिर इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज़्यादा असामान्य बात यही थी कि राम ख़ुद असामान्य व्यवहार कर रहा था।
उधर राम ने किसी की ओर ध्यान नहीं दिया। वह बिना कुछ कहे मुड़ा और सीधे अपने सीक्रेट रूम के अंदर चला गया।
अनुराधा अब भी बेहोश थी। कमरे की हल्की रोशनी उसके शांत चेहरे पर बिखरी हुई थी। बेहोशी ने उसके चेहरे की मासूमियत को ज़रा भी कम नहीं किया था। उल्टा, उसके चेहरे पर एक अजीब-सी निश्चलता उतर आई थी। कुछ बिखरी हुई लटें अब भी उसके गालों के पास ठहरी थीं। साँसों की धीमी लय बता रही थी कि अब वह पूरी तरह सुरक्षित थी।
राम कुछ क्षण वहीं खड़ा उसे देखता रहा।
फिर उसके होंठों से एक बहुत हल्की, लगभग अनसुनी-सी गहरी साँस निकली।
उसने आगे बढ़कर बेड पर पड़ा कंबल सावधानी से अनुराधा के ऊपर ठीक कर दिया, ताकि उसे ठंड न लगे। उसके बाद दीवार पर लगे ए.सी. का टेम्प्रेचर थोड़ा कम किया, एक बार कमरे पर नज़र डाली और बिना कोई आवाज़ किए वापस बाहर आ गया।
बाहर निकलते ही उसकी नज़र सामने खड़े तीनों चेहरों पर पड़ी।विवान, अथर्व और अभिमन्यु...तीनों उसी को देख रहे थे।कोई कुछ बोल नहीं रहा था, लेकिन तीनों की आँखों में एक जैसे सवाल थे। जैसे वे उसके मुँह से कुछ सुनने का इंतज़ार कर रहे हों।
राम ने एक-एक करके तीनों को देखा। कुछ क्षण तक उनकी निगाहें उसी पर टिकी रहीं। आख़िरकार वह इस तरह लगातार घूरे जाने से झुँझला गया। उसने दाँत भींचते हुए कहा,
"क्या देख रहे हो?"उसकी आवाज़ सुनते ही विवान और अथर्व दोनों जैसे चौंक गए।"क... कुछ भी नहीं, भाई।"दोनों लगभग एक साथ बोल पड़े।
राम ने सपाट स्वर में कहा, "तो फिर जाओ... अपना काम करो।"दोनों ने बिना बहस किए सिर हिलाया और मुड़ने ही वाले थे कि पीछे से अभिमन्यु की आवाज़ आई,
"रुको... तुम दोनों।"दोनों वहीं ठिठक गए।अभिमन्यु ने धीरे-धीरे अपना चेहरा राम की ओर घुमाया। उसकी आँखों में अब मुस्कान नहीं थी। वर्षों की दोस्ती उसे इतना अधिकार देती थी कि वह वहाँ खड़े बाकी दोनों की तरह चुप न रहे।
वह राम के सामने आकर खड़ा हो गया।इन दोनों को तू डरा सकता है..." उसने राम की आँखों में देखते हुए कहा, "लेकिन मुझे नहीं।"कुछ पल दोनों की नज़रें एक-दूसरे पर टिकी रहीं।
फिर अभिमन्यु ने बिल्कुल सीधे स्वर में पूछा,"अब ये बता... बात क्या है?"
उसके इतना कहते ही विवान और अथर्व, जो अभी तक चुपचाप खड़े थे, फिर से मुड़कर अपने बड़े भाई की तरफ़ देखने लगे। उनकी आँखों में भी वही सवाल था।अब वे तीनों जवाब का इंतज़ार कर रहे थे और जवाब सिर्फ़ राम के पास था।
राम ने तीनों की ओर देखा। उनके चेहरों पर फैली उत्सुकता बता रही थी कि जब तक उन्हें जवाब नहीं मिलेगा, वे यहाँ से हटने वाले नहीं थे।
उसने धीमे से साँस छोड़ी और बिल्कुल सपाट स्वर में कहा, "ऐसी कोई बात नहीं है। वो मेरे साथ लिफ्ट में थी... और अचानक ही बेहोश हो गई। इस फ्लोर पर उस समय कोई था भी नहीं। अब उसे उस हालत में अकेला लिफ्ट में कैसे छोड़ देता... इसलिए उसे यहाँ ले आया।"
राम की बात सुनते ही विवान और अथर्व ने एक-दूसरे की तरफ़ देखा। दोनों के चेहरे पर जैसे एक साथ राहत उतर आई। उन्हें लगा था कि बात शायद जितनी दिखाई दे रही है, उससे कहीं ज़्यादा गंभीर होगी। लेकिन राम का जवाब सुनकर उनके मन का बोझ कुछ हल्का हो गया।
कुछ पल की चुप्पी के बाद विवान मुस्कुराते हुए बोला, "भैया... यही हैं अनुराधा ठाकुर। कुछ दिनों के लिए आपकी पर्सनल असिस्टेंट।"
राम ने बिना कोई भाव बदले उसकी तरफ़ देखा।"नहीं..."उसकी आवाज़ पहले की तरह शांत थी।
अब किसी और को अपॉइंट करने की ज़रूरत नहीं है। इन्हें ही रहने दो।
विवान कुछ क्षण तक राम का चेहरा पढ़ता रहा। सुबह की बात उसे साफ़ याद थी, जब राम किसी भी कीमत पर मिस ठाकुर को अपना पर्सनल असिस्टेंट बनाने के पक्ष में नहीं था। इसलिए उसके मुँह से अनायास निकल गया,"लेकिन भैया... आपने तो कहा था..."उसकी बात पूरी भी नहीं हो पाई थी कि राम ने बीच में ही उसे रोक दिया।
"तो मैं अभी भी वही कह रहा हूँ।"उसकी आवाज़ में न झुंझलाहट थी, न सफ़ाई... बस एक ऐसा ठहराव था, जो साफ़ बता रहा था कि उसने अपना फैसला सुना दिया है और उस पर अब कोई बहस नहीं होगी।
विवान ने कुछ पल तक उसे देखा, फिर हल्की-सी मुस्कान के साथ सिर झुका दिया।जी, भाई।"
अथर्व ने भी बिना कुछ पूछे हामी भर दी।दोनों मुड़कर जाने लगे। जाते-जाते उनकी नज़र एक बार सीक्रेट रूम के बंद दरवाज़े पर पड़ी, फिर उन्होंने चुपचाप केबिन से बाहर कदम रख दिए।
विवान और अथर्व के बाहर जाते ही केबिन में एक बार फिर सन्नाटा फैल गया। कुछ क्षण तक राम वहीं खड़ा रहा, जैसे उसके मन में एक साथ कई विचार चल रहे हों। तभी उसकी नज़र सामने खड़े अभिमन्यु पर पड़ी, जो अब भी अपनी जगह से हिला तक नहीं था।
राम ने उसकी तरफ़ देखते हुए पूछा, "तू गया नहीं?"
अभिमन्यु ने दोनों हाथ सीने पर बाँध लिए और बिना नज़र हटाए बोला, "तुझे मैं तेरे दोनों छोटे भाई दिखता हूँ क्या, जो तू जैसा बोलेगा, वैसा करके चुपचाप निकल जाऊँ?"
राम उसके अंदाज़ पर हल्का-सा मुस्कुरा दिया।उसके चेहरे पर आई वह छोटी-सी मुस्कान देखकर अभिमन्यु की आँखें फैल गईं। वह हँसते हुए बोला, "तू... हँस रहा है, मेरे यार! ये तो कमाल हो गया। सुबह से तेरे चेहरे पर जितनी सख़्ती थी, उसके बाद तो मुझे लगा था कि आज मुस्कुराना भी भूल गया होगा।"
राम ने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया। मुस्कान उतनी ही जल्दी गायब भी हो गई, जितनी जल्दी आई थी। उसके चेहरे पर फिर वही गंभीरता लौट आई।कुछ पल चुप रहने के बाद वह धीमे स्वर में बोला,"अभि..."
"हाँ, बोल राम।"राम की नज़र कुछ क्षण के लिए सीक्रेट रूम के बंद दरवाज़े पर ठहरी, जहाँ अनुराधा अब भी बेहोश थी। फिर उसने अभिमन्यु की ओर देखते हुए कहा,"मुझे मिस ठाकुर की पूरी जानकारी चाहिए।"
अभिमन्यु ने ध्यान से उसकी आँखों में देखा। वह राम को बचपन से जानता था। वह यह भी जानता था कि राम बिना किसी ठोस वजह के किसी के बारे में जानकारी निकलवाने की बात कभी नहीं करता।
"सिर्फ़ जानकारी?" उसने गंभीर स्वर में पूछा।
राम ने शांत लहज़े में कहा, "उसकी फैमिली, पढ़ाई, पिछले कुछ साल, किन लोगों के संपर्क में रही... और अगर उसके अतीत में ऐसा कुछ है, जिसने उसे आज इस हालत तक पहुँचाया है... तो वो भी। मुझे कुछ भी अधूरा नहीं चाहिए।"
अभिमन्यु कुछ क्षण तक चुप रहा। फिर उसने गहरी साँस लेते हुए पूछा,"तू श्योर है ना? कहीं जल्दबाज़ी तो नहीं कर रहा?"राम की आँखों में एक अजीब-सा आत्मविश्वास उतर आया।
"राम रघुवंशी की नज़र कभी धोखा नहीं खाती।"उसने बिना किसी हिचक के आगे कहा,"इसलिए... सब कुछ तैयार कर ले।"
अभिमन्यु ने उसके चेहरे को गौर से देखा। उसे समझ आ गया था कि राम कोई साधारण फैसला नहीं ले रहा। जब वह इस तरह यक़ीन के साथ कोई बात कहता था, तो उसके पीछे कोई ऐसी वजह ज़रूर होती थी, जो अभी सिर्फ़ वही जानता था।
अभिमन्यु ने धीरे से सिर हिलाया।" ठीक है... मैं काम शुरू करता हूँ।"
राम की आख़िरी बात सुनते ही अभिमन्यु के चेहरे पर ऐसी खुशी फैल गई, जिसे वह छिपा ही नहीं पाया। अगले ही पल उसने बिना किसी झिझक के आगे बढ़कर राम को कसकर गले लगा लिया।
"यारा..." उसकी आवाज़ में बरसों की अपनापन भरी गर्माहट थी, "तूने आज जो बात कही है ना... दिल कर रहा है कि अभी यहीं झूम-झूमकर नाचूँ।"
राम उसकी इस अचानक की खुशी पर बस हल्का-सा मुस्कुराया। उसने दोस्त की पीठ पर दो-तीन हल्की थपकियाँ दीं और शांत स्वर में बोला, "बस कर... ज़्यादा उड़ मत। फिलहाल इस बात को ऐसे ही छिपा रहने दे।"
उसकी मुस्कान धीरे-धीरे फीकी पड़ गई।
"क्योंकि बात चाहे जैसी भी हो... है तो धोखे की। जब यह बात सामने आएगी ... तब क्या होगा, मैं नहीं जानता।"
अभिमन्यु ने तुरंत खुद को उससे अलग किया और कुछ पल तक बिना कुछ कहे उसका चेहरा देखता रहा। फिर उसने दोनों हाथों से राम के कंधे पकड़ लिए।
"तुझे सच में ऐसा लगता है?"राम ने कोई जवाब नहीं दिया।
अभिमन्यु हल्का-सा मुस्कुराया और बोला, "एक बात याद रख, यारा... मोहब्बत और जंग में बहुत-सी बातें सीधी रेखाओं से नहीं चलतीं।"वह कुछ पल रुका, फिर हँसते हुए बोला, "और वो लाइन तो सुनी ही होगी तूने... अगर परिणाम अच्छा हो, तो झूठ और धोखे का महत्व नहीं रह जाता।"
उसने राम के कंधे पर हाथ रखते हुए आगे कहा, "वैसे भी, मैं इसे धोखा नहीं मानता। हर सच बताने का भी एक सही वक़्त होता है। अभी बस वो वक़्त नहीं आया है। जब सही समय आएगा, सब कुछ साफ़ हो जाएगा।"
राम उसकी बातें चुपचाप सुनता रहा। उसके चेहरे पर अब भी वही गंभीरता थी, लेकिन अभिमन्यु उसे अच्छी तरह जानता था। उसे मालूम था कि बाहर से जितना सख़्त दिखने वाला यह आदमी है, भीतर से उतना ही ज़्यादा सोचने वाला भी है।
माहौल को हल्का करने के लिए अभिमन्यु ने अचानक मुस्कुराकर कहा, "इसलिए अब ज़्यादा मत सोच... चिल मार।"फिर उसने उँगली उठाकर शरारती अंदाज़ में जोड़ा, "और हाँ... आज रात की पार्टी तेरी तरफ़ से। इस बार कोई बहाना नहीं चलेगा।"
राम के होंठों पर अनायास मुस्कान लौट आई। उसने बेबसी से सिर हिलाया, मानो जानता हो कि इस मामले में अभिमन्यु से बहस करना बेकार है।
"ठीक है।"
बस इतना सुनना था कि अभिमन्यु विजयी मुस्कान के साथ मुड़ा, केबिन का दरवाज़ा खोला और सीटी बजाते हुए बाहर निकल गया। उसके जाते ही कमरे में फिर वही खामोशी लौट आई, लेकिन इस बार उस खामोशी में राम के चेहरे पर ठहरी हल्की-सी मुस्कान कुछ देर तक बनी रही।
कमरे के भीतर गहरा सन्नाटा पसरा हुआ था। ए.सी. की ठंडी हवा धीरे-धीरे पूरे कमरे में फैल रही थी कि तभी बिस्तर पर लेटी अनुराधा की पलकों में हल्की-सी हरकत हुई। कुछ क्षण बाद उसकी आँखें अचानक खुल गईं।एक पल के लिए वह बिल्कुल स्थिर पड़ी रही।
उसकी नज़रें अनजान छत पर टिक गईं। फिर धीरे-धीरे कमरे की दीवारों, फर्नीचर और आसपास की हर चीज़ पर घूमने लगीं। अगले ही क्षण उसे एहसास हुआ कि यह जगह उसके लिए पूरी तरह अपरिचित है।
उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा।घबराहट जैसे एक ही पल में उसके पूरे शरीर में दौड़ गई। माथे पर पसीने की बारीक बूँदें उभर आईं, जबकि कमरे में ठंडक थी। उसने बिना देर किए घबराकर खुद को ऊपर से नीचे तक देखा। उसकी साँसें तब तक तेज़ चलती रहीं, जब तक उसे यह यक़ीन नहीं हो गया कि उसके कपड़े पूरी तरह ठीक हैं और उसके साथ कुछ भी गलत नहीं हुआ है।
यह देखकर उसे थोड़ी राहत तो मिली, लेकिन वह राहत उसकी बेचैनी को पूरी तरह शांत नहीं कर सकी।उसके चेहरे पर अब भी डर साफ़ दिखाई दे रहा था। जैसे मन बार-बार उसे सावधान कर रहा हो कि जितनी जल्दी हो सके, इस जगह से निकल जाना चाहिए।
उसने जल्दी-जल्दी बिस्तर के आसपास नज़र दौड़ाई। कुछ ही दूरी पर उसका गुलाबी दुपट्टा रखा हुआ दिखाई दिया। उसने तुरंत उसे उठाया, काँपते हाथों से अपने कंधों पर ठीक से ओढ़ा और एक गहरी साँस लेकर बिस्तर से नीचे उतर आई।
उसके पैर अब भी हल्के-हल्के काँप रहे थे, लेकिन उस समय उसके मन में सिर्फ़ एक ही बात थी...
उसे किसी भी हालत में इस अनजान कमरे से बाहर निकलना था।इसी बेचैनी के साथ उसने दरवाज़े की दिशा में कदम बढ़ा दिए।
अनुराधा ने जैसे ही दरवाज़े की तरफ़ कदम बढ़ाया, उसी पल हैंडल घूमने की आवाज़ हुई और दरवाज़ा खुल गया।सामने राम खड़ा था।एक पल...बस एक पल के लिए दोनों की नज़रें मिलीं।
अनुराधा की आँखों की पुतलियाँ फैल गईं। लिफ्ट में बिताया हर सेकंड, उसकी घबराहट, उसका डर... सब कुछ एक झटके में उसके ज़ेहन में लौट आया। उसके चेहरे का रंग उड़ गया। उसने अनायास अपना दुपट्टा दोनों हाथों से सीने के पास कसकर पकड़ लिया और बिना कुछ सोचे पीछे हटने लगी। हर कदम के साथ उसकी बेचैनी बढ़ती जा रही थी, जैसे उसके सामने कोई ऐसा इंसान खड़ा हो जिससे जितनी दूरी बना सके, उतना कम हो।
राम ने उसे ध्यान से देखा।उसने महसूस किया कि अनुराधा सिर्फ़ असहज नहीं थी... वह बुरी तरह डरी हुई थी। उसकी साँसें तेज़ थीं, आँखों में बेचैनी साफ़ दिखाई दे रही थी और पीछे हटते हुए उसके कदम भी लड़खड़ा रहे थे। एक पल के लिए राम के मन में यही आया कि अगर वह इसी तरह पीछे हटती रही, तो खुद को चोट पहुँचा बैठेगी।
वह बिना जल्दबाज़ी किए उसकी तरफ़ बढ़ा।
"रिलैक्स..."उसने धीमे स्वर में कहना चाहा, लेकिन शब्द पूरे भी नहीं हो पाए। जैसे ही उसने उसे संभालने के इरादे से उसकी बाँह की तरफ़ हाथ बढ़ाया, अनुराधा के भीतर जैसे बरसों से दबा हुआ भय अचानक फट पड़ा।
उसने एक झटके से अपना हाथ उठाया।चटाक...!थप्पड़ इतनी ज़ोर से पड़ा कि उसकी आवाज़ पूरे कमरे में गूँज उठी।राम का चेहरा एक तरफ़ मुड़ गया।कुछ सेकंड तक समय जैसे थम-सा गया।
न राम ने कुछ कहा...न अनुराधा ने।कमरे में सिर्फ़ दोनों की तेज़ साँसों की आवाज़ रह गई।
राम धीरे-धीरे अपना चेहरा सीधा करता है। उसके गाल पर उभरती लाल हथेली साफ़ दिखाई दे रही थी। वह सिर्फ़ अनुराधा को देख रहा था।
उधर अनुराधा का पूरा शरीर काँप रहा था। उसके चेहरे पर गुस्सा था, लेकिन उस गुस्से की जड़ में एक गहरा डर छिपा हुआ था। उसकी आँखों में नमी उतर आई थी, जैसे यह थप्पड़ उसने सिर्फ़ सामने खड़े आदमी को नहीं, बल्कि अपने अतीत की किसी परछाईं को मारा हो।
वह काँपती आवाज़ में बोली,"बदतमीज़ इंसान...! क्या एक लड़की तुम लोगों के लिए सिर्फ़ पब्लिक प्रॉपर्टी होती है? जब मन किया, उसकी मर्ज़ी के बिना उसे छू लिया... उस पर अपना हक़ जमाने लगे।"
उसके शब्द कमरे की खामोशी को चीरते हुए निकले। हर शब्द में नफ़रत थी, शिकायत थी... और सबसे ज़्यादा, एक ऐसा दर्द था जो साफ़ बता रहा था कि यह गुस्सा सिर्फ़ इस पल का नहीं था।
राम ने धीरे-धीरे अपना चेहरा सीधा किया। गाल पर थप्पड़ की लाल छाप साफ़ उभर आई थी, लेकिन उसने उसे छुआ तक नहीं।
थप्पड़ पड़ने के बाद भी राम ने न तो अपना हाथ उठाया और न ही कोई जवाब दिया। उसने बस बहुत धीरे से अपना चेहरा सीधा किया। उसके जबड़े की नसें तन चुकी थीं और आँखों में उतरती लालिमा उसके भीतर उठ रहे उबाल का पता दे रही थी। वह बिना पलक झपकाए अनुराधा को देख रहा था। उसकी वह चुप्पी किसी भी ऊँची आवाज़ से कहीं ज़्यादा भारी थी।
लेकिन अनुराधा जैसे रुकने वाली नहीं थी। उसके भीतर वर्षों से दबा भय, अपमान और गुस्सा एक साथ शब्द बनकर बाहर निकल रहा था। उसे यह भी एहसास नहीं रहा कि सामने खड़ा आदमी एक शब्द तक नहीं बोला था। वह बस अपने भीतर जमा हर तकलीफ़ उसी पर उँडेलती जा रही थी।
"मैंने तो सिर्फ़ इतना कहा था कि... आप बदतमीज़ हैं।" उसकी साँसें तेज़ चल रही थीं, फिर भी वह बोलती रही, "लेकिन आप तो निहायत ही... घटिया इंसान हैं। एक अकेली लड़की देखी नहीं कि..."
वाक्य अधूरा रह गया।बोलते-बोलते उसकी नज़र पहली बार सीधे राम की आँखों से जा मिली।
वह जैसे वहीं ठिठक गई।
उन आँखों में गुस्सा था, लेकिन वह शोर मचाता हुआ गुस्सा नहीं था। वह बिल्कुल स्थिर था। इतना स्थिर कि उसे देखकर अनुराधा के भीतर का साहस एक पल के लिए डगमगा गया। उसके होंठ खुले रह गए, पर आवाज़ साथ छोड़ चुकी थी। कमरे में फिर वही सन्नाटा उतर आया जिसमें केवल दोनों की साँसें सुनाई दे रही थीं।
अनुराधा ने अनायास अपने होंठ भींच लिए। वह जानती थी कि वह डर गई है, मगर वह यह डर उसके सामने प्रकट नहीं होने देना चाहती थी। उसने अपनी उँगलियाँ दुपट्टे में और कस लीं, एक गहरी साँस लेकर खुद को संभालने की कोशिश की और दोबारा कुछ कहने के लिए होंठ खोले।
उसी क्षण राम उसकी ओर बढ़ा।उसके कदम तेज़ नहीं थे, फिर भी हर कदम अनुराधा के दिल की धड़कन और बढ़ा देता था। वह अनायास पीछे हटती चली गई। एक कदम... फिर दूसरा... फिर तीसरा... और तभी उसकी पीठ दीवार से जा लगी। उसने पलटकर देखा, पीछे हटने की अब कोई जगह नहीं बची थी।
राम उसके सामने आकर रुक गया।दोनों के बीच बस उतनी ही दूरी रह गई थी जितनी दो लोगों के बीच साँसों के टकराने के लिए काफ़ी होती है। अनुराधा ने महसूस किया कि उसका गला पूरी तरह सूख चुका है। उसने मुश्किल से थूक निगला। उसके हाथ अब भी दुपट्टे को कसकर पकड़े हुए थे, मानो वही उसे टूटने से बचाए हुए हो।
वह अपने चेहरे पर दृढ़ता बनाए रखने की पूरी कोशिश कर रही थी, लेकिन उसकी आँखों में उतर आई घबराहट अब छिप नहीं रही थी।
उसने काँपते होंठों से बोलना चाहा।"य... ये...आ... आप..."। लेकिन शब्द वहीं अटक गए। सामने खड़ा आदमी अब भी चुप था, और उसकी वही ख़ामोशी अनुराधा के भीतर उठ रहे तूफ़ान को और गहरा करती जा रही थी।
राम एक कदम और आगे बढ़ा। दोनों के बीच की दूरी लगभग ख़त्म हो चुकी थी। उसने अपने दोनों हाथ अनुराधा के दोनों ओर दीवार पर टिकाए, लेकिन उसे छुआ नहीं। फिर भी उसके इतने करीब खड़े होने भर से अनुराधा की धड़कनें बेकाबू हो गईं। वह दीवार से लगी खड़ी थी और उसकी निगाहें कभी राम के चेहरे पर जातीं, तो कभी बाहर निकलने का कोई रास्ता ढूँढ़ने लगतीं।
उसने हिम्मत जुटाकर कुछ कहना चाहा, लेकिन जैसे ही उसकी नज़र राम की सुलगती हुई आँखों से मिली, उसके शब्द होंठों पर ही थम गए।
राम कुछ पल तक बिना कुछ बोले उसे देखता रहा। फिर उसने अपने जबड़े भींचे और हर शब्द पर ज़ोर देते हुए कहा,
"How dare you... मुझे थप्पड़ मारने की।"उसकी आवाज़ ऊँची नहीं थी, लेकिन उसमें दबा हुआ गुस्सा साफ़ महसूस किया जा सकता था।तुम जानती भी हो... राम रघुवंशी को एक थप्पड़ मारने का अंजाम क्या हो सकता है?"
अनुराधा का गला सूख गया। उसने मुश्किल से अपने हलक में थूक निगला। डर अब भी उसके भीतर था, लेकिन उसने उसे अपने चेहरे पर हावी नहीं होने दिया। काँपती साँसों के बावजूद उसने खुद को संभाला और धीमे, मगर साफ़ शब्दों में जवाब दिया,
"हाँ... तो... तो आपकी हिम्मत कैसे हुई... मुझे इस कमरे में रखने की?"
उसने एक पल के लिए राम की आँखों में देखा। उसकी आवाज़ काँप रही थी, फिर भी उसने अपनी बात पूरी की।
"ऐसे कौन करता है किसी लड़की के साथ? बिना उसकी मर्ज़ी के उसे एक अनजान कमरे में ले आते हैं... और फिर उम्मीद करते हैं कि वो डरे नहीं?"
उसके शब्दों के बाद कमरे में फिर वही भारी खामोशी उतर आई। दोनों अपनी-अपनी जगह खड़े थे। एक के भीतर गुस्सा उबल रहा था, तो दूसरी के भीतर डर और आक्रोश एक साथ टकरा रहे थे।
राम अब तक अपने गुस्से को जैसे किसी तरह काबू में रखे हुए था, लेकिन अनुराधा का हर जवाब उसके धैर्य की आख़िरी सीमा को छू रहा था। उसकी आँखों में वही सुलगता हुआ गुस्सा था, जिसे वह लगातार दबाने की कोशिश कर रहा था।
अचानक उसने आगे बढ़कर एक हाथ से अनुराधा के दोनों गाल कसकर पकड़ लिए।अनुराधा दर्द से हल्का-सा सिहर उठी।
राम ने उसकी आँखों में सीधा देखते हुए दबी हुई, लेकिन बेहद सख़्त आवाज़ में कहा, "जाहिल लड़की... बिना सोचे-समझे कुछ भी बोल देती हो, और हाथ भी बहुत जल्दी उठा देती हो। दिमाग़ नाम की भी कोई चीज़ होती है... जो लगता है तुम्हारे पास बिल्कुल नहीं है, बेवकूफ़ लड़की।"
उसके शब्द जितने कठोर थे, उतनी ही गहरी खामोशी कमरे में फैलती जा रही थी।अनुराधा ने खुद को छुड़ाने की कोशिश नहीं की। वह बस उसे देखती रही। अगले ही पल उसकी आँखों में तैरती नमी भर आई। उसने उन्हें रोकने की पूरी कोशिश की, लेकिन आँसू उसकी पलकों की कैद से निकल ही गए। दो बूँदें उसके गालों से लुढ़कती हुई सीधे राम की उँगलियों पर आ गिरीं।
राम की आवाज़ वहीं थम गई।उसकी नज़र पहली बार अनुराधा के चेहरे पर ठहरी। कुछ क्षण पहले तक गुस्से से भरा उसका ध्यान अब उस मासूम चेहरे पर टिक गया था, जो इस वक़्त डर, अपमान और बेबसी के बीच चुपचाप खड़ा था।
बिना कुछ कहे उसने धीरे से अपना हाथ उसके चेहरे से हटा लिया।फिर भी वह अपनी जगह से नहीं हटा।उन दोनों के बीच की दूरी अब भी उतनी ही कम थी।
उधर अनुराधा ने तुरंत अपना चेहरा झुका लिया। वह नहीं चाहती थी कि राम उसकी आँखों में भरे आँसू देखे। उसने होंठ भींच लिए, ताकि कोई सिसकी बाहर न निकल सके। उसकी उँगलियाँ दुपट्टे के किनारे को इतनी कसकर पकड़े हुए थीं कि पोर सफ़ेद पड़ गए थे।
कमरे में फिर से सन्नाटा छा गया।एक तरफ़ राम था, जो अब भी अपने भीतर उठते गुस्से से जूझ रहा था, और दूसरी तरफ़ अनुराधा, जो अपने आँसुओं को किसी भी कीमत पर उसके सामने अपनी कमज़ोरी नहीं बनने देना चाहती थी।
राम कुछ देर तक अनुराधा को देखता रहा। उसके झुके हुए चेहरे पर बिखरी बेबसी, पलकों से चुपचाप गिरते आँसू और खुद को मज़बूत दिखाने की उसकी नाकाम कोशिश राम के भीतर एक अजीब-सी उथल-पुथल पैदा कर रही थी।
अभी कुछ क्षण पहले तक जो गुस्सा उसके भीतर धधक रहा था, वह जाने कब धीरे-धीरे पिघलने लगा। एक पल के लिए उसके मन में आया कि वह उसे अपने सीने से लगा ले, उसके काँपते हुए मन को सुकून दे दे, उससे कह दे कि अब उसे किसी बात से डरने की ज़रूरत नहीं है।
लेकिन अगले ही पल उसने अपनी उस इच्छा को वहीं दबा दिया। वह जानता था कि इस समय उसका ऐसा कोई भी कदम अनुराधा की नज़रों में उसकी छवि और खराब कर देगा। हालात उसके पक्ष में नहीं थे और न ही यह सही समय था।
उसने गहरी साँस लेकर अपने भीतर उठ रहे भावों को फिर से काबू में किया। कुछ क्षण तक चुप रहने के बाद वह धीमी, लेकिन सख़्त आवाज़ में बोला, "वैसे तो मैं किसी को अपनी सफ़ाई देना ज़रूरी नहीं समझता, लेकिन तुम्हारी जानकारी के लिए इतना बता देता हूँ कि जिस इंसान के बारे में तुम इतने देर से फ़ैसला सुनाती जा रही हो, उसने तुम्हारे साथ आखिर किया क्या है।"
राम की नज़रें अब भी उसी पर टिकी थीं, जबकि अनुराधा ने अपना चेहरा झुकाए रखा।
"तुम लिफ्ट में अचानक बेहोश हो गई थीं। उस समय पूरे फ्लोर पर कोई नहीं था। अब बताओ, तुम्हें उस हालत में अकेला छोड़ देता? इसलिए तुम्हें उठाकर यहाँ ले आया।"
वह कुछ पल के लिए रुका, फिर हल्की-सी कड़वाहट भरी मुस्कान उसके होंठों पर उभरी।
"Don't you think... इस सबके बाद तुम्हें कम-से-कम एक 'Thank You' तो कहना चाहिए था?"
उसने बिना आवाज़ ऊँची किए आगे कहा, "हर बात का दूसरा पहलू भी होता है। सिर्फ़ बोलती ही रहती हो... कभी-कभी सामने वाले की बात सुनना भी सीखो... पागल लड़की।"
अनुराधा अब भी चुप थी। उसने कोई जवाब नहीं दिया। उसकी पलकों से आँसू लगातार गिर रहे थे। तभी एक गर्म आँसू राम की उँगलियों पर आकर ठहरा। उस स्पर्श ने जैसे उसे अचानक एहसास दिला दिया कि वह अब भी उसके चेहरे को ज़रूरत से ज़्यादा कसकर पकड़े हुए है।
राम ने तुरंत अपनी पकड़ ढीली कर दी।धीरे से उसने उसकी ठुड्डी ऊपर की, ताकि उसका चेहरा ठीक से देख सके।अनुराधा ने चाहकर भी उसकी तरफ़ नहीं देखा।उसकी नज़रें झुकी रहीं।
लेकिन राम की नज़र उसके दोनों गालों पर जाकर ठहर गई।उसकी उँगलियों के लाल निशान उसके गोरे चेहरे पर साफ़ उभर आए थे।एक पल के लिए राम बिल्कुल शांत हो गया।उसे एहसास हुआ कि गुस्से में उसने उसके जबड़े को ज़रूरत से कहीं ज़्यादा ज़ोर से दबा दिया था।
उसने अनजाने में उसे तकलीफ़ पहुँचा दी थी।यह ख़याल आते ही उसके भीतर एक गहरा अपराधबोध उतर आया। कुछ क्षण पहले तक जो आदमी अपने गुस्से को सही मान रहा था, वही अब उन लाल पड़े निशानों को देखकर खुद से नज़रें नहीं मिला पा रहा था।
Continue...........


Write a comment ...