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1. His Dark Obssession

मुंबई... सपनों का शहर, मायानगरी और रसूखदार लोगों की पहचान। यह वह शहर है जहाँ हर दिन नई कहानियाँ जन्म लेती हैं। बड़े-बड़े उद्योगपति, नामी हस्तियाँ, फिल्मी सितारे और प्रभावशाली लोग इसी शहर की शान हैं। लेकिन इन सभी नामों के बीच एक ऐसा परिवार भी है, जिसका नाम सम्मान और रुतबे के साथ लिया जाता है—रघुवंशी परिवार।

रघुवंशी परिवार केवल अपनी दौलत के लिए ही नहीं, बल्कि अपने प्रभाव, प्रतिष्ठा और वर्षों से कायम सम्मान के लिए पूरे शहर में प्रसिद्ध था। उनके नाम का इतना प्रभाव था कि बड़े-बड़े लोग भी उनसे संबंध बनाने को अपना सौभाग्य समझते थे। शहर में उनके कई उद्योग, व्यवसाय और सामाजिक संस्थाएँ थीं, जिनकी वजह से उनका नाम हर जगह आदर के साथ लिया जाता था।

आज उसी रघुवंशी परिवार की आलीशान हवेली में सुबह से ही असामान्य चहल-पहल थी। पूरे घर में नौकर-चाकर इधर-उधर भाग रहे थे। कोई मुख्य द्वार की सजावट में लगा था, कोई बैठक को व्यवस्थित कर रहा था, तो कोई रसोई में विशेष पकवानों की तैयारी कर रहा था। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो घर में कोई बहुत बड़ा उत्सव होने वाला हो।

इसी बीच पूरे घर में एक तेज़ और अधिकारपूर्ण आवाज़ गूँजी, "अरे... विशम्भर कहाँ है?"

आवाज़ सुनते ही सभी नौकर एक पल के लिए ठिठक गए।"जल्दी-जल्दी सारे काम निपटा लो। किसी भी चीज़ में कोई कमी नहीं रहनी चाहिए। आज... पूरे पंद्रह साल बाद मेरा पोता घर लौट रहा है।"

उनकी आवाज़ में उत्साह भी था, अपनापन भी और वर्षों की प्रतीक्षा की कसक भी। पंद्रह वर्षों का लंबा इंतज़ार अब समाप्त होने वाला था। यही कारण था कि वे बार-बार हर व्यवस्था स्वयं देख रही थीं। उनके मन में बस एक ही बात थी। जब उनका पोता इस हवेली में कदम रखे, तो उसके स्वागत में कोई कमी न रह जाए।

तभी किसी ने उन्हें समझाते हुए कहा, "जानकी जी, आप इतनी क्यों परेशान हो रही हैं? शमशेर, विवान और अथर्व तो उसे लेने गए हैं न। फिर आप इतनी चिंता क्यों कर रही हैं?"

यह थे रघुवंशी परिवार के मुखिया पंचदेव रघुवंशी। उम्र भले ही ढल चुकी थी, लेकिन उनके व्यक्तित्व का तेज आज भी वैसा ही था। उनके एक फैसले की अहमियत पूरे परिवार में सबसे ऊपर मानी जाती थी।

तभी उनके पीछे से उनकी छोटी बहू केतकी की आवाज़ सुनाई दी।

"वही तो, बाबूजी। तब से मैं माँजी को समझा रही हूँ कि ज़्यादा परेशान मत होइए। आपका बीपी हाई हो जाएगा। सारी तैयारियाँ पूरी हो चुकी हैं। हवेली का हर कोना सज चुका है, रसोई का सारा इंतज़ाम भी हो गया है। अब बस उसके आने का इंतज़ार है।"

केतकी ने प्यार से जानकी जी का हाथ थाम लिया, लेकिन जानकी जी की बेचैनी कम होने का नाम ही नहीं ले रही थी।उन्होंने गहरी साँस ली और भरी हुई आवाज़ में कहा,

"अरे... मैं कैसे परेशान न होऊँ? मैं उसकी दादी हूँ। तुम सब जानते हो ना... वह किस वजह से और किन हालात में हम सबको छोड़कर गया था। उस दिन को याद करके आज भी दिल काँप उठता है।"

कुछ पल के लिए वहाँ सन्नाटा छा गया। किसी के पास उनके सवाल का कोई जवाब नहीं था।

जानकी जी की आँखें नम हो गईं। उन्होंने काँपती आवाज़ में आगे कहा,

"इतनी-सी उम्र में उसने अपने दम पर ऐसा मुकाम हासिल किया है कि आज उसका बिज़नेस दुनिया का नंबर वन बिज़नेस बन चुका है। यह बात किसी से छिपी नहीं है। हर जगह उसी का नाम है, उसी की कामयाबी के चर्चे हैं।"

उन्होंने एक पल रुककर गहरी साँस ली। उनके चेहरे पर खुशी से ज़्यादा डर साफ़ दिखाई दे रहा था।

"...और डर तो मुझे इस बात का है कि कहीं फिर से... कुछ ऐसा न हो जाए, जो पंद्रह साल पहले हुआ था। मैं दोबारा उसे खोने की हिम्मत नहीं रखती।"यह कहते-कहते उनकी आवाज़ भर्रा गई।

फिर उन्होंने धीरे-धीरे अपना चेहरा घुमाया और गंभीर नज़रों से अपने पति पंचदेव रघुवंशी की ओर देखते हुए पूछा,

"आपने... मृत्युंजय को रोक दिया है ना? वह उसके सामने नहीं आएगा... है ना?"

जानकी जी के इस प्रश्न के साथ ही वहाँ मौजूद सभी लोगों के चेहरों का रंग उड़ गया। माहौल एकाएक भारी हो गया।

पंचदेव जी ने हल्की-सी खिन्नता के साथ उनकी ओर देखा और शांत किंतु दृढ़ स्वर में बोले,

"कैसी बातें कर रही हो, जानकी जी? हम ऐसा कैसे कर सकते हैं? वह उसका पिता है। चाहे बेटा उससे कितना भी नाराज़ क्यों न हो, चाहे उसके मन में कितनी भी शिकायतें क्यों न हों... लेकिन इस सच को कोई नहीं बदल सकता कि मृत्युंजय रघुवंशी उसका पिता है।"

उन्होंने आगे कहा, "बाप-बेटे के रिश्ते में दूरियाँ आ सकती हैं, नाराज़गी आ सकती है... मगर रिश्ता कभी खत्म नहीं होता। आज पंद्रह साल बाद बेटा इस घर लौट रहा है। ऐसे समय में हम एक पिता को उसके बेटे से मिलने से कैसे रोक सकते हैं?"

सुबह के ठीक चार बजे उनका प्राइवेट जेट भारत की धरती पर उतरा। रनवे पर पहिए छूते ही जहाज़ धीरे-धीरे रफ्तार कम करने लगा।करीब पंद्रह साल बाद राम भारत लौटा था।

जेट का दरवाज़ा खुला। सबसे पहले ब्लैक थ्री-पीस सूट पहने राम बाहर आया। उसके चेहरे पर वही गंभीरता, वही ठंडापन और वही रौब था, जिसकी चर्चा आज पूरी दुनिया में होती थी। उसकी तेज़ निगाहें सामने टिकी थीं, लेकिन जैसे ही उसने भारत की मिट्टी पर पहला कदम रखा, उसके भीतर वर्षों से दबा अतीत अचानक यादों बनकर आँखों में उतर आया।

पंद्रह साल पहले इसी देश से वह किन हालात में गया था... यह याद उसके सीने में दबी हुई आग की तरह आज भी ज़िंदा थी। उन यादों का दर्द एक पल के लिए उसकी आँखों में साफ़ झलक उठा, लेकिन अगले ही क्षण उसने अपने चेहरे के भावों को पहले की तरह कठोर बना लिया।

उसके पीछे खड़ा अभिमन्यु बिना कुछ कहे उसे देख रहा था।

राम ने अपने मन की बात कभी किसी से नहीं कही थी, लेकिन कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जिन्हें शब्दों की ज़रूरत नहीं पड़ती। अभिमन्यु उन रिश्तों में से एक था। बचपन से लेकर आज तक वह राम का सबसे सच्चा और सबसे करीबी दोस्त था। राम के चेहरे पर आई ज़रा-सी खामोशी भी वह बिना उसकी ओर देखे महसूस कर लेता था।

शायद इसी वजह से कहा जाता है कि ज़िंदगी में एक ऐसा दोस्त ज़रूर होना चाहिए, जो आपकी ख़ामोशी भी पढ़ सके।

अभिमन्यु धीरे-धीरे उसके पास आया और बिना कुछ कहे पीछे से अपना हाथ राम के कंधे पर रख दिया। उस एक स्पर्श में दिलासा भी था, अपनापन भी और यह भरोसा भी कि वह हर हाल में उसके साथ खड़ा है।

राम ने एक गहरी साँस ली। फिर बिना कुछ बोले अपनी आँखों में उतर आई नमी को वहीं रोक लिया। उसने जेब से अपना काला चश्मा निकाला और आँखों पर लगा लिया, ताकि उसके चेहरे पर उभरते भाव किसी की नज़र में न आएँ।इसके बाद वह बिना पीछे मुड़े आगे बढ़ गया।उसने न अभिमन्यु की ओर देखा, न ही उससे कुछ कहा।

अभिमन्यु उसकी इस ख़ामोशी और बेरुख़ी का आदी था। वह हल्का-सा मुस्कुराया, फिर बेबसी में सिर हिलाकर उसके पीछे-पीछे चल पड़ा। उसे मालूम था कि राम बोलता कम है, लेकिन जब भी उसे किसी अपने की ज़रूरत होगी, वह हमेशा उसकी परछाईं बनकर उसके साथ रहेगा

राम रघुवंशी के भारत लौटने की ख़बर पूरे देश में आग की तरह फैल चुकी थी। बिज़नेस जगत से लेकर मीडिया तक, हर जगह बस उसी की चर्चा थी। आख़िर ए.आर. एम्पायर के मालिक और रघुवंशी खानदान के सबसे बड़े बेटे की पंद्रह साल बाद वतन वापसी कोई मामूली ख़बर नहीं थी।

सुबह होने से पहले ही एयरपोर्ट के बाहर देश के लगभग सभी बड़े न्यूज़ चैनलों की ओ.बी. वैन पहुँच चुकी थीं।कैमरे प्रवेश द्वार पर टिके हुए थे और पत्रकार बेसब्री से उस एक पल का इंतज़ार कर रहे थे, जब राम रघुवंशी बाहर निकले और उन्हें उसकी पहली तस्वीर मिल सके।

दिलचस्प बात यह थी कि वहाँ मौजूद लगभग किसी ने भी राम रघुवंशी को कभी देखा नहीं था।

हर कोई सिर्फ़ एक झलक पाने के इंतज़ार में था।

हर पत्रकार के मन में एक ही सवाल था, "आख़िर राम रघुवंशी दिखते कैसे हैं?"

दुनिया उनकी दौलत, उनके साम्राज्य और उनकी कामयाबी के बारे में सब कुछ जानती थी, लेकिन उनके चेहरे से लगभग हर कोई अनजान था।इसकी वजह भी बेहद स्पष्ट थी।

राम रघुवंशी को कभी भी शोहरत का शौक़ नहीं था। उन्होंने अपने पूरे करियर में खुद को मीडिया और सोशल मीडिया से पूरी तरह दूर रखा था। न वह किसी अवॉर्ड फ़ंक्शन में नज़र आता था, न किसी बिज़नेस समिट में मंच साझा करता था , न इंटरव्यू देता और न ही अपनी निजी ज़िंदगी को सार्वजनिक होने देता था ।

ए.आर. एम्पायर के नाम से पूरी दुनिया परिचित थी, लेकिन उसके मालिक का चेहरा आज भी एक रहस्य बना हुआ था।

यदि किसी कार्यक्रम में उनकी उपस्थिति अनिवार्य भी होती, तो वहाँ सुरक्षा इतनी कड़ी होती कि बिना उनकी स्पष्ट अनुमति कोई कैमरा उनकी तस्वीर तक नहीं ले सकता था। उनके सुरक्षा प्रमुख पहले ही मीडिया की पहुँच सीमित कर देते थे, और बिना अनुमति खींची गई किसी भी तस्वीर को सार्वजनिक करने की हिम्मत शायद ही कोई करता।

यही कारण था कि आज एयरपोर्ट के बाहर मौजूद सैकड़ों कैमरे केवल एक तस्वीर के लिए बेताब थे।

हर किसी को उम्मीद थी कि पंद्रह साल बाद लौट रहा यह रहस्यमयी उद्योगपति आज पहली बार दुनिया के सामने आएगा।

लेकिन कोई नहीं जानता था कि राम रघुवंशी अपनी ज़िंदगी अपनी शर्तों पर जीता था... और उसकी एक झलक पाना भी किसी उपलब्धि से कम नहीं माना जाता था।

राम और अभिमन्यु चारों ओर से अपने सुरक्षा गार्डों के घेरे में थे। उनकी सुरक्षा इतनी कड़ी थी कि कोई चाहकर भी उनके पास नहीं पहुँच सकता था। कुछ ही देर में सभी अपनी-अपनी गाड़ियों में बैठकर रवाना हो गए।

तभी राम का फोन बज उठा।मोबाइल स्क्रीन पर "विवान" का नाम चमक रहा था। राम के होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आई। उसने कॉल रिसीव की।

"हेलो..."लेकिन उसके कुछ कहने से पहले ही दूसरी तरफ से विवान की घबराई हुई आवाज़ गूँज उठी, "भाई! आप कहाँ हो?"

राम शांत स्वर में बोला, "छोटे, मैं निकल गया हूँ।"

"क्या...? लेकिन क्यों? हम तो आपको लेने आने वाले थे।"राम ने बिना किसी भाव के जवाब दिया, "कोई बात नहीं।"विवान ने तुरंत पूछा, "आप रघुवंशी मेंशन जा रहे हैं ना?"

"नहीं, विवान।" राम की आवाज़ इस बार पहले से अधिक गंभीर थी। मैं पहले अवंतिका विला जाऊँगा... उसके बाद रघुवंशी हाउस आऊँगा।विवान कुछ कहना चाहता था। उसके होंठों तक शब्द आए भी, लेकिन राम ने उसे बोलने का मौका ही नहीं दिया।

बाकी बात बाद में होगी।इतना कहकर राम ने बिना उसकी बात सुने ही फोन काट दिया।फोन कटते ही कार के भीतर कुछ क्षणों के लिए गहरा सन्नाटा छा गया। राम की निगाहें कार की खिड़की से बाहर टिकी थीं, मानो उसका मन पहले ही अवंतिका विला पहुँच चुका हो।

"हेलो... भाई...!"लेकिन दूसरी तरफ से कॉल कटने की आवाज़ आई।विवान ने एक गहरी साँस ली और धीरे-धीरे फोन नीचे कर लिया। क्या हुआ? अथर्व ने उसकी ओर देखते हुए पूछा।

विवान फीकी मुस्कान लाने की कोशिश करते हुए बोला, "कुछ नहीं... राम भैया पहले अवंतिका विला जाएँगे, उसके बाद रघुवंशी हाउस आएँगे।"यह कहते-कहते उसकी आवाज़ धीमी पड़ गई। चेहरे पर साफ़ उदासी झलक रही थी।

अथर्व ने उसके कंधे पर हाथ रखा और मुस्कुराते हुए कहा,"तो इसमें उदास होने की क्या बात है? अगर वो नहीं आ रहे, तो हम ही उनसे मिलने चलते हैं।"

फिर उसने ड्राइवर सीट पर बैठे शमशेर की ओर देखा।"क्यों, शमशेर काका?"

शमशेर के चेहरे पर बरसों पुरानी यादों से भरी मुस्कान उभर आई।

"हाँ-हाँ, क्यों नहीं छोटे मालिक।" उन्होंने स्नेह से कहा, "बहुत साल हो गए... राम बेटा को देखे हुए। पता नहीं अब कितना बदल गया होगा... लेकिन मेरे लिए तो आज भी वही नन्हा-सा राम है, जो पूरे घर में शरारतें करता फिरता था।"

शमशेर की बात सुनकर विवान की आँखों के सामने बचपन की कई धुंधली यादें तैर गईं।एक पल में उनका चेहरा बुझ-सा गया। आँखों में हल्की नमी उतर आई। उहोने चुपचाप खिड़की के बाहर देखा, जैसे अतीत की कोई कसक फिर से दिल में जाग उठी हो।

अथर्व ने उसकी खामोशी महसूस की, लेकिन कुछ नहीं कहा। वह जानता था कि कुछ रिश्तों की दूरी केवल वर्षों की नहीं होती... उनके बीच अधूरी यादें, अनकहे सवाल और अनगिनत एहसास भी खड़े होते हैं।

अवंतिका विला...शहर की भीड़-भाड़ से दूर, हरियाली की गोद में बसा अवंतिका विला आधुनिक वास्तुकला का अद्भुत नमूना था। इसकी हर ईंट, हर दीवार और हर कोना एक कहानी कहता था।

यह केवल एक आलीशान विला नहीं था... यह राम के लिए उसकी माँ की यादों का मंदिर था।

उसने यह विला अपनी माँ अवंतिका रघुवंशी की स्मृति में बनवाया था। यहाँ रखी हर वस्तु, हर चित्र, हर फूल और हर सजावट में उनकी पसंद की झलक दिखाई देती थी। ऐसा लगता था मानो इस घर की हवा में भी उनकी मौजूदगी आज तक महसूस की जा सकती हो।

चारों ओर रंग-बिरंगे फूलों से सजे विशाल बगीचे, बीचों-बीच संगमरमर से बना भव्य फव्वारा और काँच की दीवारों वाला आधुनिक विला अपनी शालीनता और भव्यता से किसी स्वर्ग से कम नहीं लगता था।

कार मुख्य द्वार पर आकर रुकी।राम बिना कुछ कहे धीरे-धीरे अंदर बढ़ गया।जैसे ही उसने मुख्य हॉल में कदम रखा, उसकी नज़र सीधे सामने वाली दीवार पर टिक गई।वहाँ सुनहरे नक्काशीदार फ्रेम में उसकी माँ अवंतिका रघुवंशी की आदमकद तस्वीर लगी थी।

तस्वीर में उनके चेहरे पर वही स्नेहभरी मुस्कान थी... वही ममता से भरी आँखें, जो हर बार राम को यह एहसास दिला देती थीं कि माँ आज भी उसके साथ हैं।

राम वहीं ठिठक गया।उसकी आँखें तस्वीर से हटने का नाम ही नहीं ले रही थीं। चेहरे पर कोई भाव नहीं था, लेकिन उसकी खामोशी बहुत कुछ कह रही थी। वर्षों से दिल में दबे अनगिनत जज़्बात उसकी आँखों में उतर आए थे।

कुछ पल तक वह बस अपनी माँ को निहारता रहा... जैसे उन बेजान तस्वीर वाली आँखों में भी उसे अपनी दुनिया दिखाई दे रही हो।

पीछे खड़ा अभिमन्यु चुपचाप उसे देख रहा था।वह जानता था कि इस समय राम को किसी शब्द की नहीं, केवल अपनी माँ की यादों के साथ कुछ पल अकेले रहने की ज़रूरत है।इसलिए वह बिना कुछ बोले वहीं खड़ा रहा।

पूरे हॉल में गहरा सन्नाटा पसरा था। बस दीवार पर टंगी तस्वीर के सामने जलता हुआ छोटा-सा दीपक अपनी शांत लौ से मानो यह बता रहा था कि कुछ रिश्ते कभी समाप्त नहीं होते... वे समय के साथ केवल यादों में बस जाते हैं।

अथर्व और विवान जैसे ही अवंतिका विला के भीतर पहुँचे, विवान ने राम को आवाज़ देने के लिए होंठ खोले, पर शब्द बाहर न आ सके। उसकी दृष्टि सामने खड़े राम पर ठहर गई।

राम निश्चल खड़ा था। उसकी आँखें सामने दीवार पर टँगी अवंतिका रघुवंशी की बड़ी-सी तस्वीर पर जमी थीं। उस क्षण जैसे उसे अपने आसपास किसी की उपस्थिति का भान ही न था।

विवान की दृष्टि भी उसी तस्वीर पर जा ठहरी। कुछ क्षण वह मौन खड़ा रहा। फिर उसके होंठों से धीमा-सा स्वर निकला,"बड़ी माँ..."!उसने एक बार फिर तस्वीर की ओर देखा और चुपचाप लौटने के लिए मुड़ गया।

उसी समय राम का गंभीर स्वर पीछे से सुनाई दिया, "छोटे..."। राम ने पीछे मुड़कर नहीं देखा था।

राम की आवाज़ सुनते ही विवान के कदम वहीं थम गए। वह भी बिना पीछे मुड़े खड़ा रह गया।अथर्व ने एक बार राम की ओर देखा, फिर विवान के पास आकर धीमे स्वर में बोला," तू तो भाई से मिलने आया था, फिर बिना मिले ही क्यों लौट रहा है?"

विवान ने कोई उत्तर नहीं दिया। वह मौन खड़ा रहा। उसकी चुप्पी ही उस समय उसका उत्तर थी।

इस समय न तो रात पूरी तरह विदा हुई थी, न ही दिन का प्रकाश धरती पर उतरा था। दोनों के बीच का वह शांत, धुंधला पहर अवंतिका विला पर अपनी निस्तब्ध चादर बिछाए हुए था।

उस विशाल कक्ष में इस समय केवल चार रिश्ते उपस्थित थे...राम, अभिमन्यु, विवान और अथर्व।

विवान मौन था। राम ने जब उसे पलट कर जबाब नही दिया तो वह बाहर जाने के लिए अपने कदम बढ़ा दिए थे कि पीछे से राम की आवाज़ आई, "छोटे... इधर आओ।"

विवान के कदम रुक गए। उसके आँखो मे नमी की लहर आ गई थी। वह अपने बड़े भाई की आवाज़ पर मुड़ा तो उसने देखा की राम घूम चुका था। दोनों भाई एक दूसरे क़ो सालों बाद देख रहे थे। जहाँ विवान के चेहरे पर खुशी और जुदाई का अहसास भर आया था। वही राम के होठो पर हलकी स्नेह भरी मुस्कान आ गयी थी।

राम ने बिना कुछ कहे अपनी दोनों बाँहें फैला दीं। वह निमंत्रण शब्दों का नहीं, अपनत्व का था।विवान एक क्षण तक उसे देखता रहा। फिर जैसे भीतर बँधा हुआ सारा संकोच - दर्द एकाएक टूट गया। वह तेज़ी से बढ़ा और राम के सीने से आ लगा।उसने राम को कसकर बाँहों में भर लिया। किन्तु उसके होंठ अब भी मौन थे।

राम ने भी कस कर अपने भाई क़ो गले लगा लिया। उसने स्नेह से उसकी पीठ पर हाथ फेरा। कुछ क्षण उसे वैसे ही अपने सीने से लगाए रखा, फिर धीमे, किंतु दृढ़ स्वर में बोला, "कितनी बार कहा है तुझसे... अपने आप को दोष मत दिया कर।"

राम की बात सुनकर विवान के चेहरे पर हैरानी आ गया था। उसने खुद क़ो अलग किया और राम की आँखो मे देखने लगा। राम फिर अपने छोटे भाई की मन की बात समझ चुका था।उसने क्षण-भर रुककर विवान के कंधों को थामा और उसकी आँखों में देखते हुए कहा, " तू मेरा भाई था... है... और हमेशा रहेगा और मैं ईश्वर से हर जन्म में बस यही माँगूँगा कि तू ही मेरा छोटा भाई बनकर मेरे जीवन में आए।"

राम के स्वर में अटूट विश्वास था।विवान ने कोई उत्तर नहीं दिया। वह फिर से एक बच्चे की तरह राम से लिपट गया। उसने इस बार अपनी पकड़ और दृढ़ कर ली, मानो उस एक आलिंगन में वर्षों से भीतर दबे असंख्य भावों को आश्रय मिल गया हो।

अभिमन्यु और अथर्व शांत भाव से यह दृश्य देखते रहे। उस समय किसी के पास कहने के लिए कुछ नहीं था। कुछ क्षण ऐसे होते हैं, जहाँ शब्द अपना अर्थ खो देते हैं और केवल अपनापन बोलता है।

विवान कुछ क्षण तक उसी तरह राम से लिपटा रहा। जैसे बरसों से भीतर दबा हुआ सारा अपनापन उस एक आलिंगन में सिमट आया हो। उसकी उँगलियाँ राम की पीठ को कसकर थामे थीं, मानो एक बार फिर उसे खो देने का भय अभी भी उसके भीतर कहीं जीवित हो।

भर्राए हुए स्वर में उसके होंठ काँपे, "हाँ... और मेरी मॉम... सिर्फ़ अवंतिका माँ होंगी।"इतना कहना था कि उसका संयम टूट गया। उसने अपना चेहरा राम के कंधे में छिपा लिया। आँखों से बहते आँसू वर्षों का संचित अपराधबोध, बिछोह और प्रेम अपने साथ बहाए जा रहे थे।

आई मिस यू, भाई..."

राम ने स्नेह से उसके सिर पर हाथ फेरा। उसकी आँखें भी भीग चुकी थीं, पर होंठों पर वही शांत मुस्कान थी, जो हमेशा अपने अपनों को संभालने के लिए मुस्कुरा उठती थी।"आई मिस यू टू, छोटे।"

इतने में अथर्व की धीमी-सी आवाज़ सुनाई दी, "भाई... मैं भी..."राम ने गर्दन उठाकर उसकी ओर देखा। उसकी आँखों में वही स्नेह था, जिसमें कोई भेद नहीं था। उसने बिना कुछ कहे हल्के से अपना हाथ बढ़ाया और इशारे से अथर्व को अपने पास बुला लिया।

अथर्व एक पल को मुस्कुराया, फिर तेज़ी से बढ़कर दोनों से आ लगा।अब राम की बाँहों में उसके दोनों छोटे भाई थे। एक दाहिनी ओर, दूसरा बाईं ओर। वर्षों की दूरियाँ, शिकायतें और अधूरे पल उस आलिंगन में जैसे धीरे-धीरे पिघलने लगे थे। उस क्षण शब्दों का कोई महत्व नहीं था। तीनों की धड़कनें ही एक-दूसरे से संवाद कर रही थीं।

उसी समय पीछे खड़ा अभिमन्यु यह दृश्य देख रहा था। उसके होंठों पर मुस्कान थी, पर आँखों में हल्की-सी नमी उतर आई थी। आखिरकार उसने वही किया, जो वह हमेशा करता था...गंभीर माहौल को अपनी शरारत से हल्का कर दिया।

"अरे कमीनो...!" उसने बनावटी नाराज़गी जताते हुए कहा, "एक भाई यहाँ भी खड़ा है तुम्हारा। उसे तो ऐसे भूल गए, जैसे मैं किराए का हूँ! पंद्रह साल बाद मै भी लौटा हु !!"

तीनों ने एक साथ उसकी ओर देखा। अगले ही पल वातावरण में हँसी गूँज उठी।राम ने अपनी एक बाँह अभिमन्यु की ओर बढ़ा दी।"आ जा... तू भी कमीने ! तुझे तो एक्स्ट्रा अटेंसन चाहिए ।"अभिमन्यु मुस्कुराता हुआ आगे बढ़ा और अगले ही पल चारों एक-दूसरे के आलिंगन में बँधे खड़े थे।

कुछ दूर खड़े शमशेर की दृष्टि अब भी उन चारों पर टिकी हुई थी। उनके चेहरे पर ऐसी तृप्ति थी, जैसी किसी अपने बिछड़े परिवार को फिर से एक साथ देखकर होती है। बरसों से सीने में दबी एक अभिलाषा आज जैसे उनके सामने साकार खड़ी थी। उनके दोनों हाथ अनायास ही आशीर्वाद की मुद्रा में उठ गए। भीगी आँखों में स्नेह था, गर्व था और एक अनकही राहत भी।

राम ने जब उन्हें देखा, तो बिना कुछ कहे उनकी ओर बढ़ गया।"कैसे हैं आप, काका?"अपनी आँखों की नमी छिपाते हुए शमशेर मुस्कुराए।"मैं ठीक हूँ... मालिक।"

'मालिक' शब्द सुनते ही राम के चेहरे की मुस्कान हल्की-सी फीकी पड़ गई। वह बिना एक क्षण गँवाए झुककर उनके चरण स्पर्श करने लगा।शमशेर घबरा उठे। उन्होंने तुरंत उसके दोनों हाथ पकड़ लिए और लगभग खींचते हुए उसे सीधा कर दिया।

"न... नहीं, मालिक! यह क्या कर रहे हैं आप?"राम ने स्नेहभरी दृष्टि से उनकी ओर देखा।"काका... मालिक नहीं। सिर्फ़ राम।"शमशेर की पलकों में एक हल्का-सा कंपन दौड़ गया। उनके लिए यह संबोधन बदलना आसान नहीं था। जिन हाथों ने बचपन से उसे गोद में खिलाया था, उन्हीं हाथों ने वर्षों से उसे अपने मालिक के रूप में सम्मान दिया था। आदत और मर्यादा दोनों एक साथ उन्हें रोक रही थीं।

"लेकिन..."उन्होंने संकोच से कहा।राम ने कोई तर्क नहीं दिया। बस मुस्कुराकर उनकी आँखों में देखा और हल्के से सिर हिला दिया। उस मौन आग्रह में इतना अपनापन था कि शमशेर और कुछ कह ही न सके।उन्होंने काँपते हाथों से राम के सिर पर स्नेह रखा," ठीक है... राम।"यह कहते ही उनके चेहरे पर ऐसी सहज मुस्कान लौट आई, मानो बरसों पुराना कोई बोझ उतर गया हो।राम भी मुस्कुरा उठा।

"और बताइए, काका... शिवेन्द्र कैसा है?"शमशेर की आँखों में बेटे का नाम सुनते ही चमक लौट आई।वह ठीक है, राम और तुम्हारा इंतजार कर रहा है। बस जब तुम उसे अपने पास बुला लो।"राम ने सर हिला दिया। बस काका वह भी कल तक मेरे साथ होगा। उसकी ट्रेनिंग पूरी हो चुकी है अब तो उसे अपने काम क़ो करना। शमशेर कुछ ना कह सके। सिर्फ सर हिला कर हां कह दिया। क्योंकि उनको मालूम था की शिवेंद्र की क्या अहमियत थी राम की जिंदगी मे।

Conti.........

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