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4.His Dark Obssession

राम का निर्णय सुनते ही कमरे में फिर एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। विवान और अथर्व ने अनायास एक-दूसरे की ओर देखा, जबकि अभिमन्यु की निगाहें अब भी राम के चेहरे पर ही टिकी थीं। उसे महसूस हो रहा था कि यह फैसला केवल एक ऑफिसियल डिसीजन नहीं था।।इसके पीछे कोई ऐसी बात थी, जिसे शायद खुद राम भी अभी शब्द नहीं दे पा रहा था।

राम की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि विवान ने झिझकते हुए कहा, "लेकिन भाई... नए मेल असिस्टेंट को हायर करने में कम से कम एक सप्ताह तो लग ही जाएगा। तब तक अगर आप अनुराधा दी के साथ..."

विवान की बात अधूरी ही रह गई।राम ने धीरे से अपनी आँखें सिकोड़ते हुए उसकी ओर देखा और बीच में ही पूछा, "दी... का क्या मतलब?"

विवान और अथर्व ने एक-दूसरे की ओर देखा। फिर अथर्व मुस्कराकर बोला, "भाई... हम दोनों उन्हें 'दी' ही कहते हैं। पता नहीं क्यों, लेकिन उनसे हमेशा बड़ी बहन वाली ही फीलिंग आती है। इसलिए आदत पड़ गई।"

विवान ने भी तुरंत उसकी बात का समर्थन किया।"हाँ, भाई। और आपने हमसे जो भी जानकारी निकलवाने को कहा था, उसमें अनुराधा दी ने हमारी बहुत मदद की। अकेले इतना सारा डेटा और रिकॉर्ड जुटाना आसान नहीं था। उनकी और उनकी दोस्त की मदद से ही हम इतनी जल्दी सारी डिटेल्स इकट्ठी कर पाए।"

राम बिना कुछ बोले दोनों की बातें सुनता रहा। उसके चेहरे पर कोई खास बदलाव नहीं आया, लेकिन उसकी निगाहें कुछ पल के लिए फिर उसी फ़ाइल पर टिक गईं, जिसमें अनुराधा ठाकुर का नाम दर्ज था।

अथर्व के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आ गई। वह जैसे अनुराधा की तारीफ़ करने का कोई मौका छोड़ना ही नहीं चाहता था।

"और भाई..." उसने सहज भाव से कहा, "वो जितनी दिखने में खूबसूरत है, उतनी ही प्यारी भी है। और बोलती इतनी मीठी है कि....!"

"बस...!"राम की आवाज़ ने उसकी बात बीच में ही रोक दी।कमरे का माहौल एक पल में बदल गया।राम ने फ़ाइल बंद करते हुए दोनों भाइयों की तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर गुस्सा नहीं था, लेकिन आवाज़ में साफ़ झुंझलाहट थी।

"बहुत हो गया। जितनी तारीफ़ करनी थी, कर चुके तुम दोनों अपनी 'दी' की।"

विवान और अथर्व एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे। उन्हें समझ नहीं आया कि आखिर उन्होंने ऐसा क्या कह दिया था।राम ने कुर्सी से हल्का-सा पीछे टिकते हुए कहा, "जो काम कहा है, वो करो। मेरे लिए एक मेल पर्सनल असिस्टेंट ढूँढो।"

फिर जैसे उसे अचानक कुछ याद आया हो, उसने जानबूझकर भौंहें सिकोड़ लीं।"तब तक... मेरा काम कौन देखेगा? क्या नाम है उसका...! वह कुछ पल सोचने का नाटक करता रहा।विवान और अथर्व लगभग एक साथ बोल पड़े,"भाई... अनुराधा ठाकुर।"

"हाँ... हाँ, वही।" राम ने ऐसे कहा, जैसे अभी-अभी उसे नाम याद आया हो। "आज ही पता चल जाएगा कि तुम दोनों ने उसकी जितनी तारीफ़ों के पुल बाँधे हैं... वो सच में उनकी हक़दार है भी या नहीं।"

उसने फिर फ़ाइल खोल ली।अब जाओ। कुछ देर में ऑफिस के लिए निकलना है। दोनों ने एक साथ सिर हिलाया और कुर्सियों से उठ गए। दरवाज़े तक पहुँचते-पहुँचते विवान ने एक बार पलटकर राम की तरफ़ देखा। वह फिर उसी तल्लीनता से फाइलों में डूब चुका था, मानो अभी हुई पूरी बातचीत का उस पर कोई असर ही न पड़ा हो।

लेकिन विवान और अथर्व दोनों जानते थे...। राम किसी इंसान के बारे में राय बनाने में कभी जल्दबाज़ी नहीं करता। और एक बार अगर उसने किसी को खुद परखने का फैसला कर लिया, तो फिर उसकी असली परीक्षा शुरू हो जाती थी।

दोनों चुपचाप स्टडी रूम से बाहर निकल गए।

विवान और अथर्व के जाते ही स्टडी रूम में सन्नाटा छा गया। अभिमन्यु काफी देर से लगातार राम को देखे जा रहा था। उसकी निगाहों में शरारत भी थी और एक गहरी पड़ताल भी।

आख़िरकार राम ने झुंझलाकर उसकी ओर देखा।

"क्या है? इस तरह क्यों घूरे जा रहा है मुझे? जा, पहले फ्रेश हो जा। थोड़ी देर में ऑफिस निकलना है।"

राम की चिढ़ देखकर अभिमन्यु के होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आ गई।

"तू इतना चिढ़ क्यों रहा है, राम?" उसने हँसी दबाते हुए कहा, "वैसे एक बात है... पहली बार तू किसी लड़की के साथ काम करने वाला है। उफ़्फ़... क्या सीन होगा!"

राम ने उसे घूरा।

"अगर एक शब्द और बकवास की, तो सीधा न्यूयॉर्क वापस भेज दूँगा।"

अभिमन्यु ने हँसना बंद कर दिया। कुछ पल वह चुपचाप राम को देखता रहा, फिर इस बार उसके चेहरे पर गंभीरता उतर आई।

"हम्म..." उसने धीमे स्वर में कहा, "पता नहीं यार... इस लड़की के नाम में ही कुछ बात है। जब से इसका नाम सुना है... अनुराधा ठाकुर... न जाने क्यों, मेरे दिमाग़ में बार-बार यही नाम घूम रहा है।"

राम ने कोई जवाब नहीं दिया।

उसने बस एक पल के लिए अभिमन्यु की ओर देखा, फिर खिड़की के बाहर नज़रें टिक गईं। अजीब बात यह थी कि जिस नाम को अभिमन्यु अपने दिमाग़ से नहीं निकाल पा रहा था,

वही नाम जाने कब से राम के मन में भी अनचाहे ही दस्तक दे रहा था। फिर भी उसने अपने चेहरे पर कोई भाव नहीं आने दिया।

राम ने उसे घूरते हुए कहा, "अगर ज़्यादा ही दिमाग़ में घुस गई है, तो बोल... निकाल देता हूँ। जब से उसका नाम सुना है, तब से बस मिस ठाकुर का गुणगान ही किए जा रहा है।"

अभिमन्यु हँस पड़ा।

"अरे यार, तू इतना चिढ़ क्यों रहा है?" उसने कुर्सी पर आराम से टिकते हुए कहा, "तू मत रखना उसे अपना असिस्टेंट... मैं रख लूँगा।"

वह मुस्कराया और आगे बोला, "आख़िर जब विवान और अथर्व जैसे लोग किसी लड़की की इतनी तारीफ़ कर रहे हैं, तो मानना पड़ेगा कि लड़की सच में काबिल-ए-तारीफ़ होगी। वरना ये दोनों किसी की यूँ ही तारीफ़ करने वालों में से नहीं हैं।"

उसने शरारती अंदाज़ में अपनी भौंहें उचकाईं।

"और वैसे भी... मैं अभी सिंगल हूँ। क्या पता, यही मिस ठाकुर आगे चलकर मिसेज़ राठौड़ बन जाए।"

इतना कहकर अभिमन्यु ने जानबूझकर राम की ओर देखा। उसके चेहरे पर वही शरारती मुस्कान थी, मानो वह राम के चेहरे पर कोई प्रतिक्रिया तलाश रहा हो। कमरे में कुछ क्षण के लिए खामोशी छा गई, लेकिन उस खामोशी में भी अभिमन्यु की नज़रें लगातार राम के बदले हुए भाव पढ़ने की कोशिश कर रही थीं।

राम ने गहरी साँस ली और भारी आवाज़ में कहा, "अगर मिस ठाकुर का यह तारीफ़ पुराण खत्म हो गया हो... तो अब कुछ काम की बात करें।"

उसकी आवाज़ में लौट आई गंभीरता देखकर अभिमन्यु का चेहरा भी शांत हो गया। वह समझ गया कि अब मज़ाक का समय खत्म हो चुका है।

राम ने सामने रखी फ़ाइल पर नज़र डालते हुए कहा, "तू यह पता कर कि इन दोनों मामाओं का क्या चक्कर है। और मृत्युंजय रघुवंशी ने आखिर कैसे पूरा कारोबार उनके भरोसे छोड़ दिया।"

वह कुछ पल के लिए रुका, फिर धीमे लेकिन गंभीर स्वर में बोला, "जो आदमी कभी बिज़नेस की दुनिया का बेताज बादशाह था... वह अचानक इतना लापरवाह कैसे हो गया? कहीं न कहीं कुछ ऐसा हुआ है, जो अभी तक हमारी नज़र से छिपा हुआ है।"

अभिमन्यु ने सहमति में सिर हिलाया।

राम ने आगे कहा, "अब तू भी जाकर थोड़ा फ्रेश हो जा। आज ही पता चल जाएगा कि रघुवंशी एम्पायर के अंदर आखिर चल क्या रहा है।"

अभिमन्यु उठने ही वाला था कि उसने पलटकर पूछा, "और तू? तुझे फ्रेश नहीं होना है?"

राम ने बिना उसकी ओर देखे जवाब दिया, "मैं थोड़ी देर बाद चला जाऊँगा।"

"ठीक है।" इतना कहकर अभिमन्यु कमरे से बाहर निकल गया।

उसके जाते ही स्टडी रूम एक बार फिर शांत हो गया।

राम कुछ देर तक यूँ ही कुर्सी पर बैठा रहा। फिर उसने सामने रखी फ़ाइल दोबारा खोली। पता नहीं क्यों, उसकी उँगलियाँ सीधे उसी पन्ने पर जाकर रुकीं, जहाँ अनुराधा ठाकुर का नाम दर्ज था।

उसने पूरी प्रोफ़ाइल ध्यान से देखी।

फ़ाइल में उसकी शैक्षणिक योग्यता, कार्य अनुभव और मुंबई का पता दर्ज था, लेकिन उसकी कोई तस्वीर नहीं थी।

राम ने एक बार फिर पूरा पन्ना देखा, मानो कहीं कोई फोटो छूट गई हो। जब उसे यकीन हो गया कि फ़ाइल में सचमुच उसकी कोई तस्वीर नहीं है, तो वह कुछ क्षण उसी नाम को देखता रहा।

धीरे से उसके होंठ हिले।"अनुराधा... ठाकुर..."

उसने बस इतना ही कहा, जैसे उस नाम को पहली बार नहीं, बल्कि किसी अनजाने एहसास के साथ दोहरा रहा हो। उसके बाद उसने फ़ाइल बंद नहीं की। उसकी नज़रें अब भी उसी नाम पर ठहरी थीं, जबकि उसके मन में उठते प्रश्नों के उत्तर अभी भी उससे बहुत दूर थे।

मुंबई...शहर का एक शांत-सा इलाका, जहाँ सुबह की पहली रोशनी अभी-अभी इमारतों की बालकनियों पर उतरनी शुरू हुई थी। उसी इलाके के एक छोटे-से वन बीएचके फ्लैट में अगरबत्ती की हल्की-सी खुशबू फैली हुई थी। खुली खिड़की से आती ठंडी हवा पूजा के कोने में जल रहे दीपक की लौ को कभी हल्का-सा झुका देती, तो कभी फिर से सीधा कर देती।

पूरे घर में उस समय बस एक ही आवाज़ गूँज रही थी...एक लड़की की मधुर, शांत और बेहद सुकून देने वाली आवाज़—

«अच्युतं केशवं राम नारायणम्।

कृष्ण दामोदरं वासुदेवं हरिम्।

श्रीधरं माधवं गोपिका वल्लभम्।

जानकी नायकं रामचंद्रं भजे॥»

उसकी आवाज़ में बनावट नहीं थी।वह गा नहीं रही थी... पूरे मन से प्रार्थना कर रही थी।

हर शब्द के साथ जैसे घर का कोना-कोना एक अलग ही शांति से भरता जा रहा था। बाहर भागती-दौड़ती मुंबई अपनी रफ्तार पकड़ने की तैयारी कर रही थी, लेकिन इस छोटे-से फ्लैट के भीतर समय जैसे कुछ पल के लिए ठहर गया था।

जैसे ही प्रार्थना पूरी हुई, लड़की ने आँखें खोलीं। उसके होंठों पर हमेशा की तरह एक निश्छल-सी मुस्कान थी। उसने दोनों हाथ जोड़कर भगवान के सामने सिर झुकाया।

"हे गोविंद... सब पर अपनी कृपा बनाए रखना। सबके जीवन में सुख, शांति और—"

उसकी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि पीछे से किसी ने आकर झट से उसके बगल में हाथ जोड़ लिए।

"हे मेरे राधा के गोविंद!" पीछे से आई लड़की ने पूरी श्रद्धा... और उतनी ही शरारत के साथ कहा, "सब पर कृपा बाद में करना... पहले मेरी इस सहेली पर अपनी स्पेशल कृपा बरसा दो।"

प्रार्थना कर रही लड़की ने बिना पीछे देखे ही हल्की-सी मुस्कान दबा ली। उसे आवाज़ पहचानने में एक पल भी नहीं लगा था।उधर दूसरी लड़की पूरे मन से अपनी फरियाद रखे जा रही थी।

"प्रभु, इसे कोई ऐसा लड़का मिलवा दो जो इसे सच्चा प्यार करे। बस एक बार इसकी लव स्टोरी शुरू करवा दो, ताकि ये जोगन... प्रेम की जोगन बन जाए।"

वह एक पल को रुकी, फिर आँखें खोलकर भगवान की मूर्ति की तरफ़ देखते हुए बोली,"और हाँ... मेरा भी कुछ सोच लेना प्रभु। नहीं तो ये तो एक दिन हिमालय निकल जाएगी तपस्या करने... और दोस्ती निभाने के चक्कर में मुझे भी साथ घसीट ले जाएगी।"

इतना सुनते ही पहली लड़की ने गहरी साँस ली, आँखें खोलीं और धीरे-धीरे उसकी तरफ़ मुड़ी।

उसके चेहरे पर नाराज़गी नहीं थी... बस एक बेबस-सी मुस्कान थी, जैसी किसी को अपने सबसे प्यारे इंसान की आदतों पर आती है।

"तेरी प्रार्थना खत्म हो गई हो..." उसने मुस्कुराते हुए कहा, "तो अब भगवान को भी थोड़ी शांति दे दे। सुबह-सुबह उन्हें भी तेरी शिकायतें सुननी पड़ रही हैं।"

वह अभी अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाई थी कि बगल में खड़ी लड़की ने झट से उसका मुँह अपने हाथ से बंद कर दिया।

"अरे चुप कर, आरोही!" उसने धीरे से डाँटते हुए कहा, "क्या-क्या बोले जा रही है तू? भगवान को भगवान रहने दे, मेरी माँ। उनके साथ भी तुकबंदी लगाए बिना तेरा दिन शुरू नहीं होता क्या?"

आरोही ने उसके हाथ को हटाया और आँखें दिखाते हुए बोली, "अच्छा! मैं फालतू बोल रही हूँ... या तू बोल रही है, मेरी भक्तिन अनु?"

अनु बस मुस्कुरा दी। वह जानती थी, आरोही से बहस करना मतलब खुद ही हार मान लेना।

"अच्छा बाबा... तू जीत गई।" उसने दोनों हाथ उठाकर कहा, "अब चल, ऑफिस भी समय पर पहुँचना है। पहली ही मीटिंग लेट हो गई, तो फिर तेरी ही शिकायतें सुननी पड़ेंगी।"

"मेरी नहीं, तेरी," आरोही ने तुरंत टोका, "मैं तो समय पर तैयार हो जाती हूँ। देर हमेशा तू पूजा में लगा देती है।"

"हाँ, हाँ... सब मेरी ही गलती होती है।"दोनों एक-दूसरे को देखकर हँस पड़ीं।हँसी थमने के बाद दोनों ने फिर से भगवान गोविंद के सामने हाथ जोड़कर प्रणाम किया। आरोही तो बाहर निकलने के लिए मुड़ गई, लेकिन अनु कुछ पल वहीं खड़ी रही। उसने भगवान की मूर्ति की तरफ़ देखा और हल्की-सी मुस्कान के साथ बोली,

"मेरी दोस्त की बातों का बुरा मत मानना, गोविंद।"उसने एक पल रुककर धीरे से सिर झुका दिया।

"थोड़ी नादान है... और थोड़ी-सी बेवकूफ़ भी। जो मन में आता है, वही बोल देती है।"पीछे से आरोही की आवाज़ आई, "सब सुन रही हूँ मैं !

"हाँ... हाँ... क्यों नहीं!" आरोही ने मुँह बनाते हुए कहा, "तू तो पैदा ही दादी माँ हुई थी।"अनु उसे बस देखकर मुस्कुरा दी।जा अब... पहले तैयार हो जा।

"हाँ, जा रही हूँ। लेकिन प्लीज़, आज पूजा के बाद कोई नया प्रवचन मत शुरू कर देना।"

इतना कहकर आरोही अपने कमरे की तरफ़ चली गई। जाते-जाते भी उसकी बड़बड़ाहट बंद नहीं हुई, जिसे सुनकर अनु के चेहरे की मुस्कान और गहरी हो गई।

आरोही के कमरे का दरवाज़ा बंद होते ही घर में फिर वही सुबह वाली शांति लौट आई।

अनुराधा ने अपने लंबे, घुँघराले बालों को पीछे समेटकर ढीला-सा जूड़ा बना लिया। फिर रसोई की तरफ़ बढ़ते हुए खुद से ही बुदबुदाई,

"चल अनु... जब तक आरू तैयार होती है, नाश्ता बना लेती हूँ। नहीं तो मैडम की वजह से फिर खाली पेट ही ऑफिस भागना पड़ेगा।"

रसोई में पहुँचकर उसने गैस जलाई और फ्रिज खोलते हुए जैसे अचानक कुछ याद आया।वैसे आज थोड़ा जल्दी निकलना होगा..."

उसने सब्ज़ियाँ निकालते हुए खुद ही अपनी बात पूरी की,"सर के बड़े बेटे आज पहली बार ऑफिस आने वाले हैं। पंद्रह साल बाद वापस लौटे हैं... और अब वही कंपनी संभालेंगे।"एक पल को उसके हाथ रुक गए।

"देखते हैं...! आख़िर कैसे होंगे नए बॉस।अगले ही पल उसने सिर झटक दिया, जैसे खुद को ही टोक रही हो।मुझे क्या... बॉस कोई भी हो, काम तो वही करना है।

इतना कहकर उसने फिर पूरी तल्लीनता से नाश्ता बनाने में खुद को लगा दिया। उसके लिए हर दिन की तरह यह सुबह भी बस एक और कामकाजी सुबह थी।

अपने हाथों क़ो तेजी से चलाती हुई उसने जल्दी जल्दी मुंग दाल की चिल्ला बनाई। उसी के साथ उसने नारियल की चटनी और बटर मिल्क तैयार कर लिया था।

बंद दरवाजे क़ो देख कर अनुराधा तेज आवाज़ मे बोली, आरू ! तैयार हुई ! आज जल्दी जाना है हमे ऑफिस और मुझे भी तैयार होना है।

तभी कमरे से आरोही बोली, आ रहीं हु बस पांच मिनट और दो।

अनुराधा खुद ही बुडबदाई एक तो इस नए बॉस की टेंशन है और ऊपर से आरू के पांच मिनट खतम नही हो रहे है।

उसे क्या पता था...जिस इंसान को वह सिर्फ़ अपना नया बॉस समझ रही थी, कुछ ही घंटों बाद वही उसकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा मोड़ बनने वाला था।

कमरे का दरवाज़ा खुला और आरोही बाहर निकली। निकलते-निकलते उसने शीशे में खुद पर एक नज़र डाली, गले में पड़ा गुलाबी स्कार्फ़ उँगलियों से ठीक किया और चेहरे पर आ रही बालों की एक लट को कान के पीछे सरका दिया। अगले ही पल वही लट फिर वापस आ गई।

"उफ़्फ... तू भी ना!" वह खुद से बुदबुदाई और हार मानकर मुस्कुरा दी।

हमेशा की तरह सबसे पहले आरोही की आवाज़ घर में गूँज गई।मैडम अनुराधा ठाकुर... ज़रा इधर भी नज़र डाल लीजिए।"lअनु ने पलटकर देखा तो अनायास ही उसके होंठों पर मुस्कान आ गई।

उसकी इस आदत पर उस को हमेशा हँसी आती थी। खुले, रेशमी बालों से वह चाहे जितनी लड़ाई लड़ ले, आखिर में उन्हें खुला ही छोड़ देती। ब्लू जींस और ढीली-सी सफ़ेद शर्ट में वह हमेशा की तरह बेफ़िक्र लग रही थी। आँखों का हल्का-सा लाइनर उसकी बड़ी-बड़ी आँखों को और उभार रहा था, होंठों पर लगी हल्की-सी लिप ग्लॉस बिना बनावटी लगे चेहरे की ताज़गी बढ़ा रही थी। कानों में मोती की छोटी-सी बालियाँ और कलाई पर बँधी घड़ी... बस, इससे ज़्यादा सजना उसे कभी पसंद भी नहीं था।

"अब ऐसे मत देख..." उसने अनु को अपनी तरफ़ देखते पकड़ लिया, "वरना मुझे सच में लगने लगेगा कि मैं बहुत सुंदर लग रही हूँ।"

अनु हँस पड़ी।"लगने क्यों लगेगा? तू है ही सुंदर। आरोही ने तुरंत दोनों हाथ जोड़ लिए और नाटकीय अंदाज़ में ऊपर देखते हुए बोली, "हे गोविंद... आज तुम्हारी भक्तिन ने मेरी तारीफ़ कर दी। लगता है आज सच में कोई चमत्कार होने वाला है।"

अनु ने पास रखा किचन टॉवल उठाकर उसकी तरफ़ उछाल दिया।बहुत ड्रामा करती है तू। आरोही ने हँसते हुए टॉवल पकड़ लिया और किचन के स्लैब पर बैठ गई।ड्रामा नहीं मैडम... कॉन्फिडेंस कहते हैं इसे। और अब तू भी जल्दी से तैयार हो जा, मेरी राधा।

उसने शरारती नज़रों से अनु को देखा।आख़िर आज तेरी मुलाक़ात तेरे नए बॉस से जो होने वाली है...।वह प्लेट में रखा चिल्ला उठाकर खाने लगी। वैसे..." उसने चिल्ला का एक कौर लेते हुए कहा, "आज मुझे तेरी थोड़ी चिंता हो रही है।"

अनु ने गैस धीमी करते हुए पूछा,"अब क्या हुआ?"आरोही ने रहस्यमयी अंदाज़ में आँखें छोटी कर लीं। सुना है, आज से सर के बड़े बेटे ऑफिस संभालने आ रहे हैं। पूरे पंद्रह साल बाद इंडिया लौटे हैं।

अनु ने मुँह बना कर बोली, यह बात पूरी ऑफिस ने सुना है। कुछ नया हो तो बोल। आरोही ने उसके मुँह मे चिल्ला का एक कौर देती हुई बोली, " "और लोग कहते हैं....बंदा बड़ा खतरनाक है। गुस्सा ऐसा कि सामने वाला दो बार साँस लेने से पहले भी सोचे। ऊपर से आज तक ऑफिस में किसी ने उन्हें ठीक से देखा तक नहीं। पूरा का पूरा मिस्ट्री मैन!"

वह एक पल को रुकी, फिर अचानक अनु की तरफ़ उँगली करके बोली,"और मेरी सीधी-सादी, भोली-भाली भक्तिन को उसी आदमी की पर्सनल असिस्टेंट बना दिया गया है।"

उसने दोनों हाथ जोड़कर ऊपर देखा।"हे राधा रानी... मेरी इस गाय जैसी दोस्त की रक्षा करना।"

अनु अपनी हँसी रोक न सकी। "गाय?"

"हाँ।" आरोही ने पूरी गंभीरता से सिर हिलाया। तू दुनिया की इकलौती लड़की है जो किसी से लड़ना तो दूर, तेज़ आवाज़ में बात तक नहीं कर सकती। और आज तेरा पाला सीधे ऐसे आदमी से पड़ने वाला है, जिसका नाम सुनकर लोग फाइलें सीधी पकड़ लेते हैं।

अनु ने उसके सिर पर हल्की-सी चपत लगाई।"बस कर... सुबह-सुबह मुझे डरा मत। मैं डरा नहीं रही..." आरोही ने मुस्कुराते हुए कहा, "...मैं तो बस शाम का ट्रेलर पहले ही दिखा रही हूँ।"

मेरा क्या होगा? पहले कोई गलती तो करूँ।अनु ने मुस्कुराकर सिर हिला दिया।"अरे, गलती करने के लिए तेरे जैसा सीधा इंसान ही तो चाहिए।" आरोही ने तुरंत जवाब दिया।चल, अब चपड़-चपड़ बंद कर। तू खा, मैं तैयार होकर आती हूँ। "जी, मैडम।"

अनु ने सिर हिलाया और फिर अपने कमरे मे चली गईं ।उसे अपने नए बॉस के बारे में कोई उत्सुकता नहीं थी।उसे बस समय पर ऑफिस पहुँचना था।और आरोही...उसे पूरा यक़ीन था कि आज ऑफिस में कुछ न कुछ ऐसा ज़रूर होने वाला है, जिसकी कहानी शाम को चाय के साथ सुनने लायक होगी।

आरोही ने आराम से नाश्ता किया। बीच-बीच में मोबाइल पर नज़र डालती, कभी कोई धुन गुनगुनाने लगती, तो कभी बिना वजह मुस्कुरा देती। प्लेट खाली करके वह उसे सिंक में रखने उठी ही थी कि कमरे का दरवाज़ा खुलने की हल्की-सी आवाज़ आई।

उसने पलटकर देखा...और कुछ पल तक बस देखती रह गई।अनु धीरे-धीरे उसकी तरफ़ चली आ रही थी।क्या हुआ? ऐसे क्यों देख रही है?"

तू इंसान है ना... या ऊपर वाले ने फुर्सत में बैठकर कोई स्पेशल पीस बनाया है?"

अनु खिलखिलाकर हँस पड़ी।सुबह-सुबह फिर शुरू हो गई? मैं मज़ाक नहीं कर रही। आरोही ने उसके गाल के पास आई बालों की एक लट पीछे करते हुए कहा, "देख ज़रा खुद को... बस थोड़ा-सा काजल, होंठों पर लिप बाम... और मैडम तैयार।"

अनु ने हँसते हुए उसका हाथ हटा दिया और तू? आधा घंटा शीशे के सामने खड़े होकर भी चैन नहीं पड़ता।।क्योंकि मेहनत मुझे करनी पड़ती है," आरोही ने नाटकीय अंदाज़ में आह भरी, "और तू... तू तो ऐसे ही लोगों का दिल दुखा देती है।"

दोनों अपनी-अपनी जगह बेहद खूबसूरत लग रही थीं, लेकिन अनुराधा में कुछ ऐसा था कि उस पर नज़र टिक जाए तो आसानी से हटने का नाम न ले। उसके चेहरे की सादगी ही उसकी सबसे बड़ी खूबसूरती थी।

आरोही ने दोनों हाथ सिर पर रख लिए। " अरे नही यार कसम से ! क्या बवाल लग रही है तू। रास्ते में किसी का खून करवाने का इरादा है क्या?" अनुराधा ने नाश्ते की प्लेट उठाते हुए उसे घूरा। क्योंकि अब वह चिढ गयी थी। आज आरोही कुछ ज्यादा ही उसे तंग कर रहीं थी।

"आरू, क्या बोले जा रही है तू? मैंने ऐसा क्या कर लिया? मैंने तो कुछ लगाया भी नहीं है।"

"यही तो दिक्कत है।" आरोही उसके पास आई और अपनी उँगली से थोड़ा-सा काजल लेकर उसके कान के पीछे टीका लगा दिया। "तुझे किसी की नज़र न लगे, मेरी राधू।"

फिर उसने अनुराधा को सिर से पाँव तक देखा और मुस्कराकर बोली, "तू कुछ करे या न करे, वैसे ही बहुत खूबसूरत है... और आज तो कमाल लग रही है। ऊपर से इस ठंड में तेरे गाल और नाक जो हल्के-हल्के लाल हो जाते हैं न... बस, फिर तो लड़कियों की ही नीयत डोल जाए, लड़कों का तो पूछ ही मत।"

अच्छा?" अनु ने भौंह उठाई और बैग उठाते हुए मुस्कुराकर बोली,"हो गया तेरी तारीफ़ों का कोटा? अब निकलें? पहले ही दिन देर हो गई तो अच्छा नहीं लगेगा।"

हाँ। ऑफिस में अगर आज किसी की नज़र तुझ पर पड़ गई ना, तो मुझे बिल्कुल हैरानी नहीं होगी।"

आरू...!" अनुराधा ने उसे बनावटी गुस्से से घूरा।

"अच्छा-अच्छा... मेरी देवी, माफ़ कर दे।" आरोही ने तुरंत दोनों हाथ जोड़ लिए, फिर पास रखा उसका दुपट्टा उठाकर उसकी ओर बढ़ाते हुए बोली, "ये ले, इससे अपना चेहरा ढक ले। कम से कम रास्ते में लोग चैन से अपने काम पर जा सकेंगे।"

दोनों ने घर का दरवाज़ा बंद किया और हँसते-बातें करते हुए बाहर निकल गईं।

अनुराधा मुस्कराए बिना नहीं रह सकी। उसने दुपट्टा चेहरे पर बाँधा, दोनों ने जल्दी-जल्दी अपना सामान उठाया और फ्लैट का दरवाज़ा बंद कर नीचे आ गईं। कुछ ही क्षण बाद उनकी स्कूटी मुंबई की व्यस्त सड़कों की ओर बढ़ चुकी थी।

Continue......

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