सुबह का ट्रैफिक पार करते-करते दोनों जब रघुवंशी एम्पायर पहुँचीं, तब तक घड़ी की सुइयाँ दस बजने के करीब पहुँच चुकी थीं। पार्किंग में स्कूटी रोकते ही अनुराधा की नज़र सबसे पहले अपनी घड़ी पर गई।
"हे भगवान...!" घड़ी देखते ही अनुराधा के मुँह से निकला। उसने जल्दी से स्कूटी पार्क की और हेलमेट उतारते हुए बोली, "आरु, दस बजने वाले हैं...। हमें साढ़े नौ बजे तक पहुँच जाना था। अगर मेरी बात मानकर ट्रेन से चलते, तो इतनी देर नहीं होती। लेकिन मेरी सुनता ही कौन है।"
आरोही ने भी आराम से अपना हेलमेट उतारा। गले में लिपटा स्कार्फ़ खोलकर उसने स्कूटी की डिक्की में रखा और बिल्कुल बेफ़िक्र अंदाज़ में मुस्कुरा दी।अरे, ठीक है ना यार। इतनी-सी देर हुई है, जैसे दुनिया ही रुक जाएगी। चल, जल्दी।
फिर उसने शरारत से अनुराधा की तरफ़ देखा।और तू इतनी घबरा क्यों रही है? मैंने इतना भी नहीं डराया था तुझे।अनुराधा ने कोई जवाब नहीं दिया।उसने सिर्फ़ अपनी बड़ी-बड़ी आँखें उठाकर आरोही को देखा। चेहरे पर अब भी स्कार्फ़ बँधा हुआ था। उस एक खामोश नज़र में जितनी नाराज़गी थी, उतनी शायद दस बातें कहकर भी नहीं जताई जा सकती थी।आरोही ने उसकी आँखों में देखते ही दोनों हाथ जोड़ लिए।अच्छा बाबा... गलती हो गई। अब ऐसे मत देख, सच में डर लगने लगा है। अनुराधा ने बस धीमे से सिर हिलाया... "चल!" वह दोनों तेज़ क़दमों से इमारत की तरफ़ बढ़ गई।
अनुराधा की खामोश नज़र देखकर आरोही ने बिना कुछ कहे उसका हाथ पकड़ लिया और लगभग उसे खींचते हुए लिफ्ट की ओर बढ़ गई। दोनों आपस में बातें करती हुई तेज़ी से आगे बढ़ रही थीं कि तभी उनकी नज़र सामने लगी लिफ्ट पर पड़ी।
लिफ्ट के दरवाज़े बंद होने ही वाले थे।
"दौड़, अनु...! लिफ्ट बंद हो जाएगी।" आरोही लगभग भागते हुए बोली।
वह तेज़ी से दौड़कर समय रहते लिफ्ट के भीतर पहुँच गई, लेकिन अनुराधा उससे बस एक-दो कदम पीछे रह गई। जैसे ही वह दरवाज़े तक पहुँची, लिफ्ट के दोनों पल्ले उसके सामने बंद हो गए।
"ओह, शिट!"
आरोही ने माथे पर हाथ मार लिया। लिफ्ट के भीतर खड़ी वह बेबस होकर बंद दरवाज़े को देखती रह गई, जबकि बाहर खड़ी अनुराधा ने हल्की-सी साँस छोड़ते हुए सामने लगे डिस्प्ले की ओर देखा, जहाँ लिफ्ट ऊपर बढ़ने लगी थी।
लिफ्ट के बंद दरवाज़ों को देखकर अनुराधा ने एक गहरी साँस छोड़ी। घड़ी पर नज़र गई तो दिल की धड़कन जैसे एक पल को और तेज़ हो गई। 9:58"गई आज तो..." वह बुदबुदाई।
सुबह से ही देर होने की चिंता अलग थी, ऊपर से आज पहला दिन... और वह भी नए बॉस के साथ। पता नहीं ऑफिस पहुँचते ही क्या-क्या काम इंतज़ार कर रहे होंगे।
उसने बेचैनी से सामने लगी डिस्प्ले स्क्रीन की तरफ़ देखा। लिफ्ट अभी कई फ़्लोर नीचे थी।
इतना इंतज़ार करूँगी, तो सच में लेट हो जाऊँगी..."बुदबुदाते हुए उसकी नज़र बगल में गई।वीआईपी लिफ्ट क़ो देख कर वह एक पल को ठिठक गई।
"न... नहीं... इससे कैसे जा सकती हूँ?"अगले ही पल उसने खुद ही अपने मन की बात काट दी।
लेकिन... मैं अब सर की पर्सनल असिस्टेंट हूँ। अगर कभी ज़रूरत पड़े, तो इसी लिफ्ट से तो जाना होगा।"
वह खुद को समझाने लगी, जैसे अपने ही मन से इजाज़त माँग रही हो।और वैसे भी... आज मजबूरी है। बस आज के लिए..."इतने में वीआईपी लिफ्ट के दरवाज़े बंद होने लगे।
"अरे...!"सोचने का वक़्त ही नहीं मिला।वह लगभग दौड़ पड़ी...रुकिए...!"
दरवाज़े के बीच पहुँचते ही उसने झट से हाथ बढ़ाया। सेंसर ने उसे पहचान लिया और दोनों पल्ले फिर से खुल गए।
"थैंक गॉड..."राहत की साँस लेते हुए वह जल्दी से अंदर आ गई। अंदर आते ही उसने आदतन अपना दुपट्टा ठीक किया, बैग कंधे से उतारकर सँभाला और एक तरफ़ खड़ी हो गई।देर होने की घबराहट में उसका पूरा ध्यान बस घड़ी की सुइयों पर था।
उसे ज़रा-सा भी एहसास नहीं हुआ...कि जिस पल वह लिफ्ट के अंदर दाख़िल हुई थी, ठीक उसी पल उसके पीछे एक और कदम भी उसी लिफ्ट में आकर रुका था।मोबाइल की स्क्रीन पर निगाहें टिकाए वह आदमी जैसे किसी और ही दुनिया में था। और अनुराधा...उसे अभी तक यह भी नहीं पता था कि वह लिफ्ट में अकेली नहीं थी।
लिफ्ट के दरवाज़े बंद होते ही अंदर फिर वही शांत-सी ख़ामोशी फैल गई। राम की उँगलियाँ अब भी मोबाइल की स्क्रीन पर चल रही थीं, लेकिन अचानक उसे अपने अलावा किसी और की मौजूदगी का एहसास हुआ। उसने अनायास ही नज़र उठाई।
सामने, उससे कुछ ही कदम की दूरी पर एक लड़की खड़ी थी। सफ़ेद अनारकली सूट, चेहरे पर हल्के गुलाबी रंग का स्कार्फ़ और कंधे पर टिका बैग। शायद जल्दी-जल्दी आने की वजह से उसकी साँसें अभी तक पूरी तरह सामान्य नहीं हुई थीं। वह एक पल घड़ी की तरफ़ देखती, फिर जैसे खुद को ही समझाते हुए धीमे से सिर हिला देती।
राम की नज़र बस यूँ ही उस तरफ़ गई थी, लेकिन जाने क्यों वापस मोबाइल पर नहीं लौट सकी। चेहरा अब भी स्कार्फ़ से ढका था, इसलिए उसे उसके बारे में कुछ भी पता नहीं चल सकता था। फिर भी उसकी हर छोटी-सी हरकत अनायास ही ध्यान खींच रही थी।
लड़की ने धीरे से दोनों हाथ चेहरे तक उठाए और स्कार्फ़ खोलने लगी। उसकी कलाई ज़रा-सी हिली तो काले मेटल की पतली चूड़ियाँ आपस में टकराकर हल्के से छनक उठीं। लिफ्ट के भीतर पसरी ख़ामोशी में वह बहुत मामूली-सी आवाज़ भी साफ़ सुनाई दे गई। राम ने कभी इस तरह किसी की चूड़ियों की आवाज़ पर ध्यान नहीं दिया था, लेकिन इस बार नज़र हटाने की कोशिश करने के बाद भी उसकी निगाह वहीं ठहरी रही।
स्कार्फ़ ढीला होते ही उसने उसे धीरे-धीरे चेहरे से अलग किया। उसी पल बालों में ढीला फँसा क्लिप अचानक निकल गया और लंबे, घुँघराले काले बाल एक साथ उसकी पीठ पर बिखर गए। उसने हल्की-सी झुँझलाहट के साथ उन्हें समेटना चाहा, मगर कुछ ज़िद्दी लटें फिर भी कंधों पर चली आईं।
वह पूरी तरह अपनी ही दुनिया में थी, उसे इस बात का ज़रा भी एहसास नहीं था कि सामने खड़ा एक आदमी पिछले कुछ पलों से उसकी हर छोटी-बड़ी हरकत को अनजाने में देख रहा है। और शायद यही बात राम को सबसे ज़्यादा अजीब लग रही थी... क्योंकि उसने अब तक उस लड़की का चेहरा भी नहीं देखा था, फिर भी उसकी नज़र बार-बार उसी पर लौट रही थी।
अनुराधा ने हल्की-सी झुँझलाहट के साथ ऊपर देखा, जैसे छत नहीं, सीधे अपने गोविंद से बात कर रही हो।
"हे गोविंद..." उसके होंठों पर बेबस-सी मुस्कान आ गई, "आज क्या ठान ही लिया है आपने कि मुझे देर करवाकर ही मानेंगे?"
वह बुदबुदाते हुए अपने खुले बालों को दोनों हाथों से समेटने लगी। घुँघराले बाल बार-बार उसकी पकड़ से फिसल जाते और वह उन्हें फिर से इकट्ठा करने लगती।
"पहले आरु की ज़िद... फिर ट्रैफिक... फिर लिफ्ट..." उसने धीमे से शिकायत की, "और अब ये सब..."आख़िरकार उसने बालों का जूड़ा बनाया और पिन लगाने लगी।
"उधर पता नहीं बड़े सर के सुपुत्र कैसे होंगे।" उसने हल्की-सी साँस भरी। "जिससे पूछो, वही कहता है बहुत सख़्त मिज़ाज हैं। ऊपर से आज ही के दिन पूरे तीस मिनट लेट हो गई हूँ।"
उसने जूड़े में पिन ठीक से अटकाई, फिर एक बार उसे हाथ से टटोलकर तसल्ली की कि कहीं ढीला तो नहीं रह गया।
"बस..." उसने धीरे से आँखें बंद कीं, "बाकी अब आप ही संभाल लेना।"
इतना कहकर उसने एक गहरी साँस ली, जैसे मन का आधा बोझ सचमुच अपने गोविंद को सौंप दिया हो।
उसे कहाँ पता था...कि जिस इंसान के बारे में वह पिछले दो मिनट से निश्चिंत होकर शिकायत किए जा रही थी, वह उसी लिफ्ट में, उसके ठीक पीछे खड़ा, उसकी एक-एक बात सुन रहा था।
राम जाने कब से सामने खड़ी उस लड़की को देख रहा था। यह देखना भी अजीब था। उसने कई बार चाहा कि अपनी नज़र वापस मोबाइल की स्क्रीन पर ले आए, लेकिन हर बार सामने खड़ी उस अनजान लड़की की कोई-न-कोई छोटी-सी हरकत उसका ध्यान फिर अपनी ओर खींच लेती। कभी वह घड़ी देखती, कभी धीमे-धीमे खुद से कुछ बुदबुदाती और फिर अपने बिखरे बालों को समेटने लगती।
शायद खुले बाल उसे बार-बार परेशान कर रहे थे। उसने दोनों हाथ पीछे ले जाकर उन्हें एक साथ समेटा। घुँघराले बालों का पूरा गुच्छा उसकी उँगलियों में कैद था। बाल हटते ही गर्दन के नीचे उसकी पीठ का हिस्सा दिखाई देने लगा। सफ़ेद अनारकली सूट का पिछला हिस्सा बहुत गहरा था। उसकी गोरी पीठ के दाहिनी ओर बना एक छोटा-सा काला तिल जाने कैसे राम की नज़र में उतर आया।
वह तिल कोई ऐसी चीज़ नहीं था, जिस पर किसी का ध्यान ठहर जाए। शायद किसी और ने देखा भी होता, तो अगले ही पल भूल जाता। लेकिन राम की नज़र जैसे वहीं ठहरकर रह गई। उसे खुद समझ नहीं आया कि ऐसा क्यों हुआ। वह तो बस एक मामूली-सा तिल था, फिर भी जाने क्यों उसकी आँखें उसी से हटने का नाम नहीं ले रही थीं।
एक पल के लिए उसे अपना गला सूखता हुआ महसूस हुआ। उसने अनायास लार निगली और जैसे खुद को याद दिलाया कि वह क्या कर रहा है। यह उसके स्वभाव में कभी नहीं रहा था। उसने नज़र फेरनी चाही, लेकिन अगले ही क्षण वह फिर अनजाने में उसी ओर लौट आई, जैसे उसकी आँखें उसके मन की नहीं, अपनी ही किसी ज़िद की मान रही हों।
कुछ क्षणों बाद राम ने जैसे खुद को झटका दिया। उसने गहरी साँस लेकर अपनी निगाहें उससे हटा लीं।लेकिन नज़रें फेर लेने से मन कहाँ मानने वाला था।
एक अनजानी-सी बेचैनी अब भी उसके भीतर बनी हुई थी। जाने क्यों, उसका मन बार-बार यही जानना चाहता था कि उस गुलाबी दुपट्टे के पीछे छिपा चेहरा आखिर कैसा होगा।
यह ख़याल आते ही उसके चेहरे पर हल्की-सी कठोरता लौट आई। उसने मन ही मन खुद को डाँटा।
"यह क्या कर रहा हूँ मैं...?कब से इस अनजान लड़की की हर छोटी-छोटी हरकत पर ध्यान दिए जा रहा हूँ। इसकी बेवजह की बातें भी चुपचाप सुन रहा हूँ... आखिर क्यों?"
उसे खुद पर झुंझलाहट होने लगी।जिसने हमेशा अपने मन को अपने फैसलों से चलाया था, आज वही मन किसी अनजान एहसास के पीछे भटकने लगा था। यह बात उसे बिल्कुल पसंद नहीं आ रही थी।
उसने बिना वजह उठती उस उत्सुकता को भीतर ही भीतर दबाने की कोशिश की और अपना पूरा ध्यान मोबाइल की स्क्रीन पर टिकाने का प्रयास किया, लेकिन शब्द आँखों के सामने होने के बावजूद दिमाग़ तक पहुँच ही नहीं रहे थे।
उसी असमंजस में डूबा वह खड़ा रहा कि तभी हल्के-से झटके के साथ लिफ्ट सोलहवें फ़्लोर पर आकर रुक गई।
सोलहवीं मंज़िल पर पहुँचते ही लिफ्ट के दरवाज़े धीरे-धीरे खुल गए। अनुराधा ने राहत की एक हल्की-सी साँस ली। देर होने की बेचैनी अब भी उसके चेहरे पर साफ़ थी। घड़ी की सुइयाँ जैसे हर पल उसे याद दिला रही थीं कि आज पहले ही दिन वह पूरे तीस मिनट देर से पहुँची है। यही सोचते हुए उसने बिना इधर-उधर देखे तेज़ी से लिफ्ट से बाहर कदम रख दिया।
लेकिन अगले ही पल उसके कदम अपने-आप ठिठक गए।उसे लगा जैसे किसी ने बहुत हल्के से पीछे की ओर रोक लिया हो।
पहले तो उसने इस पर ध्यान नहीं दिया। उसे लगा शायद दुपट्टा बैग में अटक गया होगा। उसने बिना पीछे देखे ही एक बार हल्का-सा खिंचाव देकर आगे बढ़ना चाहा, मगर इस बार दुपट्टा और कस गया।
उसके चेहरे की बेचैनी पल भर में घबराहट में बदल गई।
"ये...?"उसने अनायास ही गर्दन मोड़ने की कोशिश की। अभी वह पीछे देख भी नहीं पाई थी कि उसके भीतर जाने कैसी आशंका उठी। खाली कॉरिडोर... सुबह की भागदौड़... और अचानक किसी अनदेखी पकड़ का एहसास...उसकी धड़कन जैसे एक पल को रुक गई।
उसी क्षण किसी मज़बूत हथेली ने उसकी बाँह थाम ली। सब कुछ इतनी तेज़ी से हुआ कि उसे समझने का अवसर ही नहीं मिला। एक हल्के, मगर दृढ़ झटके के साथ उसका संतुलन बिगड़ा और वह पीछे की ओर खिंच आई।
डर के मारे उसकी आँखें अपने-आप बंद हो गईं। उसे बस इतना महसूस हुआ कि गिरने से पहले किसी ने उसे मज़बूती से थाम लिया है। उसकी उँगलियाँ अनायास ही सामने वाले की शर्ट की सिलवटों में कस गईं, जैसे शरीर ने बिना सोचे खुद को सँभालने का सहारा ढूँढ़ लिया हो।
कुछ क्षणों तक उसे यह भी समझ नहीं आया कि हुआ क्या है।उसके कानों में सिर्फ़ अपनी धड़कनों की आवाज़ गूँज रही थी। साँसें तेज़ हो चुकी थीं और पूरे शरीर में एक अनजाना-सा कंपन दौड़ गया था। उसने धीरे-धीरे आँखें खोलने की हिम्मत जुटाई...
राम ने उसे गिरने से बचाने के लिए जैसे ही अपनी पकड़ मज़बूत की, उसी पल पहली बार उसकी नज़र अनुराधा के चेहरे तक पहुँची और वह अनायास ठिठक गया।
अभी कुछ क्षण पहले तक वह सिर्फ़ उसकी आवाज़ सुन रहा था, चूड़ियों की धीमी छनक, बालों को समेटती उसकी उँगलियाँ और उसकी मासूम-सी बड़बड़ाहट... चेहरा अब तक उससे अनदेखा था। लेकिन इस पल जैसे किसी ने एकाएक वह परदा हटा दिया हो।
उसकी आँखें अब भी डरी हुई बंद थीं। घबराहट की वजह से साँसें तेज़ चल रही थीं और हर साँस के साथ उसकी छाती हल्के-हल्के उठ-गिर रही थी। माथे पर पसीने की बारीक बूँदें मोतियों की तरह चमक रही थीं। छोटी-सी लाल बिंदी के नीचे सजी भौंहों के बीच डर की हल्की-सी लकीर खिंच आई थी। बिना किसी बनावट के गुलाबी होंठ काँप रहे थे, जैसे कुछ कहना चाहते हों, मगर आवाज़ उनका साथ न दे रही हो। आँखों में लगा काजल अब भी वैसा ही था, लेकिन बंद पलकों के कारण उसका सौंदर्य किसी चित्र की तरह स्थिर होकर सामने आ गया था।
राम जाने कितनी देर तक उसे देखता रहा।वह यह भी भूल गया कि अभी कुछ क्षण पहले क्या हुआ था।
उसे सिर्फ़ इतना महसूस हो रहा था कि उसकी बाँहों में सिमटी यह लड़की किसी बनावटी खूबसूरती की मिसाल नहीं थी। उसमें कुछ ऐसा था जिसे किसी मेकअप, किसी महँगे कपड़े या किसी दिखावे से नहीं पाया जा सकता। उसकी सादगी ही उसकी सबसे बड़ी पहचान थी... और शायद वही बात राम की नज़र को बाँध रही थी।
एक पल के लिए उसे सचमुच लगा जैसे समय ने अपनी चाल धीमी कर दी हो।
उसने अनगिनत चेहरे देखे थे। दुनिया के बड़े-बड़े शहर, ऊँची महफ़िलें, चमकते कैमरे, फैशन और ग्लैमर.....इन सबके बीच खूबसूरती उसके लिए कभी ठहर जाने की वजह नहीं बनी। लेकिन इस अनजान लड़की का चेहरा... जाने क्यों उसकी सारी आदतों, सारे तर्कों को चुप करा रहा था।
उसके होंठ अनायास हिले।"इंडियन ब्यूटी..."यह किसी तारीफ़ की तरह नहीं निकला था।जैसे उसके भीतर उठे किसी अनकहे एहसास ने बिना इजाज़त दो शब्दों का रूप ले लिया हो।लिफ्ट में इतनी ख़ामोशी थी कि वे धीमे-से निकले शब्द भी अनुराधा तक पहुँच गए।
उसकी पलकों में हल्की-सी हरकत हुई।डर अब भी कम नहीं हुआ था। उसने धीरे-धीरे आँखें खोलीं। सामने सबसे पहले उसे एक चौड़ा सीना दिखाई दिया, फिर उस पर टिकी अपनी हथेलियाँ... और अगले ही पल उसकी नज़र ऊपर उठी और सीधे राम की आँखों से मिली।
अनुराधा को यह एहसास हुआ कि कोई उसे थामे हुए है, उसके भीतर फिर से घबराहट की एक लहर दौड़ गई। उसने हिम्मत जुटाकर धीरे-धीरे अपनी आँखें खोलीं।सबसे पहले उसे एक मज़बूत सीना दिखाई दिया, जिस पर उसके दोनों हाथ अब भी टिके हुए थे। एक पल के लिए वह कुछ समझ ही नहीं पाई। फिर उसकी नज़र धीरे-धीरे ऊपर उठी...और सामने राम का चेहरा था।
दोनों की नज़रें पहली बार इस तरह मिलीं कि जैसे कुछ क्षणों के लिए आसपास की हर आवाज़, हर हलचल कहीं पीछे छूट गई हो। अनुराधा की आँखों में अभी भी डर साफ़ दिखाई दे रहा था, जबकि राम की आँखों में एक गहरा, शांत ठहराव था। वह उसे देख तो रहा था, लेकिन उस नज़र में न कोई जल्दबाज़ी थी, न कोई असभ्य उत्सुकता। जैसे वह स्वयं भी इस अचानक बने क्षण को समझने की कोशिश कर रहा हो।
अनुराधा की साँसें अभी तक सामान्य नहीं हुई थीं। उसे अचानक एहसास हुआ कि वह अब भी उसकी बाँहों के सहारे खड़ी है।यह एहसास होते ही उसके चेहरे का रंग बदल गया।
वह लगभग घबराकर एक झटके से पीछे हटना चाहती थी। बिना कुछ सोचे उसने दोनों हथेलियाँ राम के सीने पर रखीं और खुद को अलग करने के लिए हल्का-सा धक्का दे दिया।
घटना इतनी अचानक हुई कि राम भी उसके लिए तैयार नहीं था। उसने एक कदम पीछे हटकर खुद को संभाला। उसकी पीठ लिफ्ट की दीवार से हल्के से टकराई, लेकिन अगले ही क्षण वह फिर पूरी तरह संतुलित होकर सीधा खड़ा हो गया।
इधर अनुराधा दो कदम पीछे हट चुकी थी। उसकी साँसें अब भी तेज़ थीं। एक हाथ अनायास ही अपने दुपट्टे तक चला गया, जैसे खुद को सँभालने की कोशिश कर रहा हो। उसकी आँखों में घबराहट अब भी थी, लेकिन उसके साथ एक गहरा संकोच भी उतर आया था।
लिफ्ट के भीतर फिर से वही ख़ामोशी लौट आई...लेकिन इस बार उस ख़ामोशी का अर्थ पहले जैसा नहीं था।
एक पल के लिए अनुराधा की नज़र भी सामने खड़े उस आदमी के चेहरे पर ठहर गई।इतनी नज़दीक से उसने उसे पहली बार किसी क़ो देखा था।
ऊँचा कद, सधा हुआ व्यक्तित्व, गहरी और बिल्कुल स्थिर आँखें... चेहरे पर ऐसा ठहराव, जैसे किसी भी परिस्थिति का उस पर कोई असर न पड़ता हो। उसकी साँसें अभी भी तेज़ चल रही थीं, जबकि सामने खड़ा वह आदमी बिल्कुल शांत था। उस एक पल के लिए अनुराधा जैसे सब कुछ भूल गई। उसकी आँखें अनचाहे ही उसके चेहरे पर ठहरी रहीं।
लेकिन अगले ही क्षण उसे अपनी स्थिति का एहसास हुआ।उसकी हथेलियाँ अभी कुछ पल पहले तक उसी आदमी के सीने पर टिकी थीं... और वह उसकी बाँहों के सहारे खड़ी थी।
यह एहसास बिजली की तरह उसके भीतर दौड़ गया।वह लगभग घबराकर उससे अलग हुई। पीछे हटते हुए उसका दुपट्टा कंधे से फिसलने लगा, जिसे उसने जल्दी से सँभाला। साँसें अब भी बेकाबू थीं। दिल इतनी तेज़ी से धड़क रहा था कि उसकी अपनी ही धड़कनें उसके कानों में सुनाई दे रही थीं।
डर...घबराहट...और अपमान का एक अनजाना-सा एहसास...तीनों एक साथ उसके भीतर उमड़ पड़े।उसने सिर उठाकर राम की तरफ़ देखा। इस बार उसकी आँखों में घबराहट नहीं थी। वहाँ गुस्सा था।
"तमीज़ नहीं है आपको?" उसकी आवाज़ काँपी ज़रूर, मगर शब्दों में ज़रा भी लड़खड़ाहट नहीं थी। "इस तरह किसी लड़की को खींचते हैं?"
राम बिना कुछ बोले उसे देखता रहा।उसकी ख़ामोशी ने जैसे अनुराधा के भीतर जमा सारा आक्रोश बाहर निकाल दिया।
"बिना मेरी इजाज़त के मुझे छुआ कैसे आपने?" उसने एक कदम आगे बढ़ते हुए कहा। "क्या समझ रखा है आपने? कोई लड़की अकेली दिख जाए तो...?"
वह बात पूरी नहीं कर पाई। गुस्से ने उसके शब्दों को उलझा दिया।उसने गहरी साँस ली और फिर लगभग तमतमाते हुए बोली,
"सूट-बूट पहन लेने से कोई इंसान जेंटलमैन नहीं बन जाता। जेंटलमैन होने के लिए औरत की इज़्ज़त करना भी आना चाहिए।"
अनुराधा बिना रुके बोले जा रही थी। उसके शब्द एक के बाद एक निकलते जा रहे थे। कभी वह राम को घूरती, कभी गुस्से में भौंहें चढ़ा लेती, तो कभी बोलते-बोलते दुपट्टा कंधे पर ठीक कर लेती। कुछ ही देर पहले डर से काँप रही वही लड़की अब पूरी हिम्मत के साथ उसके सामने खड़ी थी और बिना यह सोचे कि सामने कौन है, उसे खरी-खरी सुनाए जा रही थी।
राम ने एक बार भी उसे बीच में नहीं टोका। कुछ क्षण पहले जब अनुराधा ने खुद को छुड़ाने के लिए उसे धक्का दिया था, तब उसे सचमुच हल्की-सी नाराज़गी हुई थी। बरसों से किसी ने उसके साथ इस तरह पेश आने की हिम्मत नहीं की थी। लेकिन इस समय वह नाराज़गी जाने कहाँ खो गई थी।
उसकी नज़र फिर से अनुराधा के चेहरे पर टिक गई। गुस्से में उसके दोनों गाल हल्के-हल्के गुलाबी पड़ गए थे। ठंड की वजह से उसकी नाक भी सुर्ख हो आई थी। हर बार जब वह तेज़ी से बोलती, उसके गुलाबी होंठ हल्के-से काँप उठते और बड़ी-बड़ी आँखों में भरा गुस्सा और साफ़ दिखाई देने लगता।
राम जाने कब से उसे देखे जा रहा था। वह यह भी भूल गया था कि सामने खड़ी लड़की उससे क्या कह रही है। उसका ध्यान उसके शब्दों पर नहीं, उसके चेहरे पर ठहरा हुआ था। जितना वह उसे देखता, उतना ही उसे महसूस होता कि उसने इतनी सहज, इतनी सादगी से भरी खूबसूरती पहले कभी नहीं देखी।
उसे जैसे पहली बार एहसास हुआ कि किसी चेहरे को सिर्फ़ देखा नहीं जाता... कभी-कभी वह अनजाने में मन पर उतर भी जाता है।
"सुन रहे हो तुम?"अनुराधा ने झुँझलाकर उसकी आँखों के सामने चुटकी बजाई।चुटकी की आवाज़ सुनते ही राम जैसे किसी गहरे ख़याल से बाहर आया। उसने हल्का-सा पलकें झपकाईं।अनुराधा अब भी उसी गुस्से से उसे देख रही थी।
"मैं तब से बोले जा रही हूँ..." उसने तमतमाते हुए कहा, "लेकिन तुम तो निहायत बदतमीज़ किस्म के इंसान हो।"
राम चुप रहा।उसकी ख़ामोशी ने अनुराधा को और चिढ़ा दिया।"क्या तुम लड़कियों को अकेला देखकर हमेशा ऐसी ही हरकत करते हो?"
अनुराधा के आख़िरी शब्द राम के कानों में पड़े तो उसके चेहरे का शांत भाव पहली बार हल्का-सा बदल गया।
अब तक वह बिना कुछ कहे उसकी हर बात सुन रहा था, लेकिन बार-बार उसके चरित्र पर उठते सवाल उसे अच्छे नहीं लगे। उसने गहरी साँस ली। दाहिने हाथ की दो उँगलियाँ अपने माथे पर फेरते हुए उसने क्षणभर के लिए आँखें बंद कीं, मानो अपने भीतर उठ रहे क्रोध को वहीं रोक देना चाहता हो।
जब उसने दोबारा आँखें खोलीं, तो उनमें वही ठंडा ठहराव था... लेकिन अब उसमें कठोरता भी उतर आई थी।बिना कुछ कहे वह एक-एक कदम बढ़ाता हुआ अनुराधा की ओर आने लगा।
राम को अपनी तरफ़ बढ़ते देख अनुराधा का सारा साहस जैसे धीरे-धीरे जवाब देने लगा। अभी तक जो शब्द बिना रुके उसके होंठों से निकल रहे थे, वे अचानक गले में अटक गए। वह अनायास ही एक कदम पीछे हटी, लेकिन पीछे लिफ्ट की ठंडी दीवार थी। अब पीछे हटने की कोई जगह नहीं बची थी।
राम उसके सामने आकर रुक गया।दोनों के बीच अब मुश्किल से एक हाथ भर का फ़ासला रह गया था।अनुराधा ने घबराकर उसकी तरफ़ देखा। उसकी धड़कनें फिर तेज़ हो उठीं। अभी कुछ देर पहले तक जो गुस्सा उसके चेहरे पर था, उसकी जगह अब साफ़ घबराहट ने ले ली थी।
"य... ये... क्या कर रहे हो तुम?" उसकी आवाज़ पहले जैसी तेज़ नहीं रही। "बा... बात... दूर से भी हो सकती है।"उसने जल्दी से दुपट्टा अपने सीने के पास समेट लिया और हकलाते हुए बोली,"ये... ये रघुवंशी एम्पायर है... यहाँ... यहाँ ऐसी हरकतें नहीं चलेंगी।"
उसने बात तो पूरी दृढ़ता से कहने की कोशिश की, लेकिन उसकी काँपती आवाज़ और तेज़ धड़कनों ने उसका साथ नहीं दिया।राम अब भी उसके सामने उसी स्थिर नज़र से खड़ा था।
उसने अभी तक एक भी शब्द नहीं कहा था। उसकी यही ख़ामोशी... अनुराधा को उसके शब्दों से कहीं ज़्यादा डरा रही थी।
राम को अपनी ओर बढ़ते देख अनुराधा का गला सूख गया। अभी कुछ क्षण पहले तक जो लड़की बिना किसी झिझक के उसे खरी-खरी सुना रही थी, वही अब उसके हर कदम के साथ भीतर ही भीतर असहज होने लगी। उसने अपने चेहरे पर वही कठोरता बनाए रखने की कोशिश की, लेकिन उसकी उँगलियाँ अनायास ही दुपट्टे के किनारे को कसकर पकड़ चुकी थीं।
जब राम बिल्कुल उसके सामने आकर रुका, तो दोनों के बीच इतना ही फ़ासला बचा था कि अनुराधा को उसकी मौजूदगी पहले से कहीं अधिक तीव्र महसूस होने लगी। उसने खुद को संभालने के लिए ठुड्डी ज़रा-सी ऊपर उठाई, पर उसकी धड़कनों की रफ़्तार उसका साथ नहीं दे रही थी।
राम धीरे-धीरे उसकी ओर झुका। उसकी आँखें अनुराधा की आँखों से हट ही नहीं रही थीं। उसने कुछ नहीं किया, बस उतना ही झुका कि उसकी साँसों की हल्की-सी गर्माहट अनुराधा के चेहरे से टकराकर गुज़र गई। अनुराधा की पलकें अनायास झपक गईं। वह एक पल के लिए बिल्कुल स्थिर रह गई, फिर घबराकर बोली, "य... ये... क्या कर रहे हो तुम? बा... बात दूर से भी हो सकती है।"
राम के होंठों पर एक बहुत हल्की मुस्कान लौटी। उसने उसी शांत स्वर में पूछा, "घबरा रही हो?"
"न... नहीं।" अनुराधा ने जल्दी से जवाब दिया। उसने गर्दन तनिक और सीधी कर ली, जैसे अपने ही शब्दों को सच साबित करना चाहती हो। "मैं... मैं क्यों घबराने लगी?"
राम ने बिना पलक झपकाए उसे देखा। उसकी आवाज़ में न व्यंग्य था, न चुनौती; केवल एक अजीब-सा विश्वास था। "अच्छा... अगर नहीं घबरा रहीं, तो तुम्हारी आवाज़ क्यों काँप रही है? और ये..." उसकी नज़र एक पल के लिए उसके दुपट्टे को कसकर पकड़ी उँगलियों पर गई, "...ये उँगलियाँ इतनी बेचैन क्यों हैं?"
अनुराधा ने जैसे पहली बार महसूस किया कि सचमुच उसकी उँगलियाँ दुपट्टे को इतनी कसकर पकड़े हुए थीं कि पोर सफ़ेद पड़ गए थे। उसने झेंपकर तुरंत हाथ ढीला कर लिया, लेकिन अगले ही पल अपने चेहरे पर फिर वही गुस्सा ले आई। वह नहीं चाहती थी कि सामने खड़ा आदमी उसकी घबराहट पढ़ ले।
"ज़्यादा खुश मत हो," उसने खुद को सँभालते हुए कहा, "मैं तुमसे नहीं... तुम्हारी बदतमीज़ी से परेशान हूँ। और हाँ, मेरे बारे में इतना जानने की कोशिश मत करो।"
राम ने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया। बस एक पल तक उसे देखता रहा, फिर बहुत धीमे स्वर में बोला, "तुम्हें पढ़ने की कोशिश मैं नहीं कर रहा... तुम खुद अपने चेहरे पर सब लिख देती हो।"
इतना कहकर वह सीधा खड़ा हो गया। लिफ्ट में फिर वही ख़ामोशी उतर आई, लेकिन इस बार अनुराधा के भीतर अजीब-सी खीझ थी। उसे गुस्सा इस बात का कम था कि राम उसके इतने करीब आया था, और ज़्यादा इस बात का कि उसने उसकी घबराहट पहचान ली थी... और वह चाहकर भी उसे झुठला नहीं पा रही थी।
उसी समय एक हल्के-से झटके के साथ लिफ्ट सबसे टॉप फ़्लोर पर आकर रुक गई।
राम ने एक क्षण के लिए अनुराधा की ओर देखा। उसके चेहरे पर फिर वही शांत भाव लौट आया था। जैसे कुछ देर पहले लिफ्ट के भीतर जो कुछ भी हुआ, उसने उसे अपने भीतर कहीं समेट दिया हो। बिना कुछ कहे वह मुड़ा और बाहर निकलने के लिए कदम बढ़ा दिए।
पीछे खड़ी अनुराधा के भीतर मगर अभी भी गुस्से का ज्वार शांत नहीं हुआ था। उसे लगा, वह बिना कुछ सुने, बिना कुछ कहे ऐसे ही चला जाएगा। उसके भीतर जमा सारा आक्रोश एकाएक शब्द बनकर बाहर आ गया।
"सुनो!"राम के कदम ठिठके, मगर उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा।अनुराधा तेज़ स्वर में बोली, "आज जो बदतमीज़ी तुमने की है न... उसका हिसाब तुम्हें कभी न कभी ज़रूर मिलेगा।"
राम अब भी चुप रहा।उसकी ख़ामोशी ने अनुराधा के गुस्से को और भड़का दिया। वह दो कदम आगे बढ़ी और लगभग तमतमाते हुए बोली, "दिल तो करता है, यहीं खींचकर एक ज़ोरदार थप्पड़ मारूँ तुम्हें... बस अफ़सोस इस बात का है कि उससे पहले ही तुम निकल रहे हो।"
उसकी साँसें तेज़ चल रही थीं। गुस्से में उसका चेहरा फिर से लाल पड़ गया था।
"और सुनो..." उसने बिना रुके कहा, "जिस आदमी को किसी लड़की की मर्यादा का ख़याल न हो, उससे किसी और बात की उम्मीद भी क्या की जा सकती है? पता नहीं... तुम अपनी माँ और बहन की इज़्ज़त करना भी जानते हो या नहीं।"
इस बार उसके कदम वहीं रुक गए। उसके शब्द हवा में तैरते हुए राम तक पहुँचे।
कुछ क्षण तक गलियारे में गहरा सन्नाटा पसरा रहा। राम की पीठ अब भी अनुराधा की ओर थी। उसने धीरे से अपनी आँखें बंद कीं और एक लंबी साँस भीतर खींची। उसके चेहरे पर कोई उत्तेजना नहीं थी, लेकिन उसके जबड़े अनायास भींच गए थे।
उसने अब तक अनुराधा की हर बात बिना उत्तर दिए सुन ली थी।लेकिन इस बार...उसने उसके व्यक्तित्व पर नहीं, उसके संस्कारों पर प्रश्न उठा दिया था।
Continue.......


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