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3.His Dark Obssession

राम की आँखें जैसे ही माधुरी से मिलीं, उनके भीतर उतर आया रक्तिम तेज़ देखकर हॉल में उपस्थित हर व्यक्ति का चेहरा बदल गया। वह क्रोध से चिल्लाने वालों में से नहीं था। उसका स्वभाव ही ऐसा था कि वह अपने भीतर उठते तूफ़ान को भी चेहरे पर आने नहीं देता था। किन्तु जो लोग राम रघुवंशी को जानते थे, वे यह भी जानते थे कि जब उसकी आँखों का रंग बदलता है, तब उसके धैर्य की अंतिम सीमा समाप्त हो चुकी होती है। उसके बाद वह दया नहीं, केवल निर्णय करता था।

माधुरी के उठे हुए कदम अनायास ही पीछे हट गए। अभी कुछ क्षण पहले तक जो शब्द बिना रुके उनके होंठों से निकल रहे थे, वही होंठ अब मौन हो गए। हॉल में ऐसा सन्नाटा छा गया कि किसी के साँस लेने की आवाज़ भी स्पष्ट सुनाई देने लगी।

राम ने बिना किसी उतावलेपन के विवान को अपने पीछे किया। फिर एक-एक शब्द पर ठहरते हुए बोला, "मिसेज़ माधुरी मृत्युंजय रघुवंशी..."

उसका स्वर ऊँचा नहीं था, पर इतना कठोर अवश्य था कि हर शब्द सीधे सुनने वाले के भीतर उतर रहा था।

"यह आख़िरी बार है... जब आपकी ज़ुबान मेरे सामने इस तरह खुली है। आज के बाद भूलकर भी आपने मेरे सामने एक भी अपमानजनक शब्द कहा... तो आपकी यही ज़ुबान काटकर फेंक दूँगा।"

राम कुछ क्षण उन्हें देखता रहा। उसके चेहरे पर क्रोध का कोई प्रदर्शन नहीं था, पर उसकी आँखों की कठोरता ही उसके शब्दों से कहीं अधिक भयावह थी।

"और एक बात..." उसने उसी शांत स्वर में कहा, "राम रघुवंशी की डिक्शनरी में 'No Mercy' केवल लिखा नहीं जाता... निभाया भी जाता है।"

माधुरी की दृष्टि अनायास झुक गई।हॉल में उपस्थित किसी व्यक्ति ने एक शब्द तक नहीं कहा।

राम ने धीरे से अपनी नजर ऊपर उठाई।पहली मंज़िल पर खड़े मृत्युंजय रघुवंशी अब भी वहीं थे। दोनों की आँखें एक क्षण के लिए मिलीं। उस एक क्षण में न कोई शिकायत कही गई, न कोई सफ़ाई दी गई; केवल वर्षों का मौन एक-दूसरे के सामने खड़ा था।

राम ने बिना कोई भाव प्रकट किए अपनी नजर हटा ली। फिर वह मुड़ा और उसी शांत चाल से हॉल से बाहर निकलने लगा।

राम जैसे ही मुड़कर बाहर जाने लगा, पूरे हॉल में जैसे एक साथ कई आवाज़ें गूँज उठीं।

"राम...! रुक जाओ, बेटा ...!"

जानकी जी लगभग दौड़ती हुई उसके पास पहुँचीं और पीछे से उसकी बाँह थाम ली। उनकी उँगलियों की पकड़ में वर्षों का डर था—मानो एक बार फिर उनका पोता उनसे दूर जा रहा हो।

हॉल में खड़ा शायद ही कोई ऐसा था जिसकी आँखें नम न हुई हों। अभी-अभी जो मिलन हुआ था, वह फिर बिछड़ने की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा था।

जानकी जी ने काँपते स्वर में कहा, "रुक जा, मेरे बच्चे ...। ना जाने कब से तेरी राह देख रही थी। अभी आया है... और अब फिर जाने की बात कर रहा है?"

राम ठिठक गया।उसने धीरे से पलटकर अपनी दादी की ओर देखा। फिर बहुत प्यार से उनके हाथ अपने हाथों में ले लिए। कुछ पल तक वह उन्हें देखता रहा, जैसे शब्द चुन रहा हो।

"नहीं, दादी माँ..." उसका स्वर पहले जैसा ही शांत था, "अब यहाँ... और नहीं रुक सकता। वजह... आप जानती हैं।"

बस इतना ही कहा उसने।जानकी जी की आँखें झुक गईं। उनके पास उस बात का कोई उत्तर नहीं था। वे जानती थीं कि राम किस दर्द की ओर इशारा कर रहा है।कुछ पल का मौन दोनों के बीच ठहर गया।

राम ने दादी के चेहरे पर उतर आई उदासी देखी तो स्वयं ही बात बदल दी। होंठों पर हल्की-सी मुस्कान लाते हुए बोला, "अरे... अब तो मैं यहीं हूँ। इतनी भी क्या चिंता? जब मन करे, आप सब अवंतिका विला आ जाइए।"

फिर उसने मुस्कुराकर केतकी जी की ओर देखा।"और छोटी माँ..." उसकी आवाज़ में वही पुराना अपनापन लौट आया, "आपके हाथ का खाना... बहुत मिस किया मैंने। किसी दिन आऊँगा... तो आपके हाथ का खाना खाऊँगा।"

क्षणभर रुककर वह बिल्कुल पुराने दिनों की तरह मुस्कुराया,"खिलाएँगी ना...?"

केतकी जी की पलकों पर ठहरे आँसू आखिर छलक ही पड़े। उन्होंने कुछ कहने के बजाय अपने पास रखा टिफ़िन बॉक्स उठाया और चुपचाप विवान के हाथ में रख दिया।

फिर राम की ओर देखकर बोलीं, "यह बात भला मैं कैसे भूल सकती हूँ, मेरे बच्चे।"

उन्होंने भीगी मुस्कान के साथ आगे कहा, "मुझे मालूम था... कुछ लोगों की आदत ही होती है रिश्तों के बीच आग लगाने की ! यह कहते हुए उनकी नजर सीधे माधुरी की तरफ गयी । इसलिए मैं तेरे लिए खाना पहले ही पैक करके ले आई थी।"

उनकी बात सुनकर राम की आँखों में भी एक क्षण के लिए अपनापन और कृतज्ञता एक साथ उतर आए। उस टिफ़िन में केवल खाना नहीं था... छोटी माँ का वह स्नेह था, जो वर्षों की दूरी भी कम नहीं कर सकी थी।

राम की नज़र जैसे ही पंचदेव जी पर पड़ी, उसके कदम अपने आप उनकी ओर बढ़ गए।

अब तक सबको संभालते-संभालते खड़े पंचदेव रघुवंशी की वृद्ध आँखों की नमी उनसे छिपाए नहीं छिप रही थी। चेहरे पर वही पुराना रौब था, मगर आँखें अपने पोते को रोक लेने की मौन विनती कर रही थीं।

राम उनके सामने आकर ठहर गया। बिना कुछ कहे उसने उनके दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए। उन झुर्रियों से भरे हाथों में आज भी वही दृढ़ता थी, जिसने वर्षों तक पूरे रघुवंशी साम्राज्य को संभाले रखा था।

राम ने उनकी आँखों में देखते हुए हल्की-सी मुस्कान के साथ कहा,"पंचदेव रघुवंशी... इतने कमज़ोर तो नहीं हैं।"

पंचदेव जी ने उसकी ओर देखा। उनकी भीगी आँखों में गर्व उतर आया। उन्होंने मुस्कुराते हुए धीरे से सिर हिलाया।

"हाँ..." फिर अपनी भर्राई आवाज़ को सँभालते हुए बोले, "आख़िर दादा किसका हूँ... राम रघुवंशी का।"

दोनों के होंठों पर एक साथ हल्की मुस्कान आ गई।कुछ पल दोनों बिना कुछ कहे एक-दूसरे को देखते रहे। उनके बीच शब्दों से कहीं अधिक विश्वास खड़ा था।

राम ने गंभीर स्वर में कहा, "आप बिल्कुल चिंता मत कीजिए। रघुवंशी एम्पायर तब तक मेरे भरोसे रहेगा, जब तक वह अपने सही हाथों में वापस नहीं पहुँच जाता।"उसकी आवाज़ में दृढ़ विश्वास था।

मैं आपके भरोसे को कभी टूटने नहीं दूँगा। और जहाँ मेरी ज़रूरत होगी... मैं आता रहूँगा।

फिर उसने जानकी जी की ओर देखा और धीमे स्वर में बोला,"बस... हो सके तो दादी माँ को समझा दीजिए। और... कुछ दिन बाद आप भी मेरे साथ अवंतिका विला चलिएगा।"

पंचदेव जी की आँखें भर आईं।उन्होंने बिना कुछ कहे राम को अपने सीने से लगा लिया। वर्षों का गर्व, अपनापन और विश्वास उस आलिंगन में उतर आया।राम की पीठ थपथपाते हुए उन्होंने भर्राए स्वर में कहा,"मुझे तुम पर पूरा भरोसा है... मेरे शेर।"

राम की नज़र फिर अर्जुन जी पर जाकर ठहर गई। वह कुछ क्षण उन्हें देखता रहा, जैसे मन की कोई बात शब्दों में ढालने की कोशिश कर रहा हो। फिर धीरे-धीरे उनके पास आकर बोला, "चाचू... आगे जो कुछ भी करना है, उसमें मुझे आपकी मदद की ज़रूरत पड़ेगी। बाकी सारी बातें ऑफिस में करेंगे... लेकिन आज आपसे एक बात कहना चाहता हूँ।"

उसने एक पल रुककर अर्जुन जी की आँखों में देखा।

"मेरी ज़िंदगी में पिता की जगह हमेशा आपने निभाई है। जब-जब मैं गिरा... जब-जब मैं अकेला पड़ा... या मुझे किसी अपने की ज़रूरत हुई... हर बार सबसे पहले आप मेरे साथ खड़े मिले। और..." उसकी नज़र केतकी जी की ओर मुड़ गई, "...माँ का आँचल अगर कभी दोबारा महसूस हुआ, तो छोटी माँ... वह सिर्फ़ आपके पास।"

उसके शब्दों के साथ ही अर्जुन जी की आँखें भर आईं। उन्होंने बिना कुछ कहे राम को अपनी बाँहों में भर लिया। केतकी जी भी आगे बढ़ीं और दोनों ने मिलकर उसे वैसे ही अपने बीच समेट लिया, जैसे बरसों पहले किसी डरे हुए बच्चे को चुप कराया करते थे।

अर्जुन जी ने उसकी पीठ थपथपाते हुए कहा, "पगले... हमने कभी यह माना ही नहीं कि हमारे सिर्फ़ दो बच्चे हैं, क्योंकि अर्थव और सौम्या से पहले,हमारे लिए तो तू हमेशा पहला और सबसे बड़ा बेटा रहा है।"

केतकी जी ने भी उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए मुस्कुराकर कहा, "इसलिए आज के बाद ऐसी बातें फिर कभी मत करना। रिश्तों को साबित नहीं किया जाता... बस निभाया जाता है।"

राम बस मुस्कुरा दिया। उस मुस्कान में अपनापन भी था और संतोष भी।

अर्जुन जी ने फिर सहज स्वर में कहा, "ऑफिस की सारी डिटेल्स तुम्हारी असिस्टेंट के पास हैं। बाकी जो भी ज़रूरी होगा, अथर्व और विवान तुम्हें समझा देंगे।"

"और हाँ..." केतकी जी ने बीच में ही बात पकड़ ली, "रात का खाना मैं रोज़ भिजवा दूँगी। इसमें कोई बहस नहीं होगी। लेकिन अभी... सुबह का नाश्ता करके ही जाना।"

राम ने सर हिला दिया "ठीक है... छोटी माँ।"उसके इस संबोधन पर केतकी जी की आँखों में फिर वही ममता उतर आई।

ऊपर अपनी बालकनी से मृत्युंजय रघुवंशी अब भी यह सब देख रहे थे। नीचे अपने छोटे भाई और पत्नी के साथ खड़े राम को देखकर उनके भीतर न जाने कितने भाव एक साथ उमड़ रहे थे। वह चाहते तो एक आवाज़ देकर उसे रोक सकते थे... लेकिन शब्द जैसे उनके साथ छोड़ चुके थे।

उनकी आँखों की नमी अब छिपाए नहीं छिप रही थी।उन्होंने एक आख़िरी बार राम की ओर देखा, फिर धीरे से मुड़े और भारी कदमों से अपने कमरे की ओर चले गए। पीछे छूट गईं कुछ अधूरी दूरियाँ... और एक पिता का मौन, जो शायद वर्षों बाद भी अपने बेटे तक पहुँचने का रास्ता खोज रहा था।

सुबह के छह बजने को थे। रात और दिन के बीच की वह शांत घड़ी, जब शहर अभी पूरी तरह जागा नहीं था। रघुवंशी मेंशन से निकलकर राम, अभिमन्यु, विवान और अथर्व के साथ अवंतिका विला लौट आया था ।

पूरी रात की भागदौड़ और लगातार चलती घटनाओं की थकान अब सबके चेहरों पर साफ़ दिखाई दे रही थी।

जैसे ही चारों हॉल में पहुँचे, अभिमन्यु ने बिना किसी औपचारिकता के खुद को सोफ़े पर छोड़ दिया। उसने गर्दन पीछे टिकाई, लंबी साँस ली और आँखें बंद करते हुए बोला,

"यार, विवान... जरा शेफ से बोलो एक स्ट्रॉन्ग कॉफी बना दे। न्यूयॉर्क से इंडिया तक... एक पल का भी सुकून नसीब नहीं हुआ।"

उसकी बात सुनकर अथर्व मुस्कुरा दिया, जबकि विवान ने हल्का-सा सिर हिलाया और शेफ को आवाज़ देने के लिए मुड़ गया।उधर राम ने केवल एक नज़र अभिमन्यु पर डाली। उस नज़र में हल्की-सी मुस्कान भी थी और काम की गंभीरता भी। बिना कुछ कहे वह सीढ़ियों की ओर बढ़ गया।

सीढ़ियों पर पहुँचकर वह रुका भी नहीं। बस चलते-चलते इतना कहा,"मैं स्टडी रूम जा रहा हूँ। कॉफी लेकर... तुम तीनों ठीक दो मिनट में वहाँ पहुँचो।"

उसकी बात सुनकर तीनों ने एक-दूसरे की ओर देखा। वे जानते थे, राम ने दो मिनट कहा है... तो उसका मतलब सचमुच दो मिनट ही होता है।

राम तेज़ कदमों से सीढ़ियाँ चढ़ता हुआ सीधे स्टडी रूम की ओर बढ़ने लगा।

तभी अभिमन्यु ने धीरे-धीरे गर्दन घुमाकर सीढ़ियों की ओर देखा। उसके चेहरे के भाव ऐसे थे, मानो इस समय अगर राम सामने आ जाए तो उसे वहीं खड़ा-खड़ा खा जाए।ऊपर जाती सीढ़ियों पर राम बिना पीछे देखे आगे बढ़ता रहा। तभी चलते-चलते उसकी शांत आवाज़ नीचे तक सुनाई दी।

"अभि... आँखें फाड़-फाड़कर देखना बंद करो और सीधे स्टडी रूम में आओ।"

अभिमन्यु एक पल को ठिठक गया। फिर दोनों हाथ कमर पर रखकर बड़बड़ाया, "हुह...! निशाचर कहीं का। ना खुद चैन से जीता है, ना मुझे जीने देता है।"

उसकी झुँझलाहट देखकर सामने खड़े विवान और अथर्व अपनी हँसी रोक न सके। दोनों के होंठों पर दबाई हुई मुस्कान साफ़ दिखाई दे रही थी।

अभिमन्यु ने तुरंत उनकी ओर देखा। दोनों अब भी हँसी रोकने की नाकाम कोशिश कर रहे थे।

"ओए...!" उसने उँगली दिखाते हुए कहा, "ये जो दाँत निकालकर 'खी... खी...' कर रहे हो न... बंद कर दो। ज़्यादा हँसी आई, तो सारे दाँत गिनने पड़ जाएँगे।"

अभिमन्यु की धमकी सुनते ही विवान और अथर्व ने तुरंत अपने होंठ भींच लिए। दोनों ने एक-दूसरे की ओर देखा और बिना कुछ कहे उसके पीछे-पीछे चल पड़े।

सीढ़ियों तक पहुँचते-पहुँचते अभिमन्यु ने अथर्व की ओर गर्दन घुमाई और उसे घूरते हुए बोला, "पहले कॉफी लेकर आ... नहीं तो मैं यहीं सो जाऊँगा। और फिर तेरा वो कमीना मुझे चैन से सोने भी नहीं देगा।"

अथर्व हँसते हुए सिर हिलाकर किचन की ओर मुड़ गया, जबकि अभिमन्यु और विवान सीधे स्टडी रूम की ओर बढ़ गए।

अवंतिका विला का स्टडी रूम बाकी कमरों से बिल्कुल अलग था। दीवारों पर सजी अलमारियाँ, व्यवस्थित रखी फ़ाइलें, बड़ी-सी वॉल स्क्रीन और बीचों-बीच रखा विशाल टेबल... हर चीज़ अनुशासन और गंभीरता का आभास करा रही थी।

राम अपनी कुर्सी पर आकर बैठ गया। उसके बैठते ही कमरे का माहौल जैसे अपने आप बदल गया। अभी तक जो सहज बातचीत चल रही थी, उसकी जगह अब काम ने ले ली थी।

कुछ ही क्षण बाद विवान और अभिमन्यु भी सामने वाली कुर्सियों पर बैठ गए। अथर्व भी कॉफी ट्रे में रखकर अंदर आया। उसने एक-एक कप सबके सामने रखा और स्वयं भी अपनी जगह बैठ गया।

विवान ने अपने हाथ में पकड़ी मोटी फ़ाइल राम की ओर बढ़ाई।

"भाई... इसमें कंपनी के सभी महत्वपूर्ण अधिकारियों की पूरी डिटेल है। फाइनेंस डिपार्टमेंट, ऑपरेशंस, हमारे चल रहे प्रोजेक्ट्स, कॉम्पिटिटर्स... सब कुछ।"

राम ने बिना कुछ कहे फ़ाइल अपने सामने रख ली।उसी समय अथर्व ने फ़ाइलों का दूसरा बंडल अभिमन्यु की ओर बढ़ाते हुए कहा, "और ये स्टॉक, अकाउंट्स, पीवीआर, मार्केटिंग और सप्लायर्स की फाइल्स हैं। मैंने जितनी अपडेटेड जानकारी थी, सब इसमें रख दी है।"

राम ने दोनों फ़ाइलों पर एक नज़र डाली। अगले ही पल उसने पहली फ़ाइल खोली।वह एक-एक करके दोनों फाइलों के पन्ने पलट रहा था। उसकी नज़र हर दस्तावेज़, हर आँकड़े और हर नोट पर ठहरती, फिर आगे बढ़ जाती। कुछ देर तक फाइलें देखने के बाद राम ने एक पन्ने पर उँगली रोक दी। उसकी भौंहें हल्की-सी सिकुड़ीं।

"ये डील..." उसने फाइल से नज़र हटाए बिना कहा, "मृत्युंजय रघुवंशी ने हमारे सबसे बड़े रायवल के साथ कैसे साइन कर दी?"उसने दूसरा दस्तावेज़ खोला, "और ये... मेहता एंड सन्स... रावत ब्रदर्स..."

कुछ क्षण तक वह उन कागज़ों को देखता रहा। फिर कुर्सी की पीठ से टिकते हुए बोला,"एक बात मेरी समझ से बाहर है। कंपनी को पिछले आठ सालों में इतने बड़े-बड़े प्रोजेक्ट मिले हैं, फिर भी लगातार लॉस में कैसे जा रही है? कहीं न कहीं कुछ ऐसा हो रहा है जो कागज़ों में दिखाई नहीं दे रहा... और मैं वही जानना चाहता हूँ।"

राम की आवाज़ पहले की तरह शांत थी, लेकिन उसे जानने वाले समझ रहे थे कि उसका दिमाग अब हर छोटी-बड़ी बात को जोड़ना शुरू कर चुका है।विवान ने अथर्व की ओर देखा। दोनों जैसे पहले से ही इस प्रश्न के लिए तैयार थे।

विवान ने धीमे स्वर में कहना शुरू किया, "भाई... आपके और बड़ी मॉम के जाने के बाद बड़े पापा कंपनी तो आते रहे, लेकिन धीरे-धीरे पूरा कंट्रोल दोनों मामाओं और उनके बेटों के हाथ में चला गया।"

अथर्व ने बात आगे बढ़ाई, "उस समय हम दोनों भी बहुत छोटे थे। समझ तो थी नहीं कि कंपनी के अंदर क्या चल रहा है। बाद में जब हमने काम शुरू किया, तो आपने जो कंपनी हमें संभालने के लिए दी थी, हम उसी में पूरी तरह व्यस्त हो गए।"

विवान ने सामने रखी फाइल की ओर इशारा किया।

"रघुवंशी ग्रुप के अंदर क्या फैसले लिए जा रहे थे... उनकी पूरी जानकारी हमें भी नहीं मिल पाती थी। जितनी जानकारी मिली, हमने सब इस फाइल में इकट्ठा कर दी है।"

राम ने बिना कुछ कहे दोनों की बात सुनी। उसकी उँगलियाँ अब भी फाइल के उसी पन्ने पर टिकी थीं, लेकिन उसकी नज़रें बता रही थीं कि वह केवल दस्तावेज़ नहीं पढ़ रहा... पिछले आठ वर्षों का पूरा हिसाब अपने भीतर जोड़ रहा था।

राम एक-एक दस्तावेज़ बड़ी बारीकी से देख रहा था। बीच-बीच में वह किसी कागज़ पर उँगली रोक देता, कोई तारीख़ देखता, किसी साइन पर नज़र ठहर जाती, तो कभी बिना सिर उठाए ही विवान या अथर्व से उसका विवरण पूछ लेता। दोनों भी क्रम से हर सवाल का जवाब देते जा रहे थे।

काफ़ी देर तक सब कुछ देखने के बाद विवान ने सामने रखी एक पुरानी फ़ाइल खोलते हुए कहा, "भाई... करीब एक साल पहले दादू की मुलाक़ात कंपनी के सबसे पुराने मैनेजर, मिश्रा जी से हुई थी।"

राम ने बिना कुछ कहे उसकी ओर देखा।

"उन्होंने ही पहली बार कंपनी की असली हालत दादू के सामने रखी। बताया कि पिछले दस-पंद्रह सालों में रघुवंशी ग्रुप धीरे-धीरे कर्ज़ में डूबता चला गया है। बाहर से सब कुछ पहले जैसा दिखाई देता है, लेकिन अंदर की नींव कमज़ोर हो चुकी है। अब तो मार्केट में भी ये बात फैलने लगी थी।"

विवान कुछ पल रुका। शायद उस दिन का चेहरा आज भी उसकी आँखों के सामने था।

"दादू उसी दिन बहुत परेशान हो गए थे। उन्होंने वहीं से आपको फोन किया। काफी देर तक आप दोनों की बात हुई। उसके बाद आपका फोन हमारे पास आया।"

अथर्व ने बात आगे बढ़ाई, "आपने सिर्फ़ इतना कहा था कि कंपनी का एक-एक रिकॉर्ड निकालो। चाहे जितना समय लगे, लेकिन कुछ भी छूटना नहीं चाहिए। बस... उसी दिन से हम दोनों इसी काम में लग गए।"

विवान ने सामने रखी फाइलों की ओर इशारा किया।पिछले कई महीनों में जितनी भी जानकारी मिल सकी... पुराने अकाउंट्स, बोर्ड मीटिंग्स, कॉन्ट्रैक्ट्स, इंटरनल रिपोर्ट्स, सब कुछ इकट्ठा करके इन्हीं फाइलों में रखा है।"

कमरे में फिर कुछ देर के लिए सन्नाटा छा गया।राम कुछ नहीं बोला। उसकी आँखें फाइलों पर थीं, लेकिन दिमाग़ जैसे कहीं और चल रहा था। वह एक-एक कड़ी को जोड़ रहा था। इतने बड़े प्रोजेक्ट... लगातार बढ़ता कारोबार... फिर भी कंपनी घाटे में। बात सिर्फ़ खराब मैनेजमेंट की नहीं हो सकती थी। कहीं न कहीं कोई ऐसी चाल चल रही थी, जो कागज़ों में दिखाई नहीं देती थी।

इसी सोच के बीच अचानक उसकी नज़र एक नाम पर आकर ठहर गई।उसने पन्ने पर उँगलियाँ स्थिर कर दीं।कुछ क्षण तक वह उस नाम को देखता रहा, फिर पहली बार सिर उठाकर बोला,

"ये... अनुराधा ठाकुर कौन है?" यह नाम होंठों से निकलते ही जाने क्यों उसके भीतर एक हलचल-सी उठी....एक अजीब-सा एहसास...!

जैसे यह नाम उसने पहली बार पढ़ा हो, फिर भी उससे बिल्कुल अनजान न हो। वह उस अनुभूति का अर्थ समझ नहीं पाया। बस उसकी नज़र उसी नाम पर ठहरी रही।

राम के मुँह से अनुराधा ठाकुर का नाम निकलते ही विवान और अथर्व ने अनायास एक-दूसरे की ओर देखा। अगले ही क्षण दोनों के चेहरों पर हल्की-सी चमक उभर आई। उनकी इस अचानक बदली हुई प्रतिक्रिया राम की नज़र से छिप न सकी। उसने फ़ाइल से नज़र उठाकर दोनों को देखा। उसकी आँखें हल्की-सी सिकुड़ गईं।

"क्या बात है?" उसने शांत स्वर में पूछा। "इस नाम पर तुम दोनों के चेहरे क्यों बदल गए?"

अथर्व के होंठों पर लंबी-सी मुस्कान फैल गई। वह कुर्सी पर थोड़ा आगे सरक आया और बोला, "भाई... अनुराधा ठाकुर हमारी कंपनी की सबसे होनहार कर्मचारियों में से एक है। अपने कॉलेज की टॉपर रही है। पिछले तीन वर्षों से रघुवंशी एम्पायर के साथ काम कर रही है।"

वह बिना रुके आगे कहता गया, "काम के प्रति उसका समर्पण ग़ज़ब का है। कोई भी ज़िम्मेदारी हो, उसने आज तक कभी मना नहीं किया। जितना काम दो, उतनी ही लगन से पूरा करती है। मेहनती है, ईमानदार है और सबसे बड़ी बात... कंपनी के प्रति उसकी निष्ठा पर आज तक किसी ने सवाल नहीं उठाया।"

विवान हल्का-सा मुस्कुराया। "और भाई... एक वजह ये भी है कि वह हर बात बहुत जल्दी समझ लेती है। उन्हें बार-बार कुछ समझाने की ज़रूरत नहीं पड़ती। कंपनी के अंदर क्या चल रहा है, किस डिपार्टमेंट में क्या समस्या है, किस कर्मचारी से कैसे काम लेना है... इन सब पर उसकी पकड़ कमाल की है।"

वह कुछ क्षण रुका, फिर सहज भाव से बोला, "शायद यही वजह रही कि बड़े पापा, दादू और डैड ने उसे आपकी पर्सनल असिस्टेंट चुना। उनका मानना था कि अगर कोई आपको सबसे कम शब्दों में, सबसे सही जानकारी दे सकता है, तो वो अनुराधा ही है।"

राम चुपचाप दोनों की बातें सुनता रहा। उसकी उँगलियाँ अब भी फ़ाइल के उसी पन्ने पर टिकी थीं, जहाँ अनुराधा ठाकुर का नाम लिखा था। उसने एक बार फिर उस नाम पर नज़र डाली, मानो केवल उस व्यक्ति के बारे में नहीं, बल्कि उससे जुड़ी हर जानकारी को समझ लेना चाहता हो।

अथर्व हँस पड़ा, और एक बात तो हम भूल ही गए... उनकी मुस्कान।विवान भी मुस्कुरा उठा।

" सच कहूँ भाई, कंपनी में आधे काम तो उनकी मुस्कान ही करवा देती है। जिन कर्मचारी से दूसरे लोग घंटों बहस करते रह जाते हैं, वही काम वो दो मिनट में करवा लेती है। लोग उनकी इज़्ज़त भी करते हैं... और उनकी बात टालते भी नहीं।"

इतना सुनते ही राम की भौंहें हल्की-सी उठ गईं। न जाने क्यों, अनुराधा के बारे में हर नई बात उसके भीतर एक अनजानी-सी हलचल पैदा कर रही थी। एक अजीब-सी बेचैनी उसके मन में धीरे-धीरे आकार ले रही थी, लेकिन उसके चेहरे पर हमेशा की तरह कोई भाव नहीं उभरा। वह उतनी ही शांति से बैठा रहा, जैसे इन बातों का उस पर कोई असर ही न हुआ हो।

"तुम दोनों..." उसने धीमे, सपाट स्वर में कहा, "मिस ठाकुर की कुछ ज़्यादा ही तारीफ़ नहीं कर रहे?"एक पल रुककर उसने दोनों को बारी-बारी देखा।"या फिर..." उसके होंठों पर बेहद हल्की-सी मुस्कान आई, "तुम दोनों में से किसी का... कोई चक्कर-वक्कर है?"

कमरे में जैसे एक पल के लिए समय ठहर गया।विवान और अथर्व एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे। दोनों की आँखें फैल गई थीं, जैसे उन्हें यक़ीन ही न हो कि अभी-अभी यह सवाल राम ने पूछा है।

उधर अभिमन्यु भी उतना ही हैरान था। तीनों एक साथ राम की ओर देखने लगे। उनके चेहरों पर साफ़ हैरानी थी। शायद उनमें से किसी ने भी राम से ऐसा सवाल करने की उम्मीद नहीं की थी।

राम बाहर से पूरी तरह शांत दिखाई दे रहा था, लेकिन भीतर वह स्वयं इस बात का जवाब सुनने के लिए अनजानी-सी उत्सुकता महसूस कर रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि आखिर एक ऐसी लड़की, जिससे वह कभी मिला भी नहीं, उसके बारे में सुनकर उसके मन में यह हलचल क्यों उठ रही थी। फिर भी उसने अपने चेहरे पर वही निर्विकार भाव बनाए रखे और चुपचाप तीनों के जवाब का इंतज़ार करने लगा।

राम का सवाल सुनते ही विवान ने बिना एक पल गंवाए जल्दी से कहा, "अरे नहीं, भाई! ऐसी कोई बात नहीं है। मिस ठाकुर हमसे बड़ी हैं और हम उनका बहुत सम्मान करते हैं। उनके बारे में इस तरह सोचना भी गलत होगा।"

अथर्व ने तुरंत विवान की बात का समर्थन किया।

"मेरा मतलब वो नहीं था, भाई। मैं सिर्फ यह कहना चाहता था कि मिस ठाकुर आपको कंपनी की हर जानकारी सबसे अच्छे तरीके से दे सकती हैं। आपकी पर्सनल असिस्टेंट बनने से पहले वह ऑपरेशनल मैनेजर की पोस्ट पर थीं। कंपनी के लगभग हर विभाग की उन्हें पूरी समझ है।"

वह हल्का-सा मुस्कराया और बोला, "और रही हमारी बात... तो हमारे लिए तो वह बड़ी बहन जैसी हैं।"

दोनों के चेहरे देखकर साफ़ पता चल रहा था कि वे अनुराधा की तारीफ़ सिर्फ उसके काम और काबिलियत की वजह से कर रहे थे। उनकी बात सुनकर राम ने कुछ नहीं कहा।

उसकी निगाहें एक बार फिर फ़ाइल पर लिखे 'अनुराधा ठाकुर' नाम पर टिक गईं। चेहरे पर अब भी वही ठहराव था, लेकिन मन में उठ रहे सवाल पहले से कहीं ज़्यादा गहरे हो चुके थे।

अभिमन्यु की गहरी निगाहें लगातार राम पर टिकी थीं। वर्षों की दोस्ती ने उसे इतना तो सिखा ही दिया था कि राम के चेहरे पर भले ही कोई भाव न दिखाई दे, लेकिन उसके भीतर उठने वाली हलचल को वह आसानी से पहचान सकता था। अनुराधा का नाम सामने आने के बाद राम के व्यवहार में आया यह हल्का-सा बदलाव भी उससे छिप नहीं पाया था।

उधर राम भी अभिमन्यु की निगाहों का मतलब अच्छी तरह समझ रहा था। वह जानता था कि अगर अभिमन्यु ने कुछ पूछ लिया, तो बात यहीं नहीं रुकेगी।

इसलिए अभिमन्यु के कुछ कहने से पहले ही राम ने फ़ाइल बंद कर दी और शांत, लेकिन स्पष्ट स्वर में कहा,

"चाहे मिस ठाकुर कितनी भी काबिल क्यों न हों..."उसने एक पल रुककर सामने बैठे तीनों की ओर देखा।"मुझे अपने साथ किसी लड़की को असिस्टेंट के तौर पर नहीं रखना है। उन्हें कोई दूसरी ज़िम्मेदारी दे दो... और मेरे लिए एक मेल असिस्टेंट हायर कर लो।"

राम का निर्णय सुनते ही कमरे में फिर एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। विवान और अथर्व ने अनायास एक-दूसरे की ओर देखा, जबकि अभिमन्यु की निगाहें अब भी राम के चेहरे पर ही टिकी थीं। उसे महसूस हो रहा था कि यह फैसला केवल एक ऑफिसियल डिसीजन नहीं था।।इसके पीछे कोई ऐसी बात थी, जिसे शायद खुद राम भी अभी शब्द नहीं दे पा रहा था।

Conti........

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