कुछ देर बाद सब लोग ड्रॉइंग रूम में आकर बैठ गए। बाहर सुबह धीरे-धीरे अपना आँचल फैला रही थी, जबकि भीतर वर्षों की दूरियाँ सिमटकर अपनापन बन चुकी थीं। वातावरण में अब पहले जैसी भारी खामोशी नहीं थी। उसकी जगह धीमी हँसी, पुराने किस्से और अपनेपन से भरी बातें ले चुकी थीं।
अभिमन्यु कभी अथर्व की खिंचाई कर रहा था, तो कभी विवान की। अथर्व भी पीछे हटने वालों में कहाँ था। दोनों की नोकझोंक सुनकर शमशेर के चेहरे पर बार-बार मुस्कान आ जाती। वह बीच-बीच में उन्हें टोकते भी, मगर उनकी आँखों में साफ़ दिखाई देता था कि उन्हें यह शोर अच्छा लग रहा है।
राम उन सबके बीच बैठा था, पर सबसे कम बोल रहा था। वह बस सबको देख रहा था... सुन रहा था। कभी किसी बात पर उसके होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आ जाती, तो कभी उसकी दृष्टि एक-एक चेहरे पर ठहर जाती। जैसे वह इन पलों को अपनी स्मृतियों में हमेशा के लिए सहेज लेना चाहता हो।
तभी उस सहज वातावरण को विवान के मोबाइल की घंटी ने भंग कर दिया।विवान ने जेब से फोन निकाला।स्क्रीन पर नाम उभरा, "दादू..."! ओह्ह तेरी मै तो भूल गया था भाई से मिलकर की हमे रघुवंशी मेंशन जाना था।
उसके चेहरे पर अनायास मुस्कान आ गई। उसने एक नज़र राम की ओर देखा, फिर कॉल रिसीव कर ली।
"जी, दादू..."उधर से आवाज़ आई, और इतनी ऊँची कि फोन कान पर होने के बावजूद कमरे में बैठे लोगों तक उसका स्वर पहुँच गया, "नालायक! कहाँ है तू?"
विवान ने कुछ बोलना चाहा, लेकिन दादू बिना रुके बोले जा रहे थे। यहाँ तेरी दादी ने मेरी चाय तक बंद करवा रखी है। कह रही है, 'जब तक राम घर नहीं आ जाता, तब तक इनकी चाय भी नहीं बनेगी... न नाश्ता मिलेगा।' अरे, मैंने कहा मेरा क्या कसूर है? तो बोली—'कसूर चाहे किसी का भी हो, भुगतना आपको पड़ेगा।'"
दादू की शिकायत सुनते ही अभिमन्यु अपनी हँसी रोक न सका। अथर्व ने भी मुस्कुराकर सिर झुका लिया। शमशेर के चेहरे पर भी बरसों बाद वैसी ही हँसी लौट आई, जैसी कभी इस परिवार की रौनक हुआ करती थी।
विवान ने हँसी दबाते हुए कहा,"दादू... मेरी बात तो सुनिए...! "बिल्कुल नहीं!" दादू ने उसे बीच में ही रोक दिया, "आज तेरी कोई सफ़ाई नहीं सुननी।"
विवान ने फिर कोशिश की, "लेकिन दादू..."! अरे, चुप... एकदम चुप! दादू की आवाज़ पहले से भी ऊँची हो गई।फोन स्पीकर पर डालो... अभी के अभी।
विवान ने मुँह बनाते हुए सबकी ओर देखा, फिर चुपचाप फोन स्पीकर पर डाल दिया।अगले ही क्षण पंचदेव रघुवंशी की भारी और अधिकारपूर्ण आवाज़ पूरे कमरे में गूँज उठी।
"राम बेटा... मुझे मालूम है, तुम इस समय अपने विला में हो। इसलिए बिना कोई बहाना बनाए, अभी के अभी रघुवंशी हाउस पहुँच जाओ। नहीं तो तेरी दादी मेरा जीना मुश्किल कर देगी।"
इतना कहते-कहते उनकी आवाज़ का कठोरपन जैसे अपने आप पिघल गया। वही पंचदेव रघुवंशी, जिनकी बात सुनकर बड़े-बड़े लोग सहम जाते थे, राम से बात करते समय अनायास ही एक स्नेहिल दादा बन जाते थे।
उनके स्वर का यह परिवर्तन सुनते ही अथर्व से रहा न गया। वह हँसते हुए थोड़ा ऊँची आवाज़ में बोला,"वाह दादू...! कमाल है। हमसे बात करते समय तो आपकी ज़ुबान से अंगारे बरसते हैं, और राम भैया से बात करते ही फूल झड़ने लगते हैं।"
कुछ पल के लिए उधर सन्नाटा छा गया।फिर पंचदेव रघुवंशी की वही रौबदार आवाज़ सुनाई दी,"चुप... गधे!"कमरे में बैठे सभी लोगों की हँसी छूट गई। मैं पंचदेव रघुवंशी हूँ... समझे!
एक पल रुककर उन्होंने फिर उसी अधिकार से कहा, "और राम... अगले दस मिनट के भीतर रघुवंशी हाउस पहुँचो। यह मेरा आदेश है।"
इतना कहकर उन्होंने बिना किसी उत्तर की प्रतीक्षा किए फोन काट दिया।कुछ क्षण तक कमरे में सन्नाटा रहा... फिर सबकी नज़र एक साथ राम पर जा ठहरी। उसके होंठों पर हल्की-सी मुस्कान थी। दादू का आदेश वह टाल भी नहीं सकता था, और शायद टालना चाहता भी नहीं था।
फिर अचानक अथर्व ने विवान की ओर देखा। विवान ने भी उसकी ओर देखा। अगले ही क्षण दोनों की हँसी एक साथ फूट पड़ी।उनकी हँसी पूरे कक्ष में गूँज उठी।अभिमन्यु भी स्वयं को रोक न सका। वह भी उनके साथ हँस पड़ा।
राम उन तीनों को देखता रहा। उसके होंठों पर एक शांत मुस्कान उभरी। उसने धीमे से सिर हिलाया, मानो कह रहा हो। दादू आज भी वैसे ही हैं... और शायद हमेशा वैसे ही रहेंगे।कुछ क्षण बाद वह उठ खड़ा हुआ।
"अभि।"अभिमन्यु ने उसकी ओर देखा।तुम भी तैयार हो जाओ... और मैं भी अपने कमरे में जा रहा हूँ।उसने अपनी घड़ी पर एक दृष्टि डाली।दस मिनट बाद रघुवंशी हाउस के लिए निकलते हैं।
"ठीक है।"अभिमन्यु ने संक्षिप्त उत्तर दिया।
दोनों लगभग साथ ही अपने स्थान से उठे। वर्षों की संगति ने उनके बीच शब्दों की आवश्यकता बहुत कम कर दी थी। कई बार केवल एक दृष्टि ही पर्याप्त होती थी।दोनों साथ-साथ हॉल से सीढ़ी की तरफ बढ़ गए। कॉरिडोर तक पहुँचकर उनके मार्ग अलग हो गए। जहाँ अभिमन्यु का फ्लोर दूसरा था तो वही राम का तीसरा फ्लोर था। जहाँ सभी नही जाते थे।
राम अपने कमरे की ओर बढ़ गया।अभिमन्यु भी अपने कमरे की ओर मुड़ गया।मुख्य हॉल में अब केवल विवान, अथर्व और शमशेर रह गए थे।विवान की दृष्टि उन दोनों को जाते हुए देखती रही। अर्थव ने कहा, बस कुछ दिन बाद हम भी यही भाई के साथ रहेंगे। विवान ने हां मे सर हिला दिया।
अवंतिका विला का निर्माण केवल एक निवास के रूप में नहीं हुआ था। उसके प्रत्येक सदस्य के लिए वहाँ एक अलग कक्ष बनाया गया था। अभिमन्यु बचपन से ही राम के साथ था।अवंतिका रघुवंशी के निधन के बाद से उसने जैसे अपने जीवन का एक मौन संकल्प बना लिया था।
उस दिन से लेकर आज तक उसने राम का साथ शायद ही कभी छोड़ा हो।सुख हो या संकट, यात्रा हो या एकांत, मौन हो या संघर्ष..अभिमन्यु सदैव उसके साथ खड़ा रहा।उनकी मित्रता समय के साथ किसी औपचारिक संबंध की सीमा से बहुत आगे निकल चुकी थी।
वे एक-दूसरे के जीवन के ऐसे अभिन्न अध्याय बन चुके थे, जिन्हें अलग करके पढ़ना संभव ही नहीं था।
कुछ ही देर बाद गाड़ियों का काफिला रघुवंशी मेंशन के मुख्य द्वार पर आकर रुका।मेंशन का विशाल फाटक पहले से खुला था, मानो अपने सबसे प्रिय सदस्य की प्रतीक्षा कर रहा हो।
मुख्य द्वार पर पूरा रघुवंशी परिवार खड़ा था। सबसे आगे पंचदेव रघुवंशी और जानकी रघुवंशी थे। उनके साथ अर्जुन, केतकी और परिवार के अन्य सदस्य भी वहीं खड़े थे। सभी की निगाहें एकटक उसी गाड़ी पर टिकी थीं, जिसमें राम आने वाला था।
जैसे ही गाड़ी प्रांगण में आकर रुकी, वहाँ उपस्थित हर चेहरे पर अलग-अलग भाव उभर आए। किसी की आँखों में प्रतीक्षा थी, किसी के चेहरे पर संतोष, तो किसी के मन में वर्षों से दबे भाव आज उमड़ पड़े थे।
धीरे-धीरे गाड़ी का दरवाज़ा खुला...। राम जैसे ही मुख्य द्वार पर आकर रुका, जानकी जी आरती की थाल लिए उसके सामने आ खड़ी हुईं। वर्षों की प्रतीक्षा आज उनकी आँखों में उतर आई थी। काँपते हाथों से उन्होंने पूरे विधि-विधान के साथ राम की आरती उतारी। आरती पूर्ण होते ही उन्होंने थाल चुपचाप केतकी की ओर बढ़ा दी।
इसके बाद स्वयं को रोक पाना उनके लिए संभव नहीं रहा।उन्होंने आगे बढ़कर राम को अपने सीने से लगा लिया।
राम भी बिना कुछ कहे उनके आलिंगन में समा गया। उसने धीरे से अपनी बाँहें दादी के चारों ओर फैला दीं। वर्षों का बिछोह उस एक स्पर्श में जैसे पिघलने लगा। जानकी जी के काँपते हाथ कभी उसके सिर पर ठहरते, कभी उसके कंधों को सहलाते, तो कभी उसके चेहरे को छूकर मानो यह विश्वास कर लेना चाहते कि उनका राम सचमुच उनके सामने खड़ा है।
"मेरा बच्चा..."उनका स्वर भर्रा गया।"कितने सालों बाद देखा है तुझे..."। वे उससे थोड़ा अलग हुईं। दोनों हथेलियों में उसका चेहरा थामकर देर तक उसे देखती रहीं। उनकी आँखें उसके चेहरे पर बीते वर्षों का हिसाब खोज रही थीं।
फिर होंठ काँपे और शिकायत ममता पर भारी पड़ गई।तुझे अपनी इस बूढ़ी दादी की ज़रा भी याद नहीं आई...? उन्होंने भीगी आँखों से उसे देखते हुए कहा, "बोल न, राम... क्या एक बार भी मन नहीं किया अपनी दादी से मिलने का?"
राम अब भी मौन खड़ा था।उसने धीरे से अपनी पलकों को झुका लिया। एक क्षण के लिए उसकी दृष्टि दादी के काँपते हाथों पर ठहर गई। फिर उसने बहुत आदर से उन दोनों हाथों को अपने हाथों में ले लिया।
"ऐसी बात नहीं है, दादी माँ..." उसका स्वर धीमा था, पर हर शब्द दिल से निकला था। "आपसे दूर ज़रूर था... लेकिन आपका आशीर्वाद और आपके स्नेह से कभी दूर नहीं हुआ।"
इतना कहकर उसने झुककर जानकी जी के हाथ अपने माथे से लगा लिए।
"अगर मेरी वजह से आपको दुख पहुँचा है... तो आपका यह राम आज भी वही है... जो बचपन में आपकी डाँट सुनकर सबसे पहले आपकी गोद में ही आकर छिप जाता था।"
जानकी जी की आँखों से आँसू ढुलक पड़े। उन्होंने बिना कुछ कहे फिर से राम का सिर अपने सीने से लगा लिया।
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जानकी जी अब भी राम का चेहरा दोनों हथेलियों में थामे उसे निहारे जा रही थीं। मानो पंद्रह वर्षों की दूरी को अपनी आँखों में समेट लेना चाहती हों। वह बार-बार उसके माथे को सहलातीं, कभी उसके चेहरे को देखतीं, तो कभी उसे अपने सीने से लगा लेतीं।
उधर पंचदेव रघुवंशी काफ़ी देर से यह सब देख रहे थे।उनके मन की अवस्था भी कुछ भिन्न न थी। वह भी अपने पोते को बाँहों में भर लेना चाहते थे, उसके सिर पर हाथ फेरना चाहते थे, उससे दो बातें करना चाहते थे; पर जानकी जी थीं कि अपने पोते पर से अपना अधिकार हटाने का नाम ही नहीं ले रही थीं।
आख़िरकार उन्होंने हल्की-सी खीझ और मुस्कान छिपाते हुए कहा,"बस भी कीजिए, जानकी जी।"
उनकी आवाज़ सुनकर सबकी दृष्टि उनकी ओर उठ गई।
उन्होंने बनावटी नाराज़गी से आगे कहा, "बच्चा इतने वर्षों बाद घर लौटा है और आप सारा रोना-धोना यहीं निपटा लेंगी क्या? ज़रा उसे घर के भीतर तो आने दीजिए।"फिर राम की ओर देखते हुए बोले, "हम भी यहीं खड़े हैं। हमसे भी तो मिलने दीजिए उसे।"
पंचदेव जी की बात सुनते ही वहाँ खड़े सब लोगों के चेहरों पर हल्की-सी मुस्कान फैल गई। जानकी जी ने भी आँसू पोंछते हुए उनकी ओर देखा और अनमने मन से राम का हाथ छोड़ दिया, मानो अपना सबसे अनमोल ख़ज़ाना कुछ पल के लिए किसी और को सौंप रही हों।
जानकी जी अभी राम को अपने स्नेह से मुक्त भी न कर पाई थीं कि तभी पीछे से किसी ने आकर उन्हें और पंचदेव जी, दोनों को एक साथ अपनी बाँहों में भर लिया।
"दादू... दादी...!"अचानक हुए इस हमले से दोनों एक पल को चौंक पड़े।"अरे...!" जानकी जी के मुँह से अनायास ही निकला।
अभिमन्यु दोनों के कंधों पर अपनी ठुड्डी टिकाए बच्चों की तरह मुस्कुरा रहा था। उसके चेहरे पर वही पुरानी शरारत थी, जिसने न जाने कितनी बार इस घर की उदासी को हँसी में बदल दिया था।
"वाह...!" उसने बनावटी शिकायत के साथ कहा, "सारा प्यार तो अपने इस अकड़ू पोते पर ही लुटा दिया। ज़रा अपने इस गोद लिए पोते की भी नज़र उतार लीजिए।"यह कहते हुए उसने अपने दोनों हाथ फैलाकर स्वयं की ओर इशारा किया।
"देखिए तो... कितना सोणा-सा मुंडा खड़ा है आपके सामने। पता नहीं कितनी चुड़ैलों की नज़र लगी होगी मुझे।"इतना कहकर वह एकाएक रुक गया।उसने गर्दन घुमाकर राम की ओर देखा, फिर होंठ दबाकर मुस्कुराया।
"...क्योंकि आपके इस अकड़ू पोते को तो किसी की नज़र लग ही नहीं सकती।"उसकी अधूरी बात सुनकर सब उसकी ओर देखने लगे।अभिमन्यु ने जानबूझकर कुछ क्षण का मौन रखा, फिर मासूमियत से बोला,"अरे... पूछिए तो सही क्यों?"
जानकी जी की आँखों की नमी अब मुस्कान में बदल चुकी थी। उन्होंने हँसी रोकते हुए पूछा, "अच्छा... बता, क्यों?"
"क्योंकि..." अभिमन्यु ने नाटकीय अंदाज़ में लंबी साँस ली, "उसकी नज़र उतारने के लिए तो पहले इसकी आँखो मे कोई देख तो ले। जो कोई इसकी डरवानी आँखो मे देखने की हिम्मत ही कँहा करता है, जो साहब क़ो नजर लग जाये।"
उसकी बात पूरी होते ही वातावरण में फैली भारी नीरवता जैसे टूट गई। अभी तक जो आँखें आँसुओं से भीगी थीं, उन्हीं आँखों में अब हँसी की चमक उतर आई। पंचदेव जी ने मुस्कुराकर सिर झुका लिया। राम उसे बस घूर रहा था। लेकिन वह था अभिमन्यु राठौर, जिसे किसी का डर नही था।
जानकी जी ने स्नेहभरी झिड़की देते हुए उसके सिर पर हल्की-सी चपत लगाई।"चुप कर, बदमाश! इस उम्र में भी पिटने का बड़ा शौक है तुझे।"फिर उन्होंने उसी स्नेह से उसकी भी आरती उतारी, जैसे कुछ क्षण पहले राम की उतारी थी।आरती पूरी होते ही उन्होंने उसके गाल पर प्यार से हाथ फेरा।
"अब खुश?"अभिमन्यु बच्चों की तरह मुस्कुराकर बोला,"अब आया मज़ा..."।उसकी बात सुनते ही सब एक बार फिर हँस पड़े।जानकी जी ने मुस्कुराते हुए सबको भीतर चलने का इशारा किया।
"चलो... अब घर के अंदर चलें। बहुत देर से दरवाज़े पर ही खड़े हैं।"
सभी लोग हॉल के भीतर आ चुके थे। घर का वातावरण अब पहले से कहीं अधिक आत्मीय हो गया था। बरसों बाद लौटे राम को हर कोई अपने पास बैठाना, उससे बातें करना और उसे जी भरकर देख लेना चाहता था।
राम और अभिमन्यु ने एक-एक करके घर के सभी बड़ों के चरण स्पर्श किए। राम जैसे ही अर्जुन रघुवंशी के पैरों की ओर झुका, उन्होंने तुरंत उसके कंधों को थाम लिया और झुकने नहीं दिया। अगले ही क्षण उन्होंने उसे अपने सीने से लगा लिया। उनकी हथेली बड़े स्नेह से राम की पीठ पर फिर रही थी। बरसों से मन में जो खालीपन था, वह जैसे उस एक आलिंगन से भरता जा रहा था।
"तू तो हमेशा मेरे दिल में रहा है, बेटा।" अर्जुन का स्वर भीग उठा। "आ... अपने चाचू के गले लग जा। बरसों से तेरा इंतज़ार कर रहा था। आज लगता है, मन की सारी बेचैनी खत्म हो गई।"
राम भी उसी अपनत्व से उनसे लिपट गया।"कैसे हैं आप, चाचू? "अब बिल्कुल ठीक हूँ... मेरे शेर।"
दोनों अभी अलग भी नहीं हुए थे कि पीछे खड़ी केतकी मुस्कराकर बोलीं, "बस भी कीजिए। सारा प्यार आप ही कर लेंगे, या अपनी छोटी माँ को भी उसके बेटे से मिलने देंगे?"अर्जुन मुस्कराते हुए एक ओर हट गए।
तभी अभिमन्यु उनके गले लग गया और दोनो माँ बेटे के मिलन क़ो देखने लगे।
राम तुरंत झुककर उनके चरण स्पर्श करने लगा। केतकी जी ने उसे उठाया और बिना कुछ कहे उसके माथे को चूम लिया। उनकी आँखें भीग उठीं। दोनों हथेलियों में उसका चेहरा थामे वे देर तक उसे निहारती रहीं।
समय ने उसके व्यक्तित्व को और अधिक गंभीर, संतुलित और आकर्षक बना दिया था, किंतु उनकी दृष्टि में वह आज भी वही बालक था, जिसकी एक मुस्कान पर उनका सारा दिन खिल उठता था।
उन्होंने स्नेह से उसके गाल पर हाथ फेरा। कुछ कहना चाहा, पर शब्द होंठों तक आकर ठहर गए। ममता कभी-कभी बोलती नहीं, केवल स्पर्श बनकर बहती है। राम ने भी चुपचाप उनके हाथों पर अपना हाथ रख दिया। उस मौन में जितना अपनापन था, उतना शायद शब्दों में कभी नहीं हो सकता था।
केतकी देर तक उसे निहारती रहीं, जैसे बरसों की कमी अपनी नज़रों से पूरी कर लेना चाहती हों।
"नज़र न लगे मेरे बच्चे को..."उन्होंने धीरे से उसके गाल पर हाथ फेरते हुए कहा। बहुत बदल गया है तू... लेकिन मेरे लिए आज भी वैसा ही है। अब तो ज्यादा हैंडसम हो गया।"
राम ने आदर से उनका हाथ अपने हाथों में ले लिया और हल्की मुस्कान के साथ बोला, "कैसी हैं आप... छोटी माँ?"बस इतना सुनना था।केतकी की आँखों की नमी मुस्कान में बदल गई।
पुरे हॉल मे कुछ पल के लिए माहौल बेहद भावुक हो चुका था।
अभी केतकी जी का स्नेहिल स्पर्श राम के चेहरे पर ठहरा ही था कि अचानक दो चहकती हुई आवाज़ें पूरे हॉल में गूँज उठीं, "भैया...!"
राम ने जैसे ही मुड़कर देखा, रूहिका और सौम्या दौड़ती हुई उसकी ओर चली आ रही थीं। अगले ही क्षण दोनों एक साथ उससे आकर लिपट गईं।"भैया...!"उनकी आवाज़ में बरसों की प्रतीक्षा थी, तो बचपन की वही निश्छल खुशी भी।
राम के होंठों पर सहज मुस्कान फैल गई। उसने बिना किसी प्रयास के दोनों को एक साथ अपनी बाजु में उठा लिया। अगले ही पल वह उन्हें लेकर एक बार गोल-गोल घूम गया।रूहिका और सौम्या की खिलखिलाहट पूरे हॉल में गूँज उठी।
वहाँ उपस्थित हर व्यक्ति अनायास ही मुस्कुरा उठा। बरसों बाद उस घर में फिर वही पुरानी रौनक लौट आई थी।दोनों को नीचे उतारते ही रूहिका ने होंठ फुलाकर पूछा,"भैया... हमारा गिफ्ट?"
राम ने बनावटी गंभीरता से उसकी ओर देखा, फिर बिना कुछ कहे अपने पीछे खड़े लोगों की ओर इशारा कर दिया।सबकी नज़र उधर गई।उसके साथ आए कुछ लोग हाथों में तरह-तरह के बड़े-बड़े बैग लिए खड़े थे।
राम मुस्कुराया, " "जाओ... देख लो। जो पसंद आए, सब तुम्हारा।"इतना सुनना था कि रूहिका और सौम्या एक-दूसरे का हाथ पकड़कर खुशी से उधर दौड़ पड़ीं। उनकी उत्सुकता देखकर हॉल में एक बार फिर हँसी की हल्की-सी लहर दौड़ गई।
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रघुवंशी मेंशन का वातावरण अब पहले से बिल्कुल बदल चुका था। कुछ देर पहले तक जहाँ बरसों के बिछोह की नमी थी, वहीं अब घर के हर कोने में अपनापन और हल्की-हल्की हँसी घुल गई थी। बड़े-बूढ़ों के चेहरे पर संतोष था, बच्चों के मन में उत्साह, और घर की दीवारें भी जैसे वर्षों बाद लौटे अपने बेटे का स्वागत कर रही थीं।
इसी बीच पहली मंज़िल की कोरिडोर से एक जोड़ी आँखें लगातार नीचे का दृश्य देख रही थीं।
वह मृत्युंजय रघुवंशी थे।
वर्षों बाद अपने बेटे को सामने देखकर भी वह सीढ़ियाँ उतरकर उसके पास नहीं आ सके। न जाने कितनी बार मन ने चाहा कि एक बार उसे पुकार लें, उसके सिर पर हाथ फेर दें, उसे अपने सीने से लगा लें; पर उनके कदम जैसे वहीं थम गए थे।
राम केवल उनका बेटा ही नहीं था, वह उनकी पहली पत्नी अवंतिका रघुवंशी की अंतिम निशानी भी था।
मृत्युंजय की दृष्टि राम के चेहरे पर ठहर गई। समय ने उसके व्यक्तित्व को निखार दिया था। चेहरे की बनावट, चाल, कद-काठी और व्यक्तित्व—सब कुछ उन्हीं पर गया था। केवल उसकी आँखें... वे आँखें बिल्कुल अवंतिका जैसी थीं। वही गहराई, वही शांत गंभीरता और वही अनकहे भाव।
मृत्युंजय उन आँखों को देर तक देखते रहे। शायद उनमें वह अपना बीता हुआ जीवन खोज रहे थे।
तभी उनकी दृष्टि धीरे-धीरे राम से हटकर सामने गई।माधुरी रघुवंशी राम की ओर बढ़ रही थीं।
उन्हें देखते ही मृत्युंजय के चेहरे का भाव बदल गया। उनकी भौंहें अनायास तन गईं। आँखों की गंभीरता और गहरी हो उठी।
उन्होंने धीरे से अपना अंगूठा दूसरी उँगलियों पर रगड़ना शुरू कर दिया। यह उनकी पुरानी आदत थी। जब भी मन किसी गहरे द्वंद्व या चिंता में उलझता, उनकी उँगलियाँ अनायास ही यही हरकत करने लगती थीं।अब उनकी पूरी दृष्टि माधुरी पर टिक गई थी।
रघुवंशी मेंशन के हॉल में अभी हँसी की हल्की-हल्की गूँज शेष थी कि तभी ऊपर से आती रेशमी साड़ी की सरसराहट ने सबका ध्यान अपनी ओर खींच लिया।
सीढ़ियों से उतरती हुई माधुरी रघुवंशी धीरे-धीरे हॉल में आ रही थीं।
समय ने उनकी आयु अवश्य बढ़ाई थी, पर उनके व्यक्तित्व की आभा पर उसका कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा था। उनकी चाल में एक ऐसा संयमित आत्मविश्वास था, जिसे देखकर सहज ही आभास हो जाता था कि वे इस घर की बड़ी बहू हैं।
पर उनके हॉल में उतरते ही वातावरण की सहजता जैसे कहीं खो गई।
अभी कुछ क्षण पहले तक जो हँसी पूरे हॉल में बिखरी हुई थी, वह एकाएक सिमट गई। कई चेहरे अनायास ही गंभीर हो उठे। किसी ने कुछ नहीं कहा, फिर भी वहाँ उपस्थित लगभग हर व्यक्ति की आँखों में एक-सा भाव उतर आया।
किन्तु उन बदलते भावों से माधुरी क़ो कोई फर्क नही पड़ा। उसने एक बार भी इधर-उधर देखने का प्रयास नहीं किया। उसके कदम सीधे राम के सामने आकर थम गए।
कुछ क्षण तक वे उसे देखती रहीं।फिर शांत स्वर में कहा, "राम... तुम कब आये ! हमे तो किसी ने बताया ही नही। "मधुरी ने एक नजर केतकी पर डाली लेकिन केतकी क़ो जैसे फर्क ही नही पड़ा था।
राम ने कोई रिस्पांस नही किया बल्कि वह अपने भाई बहन के बीच उसी तरह से मौजूद रहा। जैसे माधुरी के आने से पहले था ।उसको यु खुद क़ो नजरअंदाज करते देख माधुरी खुन के घूंट पी कर रह गयी थी। फिर अगले पल उसने कटाक्ष मे कहा,
"अजीब बात है... तुम्हें मैं और तुम्हारे पापा दिखाई ही नहीं दिए। जिनके सबसे पहले चरण स्पर्श करने चाहिए थे या फिर... न्यूयॉर्क में रहकर रघुवंशी खानदान के संस्कार भी वहीं छोड़ आए हो?"
उसका स्वर ऊँचा नहीं था, फिर भी हॉल का एक-एक व्यक्ति वह कटाक्ष स्पष्ट सुन रहा था।
एक पल में वातावरण फिर बदल गया।अर्जुन जी के चेहरे की मुस्कान गायब हो चुकी थी। केतकी जी की उँगलियाँ अनायास एक-दूसरे में उलझ गईं। अभिमन्यु की आँखों में क्षणभर के लिए तीखापन उतर आया। विवान और अथर्व ने भी एक-दूसरे की ओर देखा, पर किसी ने कुछ नहीं कहा।
सबकी दृष्टि अब केवल राम पर थी।किन्तु राम की मुद्रा में रत्तीभर भी परिवर्तन नहीं आया।
वह उसी शांत भाव से खड़ा रहा। उसके चेहरे पर न प्रतिवाद था, न आक्रोश, न ही कोई असहजता। जैसे उसने उन शब्दों को सुना ही नही और मौजूद शख्स उसके लिए कोई महत्व नही रखता हो।
उसकी चुप्पी, उस क्षण, किसी भी उत्तर से कहीं अधिक गहरी थी।
उसका यु सबके सामने कोई रिस्पांस नही देना माधुरी क़ो बिलकुल गवारा नही थी और इस वक़्त उसने अपनी जहर की जुबान खोल दी।
राम का सबके सामने यूँ शांत खड़े रहना और एक शब्द तक न कहना, माधुरी को बिल्कुल स्वीकार नहीं हुआ। उन्हें जैसे उसी प्रतिक्रिया का इंतज़ार था, जो उन्हें मिली ही नहीं। राम की खामोशी ने उनके भीतर का आक्रोश और बढ़ा दिया।
उन्होंने एक गहरी साँस ली और इस बार उनके शब्दों की धार पहले से कहीं अधिक तीखी थी।
"तुम बचपन में भी बदतमीज़ थे... और इतने साल बाद भी वैसे ही हो। बाहर रहकर भी अपनी हरकतें नहीं सुधार सके।"
उनके शब्द पूरे हॉल में गूँज उठे।कुछ क्षण पहले तक जो घर अपनों के मिलन की खुशियों से भरा था, वहाँ अब एक अजीब-सी खामोशी फैल गई। कोई कुछ नहीं बोला, लेकिन हर चेहरा बता रहा था कि माधुरी की बातें सबको चुभ रही थीं।
माधुरी अभी और कुछ कहने ही वाली थीं कि तभी हॉल में एक तेज़ आवाज़ गूँजी, " मॉम...!"
सबकी नज़र एक साथ विवान की ओर उठ गई।अब तक शांत खड़ा विवान पहली बार अपनी माँ के सामने खड़ा था। उसके चेहरे पर गुस्सा साफ़ दिखाई दे रहा था।
"आपकी प्रॉब्लम क्या है?" उसकी आवाज़ में दबा हुआ आक्रोश अब खुलकर सामने आ चुका था। "आपको किसी ने यहाँ बुलाया था? यहाँ आकर आप होती कौन हैं भाई के लिए कुछ भी कहने वाली?"
वह बिना रुके बोलता गया।"किस हक़ से आप उनसे इस तरह बात कर रही हैं?"उसने एक पल के लिए राम की ओर देखा, फिर वापस माधुरी की तरफ़ मुड़ा।
"आपको तो अच्छी तरह मालूम है... भाई ने आपको कभी अपनी माँ का दर्जा दिया ही नहीं। आप उनके लिए हमेशा डैड की दूसरी पत्नी रहेगी। हर बार मुँह उठा कर क्यों चली आती है आप !""
उसके आख़िरी शब्दों के साथ ही पूरा हॉल जैसे स्तब्ध रह गया। किसी ने शायद नहीं सोचा था कि विवान एक दिन अपनी ही माँ से इस तरह सवाल करेगा। उसकी आवाज़ में केवल गुस्सा नहीं था, बल्कि वर्षों से भीतर दबा हुआ सच भी था, जो आज सबके सामने आ गया था।
राम की खामोशी माधुरी को भीतर तक चुभ रही थी। उन्हें जैसे उसी पल का इंतज़ार था जब राम अपना संयम खो बैठे, लेकिन सामने खड़ा युवक बिना किसी प्रतिक्रिया के शांत भाव से उन्हें देख रहा था। उसकी यही चुप्पी माधुरी के भीतर वर्षों से जमा आक्रोश को और भड़का रही थी।
उन्होंने तीखी नज़र विवान की ओर घुमाई। अपने ही बेटे का इस तरह सबके सामने उनके विरुद्ध खड़ा होना उन्हें असहनीय लगा। आवेश में उन्होंने बिना एक क्षण सोचे अपना हाथ उठाया और विवान के गाल पर थप्पड़ मारने के लिए उनका हाथ उठा.... लेकिन अगले ही पल..!
किसी को समझने का अवसर तक नहीं मिला कि हुआ क्या। अगले ही पल विवान राम के पीछे खड़ा था। राम ने इतनी तीव्र गति से उसकी बाँह पकड़कर उसे अपनी ओर खींच लिया था कि माधुरी का उठता हुआ हाथ हवा में ही ठहरकर रह गया।
राम अब भी वहीं खड़ा था। उसके चेहरे पर पहले जैसी ही शांति थी। एक हाथ सहजता से विवान की बाँह पर टिका हुआ था, मानो उसे यह भरोसा दे रहा हो कि जब तक वह सामने खड़ा है, कोई हाथ उस तक पहुँच नहीं सकता।
माधुरी ने गुस्से मे अपना हाथ नीचे कर लिया। उनका चेहरा क्रोध से तमतमा उठा था। दाँत भींचे वे कुछ क्षण तक केवल राम को देखती रहीं। उन्हें पहली बार एहसास हुआ कि वर्षों पहले का वह लड़का अब वैसा नहीं रहा।उन्होंने अपने भीतर उबलते विष को शब्दों का रूप दिया।
"विवान... तुम अपनी माँ से इस लहज़े में बात करोगे?" उनका स्वर अब पहले से कहीं अधिक कठोर था। "और जिसके लिए तुम मुझसे बहस कर रहे हो..." उनकी दृष्टि राम पर टिक गई, "...वो आखिर आ ही गया।"
उनके होंठों पर व्यंग्य तैर उठा।"क्यों, राम...? इतने साल बाद लौटने की वजह क्या है? इस घर की याद आ गई... या अपने हिस्से की?"
राम फिर भी मौन रहा।उसकी चुप्पी अब उत्तर नहीं, चुनौती बन चुकी थी। जितना वह शांत खड़ा था, माधुरी का स्वर उतना ही तीखा होता जा रहा था।
"पंद्रह साल पहले तुम्हारी..." उन्होंने लगभग ज़हर उगलते हुए कहा, "...वो बदचलन..."! माधुरी के
शब्द पूरा होने से पहले ही...।
राम की नजर उठी....बस एक नजर ...और उस नजर ने पूरे हॉल का वातावरण बदल दिया।
उसकी आँखों में पहली बार दबा हुआ ज्वालामुखी दिखाई दिया। चेहरा अब भी निर्विकार था, मगर आँखों की लालिमा बता रही थी कि अब बात उसके स्वाभिमान की नहीं रही थी।
उसने अपने लिए हर अपमान सह लिया था...लेकिन अपनी माँ के लिए नहीं। उस क्षण हॉल में उपस्थित हर व्यक्ति ने महसूस किया कि माधुरी ने वह सीमा लाँघ दी है, जहाँ से लौटना अब संभव नहीं था।
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Conti......... 6


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