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6.His Dark Obssession

राम ने जैसे ही अनुराधा के मुँह से अपनी माँ और बहन के बारे में वह बात सुनी, उसके बढ़ते कदम वहीं ठिठक गए। कुछ क्षण तक वह बिल्कुल स्थिर खड़ा रहा। फिर बिना कोई प्रतिक्रिया दिए धीरे-धीरे मुड़ा और उसी शांत चाल से वापस लिफ्ट की ओर चल पड़ा।

उसे अपनी ओर लौटते देख अनुराधा का चेहरा एकाएक बदल गया। अभी कुछ क्षण पहले तक जो गुस्सा उसके शब्दों में था, वह पलभर में जाने कहाँ गायब हो गया। उसे लगा, शायद उसने कुछ ज़्यादा कह दिया है।

जैसे ही राम लिफ्ट के भीतर आया, उसने घबराकर तुरंत 'डोर क्लोज़' का बटन दबाने के लिए हाथ बढ़ाया, मानो किसी तरह दरवाज़ा बंद होने से पहले उसे बाहर ही रोक दे। लेकिन उसकी उँगलियाँ बटन तक पहुँचतीं, उससे पहले ही राम ने आगे बढ़कर अपनी हथेली से 'स्टॉप' का बटन दबा दिया।

हल्की-सी 'बीप' के साथ लिफ्ट वहीं ठहर गई।उस एक आवाज़ ने जैसे अनुराधा के भीतर भी सब कुछ रोक दिया।अब बंद लिफ्ट में फिर वही दोनों थे।

चारों तरफ़ गहरा सन्नाटा था। ऊपर जलती सफ़ेद रोशनी, बंद धातु की दीवारें और उनके बीच पसरी हुई खामोशी अचानक इतनी भारी हो गई कि अनुराधा को अपनी ही साँसों की आवाज़ साफ़ सुनाई देने लगी।

कुछ क्षण पहले तक वह जितनी निर्भीक दिखाई देने की कोशिश कर रही थी, उतनी ही तेज़ी से उसका साहस बिखरने लगा। उसके मन में एक साथ न जाने कितने ख़याल दौड़ पड़े। उसने अनायास एक कदम पीछे हटना चाहा, लेकिन पीछे फिर वही लिफ्ट की ठंडी दीवार थी।

उसकी उँगलियाँ काँपने लगीं। माथे पर पसीने की महीन बूँदें उभर आईं, जो देखते-देखते कनपटियों तक उतरने लगीं। गला जैसे सूख गया था। उसने कई बार कुछ कहना चाहा, मगर शब्द होंठों तक आते-आते बिखर जाते। उसकी नज़र एक पल राम के चेहरे पर जाती और अगले ही पल घबराकर झुक जाती। वह पहली बार सचमुच डर गई थी।

राम अब भी कुछ नहीं बोला। वह बस शांत खड़ा उसे देख रहा था। उसके चेहरे पर क्रोध की कठोर रेखाएँ थीं, पर उनमें कोई उतावलापन नहीं था। यही संयम, यही मौन अनुराधा को और अधिक विचलित कर रहा था। उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि सामने खड़ा आदमी अगले ही पल क्या कहेगा।

आख़िरकार काँपते हुए उसके होंठ खुले।

"मु... मु... मुझे..." उसने जैसे बड़ी मुश्किल से शब्दों को आवाज़ दी, "छो... छोड़ दो..."

वाक्य पूरा करते-करते उसकी आवाज़ लगभग फुसफुसाहट में बदल गई। वह दीवार से लगी खड़ी थी, दोनों हथेलियाँ अपने दुपट्टे को कसकर पकड़े हुए, और उसकी आँखों में पहली बार गुस्से की जगह साफ़-साफ़ भय दिखाई दे रहा था।

उसकी काँपती हुई वह आवाज़ जैसे सीधे राम के भीतर उतर गई।अब तक उसे लग रहा था कि सामने खड़ी लड़की गुस्से में जाने क्या-क्या कहे जा रही थी । लेकिन उस एक वाक्य ने सब कुछ बदल दिया। वह पहली बार उसकी आँखों को ध्यान से देखने लगा।

उनमें अब गुस्सा नहीं था, न चुनौती... वहाँ केवल भय था। ऐसा भय जो किसी अभिनय का हिस्सा नहीं हो सकता था। उसका चेहरा पूरी तरह सफ़ेद पड़ चुका था। माथे पर उभरा पसीना कनपटियों से होता हुआ गर्दन तक उतर आया था। होंठ बुरी तरह काँप रहे थे और साँसें इस तरह टूट रही थीं, मानो सीने में अटक गई हों।

राम का सारा क्रोध उसी क्षण जैसे कहीं विलीन हो गया।उसे अचानक एहसास हुआ कि शायद उसने उसे ज़रूरत से ज़्यादा डरा दिया है। उसका इरादा उसे डराने का कभी नहीं था। वह तो बस उसकी कही हुई बातों का जवाब देना चाहता था, लेकिन सामने खड़ी लड़की की हालत देखकर पहली बार उसके भीतर एक अनजानी-सी बेचैनी उठी।

उसने सहज ही एक कदम उसकी ओर बढ़ाया। उसके चेहरे की कठोरता कब की उतर चुकी थी। वह कुछ कहना चाहता था, शायद यह समझाना चाहता था कि उसे डरने की कोई ज़रूरत नहीं है, लेकिन शब्द होंठों तक पहुँचने से पहले ही सब कुछ अचानक बदल गया।

अनुराधा की पलकों ने एक बार धीमे से झपकने की कोशिश की, जैसे वह सामने खड़े आदमी को आख़िरी बार साफ़ देख लेना चाहती हो। अगले ही क्षण उसकी आँखों की रोशनी बुझती-सी चली गई। उसके घुटनों ने जवाब दे दिया और उसका शरीर धीरे-धीरे आगे की ओर झुकने लगा।

"अरे..."

राम के मुँह से अनायास निकला। उसने बिना एक पल गँवाए आगे बढ़कर उसे अपनी बाँहों में थाम लिया। यदि वह ज़रा-सी भी देर कर देता, तो वह सीधे संगमरमर के फर्श पर गिर पड़ती। उसका हल्का-सा शरीर पूरी तरह ढीला पड़ चुका था। सिर आकर राम के कंधे से टिक गया और उसके बिखरे हुए बाल बाँह पर फैल गए।

राम ने एक क्षण उसे वैसे ही थामे रखा। उसे यक़ीन ही नहीं हुआ कि अभी कुछ पल पहले जो लड़की पूरे आत्मविश्वास से उससे उलझ रही थी, वह इस तरह बेहोश होकर उसकी बाँहों में निढाल हो जाएगी। उसने हल्के हाथों से उसके गाल थपथपाए।

"सुनो..."उसकी आवाज़ अब पहले जैसी नहीं थी। उसमें पहली बार घबराहट साफ़ सुनाई दे रही थी।

"सुनिए... आँखें खोलिए... क्या हुआ आपको?"कोई उत्तर नहीं मिला।उसने फिर उसके गाल पर हल्की-सी थपकी दी। "सुन रही हैं आप...?"

लेकिन उसकी पलकों में कोई हरकत नहीं हुई। उसकी साँसें चल रही थीं, मगर वह पूरी तरह अचेत थी।

राम ने गहरी साँस ली। अब सोचने का समय नहीं था। उसने बहुत सावधानी से उसे अपनी बाँहों में उठा लिया, इस तरह कि उसका सिर और गर्दन बिल्कुल स्थिर रहें।

फिर एक नज़र उसके निस्तेज चेहरे पर डाली। कुछ क्षण पहले तक उसी चेहरे पर गुस्से की लाली थी, और अब वहाँ केवल बेहोशी की निस्पंद शांति थी।उसने तुरंत लिफ्ट का स्टॉप बटन हटाया। दरवाज़े खुलते ही वह तेज़ क़दमों से बाहर निकला और उसे सँभाले हुए अपने केबिन की ओर बढ़ गया। उसके कदम तेज़ ज़रूर थे, लेकिन इतने संतुलित कि उसकी बाँहों में बेसुध पड़ी लड़की को ज़रा-सा भी झटका न लगे।

लिफ्ट का दरवाज़ा खुलते ही राम तेज़ क़दमों से बाहर निकला। चौबीसवीं मंज़िल पर हमेशा की तरह गहरा सन्नाटा पसरा हुआ था। पूरे फ़्लोर पर केवल एक ही केबिन था...राम रघुवंशी का।

रघुवंशी एम्पायर में यह नियम वर्षों से चला आ रहा था कि कोई भी व्यक्ति सीधे राम तक नहीं पहुँच सकता था। उससे मिलने की इच्छा रखने वाले को पहले अठारहवीं मंज़िल पर विवान या अथर्व से समय लेना पड़ता था। किससे, कब और कितनी देर के लिए मुलाक़ात होगी, इसका अंतिम निर्णय वही दोनों करते थे। चौबीसवीं मंज़िल तक बिना उनकी अनुमति के पहुँचना लगभग असंभव था।

राम ने अपने केबिन का दरवाज़ा खोला और बिना रुके भीतर चला गया।विशाल केबिन के पीछे, लकड़ी की पैनलिंग में इस तरह छिपा एक दरवाज़ा था कि पहली नज़र में उसका होना किसी को दिखाई भी न दे। उसने सुरक्षा लॉक खोला। दरवाज़ा खुलते ही भीतर बना वह सीक्रेट रूम सामने था, जिसके बारे में कंपनी में गिने-चुने लोगों को ही जानकारी थी।

कमरे में हल्की चंदन की सुगंध घुली हुई थी। दीवारों के रंग आँखों को सुकून देते थे और बीचोंबीच रखा चौड़ा बिस्तर पूरे कमरे को एक शांत गरिमा दे रहा था।राम ने अत्यंत सावधानी से उसे अपनी बाँहों से उतारा।

उसने इस बात का पूरा ध्यान रखा कि उसका सिर कहीं झटके से न लगे। धीरे-धीरे उसे बिस्तर पर लिटाया और तकिए को हल्का-सा ठीक कर उसके सिर के नीचे लगा दिया। फिर एक क्षण रुककर उसने उसके चेहरे की ओर देखा।

वह अब भी बेहोश थी।उसकी साँसें पहले की अपेक्षा कुछ संतुलित अवश्य थीं, पर चेहरा अभी भी फीका पड़ा हुआ था। माथे पर पसीने की महीन बूँदें अब भी चमक रही थीं। घुँघराले बालों की कुछ लटें चेहरे पर बिखर आई थीं।

राम ने जेब से अपना फ़ोन निकाला।उसने बिना समय गँवाए अभिमन्यु को केवल एक छोटा-सा संदेश भेजा,Immediately. My cabin."संदेश भेजते ही उसने फ़ोन एक ओर रख दिया।

कमरे में फिर वही गहरी ख़ामोशी लौट आई।राम बिस्तर के पास रखी कुर्सी खींचकर बैठ गया। उसकी नज़र अनायास ही अनुराधा के चेहरे पर ठहर गई। कुछ देर पहले तक इसी चेहरे पर गुस्से की तपिश थी, आँखों में चुनौती थी और शब्दों में आग। अब वही चेहरा बिल्कुल शांत था। साँसों की धीमी लय के अलावा उसमें किसी हलचल का कोई चिन्ह नहीं था।

उसे पहली बार लगा कि यह लड़की जितनी निडर दिखने की कोशिश करती है, भीतर से उतनी ही कोमल है।

राम ने आगे बढ़कर उसके माथे के पास आ गिरी एक बिखरी लट को बहुत सावधानी से एक ओर कर दिया, ताकि वह उसके चेहरे पर न आए। उसके बाद उसने अपना हाथ तुरंत वापस खींच लिया। वह जानता था कि इस समय उसकी पहली ज़िम्मेदारी उसे होश में लाना और यह सुनिश्चित करना है कि वह सुरक्षित है।

फिर भी उसकी आँखें बार-बार उसी चेहरे पर लौट आती थीं।वह समझ नहीं पा रहा था कि ऐसा क्यों हो रहा है। उसने अपने जीवन में न जाने कितने लोगों से मुलाक़ात की थी। चेहरे उसके लिए कभी मायने नहीं रखते थे।

लेकिन इस लड़की के चेहरे की मासूमियत, उसके भावों की सच्चाई और कुछ देर पहले तक उसके भीतर उमड़ता हुआ गुस्सा..सब मिलकर जैसे उसकी स्मृति पर एक गहरी छाप छोड़ गए थे।

राम ने धीरे से लंबी साँस ली और कुर्सी की पीठ से टिक गया। उसकी निगाह अब भी उसी पर थी, लेकिन उस निगाह में आकर्षण से अधिक चिंता थी।उसे बस अभिमन्यु के आने का इंतज़ार था।

राम का इस तरह अचानक फोन करना ही अभिमन्यु के लिए हैरानी की बात थी। ऊपर से उसने बिना कुछ समझाए सिर्फ़ इतना कहा था, "एक फीमेल डॉक्टर को लेकर तुरंत मेरे केबिन आओ।"

बस... इतना कहकर उसने कॉल काट दिया।

अभिमन्यु कुछ क्षण फोन की स्क्रीन देखता रह गया। वर्षों की दोस्ती में उसने राम को कभी इस तरह किसी बात की जल्दबाज़ी करते नहीं देखा था। उसके मन में न जाने कितने सवाल उठे, लेकिन वह जानता था कि इस समय सवालों से ज़्यादा ज़रूरी राम की बात मानना है।

बिना एक पल की देरी किए वह तुरंत एक महिला डॉक्टर को साथ लेकर चौबीसवीं मंज़िल की ओर निकल पड़ा। रास्ते में विवान और अथर्व भी उनके साथ आ गए। दोनों के चेहरे पर भी उलझन साफ़ दिखाई दे रही थी। आखिर ऐसा क्या हो गया था कि राम ने खुद फोन करके एक महिला डॉक्टर बुलवाई?

कुछ ही देर बाद चारों राम के केबिन के भीतर बने सीक्रेट रूम में दाखिल हुए।कमरे में कदम रखते ही अभिमन्यु की नज़र अनायास सामने बिस्तर पर चली गई... और वहीं ठहर गई।

बिस्तर पर एक लड़की बेहोश पड़ी थी।

एक पल के लिए उसकी आँखें अविश्वास से फैल गईं। उसे अपनी हैरानी पर यक़ीन ही नहीं हुआ। वह राम को जितना जानता था, उतना शायद ही कोई और जानता हो। इस सीक्रेट रूम में तो आज तक परिवार के गिने-चुने लोगों के अलावा किसी को आने की इजाज़त नहीं मिली थी, फिर आज इस अनजान लड़की का यहाँ होना... उसकी समझ से बिल्कुल बाहर था।

उसकी नज़र धीरे-धीरे उस लड़की से हटकर राम के चेहरे पर पहुँची। वह कुछ पूछने के लिए होंठ खोल ही रहा था कि महिला डॉक्टर ने बिना समय गँवाए शांत लेकिन सख़्त लहज़े में कहा,

"प्लीज़... आप सब बाहर वेट कीजिए। पहले मुझे इन्हें चेक करने दीजिए।"

डॉक्टर की बात सुनकर राम बिना कुछ कहे एक तरफ़ हट गया। उसके पीछे अभिमन्यु, विवान और अथर्व भी चुपचाप कमरे से बाहर निकल आए। राम ने धीरे से दरवाज़ा बंद किया और उसकी नज़रें उसी बंद दरवाज़े पर टिक गईं, जबकि अभिमन्यु के मन में उठे सवाल अब पहले से कहीं ज़्यादा गहरे हो चुके थे।

डॉक्टर के कमरे के अंदर जाते ही दरवाज़ा धीरे से बंद हो गया। बाहर गलियारे में फिर वही ख़ामोशी फैल गई। चारों की नज़रें कुछ क्षण तक उसी बंद दरवाज़े पर टिकी रहीं। माहौल इतना अचानक बदल गया था कि किसी के पास कहने के लिए शब्द नहीं थे।

राम दरवाज़े के सामने बिल्कुल स्थिर खड़ा था। उसकी निगाहें दरवाज़े से हट ही नहीं रही थीं। उसके चेहरे पर हमेशा की तरह वही ठहराव था, लेकिन जो लोग उसे अच्छी तरह जानते थे, वे समझ सकते थे कि उसके भीतर बहुत कुछ चल रहा है।

अभिमन्यु कुछ देर तक चुपचाप उसे देखता रहा। जितनी हैरानी उसे उस लड़की के बेहोश होने पर नहीं थी, उससे कहीं ज़्यादा इस बात पर थी कि राम उसे अपनी बाँहों में उठाकर सीधे अपने सीक्रेट रूम तक ले आया था।

इस कमरे में आज तक किसी बाहरी व्यक्ति का आना तो दूर, उसके बारे में जानने वाले लोग भी उँगलियों पर गिने जा सकते थे। और आज उसी कमरे के अंदर एक लड़की उसके अपने बेड पर लेटी थी।

आख़िरकार उसने आगे बढ़कर राम के कंधे पर हाथ रखा। उसके चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान थी, लेकिन आँखों में सवाल साफ़ दिखाई दे रहे थे।

"माजरा क्या है?" उसने धीमे स्वर में पूछा। "ऐसा क्या किया तूने कि एक लड़की बेहोश हो गई? और ऊपर से उसे अपने कमरे में... अपने ही बेड पर सुला दिया।"

वह कुछ पल रुका, फिर सिर हिलाते हुए बोला, "तुझे इतने सालों से जानता हूँ, राम। तूने आज तक ऐसा कभी नहीं किया। ख़ासकर किसी लड़की के लिए... कभी नहीं।"

राम ने उसकी तरफ़ देखा। वह शायद पूरी बात बताने ही वाला था कि तभी अब तक चुप खड़ा विवान अचानक बोल पड़ा,

"भाई... ये अनुराधा दी बेहोश कैसे हो गई?"

उसके मुँह से 'अनुराधा' नाम सुनते ही राम की दोनों भौंहें अनायास आपस में जुड़ गईं। उसने पहली बार उस नाम को अपने भीतर दोहराया।

"अनुराधा...?"

अभिमन्यु जैसे एकदम ठिठक गया। पहले उसने विवान की तरफ़ देखा, फिर राम की ओर, और अगले ही पल अविश्वास में अपना हाथ मुँह पर रख लिया।

"रुको..." उसके मुँह से अनायास निकला। "क्या... ये मिस ठाकुर हैं?"उसने तुरंत अथर्व की तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर अब उत्सुकता नहीं, बल्कि साफ़ हैरानी थी।

"अथर्व... वही मिस ठाकुर... जिन्हें भाई ने अपना नया पी.ए. रखा है?"अथर्व ने बिना कुछ कहे बस धीरे से सिर हिलाकर 'हाँ' कह दिया।

अभिमन्यु कुछ क्षण तक बिल्कुल चुप खड़ा रहा। उसकी नज़र कभी बंद दरवाज़े पर जाती, कभी राम के चेहरे पर लौट आती। उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि किस बात पर ज़्यादा हैरान हो। इस बात पर कि बेहोश पड़ी लड़की वही मिस ठाकुर थी... या इस बात पर कि राम, जिसने आज तक किसी लड़की को अपने निजी दायरे में आने नहीं दिया, आज उसी लड़की के लिए डॉक्टर बुलाकर उसके कमरे के बाहर खड़ा था।

उधर राम के मन में भी पहली बार एक बात साफ़ हुई..अनुराधा...तो यही उसका नाम था।

अभिमन्यु की बात के बाद कुछ क्षण के लिए फिर सन्नाटा छा गया। राम की नज़र अब विवान पर टिक गई थी। उसके चेहरे पर कोई विशेष भाव नहीं था, लेकिन उसकी आँखों में एक सीधा-सा प्रश्न साफ़ दिखाई दे रहा था।

अपनी उसी गहरी और स्थिर आवाज़ में उसने पूछा, "क्या... यही अनुराधा ठाकुर है?"

"हाँ, भाई... यही है।" विवान ने बिना एक पल गँवाए जवाब दिया।

राम कुछ नहीं बोला।उसने बस एक बार बंद दरवाज़े की ओर देखा, जिसके पीछे अनुराधा अब भी बेहोश पड़ी थी।राम ने मन मे कहा, " तो तुम हो... मिस ठाकुर ! उसके होंठों पर एक बेहद हल्की, लगभग अदृश्य-सी रेखा उभरी और उतनी ही जल्दी गायब भी हो गई।

"तुम्हारे नाम ने मुझे कल रात से परेशान कर रखा था... और अब तुम ख़ुद मुझे हक़ीक़त में परेशान कर रही हो।"

यह सोचते ही उसकी निगाह एक बार फिर उसी बंद दरवाज़े पर टिक गई।उसी समय कमरे का दरवाज़ा खुला।

दरवाज़े की हल्की-सी आवाज़ ने सबका ध्यान अपनी ओर खींच लिया। डॉक्टर बाहर निकली। उसके चेहरे पर वह सहज संतोष नहीं था, जो सामान्य जाँच के बाद दिखाई देता है। उसकी भौंहों के बीच हल्की-सी सिलवट थी, मानो उसने कुछ ऐसा देखा हो जिसने उसे सोचने पर मजबूर कर दिया हो।

एक पल में चारों की नज़रें उसी पर टिक गईं।सबसे आगे खड़ा राम बिना कुछ कहे डॉक्टर को देख रहा था। उसकी गहरी, स्थिर निगाहें डॉक्टर के चेहरे से हट ही नहीं रही थीं। वह किसी तरह की जल्दबाज़ी में नहीं था, लेकिन इंतज़ार ज़रूर कर रहा था। डॉक्टर के चेहरे पर उभरे उन हल्के-से परेशानी के भाव उसकी नज़र से छिप नहीं पाए थे। डॉक्टर ने भी एक क्षण के लिए राम की आँखों में देखा।

डॉक्टर धीमे-धीमे कदमों से चलती हुई राम के सामने आकर रुक गई। उसके चेहरे पर अब भी गंभीरता बनी हुई थी।उसने एक गहरी साँस ली और प्रोफेशनल लहज़े में कहा,"सर... वैसे तो आपकी वाइफ अब खतरे से बाहर हैं। फिलहाल उनकी हालत स्थिर है।"

"वाइफ...?"यह शब्द सुनते ही अभिमन्यु, विवान और अथर्व तीनों की आँखें एक साथ फैल गईं।

क्या...?तीनों लगभग एक साथ बोल पड़े, लेकिन इससे पहले कि कोई अपनी बात पूरी करता, राम ने बिना उनकी तरफ़ देखे बस अपना दाहिना हाथ हल्का-सा उठा दिया।

उसका इशारा ही काफ़ी था।तीनों तुरंत चुप हो गए। हालांकि उनके चेहरों पर छाया अविश्वास साफ़ बता रहा था कि उनके मन में इस वक्त हज़ारों सवाल उमड़ रहे थे।

उधर डॉक्टर भी उनकी प्रतिक्रिया देखकर कुछ पल के लिए असहज हो गई। उसे लगा शायद उसने कुछ ऐसा कह दिया है, जो उसे नहीं कहना चाहिए था।

कुछ क्षणों की ख़ामोशी के बाद राम ने अपनी ठंडी, गंभीर और अधिकारपूर्ण आवाज़ में कहा,

"हाँ... तो आप क्या कह रही थीं, डॉक्टर?"वह एक पल रुका, फिर बिल्कुल सपाट चेहरे के साथ बोला,"क्या हुआ है... मेरी वाइफ को?"

'मेरी वाइफ' शब्द उसके मुँह से इतने सहज और ठहराव के साथ निकले कि डॉक्टर को ज़रा भी शक नहीं हुआ।लेकिन दूसरी तरफ़ खड़े अभिमन्यु, विवान और अथर्व के लिए यह किसी बम के फटने से कम नहीं था।

अभिमन्यु ने अविश्वास से राम की ओर देखा।"ये... कब हुआ?" उसने मन ही मन बुदबुदाया।विवान ने तो अपने होंठ ही दबा लिए, ताकि कहीं हँसी और हैरानी एक साथ बाहर न निकल जाए।वहीं अथर्व बस चुपचाप राम को देख रहा था।

राम के मुँह से "मेरी वाइफ..." सुनते ही अभिमन्यु, विवान और अथर्व के चेहरे एक साथ देखने लायक हो गए।

तीनों की आँखें पहले राम पर टिकीं, फिर अनायास एक-दूसरे की तरफ़ उठीं, जैसे यह यक़ीन करना चाह रहे हों कि उन्होंने सचमुच वही सुना है जो उनके कानों ने सुना।अभिमन्यु तो कुछ ज़्यादा ही हैरान था।

वह राम को बचपन से जानता था। उसके स्वभाव, उसके फैसलों और उसकी आदतों से अच्छी तरह वाक़िफ़ था। इसलिए राम के मुँह से निकले उन दो शब्दों ने उसके भीतर जितने सवाल खड़े कर दिए थे, उतने शायद किसी और के मन में नहीं थे।

अनायास उसका मुँह खुल गया।वह कुछ पूछने ही वाला था कि तभी राम की ठंडी, लेकिन सख़्त नज़र बस एक पल उस पर पड़ी।

अभिमन्यु ने बिना कुछ कहे अपना मुँह बंद कर लिया। वह उस नज़र का मतलब अच्छी तरह समझता था। यह वही नज़र थी, जो साफ़ बता रही थी कि इस समय कोई सवाल नहीं पूछा जाएगा।

अगले ही क्षण उसकी नज़र अपने बगल में खड़े विवान पर पड़ी।विवान अब भी उसी तरह मुँह खोले राम को देख रहा था।अभिमन्यु से रहा नहीं गया। उसने हल्के से विवान की ठोड़ी ऊपर उठाई और उसका खुला हुआ मुँह बंद कर दिया।

विवान ने पहले उसे घूरकर देखा, फिर जैसे अपनी ही हालत का एहसास हुआ। उसकी नज़र बगल में खड़े अथर्व पर गई।अथर्व भी किसी मूर्ति की तरह खड़ा था। उसकी आँखें राम पर जमी थीं और मुँह अब भी खुला हुआ था।

विवान ने बिना कुछ कहे उसकी ठोड़ी पकड़कर उसका मुँह भी बंद कर दिया।अगर उस समय कोई बाहर वाला वहाँ मौजूद होता, तो शायद इस दृश्य पर हँसे बिना न रह पाता।लेकिन उन तीनों के लिए यह हँसी का नहीं, हैरानी का विषय था।

अब तीनों पूरी तरह चुप थे।किसी के होंठ नहीं हिल रहे थे, लेकिन उनकी आँखों में तैरती उत्सुकता हर पल बढ़ती जा रही थी।वे बार-बार राम को देख रहे थे। जो अब भी डॉक्टर के कुछ कहना का इंतजार कर रहा था।

इन तीनों के मन में सिर्फ़ एक ही सवाल था, " आख़िर राम करने क्या वाला था...?

डॉक्टर कुछ क्षण तक चुप खड़ी रही। उसके चेहरे पर झिझक साफ़ दिखाई दे रही थी। वह जैसे अपने शब्दों को कई बार मन ही मन तौल रही थी कि बात कैसे कहे।

आख़िर उसने धीमे स्वर में कहना शुरू किया, "जी सर... वैसे आपकी वाइफ बिल्कुल ठीक हैं। घबराने वाली कोई बात नहीं है। बस... ये शायद समय पर अपने लिए प्रॉपर डाइट नहीं लेतीं। शरीर में थोड़ी वीकनेस है, इसलिए अचानक बेहोश हो गईं।"

राम बिना पलक झपकाए उसकी बात सुनता रहा।डॉक्टर ने एक बार फिर उसकी ओर देखा, फिर धीमे से बोली, "और... शायद..."शब्द फिर उसके होंठों पर आकर ठहर गए।

राम की भौंहें हल्की-सी सिकुड़ गईं। उसकी गहरी नज़रें डॉक्टर के चेहरे पर टिक गईं।आगे बोलिए, डॉक्टर।"उसकी आवाज़ ऊँची नहीं थी, लेकिन इतनी गंभीर थी कि डॉक्टर की झिझक और बढ़ गई।

उसने एक गहरी साँस ली और हिम्मत जुटाकर बोली, "सर... मुझे ऐसा लगता है कि... आप अपनी वाइफ के साथ... बहुत ज़्यादा cruel होते होंगे।"उसकी बात पूरी होते ही वहाँ का माहौल जैसे एक पल में बदल गया।

राम के चेहरे का ठहराव वैसा ही रहा, लेकिन उसकी आँखों की गहराई अचानक और सख़्त हो गई। जबड़े हल्के-से भींच गए। कुछ क्षण तक वह डॉक्टर को देखता रहा, फिर बेहद नियंत्रित आवाज़ में बोला,"क्या मतलब है आपका?"

डॉक्टर कुछ कह पाती, उससे पहले ही राम ने फिर पूछा,"क्या मैं उसे मारता हूँ?"उसके शब्द धीमे थे, लेकिन उनमें दबा हुआ आक्रोश साफ़ महसूस किया जा सकता था।

"क्या मैं तुम्हें ऐसा आदमी लगता हूँ?"

डॉक्टर का गला सूख गया। उसने तुरंत घबराकर सिर हिलाया।"न... नहीं सर। मेरा वो मतलब बिल्कुल नहीं था।"उसने जल्दी-जल्दी सफ़ाई देते हुए कहा,"मेरा मतलब था कि... पति पत्नी के रिश्ते जब....!!"वाक्य पूरा होने से पहले ही उसकी आवाज़ थम गई।

राम की लाल पड़ती आँखें अब भी उसी पर टिकी थीं। उन आँखों में ऐसा ठंडा गुस्सा था कि डॉक्टर की हिम्मत आगे बोलने की नहीं हुई।

कुछ क्षण पहले तक जहाँ सिर्फ़ चिंता थी, अब वहाँ एक ऐसा सन्नाटा फैल चुका था, जिसमें किसी की भी आवाज़ उठाने का साहस नहीं हो रहा था। अभिमन्यु, विवान और अथर्व भी चुपचाप खड़े यह सब देख रहे थे। उनके चेहरे पर तो हैरानी इस कदर बढ़ गयी थी की उनसे कण्ट्रोल नही हो रहा था।

राम की आँखों में उतरती कठोरता देखकर डॉक्टर एक पल के लिए भीतर तक सहम गई। उसे महसूस हुआ कि यदि उसने अपनी बात अब भी अधूरी छोड़ी, तो सामने खड़ा आदमी तब तक सवाल करता रहेगा, जब तक उसे पूरा उत्तर न मिल जाए।

उसने बिना एक पल गँवाए जल्दी-जल्दी कहना शुरू किया, "न... नहीं सर, मेरा वो मतलब बिल्कुल नहीं था। दरअसल... इनके शरीर पर बहुत पुराने ज़ख्मों के निशान हैं। ऐसे ज़ख्म, जो बताते हैं कि इन्होंने कभी बहुत ज़्यादा तकलीफ़ सही है। इसलिए मुझे लगता है कि जब भी ये बहुत ज़्यादा घबराती होंगी, इनके अतीत में जो कुछ भी हुआ होगा, उसका दबाव ये संभाल नहीं पाती होंगी... और शायद इसी वजह से आज बेहोश हो गईं।"

डॉक्टर ने एक गहरी साँस ली और फिर थोड़ा संयत होकर बोली, "आप बस इतना ध्यान रखिएगा, सर... कि इनके सामने वैसी कोई परिस्थिति दोबारा न आए, जो इन्हें उस अतीत की याद दिला दे। फिलहाल इन्हें आराम की ज़रूरत है। ये कुछ दवाइयाँ हैं। अगले पंद्रह दिनों तक खाना खाने के बाद इन्हें दे दीजिएगा। कुछ देर में इन्हें होश आ जाएगा।"

अपनी बात पूरी करते ही उसने दवाइयों का पर्चा और दवा राम की ओर बढ़ा दी। फिर किसी के कुछ कहने का इंतज़ार किए बिना तेज़ी से मुड़ी और लगभग जल्दी-जल्दी कदमों से केबिन से बाहर निकल गई। ऐसा लग रहा था, जैसे वह उस कमरे में एक पल भी और रुकना नहीं चाहती।

डॉक्टर के बाहर निकलते ही राम की नज़र अथर्व पर गई। उसने कुछ नहीं कहा, बस हल्के-से इशारे के साथ बोला, "मैम को छोड़ आओ।"

बात सुनने में जितनी साधारण थी, उसका अर्थ उतना ही स्पष्ट था। यह सिर्फ़ डॉक्टर को बाहर तक छोड़ आने के लिए नहीं कहा गया था। यह एक ख़ामोश चेतावनी भी थी कि इस कमरे में जो कुछ देखा और सुना गया है, वह इसी कमरे की चारदीवारी से बाहर नहीं जाना चाहिए।

अथर्व वर्षों से राम के साथ था। वह उसके इशारों की भाषा समझता था। उसने बिना कोई सवाल किए बस इतना कहा, "जी, भाई," और डॉक्टर के पीछे बाहर निकल गया।

दरवाज़ा बंद होते ही कमरे में फिर वही गहरी ख़ामोशी लौट आई। कुछ क्षण तक राम वहीं खड़ा रहा। उसके मन में डॉक्टर की कही हर बात एक-एक करके घूम रही थी—पुराने ज़ख्म... बहुत ज़्यादा तकलीफ़... अतीत का दबाव...!

उसने धीरे से अपना चेहरा विवान की ओर घुमाया।"मिस ठाकुर के अतीत के बारे में... क्या तुम कुछ जानते हो?"विवान ने बिना देर किए 'नहीं' में सिर हिला दिया।"नहीं, भाई। उन्होंने कभी अपने बारे में कुछ नहीं बताया।"

कुछ पल तक राम चुप रहा। उसकी आँखों की गहराई बता रही थी कि वह किसी सोच में डूब चुका है।विवान ने संकोच से पूछा, "अगर कहें तो... मैं पता करूँ?"राम ने उसकी ओर देखा। फिर बिना एक शब्द बोले बहुत हल्के से 'नहीं' में सिर हिला दिया।

उसके इस छोटे-से इन्कार के साथ ही बात वहीं समाप्त हो गई। कम-से-कम अभी के लिए... वह अनुराधा के अतीत को उसकी अनुमति के बिना जानना नहीं चाहता था।

Continue....

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